शनिवार, 8 सितंबर 2012

आपातकाल के मायने? / कुमार केतकर









कुमार केतकर |
 Jun 25, 2011, 00:03AM IST


आपातकाल की यादें जिन लोगों ने संजो रखी हैं, वे लगभग 60 के हो चुके हैं। जिन्होंने आपातकाल को पुस्तकों या अखबारों से पढ़कर जानने की कोशिश की, उन्होंने वास्तव में उसका अनुभव नहीं किया है।

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साल पहले 25 जून की मध्यरात्रि के बाद और 26 जून को तड़के तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आपातकाल की घोषणा की थी। आकाशवाणी पर देश को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा: देश की स्थिरता और सार्वभौमिकता खतरे में पड़ गई है। कानून व्यवस्था तथा अनुशासन कायम करने के लिए सरकार को कुछ कड़े कदम उठाने पड़ रहे हैं।यही आपातकाल है। आचार्य विनोबा भावे ने बाद में आपातकाल को अनुशासन पर्वबताया।

बाबा रामदेव यदि वास्तव में आज 36 साल के हैं तो उनका जन्म भी उसी दौरान हुआ होगा। आडवाणी की उम्र तब 45 साल से अधिक थी। यही कारण है कि वे आपातकाल के हालात को भलीभांति जानते हैं। जॉर्ज फर्नाडीज आडवाणी की ही उम्र के हैं, लेकिन वे इस समय एल्जाइमर से पीड़ित हैं। वाजपेयीजी अस्वस्थ हैं। संघ परिवार के वरिष्ठ स्वयंसेवकों-नेताओं को आपातकाल की यादें ताजा होंगी, क्योंकि उनमें से कइयों को उस समय जेल जाना पड़ा था।

कई समाजवादियों को भी आपातकाल याद होगा, क्योंकि वे भी उस समय या तो जेल में थे या भूमिगतहो गए थे। उम्र के साठ साल पूरे कर चुके कांग्रेसियों को आपातकाल याद तो है, लेकिन वे इस विषय को टाल देते हैं। यदि उन्हें कुछ याद है तो बस आपातकाल के बाद हुए चुनावों में हुई करारी हार।

आज कोई भी इस बात का जिक्र नहीं करता कि सरकार की ऐसी क्या मजबूरी थी, जिसे लेकर आपातकाल लगाना पड़ा। आडवाणी ने जब आपातकाल का हवाला दिया तो किसी ने इस बात पर गौर नहीं किया। लेकिन आपातकाल को भुलाया नहीं जा सकता, क्योंकि उस दौर के संस्कार आज भी राजनीति पर बने हुए हैं। आज की युवा पीढ़ी इंटरनेट व वैश्विक इंस्टेंट एक्सेसपर पली-बढ़ी है। इस तकनीक के कारण राजनीति का स्तर और उसके मायने ही बदल गए हैं।

देश में आपातकाल भले ही 25 जून 1975 को घोषित किया गया हो, लेकिन भारतीय राजनीति की अस्वस्थता 1967 से ही महसूस की जा रही थी। देश के चौथे लोकसभा और विधानसभा चुनाव 1967 में संपन्न हुए। देश में पहली बार कांग्रेस परास्त हुई। तब तक यही माना जाता था कि सत्ताधारी दल यानी कांग्रेस।

विपक्ष (जनसंघ, कम्युनिस्ट, समाजवादी) न के बराबर था। 1957 में केरल में कम्युनिस्टों की सरकार बनी थी, लेकिन वह भी केंद्र के हस्तक्षेप के चलते अल्पायु साबित हुई। 1967 में देश के आठ राज्यों में कांग्रेस को परास्त होना पड़ा और वहां विभिन्न विपक्षी दलों की सरकारें बनीं। स्वाधीनता से पहले जन्मे बच्चे 1967 में पहली बार मतदान करने जा रहे थे। इन्हीं बेचैन युवाओं के कारण कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा।

इस बदलाव को भांपते हुए इंदिरा गांधी ने पार्टी के बुजुर्गो से जनता की और खासकर युवाओं की नब्ज टटोलने की अपील की। इन नेताओं ने जो गुट बनाया, उसे ही कुछ समय बाद अखबारों ने सिंडिकेटनाम दे दिया। 1967 में लोकसभा चुनाव से पहले पार्टी का संसदीय नेता चुनने के लिए चुनाव हुआ था, जिसमें मोरारजी देसाई को हराकर इंदिरा गांधी नेता बन गईं। कांग्रेस दो गुटों में बंट गई। इंदिरा गांधी की नीतियों का सिंडिकेट ने विरोध किया।

