शुक्रवार, 7 सितंबर 2012

आपातकाल की कहानी, भुक्तभोगी की जुबानी


खट्ठा-मीठा


विजय कुमार सिंघल 'अंजान'   Thursday June 28, 2012 मेरे मित्र श्री बिपिन किशोर सिन्हा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और महामना मालवीय मिशन के वरिष्ठ कार्यकर्ता हैं। आपात्-स्थिति लगाये जाते समय वे काशी हिन्दू वि.वि. में इंजीनियरिंग के विद्यार्थी थे। उस समय वि.वि. के तत्कालीन उपकुलपति की शह पर पुलिस ने वहाँ के संघ कार्यकर्ताओं पर कैसे जुल्म ढाये उसकी एक झाँकी उन्होंने अपने ही शब्दों में लिखी है। उस कहानी को मैं उनकी अनुमति से अपने ब्लाग में बिना किसी टिप्पणी के प्रस्तुत कर रहा हूँ, ताकि ब्लाग के पाठक उस स्थिति की भयावहता से परिचित हों।
आपात्काल, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय और स्मृतियां
इमर्जेन्सी की ३७वीं बरसी पर विशेष --
उस समय महानगरों को छोड़ दूरदर्शन की सुविधा कहीं थी नहीं। समाचारों के लिए आकाशवाणी और अखबारों पर ही निर्भरता थी। २५ जून, १९७५ की काली रात! आकाशवाणी ने रात के अपने समाचार बुलेटिन में यह समाचार प्रसारित किया कि अनियंत्रित आन्तरिक स्थितियों के कारण सरकार ने पूरे देश में आपात्काल (Emergency) की घोषणा कर दी है। इस दौरान जनता के मौलिक अधिकार स्थगित रहेंगे और सरकार विरोधी भाषणों और किसी भी प्रकार के प्रदर्शन पर पूर्ण प्रतिबंध रहेगा। समाचार पत्र विशेष आचार संहिता का पालन करेंगे जिसके तहत प्रकाशन के पूर्व सभी समाचारों और लेखों को सरकारी सेन्सर से गुजरना होगा। मुझे याद है - जनसत्ता के प्रथम पृष्ठ पर कोई समाचार नहीं छपा। पूरा पृष्ठ ही काली स्याही से पुता था।
 सचमुच लोकतंत्र और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के लिए काला दिन ही था २५, जून १९७५। इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा श्रीमती इन्दिरा गांधी के रायबरेली लोकसभा क्षेत्र से चुनाव को अवैध ठहराने तथा उन्हें छः साल तक चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगाने के बाद किसी अनहोनी की अपेक्षा तो सभी कर रहे थे, लेकिन ऐसा अधिनायकवादी कदम वे इतना शीघ्र उठा लेंगी, इसकी उम्मीद नहीं थी। इलाहाबाद हाई कोर्ट के निर्णय के बाद, नैतिकता के आधार पर इन्दिरा गांधी के इस्तीफ़े की उम्मीद थी, लेकिन सत्ता लोलुपता आड़े आ गई। उन्होंने इस्तीफ़ा देने के बदले लोकतंत्र का गला घोंटना ही उचित समझा। लोकबंधु जय प्रकाश नारायण का आन्दोलन अपने चरम पर था। कांग्रेस के कुशासन और भ्रष्टाचार से तंग आकर जनता ने भूराजस्व भी देना बंद कर दिया था। बिहार में प्रत्येक कस्बे, तहसील, जिला और राजधानी में भी जनता सरकारों का गठन हो चुका था। जनता ने अवैध सरकार के आदेशों कि अवहेलना शुरु कर दी थी। जनता सरकार के प्रतिनिधियों की बात मानने के लिए ज़िला प्रशासन भी विवश था। पूरे देश में इन्दिरा सरकार इतनी अलोकप्रिय हो चुकी थी कि चारो ओर से बस एक ही आवाज़ आ रही थी - इन्दिरा गद्दी छोड़ो। लेकिन इन्दिरा जी भला गद्दी क्योंकर छोड़तीं। उन्होंने सत्ता छोड़ने के बदले देश को तानाशाही की अंधी गलियों में धकेल दिया। ऐसा करने की सलाह उन्हें क्रेमलिन (सोवियत रूस) से प्राप्त हुई थी। रात में इमर्जेन्सी की घोषणा हुई और पौ फटने के पूर्व सभी विरोधी दलों (सी.पी.आई.को छोड़कर) के नेता जेलों में ठूंस दिए गए। न उम्र का लिहाज़ रखा गया न स्वास्थ्य का। लोकबंधु जय प्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, चरण सिंह, लाल कृष्ण अडवानी, जार्ज फर्नाण्डिस, पीलू मोदी आदि राष्ट्रीय स्तर के नेता आतंकवादियों की तरह रात क�� अंधेरे में घर से उठा लिए गए और मीसा (Maintenance of Internal Security Act)   के तहत अनजाने स्थान पर कैद कर किए गए। मीसा वह काला कानून था जिसके तहत बन्दी को कोर्ट में पेश करना आवश्यक नहीं था। इसमें ज़मानत का भी प्राविधान नहीं था। सरकार ने जिनपर थोड़ी रियायत की उन्हें डी.आई.आर. (Defence of India Rule)  के तहत गिरफ़्तार किया गया। यह थोड़ा नरम कानून था। इसके तहत गिरफ़्तार व्यक्ति को कोर्ट में पेश किया जाता था।
 मैं उन दिनों काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में इंजीनियरिंग के अन्तिम वर्ष का छात्र था। विद्यार्थी परिषद और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का सक्रिय कार्यकर्त्ता भी था। बी.एच.यू. के छात्र संघ पर विद्यार्थी परिषद का कब्जा था। अध्यक्ष पद पर मेरे ही कालेज के श्री दुर्ग सिंह चौहान (इस समय उत्तराखंड टेक्निकल युनिवर्सिटी के कुलपति), उपाध्यक्ष पद पर केदार नाथ सिंह ( संप्रति वाराणसी ग्रेजुएट कन्स्टीच्येन्सी से भाजपा के एम.एल.सी) और महासचिव के पद पर आद्या प्रसाद त्रिपाठी (वर्तमान में हिन्दू विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर) निर्वाचित हुए थे। तीनों विश्वविद्यालय परिसर के छात्रावास में ही रहते थे। एक झटके में तीनों को गिरफ़्तार कर लिया गया और मीसा के तहत अज्ञात जेल में भेज दिया गया। जेल में पहुंचते ही दुर्ग सिंह चौहान को तनहाई में डाल दिया गया। ज्ञात हो कि तनहाई एक सेल होता है जिसमें अत्यन्त गंभीर अपराध के अपराधी और खूंखार कैदी को रखा जाता है। सेल के कैदी को किसी से बात करने की इज़ाज़त नहीं होती। अधिक दिनों तक सेल में रखने पर कैदी के पागल हो जाने की संभावना होती है। कुलपति कालू लाल श्रीमाली चौहान जी से व्यक्तिगत खुन्नस रखते थे। उन्हें तनहाई में रखने का आदेश डी.एम. ने कुलपति की सलाह पर दी थी। छात्र संघ का अध्यक्ष, प्रथम श्रेणी में आनर्स के साथ एलेक्ट्रिकल इन्जीनियरिंग मे बी.टेक. डिग्रीधारी इन्जीनियर एक ही रात में कुलपति, कालू लाल श्रीमाली की निगाह में खूंखार अपराधी बन गया था। उस समय चौहान जी एम.टेक. के विद्यार्थी थे। पहली रात को मेरे दो घनिष्ठ मित्रों, सिविल इन्जीनियरिंग के ओम प्रकाश पूर्वे और एलेक्ट्रानिक्स के प्रदीप तत्त्ववादी को पुलिस ने हास्टल से उठा लिया। पूर्वे मुज़फ़्फ़रपुर (बिहार) का रहने वाला था और तत्त्ववादी नासिक का। पूर्वे का अपराध था कि उसने पिछले छात्र संघ के चुनाव में विद्यार्थी परिषद का जमकर प्रचार किया था और प्रदीप तत्त्ववादी का सबसे बड़ा अपराध था कि उसके चाचा, प्रोफ़ेसर शंकर विनायक तत्त्ववादी संघ के प्रान्त बैद्धिक प्रमुख और इन्जीनियरिंग कालेज में प्रोफ़ेसर थे।
   हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्थापक पंडित मदन मोहन मालवीय जी ने आर.एस.एस. को ला कालेज के परिसर में दो कमरों का एक भवन कार्यालय के लिए दिया था। कालू लाल श्रीमाली ने उसे एक ही रात में बुलडोज़र लगा कर ध्वस्त कर दिया और कबाड़ को विश्वनाथ मन्दिर से साइंस कालेज की ओर जाने वाली सड़क के किनारे डाल दिया। इस सड़क के दोनों किनारे पर जो फ़ूटपाथ बाद में बने, उसकी नींव में संघ कार्यालय की ही ईंटें हैं। मुझे इस बात का संतोष आज भी रहता है, और मैं कालू लाल श्रीमाली का आभार व्यक्त करता हूं कि उन ईंटों का इस्तेमाल उसने शौचालय के फ़र्श के निर्माण में नहीं किया। बाबर और औरंगज़ेब के कृत्यों से कम घृणित यह कृत्य नहीं था। सत्ता प्राप्त होने के बाद याद दिलाने के बावज़ूद भी न जनता पार्टी की सरकार ने कुछ किया और न भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने। महामना द्वारा प्रदत्त हमारा संघ कार्यालय इमर्जेन्सी में मिट्टी में मिला दिया गया, यह हूक आजीवन रहेगी।
 छात्रों में भयंकर असंतोष भड़का। गुप्त बैठकें हुईं। यह तय किया गया कि अगले दिन रात के आठ बजे सभी छात्रावासों से मशाल जुलूस निकाला जाएगा और प्रत्येक समीपवर्ती चौराहे पए इन्दिरा गांधी का पुतला फूंका जाएगा। अगले दिन नियत समय पर यह कार्यक्रम संपन्न किया गया। इंजीनियरिंग कालेज के छात्रों ने राजपुताना चौराहे पर इन्दिरा गांधी का पुतला फूंका। मशाल जुलूस का निकलना तथा पुतला फूंका जाना उपकुलपति कालू लाल श्रीमाली के मुंह पर एक करारा तमाचा था जिसने पूरे विश्वविद्यालय को एक सैनिक छावनी में बदल दिया। कुछ ही मिनटों में सिंहद्वार से छात्रावास वाली सड़क पर पी.ए.सी. की गाड़ियां दौड़ने लगीं। हमलोगों ने अनजाने चेहरों को हास्टल लौट जाने का निर्देश दिया तथा सक्रिय कार्यकर्ताओं को नूतन विश्वनाथ मन्दिर के सामने फैकल्टी रोड पर खड़े पेड़ों पर चढ़कर छुप जाने का निर्देश दिया। रात अंधेरी थी बूंदाबांदी भी शुरु हो गई। मैं अपने साथियों के साथ मन्दिर से थोड़ा आगे एक पेड़ पर छुप के बैठ गया। विश्वविद्यालय से बाहर जाना असंभव था। सिंहद्वार समेत सारे निकास द्वार बंद कर दिए गए। हास्टल में कांबिंग आपरेशन चलाया गया। जिस भी छात्र के कमरे में सरकार विरोधी या आर.एस.एस./विद्यार्थी परिषद/समाजवादी युवजन सभा का कोई पत्रक या साहित्य बरामद हुआ, उसे गिरफ़्तार कर लिया गया। जिनके कमरे बंद मिले, उन छात्रों पर विशेष नज़र रखने की हिदायत वार्डेन को दी गई। मैं और मेरे साथी रात भर पेड़ पर टंगे रहे। नीचे पुलिस की पेट्रोलिंग होती रही। सवेरा होने पर पेट्रोलिंग बंद हुई और हमलोग अपने-अपने हास्टल गए। हास्टल में पुलिस द्वारा मचाए गए ताण्डव की सूचना विस्तार से मित्रों ने दी। छात्रों का पक्ष ले रहे वार्डेन को भी उन्होंने गालियां दीं। मेरे कमरे पर पुलिस बार-बार जा रही थी लेकिन ताला बंद देख लौट आ रही थी। पुलिस के वांछितों की सूची में संभवतः मेरा नाम काफी ऊपर था। सैकड़ों छात्र गिरफ़्तार किए गए उस काली रात को।
मैंने उसी दिन से रात में हास्टल में रहना छोड़ दिया। क्लास खत्म होने के बाद अलग-अलग रास्ते से विश्वविद्यालय से बाहर निकलता और दूर के रिश्ते के अपने मामाजी के यहां रात गुजारता। पढ़ाई बुरी तरह बाधित हो रही थी। इस लुकाछिपी से तो जेल जाना ही अच्छा लग रहा था। संगठन में मुझसे वरिष्ठ कोई छात्र रह नहीं गया था। आन्दोलन को गतिमान रखने के लिए संघ द्वारा मुझे गिरफ़्तारी से बचने की सलाह दी जा रही थी। वैसे मैं तो कब का गिरफ़्तार हो गया होता यदि दिन में कालेज से गिरफ़्तारी होती। उपकुलपति कालू लाल लाल श्रीमाली दिन के उजाले से बहुत डरता था। इमर्जेन्सी के प्रारंभिक दिनों में वह दिन में कोई कार्यवाही नहीं करता था।
 हमने छात्रों का मनोबल बनाए रखने के लिए सक्रिय छात्रों की एक नई टीम बनाई। डा. प्रदीप सिंह, होमेश्वर वशिष्ठ, विष्णु गुप्ता, इन्द्रजीत सिंह, शरद सक्सेना, अरुण प्रताप सिंह और मैं, कोर ग्रूप के सदस्य थे। इन छः क्रान्तिकारियों का परिचय दिए बिना यह लेख अधूरा रहेगा।
 १. डा. प्रदीप सिंह - बिहार के सासाराम जिले का रहने वाला यह क्रान्तिकारी अत्यन्त जोशीला था। कठिन से कठिन कार्य करने के लिए सदैव प्रस्तुत रहता था। रज्जू भैया से उसने सशस्त्र क्रान्ति की अनुमति मांगी। बहुत समझाने-बुझाने के बाद वह अहिंसक आन्दोलन के लिए सहमत हुआ था। मेडिकल कालेज में वह तृतीय वर्ष का छात्र था, रुइया छात्रावास में रहता था। इस समय अपने गृह नगर में कार्यरत है।
 २. होमेश्वर वशिष्ठ - धौलपुर, राजस्थान का रहने वाला यह क्रान्तिकारी मूल रूप से कवि था। बड़ी सारगर्भित कविताओं की रचना करता था लेकिन सिद्दान्तों और आदर्शों के लिए मर-मिटने के लिए प्रतिबद्ध था। माइनिंग इन्जीनियरिंग का अन्तिम वर्ष का छात्र होमेश्वर सी.वी. रमन हास्टल में रहता था। इस समय धौलपुर में एरिया मैनेजर।
 ३. इन्द्रजीत सिंह - बलिया का निवासी मेटलरजिकल इन्जीनियरिंग के तृतीय वर्ष का छात्र था, मौर्वी हास्टल में रहता था। लंबाई साढ़े छः फीट की थी। भीड़ में भी अपनी लंबाई के कारण दूर से पहचाना जाता था। अत्यन्त मृदुभाषी लेकिन कुशाग्र बुद्धि का यह स्वयंसेवक किसी भी परिस्थिति में झुकता नहीं था। डिग्री हासिल करने के बाद इसने स्वयं का उद्योग लगाया। इसकी कंपनी राजपूत इन्जीनियरिंग में निर्मित थर्मोकपुल भारत मे सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।
