बुधवार, 5 सितंबर 2012

मीडिया के लिए मानदंड






सुप्रीम कोर्ट ने विचाराधीन मामलों की रिपोर्टिग के संदर्भ में बहस का दायरा बढ़ाते हुए अब अपराध, सेक्स और हिंसा से संबंधित मामलों को भी इसमें शामिल कर लिया है।
कोर्ट पहले से इस मुद्दे पर सुनवाई कर रहा है कि क्या अदालत की कार्यवाही की रिपोर्टिग के बारे में कोई दिशा-निर्देश तय किए जाने चाहिए? प्रधान न्यायाधीश जस्टिस एसएच कापड़िया के नेतृत्व वाली संविधान बेंच की टिप्पणियों से संकेत मिलता है कि अदालत ऐसे दिशा-निर्देशों की जरूरत महसूस करती है, जिससे किसी आरोपी को मुकदमा पूरा होने के पहले ही दोषी ठहरा देने, अत्यधिक रिपोर्टिग या चर्चा से न्यायिक कार्यवाही को प्रभावित करने, संबंधित पक्षों की निजता में घुसपैठ आदि जैसी प्रवृत्तियां रोकी जा सकें।
अच्छी बात है कि सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में अपनी बात रखने को इच्छुक हर पक्ष के लिए हस्तक्षेप के दरवाजे खुले रखे हैं। यह एक बेहद महत्वपूर्ण मसला है, जिसका संबंध प्रेस एवं अभिव्यक्ति की आजादी से है, जो लोकतंत्र की मूल आत्मा हैं। मीडिया के बारे में ऐसी कोई गाइडलाइन बनाए जाने का दूरगामी असर होगा। अगर ऐसे दिशा-निर्देश तय हुए तो मुमकिन है कि राज्य-व्यवस्था के दूसरे अंग भी ऐसे कदम उठाने के लिए प्रेरित हों। इस सिलसिले में यह विचारणीय है कि अतीत में अपने कई फैसलों में खुद सुप्रीम कोर्ट ने कुछ अपवादों को छोड़कर खुली सुनवाई एवं कार्यवाही के अबाधित प्रकाशन के पक्ष में व्यवस्था दी है।
जजों ने कहा है कि सुनवाई के प्रचार से लोगों में भरोसा पैदा होता है कि न्याय सही ढंग से किया गया। यह भी ध्यानार्थ है कि अखबारों की रिपोर्टिग इतिहास के दस्तावेज के बतौर मौजूद रहती है। यह आने वाली पीढ़ियों के लिए किसी दौर में कोर्ट के सामने आए संवैधानिक एवं अन्य मामलों को जानने का स्रोत होती है। ये बातें लोकतंत्र की सेहत से अभिन्न रूप से जुड़ी हैं। इसलिए इस मामले में सतर्कता की आवश्यकता है। बहरहाल, मीडिया आत्म-अनुशासन बरते, यह भी जरूरी है। आखिर कोर्ट आज इसीलिए इस मुद्दे पर विचार कर रहा है, क्योंकि मीडिया के एक हिस्से ने यह अनुशासन तोड़ा है।


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