राष्ट्रपति चुनाव के दौरान कांग्रेस के नीतिगत मतभेद और खुलकर सामने आए। राष्ट्रपति जाकिर हुसैन के असमय देहांत के बाद सिंडिकेट ने प्रस्ताव रखा कि सिंडिकेट के ही एक सदस्य संजीव रेड्डी को राष्ट्रपति बनाया जाए। इंदिरा गांधी की भी अनुमति प्राप्त कर ली गई। लेकिन रेड्डी को राष्ट्रपति बनाकर इंदिरा गांधी को घेरने की सिंडिकेट की यह एक चाल थी। इंदिरा गांधी ने निर्दलीय वीवी गिरि को समर्थन दिया और आधिकारिक प्रत्याशी रेड्डी परास्त हो गए।

इससे क्रोधित सिंडिकेट ने इंदिरा गांधी को ही पार्टी से बेदखल कर दिया और पार्टी टूट गई। सरकार अल्पमत में आ गई। फिर कम्युनिस्टों और कुछ समाजवादियों के समर्थन पर सरकार जैसे-तैसे गिरने से बच गई। इंदिरा गांधी ने 1971 में गरीबी हटाओमुद्दे पर मध्यावधि चुनाव में भाग लिया। सिंडिकेट ने जनसंघ, निर्दलीय और एक समाजवादी गुट को एकजुट कर बड़ी आघाड़ीबनाई, जिसे इंदिरा ने करारी मात दी।

इंदिरा गांधी ने बांग्लादेश के निर्माण में जो सहायता की थी, उसका बदला लेने की न केवल पाकिस्तान, बल्कि अमेरिका ने भी ठान ली। इस तरह इंदिरा विरोधी अभियान को अंतरराष्ट्रीय स्वरूप प्राप्त हुआ। इंदिरा गांधी की अगुआई में हुए शिमला करार (1972) के बाद भारत-पाक संबंधों में सुधार के संकेत मिलने लगे थे। 1973 में अरब-इजरायल युद्ध हुआ और तेल की दरें आसमान छूने लगीं। महंगाई बढ़ने लगी। राजनीतिक दलों ने इंदिरा गांधी के खिलाफ मोर्चाबंदी की तैयारी शुरू कर दी और इसकी कमान जेपी को सौंपी गई।

इसी दौरान जॉर्ज फर्नाडीज ने रेल हड़ताल घोषित कर देश में खलबली मचा दी। 1975 का आरंभ ही हिंसा से हुआ। 2 जनवरी को हुए बम विस्फोट में रेलमंत्री ललित नारायण मिश्र की मृत्यु हो गई। 12 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 1971 के चुनाव में हुए इंदिरा गांधी के चयन को खारिज कर दिया। मामला सुप्रीम कोर्ट में गया, लेकिन हाईकोर्ट के फैसले को विरोधियों ने हथियार बना लिया। उन्होंने इंदिरा गांधी के इस्तीफे की मांग की और देश में आंदोलन चलाने की चेतावनी दी। (उस समय जेपी के आंदोलन को सिविल सोसायटी मूवमेंटनहीं माना गया था)।

इंदिरा गांधी अमेरिका की राह में रोड़ा बन गई थीं, इसी कारण इंदिराविरोधी अभियान को अमेरिका द्वारा समर्थन दिया जा रहा था। सीआईए ने अगस्त 1975 में बांग्लादेश के असंतुष्ट फौजी अफसरों के जरिये मुजीबुर्रहमान परिवार के सदस्यों की हत्या करवा दी। 1972 से देश में असंतोष लगातार बढ़ रहा था और उस पर काबू पाने के लिए आपातकाल लगा दिया गया।

आपातकाल में कई ऐसी घटनाएं हुईं, जिन्हें गवारा नहीं किया जा सकता, लेकिन आपातकाल लागू करने की आवश्यकता का मुद्दा नकारा नहीं जा सकता। केवल संजय गांधी को जिम्मेदार मानकर विपक्ष अपनी गैरजिम्मेदार राजनीति को छुपा नहीं सकता।

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आपातकाल में मौलिक अधिकारों का हनन







आपातकाल में मौलिक अधिकारों का हुआ हनन
आपातकाल में मौलिक अधिकारों का हुआ हनन

उच्चतम न्यायालय ने कहा कि 1975 में आपातकाल के समय मौलिक अधिकारों का हनन किया गया था.
इसके साथ ही न्यायालय ने हत्या के मामले में अपनी ओर से सुनाई गई मौत की सजा को उम्रकैद में तब्दील कर दिया.

न्यायमूर्ति आफताब आलम और न्यायमूर्ति अशोक कुमार गांगुली की खंडपीठ ने अपने एक निर्णय में आपातकाल की स्थिति के संदर्भ में यह राय रखी.