 ४. अरुण प्रताप सिंह - ला अन्तिम वर्ष के छात्र, भगवान दास हास्टल में रहते थे। उम्र में हमलोगों से काफी बड़े थे। स्वाभाविक नेतृत्व क्षमता के धनी अरुण जी इमर्जेन्सी में हमलोगों के अभिभावक थे। मन-मस्तिष्क और शरीर से बलिष्ठ यह क्रान्तिकारी सोनभद्र का रहने वाला था। इस समय राबर्ट्सगंज के बड़े वकीलों में उनकी गणना होती है।
 ५. विष्णु गुप्ता - मौन तपस्वी, मेधावी, अल्पभाषी, दृढ़प्रतिज्ञ और विचारों पर अडिग। संघ को समर्पित निष्ठावान कार्यकर्त्ता। मेकेनिकल इन्जीनियरिंग के अन्तिम वर्ष का यह छात्र मेरा प्रिय मित्र और सहपाठी रहा है। हमदोनों धनराजगिरि छात्रावास में रहते थे। विष्णु बदायूं का रहनेवाला है। इस समय हिन्दुस्तान एरोनटिक्स लिमिटेड, लखनऊ मे महाप्रबंधक के पद पर कार्यरत है।
 ६ शरद सक्सेना - अत्यन्त मृदुभाषी यह क्रान्तिकारी लखनऊ का रहने वाला था। मेरा सहपाठी और अभिन्न मित्र शरद मेकेनिकल इन्जीनियरिंग के अन्तिम वर्ष का छात्र था और विश्वकर्मा हास्टल में रहता था। उसे हम अजातशत्रु कहते थे। उसके विचारों और कार्यों में गज़ब की दृढ़ता थी। जो सोच लेता था, करके ही दम लेता था। अपने दोस्तों की हरसंभव सहायता करने के लिए हमेशा तत्पर रहा करता था। इस समय नौ सेना के मझगांव डाक, मुंबई में महाप्रबंधक।
 एक दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह प्रो. राजेन्द्र सिंह (रज्जू भैया) ने सिद्धगिरि बाग के एक गुप्त स्थान पर स्वय़ंसेवकों की बैठक ली। उस बैठक तक पहुंचना भी किसी जासूसी फिल्म के दृश्य से कम रोमांचक नहीं था।
 मुझे यह सूचना मिली कि मुझे अपने पांच विश्वस्त सहयोगियों के साथ लंका स्थित पुषालकर जी के दवाखाने (ऊषा फ़ार्मेसी) में दिन के ठीक बारह बजे पहुंचना है - बिना किसी सवारी के पैदल। वहां छः सायकिल सवार पहले से उपस्थित थे। उन्होंने हमें अपनी-अपनी सायकिलों पर बैठाया और कमच्छा में एक स्वयंसेवक दिवाकर के घर के सामने छोड़ दिया। वहां दो आदमी पहले से तैनात थे। हममें से तीन को एक के पीछे जाना था और शेष तीन को दूसरे के पीछे। हम दो ग्रूपों में विभक्त हो चुके थे। दोनों ग्रूपों ने अलग-अलग गलियों में प्रवेश किया। पता नहीं किस रास्ते हम रमापुरा पहुंचे। रिले रेस की तरह हमलोग अलग-अलग स्वयंसेवकों के मार्गदर्शन में गोदौलिया, लक्सा, गुरुबाग होते हुए सिद्धगिरि बाग पहुंचे। वहां पहले से ही लगभाग ५० स्वयंसेवक एक हाल में उपस्थित थे। सर्वत्र शान्ति थी; कोई किसी से न परिचय पूछ रहा था, न बात कर रहा था। दिन के ठीक तीन बजे रज्जू भैया कक्ष में प्रकट हुए। मैंने पूर्व में उन्हें कई बार देखा था, लेकिन उस दिन उन्हें पहचान नहीं पाया। उनके चेहरे से उनकी मूंछे गायब थीं। सदा धोती-कुर्ते में रहनेवाले उस दिन पैंट-शर्ट पहने थे। उन्होंने हंसते हुए स्वयं अपना परिचय दिया -
 "मेरे नए हुलिए को देख आप शंकित न हों। मैं आपका रज्जू भैया ही हूं।"
 उनकी आवाज़ सुन मैं आश्वस्त हुआ कि वे रज्जू भैया ही थे। फिर भी मैं अपनी जिज्ञासा रोक नहीं पाया, पूछ ही लिया -
 "रज्जू भैया, आपने यह वेश क्यों धारण कर रखा है? आपकी मूंछे कहां चली गईं?"
 रज्जू भैया किसी भी गंभीर विषय को क्षण भर में ही सहज बना देते थे। हंसते हुए बोले -
 "मूंछें तो अपनी खेती हैं, जब चाहा उगा लिया, जब चाहा काट लिया। रही बात वेश-भूसा की, तो मैंने सोचा कि क्यों नहीं कालेज के दिनों को याद कर लिया जाय। इन्दिरा गांधी की खुफ़िया पुलिस मुझे इस रूप में देखने की आदी नहीं है।"
 हाल में एक ठहाका लगा और सभी तनावरहित हो गए।
 रज्जू भैया ने बताया - आर.एस.एस, जनसंघ, विश्व हिन्दू परिषद, भारतीय मज़दूर संघ, विद्यार्थी परिषद, सेवा समर्पण संस्थान, विद्या भारती आदि आनुषांगिक संगठन, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी, स्वतंत्र पार्टी, लोकदल, समाजवादी पार्टी इत्यादि सभी गैर कांग्रेसी पार्टियों का शीर्ष नेतृत्व जेल में है। पूज्य सरसंघचालक बाला साहब देवरस को भी गिरफ़्तार किया जा चुका है। सिर्फ़ वे और नानाजी देशमुख ही बाहर हैं। पूरे देश में लाखों स्वयंसेवको की गिरफ़्तारी हो चुकी है। देश के सभी जेलों में क्षमता से अधिक राजनैतिक बन्दी हैं। इसलिए अब और गिरफ़्तारी देने की आवश्यकता नहीं है। प्रचार तंत्रों पर सरकार ने पूर्ण नियंत्रण स्थापित कर लिया है। आकाशवाणी को इन्दिरा वाणी की उपाधि मिल चुकी है। पूरा देश सही समाचारों के लिए बी.बी.सी. पर आश्रित है। लेकिन सभी लोग बी.बी.सी. नहीं सुन पाते हैं। हमें अपने ढंग से अपने नेटवर्क के माध्यम से जनता तक सही बात पहुंचानी है। हमें लोकसंपर्क के माध्यम से अलख जगाने का काम करना है। इसके लिए अबतक गिरफ़्तारी से बचे कार्यकर्त्ताओं को गिरफ़्तारी से बचते हुए भूमिगत होकर कार्य करना है। समय-समय पर आपलोगों को आवश्यक निर्देश, पत्रक और साहित्य स्वयमेव उपलब्ध हो जाएगा। उसके सुरक्षित वितरण की जिम्मेदारी आपलोगों पर है। हमारा यह नेटवर्क पूरे देश में कार्य कर रहा है। शीघ्र ही इमर्जेन्सी कि यह काली रात समाप्त हो जाएगी। विजय ही विजय है।
 मात्र एक घंटे में बैठक समाप्त हो गई। कार्यकर्त्ता अपूर्व उत्साह से भर उठे। हम जैसे गए थे, वैसे ही वापस भी आए। मैं किन रास्तों से बैठक स्थल पर गया था, मुझे आज भी याद नहीं है। वैसे भी बनारस की गलियां किसी भूल-भुलैया से कम नहीं हैं।
 डा. प्रदीप ने पता नहीं कहां से एक हिन्दी टाइप राइटर और एक साइक्लोस्टाइल मशीन पा ली। केन्द्र से छपी सामग्री मिलने के पूर्व वह चार पृष्ठ का एक स्थानीय पत्र निकालना चाह रहा था। मुझे संपादन का दायित्व दिया। टाइप करने और छापने का काम उसने स्वयं लिया, वितरण के लिए नेटवर्क तो था ही। ‘रणभेरी’ नाम दिया गया उस पाक्षिक का। अभी चार ही अंक छपे थे कि एक रात पुलिस का छापा पड़ा और सारी सामग्री पुलिस उठा ले गई। उस रात प्रदीप हास्टल में नहीं था। किसी ने मुखबिरी की थी, लेकिन वह बच गया। विश्वविद्यालय प्रशासन ने उसके इस अपराध को बेहद संगीन माना। उसे हास्टल और विश्वविद्यालय से निकाल दिया। पुलिस ने उसपर मीसा तामील की लेकिन अपने लाख प्रयासों के बावज़ूद भी उसे गिरफ़्तार करने में सफल नहीं हो सकी। उसके घर कुर्की-ज़ब्ती की नोटिस भेजी गई। परिवार वालों को आसन्न संकट से बचाने के लिए कोर कमिटी ने प्रदर्शन के साथ प्रदीप को गिरफ़्तारी देने की सलाह दी। होमेश्वर वशिष्ठ, विष्णु और अरुण जी उसे अकेले भेजने के पक्ष में नहीं थे। एक दिन कृषि विद्यालय की प्रत्येक कक्षा में प्रदीप, अरुण जी और होमेश्वर ने घुसकर लंबा भाषण दिया। हमलोग पर्चे बांट रहे थे। यह कार्यक्रम लंच के पहले किया गया, लेकिन पुलिस नहीं आई। गिरफ़्तारी नहीं हो पाई। वहीं पर यह घोषणा की गई कि अपराह्न में यही क्रान्तिकारी आर्ट्स कालेज और साइंस कालेज के बीच खाली मैदान में भाषण देंगे।
 हमलोग वापस चले आए। दोपहर के बाद भोजनोपरान्त हमलोग साइंस कालेज पहुंचे। वहां पुलिस तैनात थी। छात्रों के क्लास में जाने के पूर्व प्रदीप, होमेश्वर, इन्द्रजीत और अरुण ��ी ने चारो��� दिशाओं में खड़े होकर छात्रों को संबोधित करना आरंभ कर दिया। आर्ट्स और साइंस कालेज के अधिकांश छात्र शीघ्र ही उपस्थित हो गए।  १००-५० की भीड़ अचानक जनसमूह में परिवर्तित हो गई। पुलिस अग्रिम कार्यवाही के लिए जबतक उच्चाधिकारियों और वी.सी. से निर्देश लेती, तबतक सभी पत्रक बंट चुके थे, क्रान्तिकारी भाषण जारी थे, जनसमूह के "इन्दिरा गांधी- मुर्दाबाद" के नारे से आकाश गूंज रहा था। नारेबाजी और तालियों की गड़गड़ाहट की आवाज़ संस्कृत संकाय और मिन-मेट तक पहुंच रही थी। आधे घंटे के बाद पुलिस ने कार्यवाही की, खूब लाठियां भांजी। भीड़ तितर-बितर हो गई, सैकड़ों घायल हुए। मुझे भी इमर्जेन्सी का प्रसाद मिला। दो-तीन लाठियां मेरे शरीर पर भी पड़ीं। लेकिन प्रदीप, होमेश्वर, इन्द्रजीत और अरुण जी डटे रहे। इन्द्रजीत कुछ ज्यादा ही जोश में था। योजनानुसार उसे गिरफ़्तारी नहीं देनी थी। उसे सिर्फ़ पत्रक बांटने थे। लेकिन वह भी भाषण में शामिल हो गया और अन्त तक डटा रहा। छात्रों के सामने पुलिस ने उनपर कोई प्रहार नहीं किया, सिर्फ़ गिरफ़्तार किया। चारो वीर योद्धा नारे लगाते रहे। चारों को भेलूपुर थाने में ले जाया गया। वहां पुलिस ने अपना गुस्सा उतारा। मेज़ पर उनकी हथेलियां ज़बर्दस्ती रखकर बेंतों की वर्षा की गई। लात-घूंसों और थप्पड़ों से जमकर पिटाई की गई। मां-बहन की गालियां दी गईं अलग से।
थानेदार नागेन्द्र सिंह चारों से बस एक ही सवाल बार-बार पूछता -
 "बता सालो, नानाजी देशमुख कहां है?"
इतनी यातना के बाद भी होमेश्वर हंसता रहा। उसने थानेदार से ही प्रश्न पूछा -
 "आप कहां तक पढ़े हैं?"
 "मैं इन्टर पास हूं।"
 "आपको पता है, जिन्हें आप इतनी यातना दे रहे हैं, वे कौन हैं?"
 "कौन हैं, तू ही बता," थानेदार ने रोब गांठते हुए कहा।
 होमेश्वर ने परिचय कराते हुए कहा -
 "ये हैं डा. प्रदीप, जिन्हें आप महीनों से तलाश रहे थे, लेकिन पकड़ नहीं पाए। आज इन्होंने स्वेच्छा से गिरफ़्तारी दी है। मैं और ये लंबू इन्द्रजीत इंजीनियरिंग के छात्र हैं और ये बलिष्ठ सज्जन,  अरुणजी इनका नाम है, वकील हैं। क्या आप जानना चाहेंगे कि आपलोग नानाजी को क्यों नहीं गिरफ़्तार कर पाए हैं?"
 "बताओ, बताओ, क्या कारण है?" थानेदार ने अपनी कुर्सी होमेश्वर के पास खिसका ली।
 "आप देख रहे हैं - आपके सामने दो इंजीनियर, एक डाक्टर और एक वकील बैठे हैं। हमारी योजनाएं ऐसे ही समझदार, जिम्मेदार और तेज लोगों द्वारा बनाई जाती हैं जिसकी भनक तक आप नहीं पा सकते हैं। इसके उलट आपकी योजनाएं आप जैसे हाई स्कूल-इन्टर पास मूढ़ चमचे और लाठी की भाषा में बात करने वाले मूर्खों द्वारा बनाई जाती हैं। आप क्या, आपके सात पुरखे भी नानाजी को नहीं पकड़ सकते।"
 इधर होमेश्वर की बात समाप्त हुई, उधर थानेदार नागेन्द्र सिंह ने चारों पर तड़ातड़ बेंत बरसाने शुरु कर दिए। और कर भी क्या सकता था? प्रदीप की उंगली टूटी, होमेश्वर का सिर, अरुण जी का हाथ और इन्द्रजीत का ललाट लहुलुहान हुआ। रात भर उन्हें लाकअप में रखा गया जिसमें पेशाब और पाखाने की दुर्गंध फैली थी। लाल चींटे (माटा) बदन पर चढ़ रहे थे। उन्हें न तो खाना दिया गया, न पीने का पानी। अगले दिन चारों मीसा के अन्तर्गत चालान कर दिए गए - अज्ञात जेल में, अनिश्चित काल के लिए।
 हमलोग इस भ्रम में थे कि दिन में गिरफ़्तारियां नहीं होती। अतः दिन में हमलोग भोजन, अपने हास्टल के मेस में ही करते थे। शनिवार का दिन था। भोजन करने के बाद शरद ने पिक्चर देखने की योजना बनाई। चित्रा सिनेमा में फिल्म "जय संतोषी माता" धूम मचा रही थी। हम तीनो मित्र - शरद, विष्णु और मैं, रिक्शा पकड़ने के लिए विश्वनाथ मन्दिर के पीछे ��ाली हास्टल रोड पर जा रहे थे। अचानक दो मोटर सायकिल हमलोगों के पास रुकी। उसपर तीन सवार थे। तीनों सामान्य वेश-भूसा में थे। एक आदमी ने सामने आकर विष्णु से पूछा -
 "आपका नाम विष्णु गुप्ता है?"
 "जी हां," विष्णु के मुख से इतना ही निकला था कि उस बलिष्ठ आदमी ने विष्णु को उठाकर मोटर सायकिल पर बैठा लिया। मैं और शरद चिल्लाते हुए पीछे-पीछे दौड़ते रहे लेकिन कुछ ही पलों में मोटर सायकिल आंखों से ओझल हो गई। विष्णु के अपहरण की सूचना हमने अपने वार्डेन को दी। वे हंसे और बोले -
 "विष्णु का अपहरण नहीं हुआ है, उसे पुलिस ले गई है।"