खंडपीठ ने कहा कि वर्ष 1976 में जबलपुर के एडीएम वी शिवकांत शुक्ला के मामले में उच्चतम न्यायालय की पांच न्यायधीशों की पीठ द्वारा मौलिक अधिकारों का निलंबन बरकरार रखने का फैसला सही नहीं था. न्यायमूर्ति गांगुली ने राय रखी,‘‘इस बात में कोई संदेह नहीं है कि जबलपुर के एडीएम के मामले में न्यायालय के बहुमत के फैसले से देश की जनता के मौलिक अधिकारों का हनन हुआ था.’’

न्यायाधीश ने हत्या के मामले में मौत की सजा पाए रामदेव चौहान उर्फ राजनाथ चौहान को दी मौत की सजा को भी बदल दिया। खुद उनकी मौजूदगी वाली खंडपीठ ने पांच मई, 2009 को सुनाए अपने एक फैसले में चौहान को मिली मौत की सजा को बरकरार रखा था. चौहान ने आठ मार्च, 1992 को अपने ही परिवार के चार लोगों की हत्या कर दी थी.

न्यायमूर्ति गांगुली ने कहा कि जबलपुर के अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट वी शिवकांत शुक्ला के मामले में न्यायालय की ओर से दिए गए बहुमत के फैसले को याद करें तो उसमें न्यायाधीशों ने यह राय दी थी कि 27 जून, 1975 को राष्ट्रपति की ओर से जारी आदेश के अनुसार प्रतिबंधात्मक कानून मीसा के तहत हिरासत में लिया गया कोई भी व्यक्ति अनुच्छेद 226 के अंतर्गत कोई याचिका दाखिल नहीं कर सकता. राष्ट्रपति का यह आदेश संविधान के अनुच्छेद 359 (1) के तहत आया था.

आपातकाल के इस मामले के बाद खंडपीठ ने चौहान के मामले में भी स्पष्ट राय रखी. पहले उच्चतम न्यायालय की ही एक खंडपीठ ने यह कहते हुए मौत की सजा को बरकरार रखा था. उच्चतम न्यायालय की ओर से कोई फैसला बरकरार रखे जाने के बाद राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के पास इस बात अधिकार नहीं है कि वह मौत की सजा को उम्रकैद में बदनले के लिए राज्यपाल से सिफारिश करे.

चौहान को गुवाहाटी की एक सत्र अदालत ने मौत की सजा सुनाई थी. बाद में उच्च न्यायालय ने भी इस सजा को बरकरार रखा. 31 जुलाई, 2000 को उच्चतम न्यायालय में न्यायमूर्ति के टी थॉमस और आर पी सेठी की खंडपीठ ने भी चौहान की मिली मौत की सजा को बरकरार रखा. चौहान की दलील यह थी कि वारदात के वक्त वह महज 16 साल का था और इस आधार पर उसे मौत की सजा नहीं दी जा सकती.

बाद में चिकित्सा जांच में न्यायालय ने पाया कि वारदात के समय वह 20 साल का था और ऐसे में उसका मामला किशोर न्याय अधिनियम के अंतर्गत नहीं आया.

इस मामले पर दायर एक याचिका की सुनवाई करते हुए 10 मई, 2001 को न्यायालय की एक खंडपीठ ने बहुमत से चौहान की सजा को बरकरार रखने का फैसला फिर कर दिया.
इस फैसले में ही एक न्यायाधीश ने एक अलग राय रखी. इस न्यायाधीश ने कहा कि चौहान की उम्र को लेकर संदेह है और ऐसे में उसे उम्रकैद की सजा दी जा सकती थी.

चौहान मामले पर मानवाधिकार आयोग ने दखल दिया. आयोग ने असम के राज्यपाल से आग्रह किया कि चौहान की उम्र को लेकर संदेह होने की स्थिति में उसे मिली मौत की सजा को उम्रकैद में तब्दील किया जाना चाहिए.

आयोग की इस सिफारिश के बाद पीड़ित परिजनों ने उच्चतम न्यायालय का रुख किया. न्यायालय ने आठ मई, 2009 को आयोग को फटकरार लगाई और कहा कि उसके पास इस मामले में दखल देने का कोई आधार नहीं है.

चौहान ने उच्चतम न्यायालय के फैसले को चुनौती देते हुए दूसरी बार पुनर्विचार याचिका दायर की. याचिका पर न्यायालय ने कहा कि अगर हम वर्ष 1993 के अधिनियम की धारा 12 (जे) पर गौर करेंगे तो मालूम पड़ता है कि मानवाधिकार आयोग मानवाधिकारों को बढ़ावा देने के लिए जरूरी पहल कर सकता है.

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