 वार्डेन को सब पता था। विष्णु के चाचा विश्वविद्यालय में ही भाषा विज्ञान विभाग में प्रोफ़ेसर थे। हमने उन्हें सूचना दी। कैंपस के बाहर कबीर नगर में रहते थे। एक योग्य वकील की सेवाएं ली गईं। विष्णु पर डी.आई.आर. तामील किया गया था, जिसमें ज़मानत हो सकती थी। दूसरे दिन विष्णु को कोर्ट में पेश किया गया। उसपर आरोप था कि उसने लंका चौराहे पर राष्ट्रविरोधी भाषण दिया और ‘इन्दिरा गांधी मुर्दाबाद’ का नारा लगाया।
 जज मुस्कुराया, पूछा -
 "गवाह हैं?"
 "जी हां हुजूर। ये वे तीन गवाह हैं, जो मौका-ए-वारदात पर हाज़िर थे।" सरकारी वकील ने तैयार जवाब दिया।
 "उन्हें पेश किया जाय।"
 गवाह पेश किए गए। उन्हें देखते ही जज साहब उखड़ गए। बोले -
 "वाराणसी में जहां भी सरकार विरोधी भाषण दिए जाते हैं, या मुर्दाबाद का नारा लगाया जाता है, ये तीनों हर जगह मौजूद रहते हैं। ये एक ही समय लंका में होते हैं, अस्सी में होते हैं, गोदौलिया में होते हैं, चौक में होते हैं, बेनिया बाग में होते हैं, लहुराबीर में होते हैं, कैन्ट में होते हैं और कचहरी में भी होते हैं। ये पुलिस के भाड़े के झूठे गवाह हैं। डी.आई.आर. के सभी मामलों में बतौर गवाह यही तीनों पेश किए जाते हैं। देखते-देखते मैं इनके चेहरे पहचान गया हूं। इनके नाम भी मुझे याद हैं। झूठी गवाही के जुर्म में इन्हें तत्काल हिरासत में ले लिया जाय और मुकदमा चलाया जाय। No further hearing. Bail granted to Mr. Vishnu Gupta."
 जज का न्याय सुन हम दंग रह गए। खुशी-खुशी हास्टल में आए। लेकिन विष्णु के कमरे पर विश्वविद्यालय का ताला लगा था। वार्डेन के हाथ में वी.सी. का परवाना था। विष्णु को हास्टल से निकाल दिया गया था। वह अपने सामान के साथ अपने चाचा के यहां चला गया। कोर्ट ने जिसे निर्दोष माना था, वी.सी. ने उसे अवांछित करार दिया। पन्द्रह दिन बाद एक समाचार मिला - विष्णु को ज़मानत देनेवाले जज का तबादला पिथौरागढ़ कर दिया गया।
 दिन बीत रहे थे। इमर्जेन्सी की ज्यादतियां बढ़ती जा रही थीं। जिस भी छात्र का नाम स्टूडेन्ट फ़ेडेरेशन आफ़ इण्डिया (SFI)  के कार्यकर्ता प्राक्टर आफ़िस में नोट करा देते, रात में वह गिरफ़्तार हो जाता। कांग्रेसियों से ज्यादा कम्युनिस्ट वी.सी. कि मुखबिरी कर रहे थे। व्यक्तिगत दुश्मनी भी खूब निकाली गई। महीनों कालू लाल श्रीमाली का आतंक चलता रहा। अब गिरफ़्तारियां दिन में भी शुरु हो गईं थीं। फ़र्मास्यूटिकल इन्जीनियरिंग के विद्वान प्रोफ़ेसर, डा. शंकर विनायक तत्त्ववादी को दिन में ही उनके विभाग से पुलिस ने उठा लिया। शिक्षक भी गिरफ़्तार होने लगे थे। हमें पहले से अधिक चौकन्ना होना पड़ा। एक कुलपति अपने ही छात्रों और शिक्षकों पर इतने निम्न स्तर पर आकर इतना घटिया प्रतिशोधात्मक और घृणित कर्यवाही कर सकता है, कालू लाल श्रीमाली उसके ज्वलन्त उदाहरण थे। सैकड़ों निर्दोष सिर्फ़ शंका में जेल भेजे गए, सैकड़ों का कैरियर बर्बाद हुआ।
 इमरजेन्सी के कुछ महीने बाद ही बांग्ला देश के राष्ट्रपति मुजीबुर्रहमान की हत्या कर दी गई। इन्दिरा गांधी के बेड रूम में एक परचा मिला। उसमें लिखा था - मुज़ीब ने आपकी ही सलाह पर आपके नक्शे कदम पर चलते हुए अपने देश में इमर्जेन्सी लगाई थी। उनका हश्र सारी दुनिया ने देखा। आपके बेड रूम में यह पर्चा पहुंच चुका है। आप जान गई होंगी कि हम भी जब चाहें आपके पास पहुंच सकते हैं। आपका भी वही हश्र हो सकता है जो मुज़ीब का हुआ। लेकिन सक्षम होते हुए भी हम ऐसा नहीं करेंगे क्योंकि हम अहिंसा में अटूट विश्वास करते हैं। हमारा धैर्य टूट जाय इसके पहले हिंसक प्रतिशोध बन्द कर दें।
 इस घटना के बाद इन्दिराजी के मन में भय व्याप्त हो गया। अचानक ज्यादतियां बन्द हो गईं, गिरफ़्तारियां थम गईं। हमें ही नहीं पूरे हिन्दुस्तान को संघ द्वारा छापे जा रहे पत्रकों और बुलेटिनों के द्वारा सही समाचार मिल रहा था। रणभेरी के बाद ‘कुरुक्षेत्र’ प्रकाशित हुआ जो बाद में ‘लोकमित्र’ में परिवर्तित हो गया। प्रत्येक छः महीने के बाद पत्र का नाम बदल दिया जाता था। वे लोग, जो हमलोगों से बात करने में डरते थे, अब पत्रकों की मांग करने लगे। वैसे हमलोगों ने इमर्जेन्सी के तुरन्त बाद पत्रकों के वितरण की अच्छी व्यवस्था कर रखी थी। कोई पढ़े या न पढ़े, हास्टल के प्रत्येक कमरे में पत्रक सही समय पर पहुंच ही जाता था। कालू लाल श्रीमाली की खुफ़िया एजेन्सी अन्त तक इस इसे बन्द नहीं करा सकी। धीरे-धीरे जेलों में बन्द छात्रों को ज़मानत भी मिलने लगी। यू.पी. के खूंखार मुख्यमंत्री हेमवती नन्दन बहुगुणा के स्थान पर नरम मिज़ाज़ वाले नारायण दत्त तिवारी को मुख्यमंत्री का ताज़ सौंपा गया। उनके आने के बाद हमलोगों ने काफी राहत महसूस की। एक दिन क्लास समाप्त होने पर मेरे वार्डेन ने मुस्कुराते हुए मुझसे कहा - You can come to hostel. There is no fear as such. उन्हीं वार्डेन ने मुझे एक बार सलाह दी थी कि मैं अपने कमरे में इन्दिरा गांधी का एक बड़ा सा पोस्टर लगा लूं; वे मुझे गिरफ़्तारी से बचा लेंगे। मेरा उत्तर था -
 " इन्दिरा गांधी ने लोकतंत्र की हत्या की है। मैं उससे घृणा करता हूं। गिरफ़्तार होना और फ़ांसी पर चढ़ जाना भी पसन्द करूंगा लेकिन जीते जी कमरे में उस तानाशाह की तस्वीर नहीं लगा सकता।"
 मैं हास्टल में आ गया। पढ़ाई को काफी नुकसान हुआ था। मैंने दिनरात मिहनत की। १९७६ में सम्मान सहित इन्जीनियरिंग की डिग्री ली। मैंने  एम.टेक. में एडमिशन ले लिया। मुझपर कोई पुलिस केस नहीं था। इमर्जेन्सी के खात्मे तक मैं बी.एच.यू. में ही रहा। इस समय अधीक्षण अभियन्ता (Superintending Engineer) हूं। जिस भी कार्यालय में कार्यभार ग्रहण करता हूं, सबसे पहले इन्दिरा गांधी का फोटो हटवा देता हूं। लोगों ने चमचागिरि में फोटो टांग दिए थे। वैसे स्पष्ट राजकीय आदेश है कि सरकारी कार्यालयों मे महात्मा गांधी को छोड़ किसी भी राजनेता की तस्वीर न लगाई जाय।
 लोकतंत्र के वे काले दिन कभी विस्मृत नहीं होंगे। ईश्वर न करे, हिन्दुस्तान को दुबारा इमर्जेन्सी के दिन देखने पड़े।
                    ॥इति॥

इस पोस्ट में व्यक्त विचार ब्लॉगर के अपने विचार है। यदि आपको इस पोस्ट में कही गई किसी भी बात पर आपत्ति हो तो कृपया यहाँ क्लिक करें|
इस पोस्ट पर टोटल (41) कॉमेंट | दूसरे रीडर्स के कॉमेंट पढ़े और अपना कॉमेंट लिखे|
यदि आपको कॉमेंट भेजने में कोई दिक्कत आए तो हमें इस पते पर बताएं -- nbtonline@indiatimes.co.in

रेटिंग 4.6/5 (36 वोट्स)
(वोट देने के लिए कर्सर स्टार पर ले जाएं और क्लिक करें)


 इस आर्टिकल को ट्वीट करें।

कॉमेंट:
छांटें:  सबसे नया | सबसे पुराने | पाठकों की पसंद (30) | सबसे ज्यादा चर्चित | लेखक के जवाब (14)

Praveen Sharma का कहना है:
June 30,2012 at 08:01 AM IST
विजय जी, इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि आपातकाल के दरम्यान नागरिकों को कष्ट नहीं हुआ........लेकिन कुछ अच्छे काम भी हुए, जैसे--- हराम-खोरी कम हुई, आवादी बढ़ाने वाली फैक्ट्री का उत्पादन कम हो गया.
जवाब दें
(Praveen Sharma को जवाब )- विजय कुमार सिंघल 'अंजान' का कहना है:
June 30,2012 at 06:56 PM IST
प्रवीण जी, आपातकाल में कुछ अच्छी बातें थीं, पर उसका उद्देश्य इंदिरा की कुर्सी बचाना था, एक दो अच्छे कार्य किसी दमन को सही नहीं ठहरा सकते.
जवाब दें

Vijay Balyan का कहना है:
June 29,2012 at 03:24 PM IST
अंजान जी, प्रणाम!
बड़े भाई लेख पढ़ने को दिल नही किया ...... कारण सॉफ है बहुत ही ज़्यादा लंबा है ...... वैसे अंदाज़ा लगाया है की अन्य लेखो की भाँति ये भी कुछ नयी ही जानकारी देगा .... किंतु अभी समय की कमी के कारण सिर्फ़ कोमेंट (शिकायत) कर रहा हूँ ........
जवाब दें
(Vijay Balyan को जवाब )- विजय सिंघल का कहना है:
June 30,2012 at 02:34 PM IST
पूरा लेख एक बार में ही डालकर मैने शायद ग़लती की. आगे ध्यान रखूँगा. अभी थोडा सा,आय लगाकर इसे पढ़ लीजिए. धन्यवाद.
जवाब दें

bijender का कहना है:
June 29,2012 at 11:20 AM IST
विजय जी, नमस्कार |
सुक्रिया
जवाब दें
(bijender को जवाब )- विजय सिंघल का कहना है:
June 30,2012 at 02:35 PM IST
धन्यवाद विजेंद्र जी.
जवाब दें

Kapil kumAR का कहना है:
June 29,2012 at 01:47 AM IST
यह लेख इक दम दुरुस्त है पर इसकी विवेचना इकतरफ़ा है
मुझे भी कुछ कुछ याद है 1975-77 का वक़्त
जो लोग कट्टर संघी थे या राजनीतिक थे उनपर गाज गिरी और उसमे काफ़ी लोग छोटे मोटे गुंडे , मिलावातखोर और बेईमान लाला भी थे जीनो ने मौके की नज़ाकत नही समझी और रासन की दुकानो , किराने की दुकानो मे खूब जमाखोरी की , कांग्रेस को आपातकाल के बहाने उनपर हाथ साफ करने का मौका मिल गया ,यह सच भी है उस वक़्त सारे गुंडे मवाली गायब हो गये थे , लाला लोग मिलावट नही करते थे, तोल भी बराबर था , प्रेस तो कल भी गुलाम थी और तब भी थी और आज भी है
जो सबसे बड़ा अत्याचार था वो की इंदिरा की बुराई पर उसे जेल मे डाला देना और कुछ लोगो को को सिर्फ़ शक़ के बिना पर जेल मे डाल देना नही तो आज भी वो दिन याद है
जब सिर्फ़ इक आदेश पर सारे गैर क़ानूनी चबूतरे , दुकानो के फैलाव लोगो ने अपने हाथो से खुद तोड़े और हटाए थे
अगर आपकी यादडस्त मे ऐसा कोई दिन है जब लोग अनिधकीर्ट ज़मीन पर अपने हाथो खुद कब्जा छोड़ दे या अपने हाथो से खुद मिलावटो समान फैंक देआपको मेरा नत नत नमस्कार ? तो ऐसा सिर्फ़ आपातकाल मे हुवा था फिर कभी नही , हिन्दुस्तान की गैरजीमेदार जनता , नौकरसही , व्यापारी सिर्फ़ डंडे की भाषा समझते है और कुछ नही
जवाब दें
(Kapil kumAR को जवाब )- Jaikumar Rana का कहना है:
June 29,2012 at 10:47 AM IST
कपिल जी आप भी अपनी जगह सही कहते है की कुछ लोग सिर्फ़ डंडे की भाषा समझते हैं मगर इस एमर्जेन्सी का उद्देश्य उन लोगो को ठीक करना नही बल्कि इंदिरा का सत्ता में बना रहना था. ज़रा सन्दर्भ पर भी ध्यान दे तो कितना अच्छा हो! क्या इंदिरा ने ये एमर्जेन्सी अनधिकृत कब्ज़े छुड़ाने और जमाखोरी, मिलावट खोरी, कालाबाज़ारी को रोकने के लिए एमर्जेन्सी लगाई थी?
जवाब दें
(Jaikumar Rana को जवाब )- विजय सिंघल का कहना है:
June 30,2012 at 02:37 PM IST
आपने आपातकाल के उद्देश्य को ठीक से समझा है, जयकुमार जी. पर सतनाम जैसों की समझ में यह बात नही आएगी.
जवाब दें
(Kapil kumAR को जवाब )- विजय कुमार सिंघल 'अंजान' का कहना है:
June 29,2012 at 08:34 AM IST
कपिल जी, आपका कहना भी एकदम सही है. बहुत से लोग केवल डंडे की भाषा ही समझते है. लेकिन उनको ठीक करने के लिए आपातकाल घोषित करने की ज़रूरत नहीं है. शासन को कड़ाई से लागू करके भी ऐसा किया जा सकता है.
जवाब दें

Kailash का कहना है:
June 28,2012 at 10:28 PM IST
सरजी, आज के हालत मे आप क्या समझते है ये इमरजेंसी नही है, आप कही भी पढ लो पूरा देश कलाम जी को प्रेसीडेंट के रूप मे चाहता है लेकिन क्या ये होगा
यहा से एक चमची गयी और और इन्होने नये चमचे को तय्यार कर लिया.......
आपके समय मे विपक्ष ने आपका साथ दिया होगा इस इमरजेंसी वो भी नही देंगे अगर देंगे तो सिर्फ़ अपनी रोटी सेकने के लिए.......
मे जब लखनऊ आया था तब उत्तरप्रदेश मे चुनावी महॉल था मुलायम जी मायावती जी एक दूसरे को और कुत्ति पार्टियो को खूब गलिया दे रहे थे आज सब प्रणब जी को बधाई दे रहे है.........जय हो.......
आज कमारतोड महँगाई जी....... माहने याद आवे आज वाजपयी जी...
जवाब दें
(Kailash को जवाब )- विजय कुमार सिंघल 'अंजान' का कहना है:
June 28,2012 at 11:45 PM IST
कैलाश जी, एमर्जेन्सी के दिनों की कल्पना आप नहीं कर पा रहे हैं. जैसा बिपिन जी ने इस संस्मरण में लिखा है वैसी घटनाएँ बहुत हुई थी. आक की समस्याएँ दूसरे तरह की हैं.
जवाब दें
(विजय कुमार सिंघल 'अंजान' को जवाब )- Kailash का कहना है:
June 29,2012 at 12:11 AM IST
सर आप से सहमत हूँ पर क्या आपातकाल एक ही तरह का होता है पान सिंह तोमर फिल्म मे कहा था( डकैत तो दिल्ली मे बैठते है मे तो बागी हूँ)....... जब अन्ना हज़ारे और बाबा रामदेव (जिन्हे लाखों लोगों का समर्थन था) जैसे लोग अपनी नायोचित बात इस सरकार से नही मनवा सके तो मे तो इसे आपातकाल ही मानता हू........धन्यवाद........
जवाब दें
(Kailash को जवाब )- विजय कुमार सिंघल 'अंजान' का कहना है:
June 29,2012 at 08:31 AM IST
सही है, कैलाश जी. इसे आप अघोषित आपातकाल कह सकते हैं.

Lolita का कहना है:
June 28,2012 at 10:23 PM IST
आपने लिखा..." लोकतंत्र के वे काले दिन कभी विस्मृत नहीं होंगे। ईश्वर न करे, हिन्दुस्तान को दुबारा इमर्जेन्सी के दिन देखने पड़े।
" आफ़ि की पार्टी के लोग कहा रहे है की गुजरात मे आपकेमहानतम नेता मोदी जी ने आप्तकाल को जिंदा कर दिया है....बेचारे गुजरात के लोग तोबुरे दिन देखा रहे...कहा आपके ईश्वर जी...वो भी आपकी नही सुनते क्या? क्या सुने...जब भी बोलते हो बदबू ही आती है बेचारा ईश्वर भी भाग गया....
जवाब दें
(Lolita को जवाब )- विजय कुमार सिंघल 'अंजान' का कहना है:
June 28,2012 at 11:43 PM IST
लोलिता कुमारी, आप आपातकाल की तुलना गुजरात की वर्तमान स्थिति से करके अपनी मूर्खता का परिचय दे रही हैं. क्या मोदी जी ने इस तरह किसी का उत्पीड़न किया है? अगर ऐसी कोई घटना घटी है तो उसे सामने लाइए. अगर आप केशु भाई पटेल की बातों को प्रमाण मान रही हैं, तो फिर मुझे कुछ नहीं कहना. क्या गुजरात में मीडिया पर कोई सेंसरशिप है?
जवाब दें
(विजय कुमार सिंघल 'अंजान' को जवाब )- lolita का कहना है:
June 29,2012 at 08:53 AM IST
गुजरात मे पक्का सेंसरशिप है...इंदिरा गाँधी के आपात काल से भी बुरे हाल आज गुजरात के है, लेकिन जेसे कांग्रेसी नही मानता की आपात काल ग़लता था...आप भा जेया पा के पित्टू भी नही मानेगे..इसलिए ये बहस सामप्त होती है....
जवाब दें
(lolita को जवाब )- विजय कुमार सिंघल 'अंजान' का कहना है:
June 29,2012 at 08:57 AM IST
अगर गुजरात में प्रेस सेंसरशिप है, तो प्रेस कॉउंसिल ऑफ इंडिया को यह जानकारी दीजिए. उसके अध्यक्ष तो कांग्रेस के पिट्ठु मार्कण्डेय काटजू है.
(lolita को जवाब )- विजय सिंघल का कहना है:
June 30,2012 at 02:40 PM IST
मेरे बड़ी साढ़ू भाई सूरत में रहते हैं. मैने उनसे कई बार पूछा है कि गुजरात में कोई दमन तो नहीं है. हर बार उनका जबाब नहीं में रहा. उनका कहना है कि अगले चुनाव में फिर मोदी जी को भारी बहुमत मिलेगा. अब आप ही बताइए की इस प्रत्यक्ष प्रमाण को मैं कैसे झुठलाऊं?

Saurabh Srivastava का कहना है:
June 28,2012 at 10:18 PM IST
विजयजी, ऐसी-ऐसी अनेक घटनाएँ हैं जो इतिहास के पन्नों में दब गयी मगर कॉंग्रेस्सियों ने अपनी सत्ता बचाने के लिए उसे जनता के सामने नहीं आने दिया !!
जवाब दें
(Saurabh Srivastava को जवाब )- विजय कुमार सिंघल 'अंजान' का कहना है:
June 28,2012 at 11:39 PM IST
सौरभ जी, सत्य को दबाने के अपराधी केवल कांग्रेस सरकारें नहीं बल्कि हमारे देश का बिका हुआ मीडिया भी है.
जवाब दें

Satnam का कहना है:
June 28,2012 at 10:14 PM IST
हमेशा की तरह फिर एक बार, एक तरफ़ा लेखा और तथ्यो को जेसा चाह वेसा तोड़ा...मेने भी अपनी आँखो से देखा है आप्तकाल मे 90 प्रतिशत गुंडे जेलो मे गये थे आह 10 प्रतिशत पका भले भी चले गये...कहते है ना गुण के साथ गेंहू भी पीस जाते है....लेकिन वही समय था जब पहली बार देश ने अनुशाशण देखा, रेले समय पर चलाने लगी, सरकारी ओफिसो मे काम ठीक से होने लगा....मेरे जीवन का सबसे सुंदर समय मेने आपातकाल मे ही देखा...मे युवा था, यूनिवर्सिटी मे था...लेकिन खुश था..मेरे जेसे कलरोडो भले लोगो ने रहट की सांस ली थी....और आपने आपातकाल मे इंदिरा गाँधी के लिए भद्दे शब्द लिखे...लेकिन क्या आपको पता है की आपातकाल के बाद आई सरकार ढाई साल मे नलियो मे पड़ी थी...और देश ने फिर इंदिरा गाँधी को चुना....और इसी इंदिरा गाँधी के लिए श्ररी अटल बिहारी ने दुर्गा कहा था....कुतरको से भरे गंदे लेखो मे एक और लिखे....मे आपके निरतक लेखने की निंदा करता हू...आपात काल आज़ाद भारत का सबे सुनहर स्वर्ण काल था...सिर्फ़ भले लोगो के लिए...हा गुंडे सब जेलो मे...वो तो वाहा रहे यही उचित....आपके टुचे लेखने की निंदा के सहत मे अपनी बात ख़तम करता हू
जवाब दें
(Satnam को जवाब )- विजय कुमार सिंघल 'अंजान' का कहना है:
June 28,2012 at 11:37 PM IST
सतनाम जी, अगर आप आपातकाल को सबसे सुनहेरा काल मानते हैं तो कहना पड़ेगा की आपकी आत्मा मे हिटलर या स्टालिन की आत्मा घुस गयी है. धिक्कार है आप पर.
जवाब दें
(विजय कुमार सिंघल 'अंजान' को जवाब )- Satnam का कहना है:
June 29,2012 at 08:59 AM IST
ओके मेरे भीतर हिटलर की आत्मा है और आपके भीतर? नफ़रत, हिंसा, हत्या, क्रोध सब रक्षाषो की आत्माए घुस गा है....
जवाब दें
(Satnam को जवाब )- विजय सिंघल का कहना है:
June 30,2012 at 02:42 PM IST
अगर आपको ऐसा मानने से प्रसन्नता होती है, तो मुझे कोई आपत्ति नहीं है. सत्य तो सत्य ही रहेगा.

Amit Sharma का कहना है:
June 28,2012 at 10:07 PM IST
नमस्कार विजय जी , काफ़ी जीवंत संस्मरण लिखा है . मैने तो आपातकाल नही देखा पर आपके लेख से ऐसा लगा मानो मे स्वयं उस काल मे पहुच गया हू . युवा पीढ़ी के साथ अपने संस्मरण साझा करने के लिए धन्यवाद .
जवाब दें
(Amit Sharma को जवाब )- विजय कुमार सिंघल 'अंजान' का कहना है:
June 28,2012 at 11:35 PM IST
अमित जी, यह संस्मरण मेरे एक मित्र बिपिन किशोर सिन्हा जी का है. आपकी भावनाएँ उन तक पहुँचा दूँगा.
जवाब दें

sp का कहना है:
June 28,2012 at 09:11 PM IST
पर मेरी याददश्स्त और जानकारी के हिसाब से जनसत्ता 1981 या 82 में प्रकाशित हुआ था . कृपया इस पर गौर करे .(वैसे ये बात यहा गौण है).
जवाब दें
(sp को जवाब )- विजय कुमार सिंघल 'अंजान' का कहना है:
June 28,2012 at 11:47 PM IST
हो सकता है आपकी बात सही हो. पता लगाकर बताऊँगा. ध्यान दिलाने के लिए धन्यवाद.
जवाब दें

raj.hyd का कहना है:
June 28,2012 at 08:56 PM IST
आपातकाल मे हमको भी कुछ कार्य करने का अवसर मिला था,हमारे पिताजी को तो एक सी आई डी कहलाने वाले कहा था की हमको 7 व्यक्तियो को गोली मारने काआदेश मिला हुआ है! हम और पिताजी चुपचाप जनता समाचार के पत्रक कुछ समय बाँटते रहे!आप कह रहे है की मुजीब जी की हत्या के बाद ज़ुल्म रुक गये थे यह यथार्थ नही है!मुजीबजी की हत्या 15अगस्त 1975 को हो गयी थी! इसके बाद कई हज़ारआपातकाल विरोधी कार्यकर्ताओ के साथ ज़ुल्म किए गये थे नाख़ून नोचे गये,कई सौ कार्यकर्ताओ की हड़ियाँ तोड़ दी गयी थी!जो बड़े नेता थे वह ज़रूर राहत मे थे, अनेक नेता पैरोल मे छोड़ दिए गये थे कुछ ने माफी भी माँग ली थी!अनेक जनसंघ के जिला अध्यक्ष, व सांसद कांग्रेस मे भी शामिल हो हो गये थे,उसी जिले केअनेक निष्ठावान व्यक्ति ऐसे भी थे जिनका संघ से विशेष संबंध भी नही था, सक्रिय भी नही थे इसके बावजूदअपनी एम बी बी एस , चिकित्सा की बहुत अच्छी "प्रैक्टिस" को छोड़ कर जेल चले गये थे! इसके बाद उनकी हमेशा के लिए "प्रैक्टिस" का स्तर वह कभी नही आ सका! और स्वयं भी काफ़ी बीमार हो गये,आजीवन ठीक नही हो पाए!क्योकि एक भावना से वशीभूत होकर जेल गये थे!उन्होने अपना एक चलता हुआ नर्सिंग होम भी बर्बाद कर लिया था! अनेक माह जेल जाने का हश्र उनको मिला था!इसके बावजूद जनता सरकार मे उनको कोई पूछने वाला भी नही था!क्योकि बाद मे जनता सरकार मे आँधी के आम जैसे लोग शामिल हो गये थे निष्ठावान कार्यकर्ताओ की इज़्ज़त नही हो पा रही थी!जो अनपढ़ थे,जो "ए मे ले" [विधायक] के लिए प्रार्थना पत्र दे रहे थे उनको नेताओ के बल परविधायकी का टिकिट मिल रहा था! और अंधी जनता का वोट का "भंडार" मिल रहा था!फिर जनता पार्टी मे"घटक मे पटक" चालू हो गयी थी!इंदिराजी के बुरे कारनामो का फल के कारण जनता दल के बहुत से नेता पहली बार केंद्र मे सत्ता का सुख ले रहे थे लेकिन वह"सुख " पचा नही पाए , और बहुत जल्दी ही जनता मे अपनी साख खोने लगे चौधरी चरण सिंह जी घोर इंदिरा जी विरोधी होते हुए भी उन्ही के बल पर कुछ दिनो के लिए देश के प्रधान मंत्री पद का "तमंगा" लेने से भी नही चुके,अपनी राजनैतिक आत्महत्या करना उनको खूब पसंद आया! आपातकाल का आंतरिक विरोध मे संघ के स्वयं सेवको ने सबसे ज़्यादा भाग लिया था!इसके बावजूद जनता पार्टी के बहुत से नेताओ ने इसको को ज़्यादा शिकार भी बनाना चाहा !अपनी बर्बादी को स्वीकार किया !
जवाब दें
(raj.hyd को जवाब )- विजय कुमार सिंघल 'अंजान' का कहना है:
June 28,2012 at 11:34 PM IST
राज जी, आपका कहना शत प्रतिशत सत्य है. चरण सिंह ने अगर सत्ता लोलुपता नहीं दिखाई होती तो इंदिरा को वापस आने का मौका नहीं मिलता. वैसे भी इस देश की जनता महामूर्ख है. अपने भले बुरे का ज्ञान उसे नहीं है.
जवाब दें
(विजय कुमार सिंघल 'अंजान' को जवाब )- Satnam का कहना है:
June 29,2012 at 09:02 AM IST
पक्का देश की जनता मूर्ख है, गुजरात मे, मॅढिया प्रदेश मे, गोआ मे, कर्नाटक मे कभी कभी केंद्र मे भा जा पा जेसी संप्रादायक पार्टी को जीता देता है.....और आपके गंदे लेखा भा पढ़ती है...मूर्ख तो है महा मूर्ख विजय जी....
जवाब दें
(Satnam को जवाब )- विजय सिंघल का कहना है:
June 30,2012 at 02:44 PM IST
अगर आपको मेरे लेख गंदे लगते हैं, तो उनको पढ़ने की मूर्खता आप मत कीजिए. इतना समय लगाने के लिए आपको धन्यवाद.

true indian का कहना है:
June 28,2012 at 08:50 PM IST
अच्छी कहानी लिखने की कोशिश की पर अफ़सोस कहानी ना होकर झूठ का पुलिंदा बनकर रह गया, खैर पढ़ कर अफ़सोस हुआ की किस तरह डॉक्टर, इंजीनियर जैसे पढ़े-लिखे समझदार लोग भी आर एस एस जैसे संघठन के बहकावे मे आ गये लानत है शायद यही इस देश का दुर्भाग्य है................
जवाब दें
(true indian को जवाब )- विजय कुमार सिंघल 'अंजान' का कहना है:
June 28,2012 at 11:30 PM IST
राहुल सिंह, आपने अपना नाम तो ट्रू इंडियन रखा है, पर झूठ बोलते हुए आपको लज्जा नहीं आई. यह संस्मरण मेरे एक मित्र का है और इसका एक-एक शब्द सत्य है. आपको विश्वास नहीं है तो न सही.
जवाब दें
(विजय कुमार सिंघल 'अंजान' को जवाब )- true indian का कहना है:
June 29,2012 at 02:45 PM IST
अंजान जी ट्रू इंडियन इसलिए लिखा क्योंकि अगर राहुल लिखता तो लोग कुछ और ही मतलब निकाल लाते है क्योंकि अपने देश मे " राहुल " बहुत फेमस है, खैर ये बताए आप मुझे झूठा बता रहे है और अपनी इस बेतुकी झूठ का पुलिंदा को सच्चा बता रहे है. वा ये तो वही बात हुई की हम करे तो रस लीला और कोई और करे तो कॅरक्टर ढीला. अब आप ही सोचे लज्जा किसे आनी चाहिए.
जवाब दें
(true indian को जवाब )- विजय सिंघल का कहना है:
June 30,2012 at 02:50 PM IST
लज्जा आपको आनी चाहिए, बंधु. मेरे मित्र विपिन जी ने अपने स्वयम् के अनुभव लिखे हैं और आप बिना किसी प्रमाण के उनको झूठा बता रहे हैं. इनमें जिन व्यक्तियों का ज़िक्र है वे सभी अभी जीवित हैं और उनका वर्तमान स्थान भी दिया गया है. आप उनसे पुष्टि कर सकते हैं. इनमें से एक श्री विष्णु गुप्ता के साथ मैने एच ए एल में एक ही विभाग में 6 साल काम कियाहै. मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि उनके बारे में लिखा गया एक-एक शब्द सत्य है. विष्णु जी अभी भी महमना मालवीय मिशन में मेरे साथ सक्रिय हैं.

(Mrityunjay Kumar को जवाब )- विजय कुमार सिंघल 'अंजान' का कहना है:
June 28,2012 at 11:28 PM IST
धन्यवाद मृत्युंजय जी. यह संस्मरण मेरे एक मित्र बिपिन जी का है.
जवाब दें

keshav का कहना है:
June 28,2012 at 07:35 PM IST
प्रणाम विजय जी,
लेख काफ़ी बड़ा हो गया है अगर आप इसे दो भागो में विभाजित करते तो पढ़ने में ज्याद आसानी होती ....
जवाब दें

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें