शनिवार, 22 सितंबर 2012

बिहार विज्ञापन घोटाला'' उजागर

 

 

 

 

 

 

बिहार वित्त अंकेक्षण विभाग ने 2006 में ही अरबों का ''हिन्दुस्तान विज्ञापन घोटाला'' उजागर कर दिया था

: लेकिन नेताओं-अफसरों-संपादकों की तिकड़ी ने कार्रवाई नहीं होने दी, फाइल को ही दबा दिया : दैनिक हिन्दुस्तान के लगभग दो सौ करोड़ के सरकारी विज्ञापन घोटाले के बारे में नित नई जानकारियां सामने आ रही हैं. बिहार सरकार के वित्त अंकेक्षण विभाग ने वित्तीय वर्ष 2005-06 में ही बिहार में सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग, पटना की मिलीभगत से दैनिक हिन्दुस्तान द्वारा किए जा रहे सरकारी विज्ञापन के फर्जीवाड़े को उजागर किया था.
यही नहीं, दैनिक हिन्दुस्तान से अवैध ढंग से सरकारी विज्ञापन के प्रकाशन के मद से लगभग एक करोड़, पन्द्रह हजार नौ सौ पचपन रुपए की वसूली की सिफारिश भी की थी. इस तथ्य को मुंगेर के पुलिस अधीक्षक पी. कन्नन के निर्देशन में हुई जांच की रिपोर्ट में सहायक साक्ष्य के रूप में जोड़ा गया है. पुलिस उपाधीक्षक अरूण कुमार पंचालर ने अपनी पर्यवेक्षण टिप्पणी के पृष्ठ-05 और 06 में बिहार सरकार के वित्त अंकेक्षण विभाग के अंकेक्षण प्रतिवेदन (संख्या-195।2005-06) के मूल तथ्य को उद्धृत किया है.

पुलिस उपाधीक्षक ने पर्यवेक्षण टिप्पणी में लिखा है --‘अनुसंधान में प्रगति-पर्यवेक्षण के क्रम में अभियोजन पक्ष की तरफ से निम्नांकित दस्तावेज प्रस्तुत किए गए। (1) बिहार सरकार के वित्त अंकेक्षण विभाग के पत्रांक -178। वि0अं0, दिनांक 08-05-2006 जिसके माध्यम से  अंकेक्षण प्रतिवेदन संख्या निर्गत है। इसके अवलोकन से विदित होता है कि अंकेक्षण के दौरान अंकेक्षण दल ने यह पाया कि हिन्दुस्तान दैनिक को पटना संस्करण के अतिरिक्त मुजफफरपुर  तथा भागलपुर मुद्रण केन्द्रों को स्वतंत्र प्रकाशन दिखाकर उनके विज्ञापन के लिए अलग दर पर वर्ष 2002-03 एवं 2003-04 में कुल एक करोड़ पन्द्रह हजार नौ सौ पचपन रुपये का अवैध भुगतान किया गया था जबकि मुजफफरपुर तथा भागलपुर कोई स्वतंत्र प्रकाशन या संस्करण नहीं है, वरन् पटना संस्करण के केवल मुद्रण केन्द्र हैं। इनके लिए अलग से कोई पंजीयन संख्या आर0एन0आई0 से नहीं प्राप्त हुआ था। पटना संस्करण की पंजीयन संख्या-44348।1986।पटना। ही इनका पंजीयन के रूप में अंकित था। अंकेक्षण के क्रम में उक्त दोनों मुद्रण केन्द्रों को स्वतंत्र प्रकाशन होने का कोई प्रमाण पत्र उपलब्ध नहीं पाया गया, क्योंकि इनके लिये अलग से कोई प्रिंट लाइन नहीं थी और न अलग पंजीयन था।

अंकेक्षण के दौरान पाया गया कि मुजफफरपुर और भागलपुर लाइन से कोई प्रकाशन नहीं होता है। इस बात की पुष्टि अंकेक्षण के दौरान हिन्दुस्तान दैनिक के प्रतिनिधियों द्वारा भी किया गया कि मुजफ्फरपुर एवं भागलपुर के लिये पंजीयन एवं मास्ट हेड वही है जो पटना के लिए है। इस आधार पर केवल मुजफ्फरपुर या भागलपुर में विज्ञापन छापने के लिए हिन्दुस्तान दैनिक तैयार नहीं था एवं संयुक्त रूप से पटना, मुजफफरपुर तथा भागलपुर तीनों में छापने के लिये सरकार को बाध्य किया।
अंकेक्षण के दौरान यह पाया गया कि दिनांक 28-03-2001 से मुजफफरपुर एवं दिनांक 03 अगस्त, 2001 से भागलपुर में मुद्रण केन्द्र प्रारंभ किया गया। प्रेस पुस्तक पंजीयन  अधिनियम-1867 के तहत प्रकाशन का कार्य प्रारंभ करने के पूर्व जिलाधिकारी के समक्ष विहित प्रपत्र में घोषण करना, कंपनी रजिस्ट्रार से अनुमति प्राप्त करना और भारत सरकार के समाचार पत्र पंजीयक से पंजीयन कराना अनिवार्य था, जो नहीं कराया गया।

सभी अभियुक्तों के विरूद्ध प्रथम दृष्टया आरोप प्रमाणित
मुंगेर पुलिस ने कोतवाली कांड संख्या-445।2011 में सभी नामजद अभियुक्त ।1। शोभना भरतिया, अध्यक्ष, दी हिन्दुस्तान मीडिया वेन्चर्स लिमिटेड, नई दिल्ली ।2। शशि शेखर, प्रधान संपादक, दैनिक हिन्दुस्तान, नई दिल्ली ।3। अकु श्रीवास्तव, कार्यकारी संपादक, हिन्दुस्तान, पटना संस्करण ।4। बिनोद बंधु, स्थानीय संपादक, हिन्दुस्तान, भागलपुर संस्करण और ।5। अमित चोपड़ा, मुद्रक एवं प्रकाशक, मेसर्स हिन्दुस्तान मीडिया वेन्चर्स लिमिटेड, नई दिल्ली के विरूद्ध भारतीय दंड संहिता की धाराएं 420।471।476 और प्रेस एण्ड रजिस्ट्रेशन आफ बुक्स एक्ट, 1867 की धाराएं 8।बी0।,14 एवं 15 के तहत लगाए गए सभी आरोपों को अनुसंधान और पर्यवेक्षण में ‘सत्य‘ घोषित कर दिया है। देश के सांसद और बिहार के विधायक इस विज्ञापन घोटाले को आगामी संसद सत्र व बिहार विधानसभा और विधान परिषद में उठाने की तैयारी कर रहे हैं।

दुर्भाग्य की बात है कि आर्थिक अपराधियों के विरूद्ध युद्ध चलाने की घोषणा करने वाले बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार की सरकार के उंचे पदों पर विराजमान अधिकारियों ने वित्त अंकेक्षण विभाग  की अंकेक्षण रिपोर्ट को कूड़ेदान में डाल दिया है। कालांतर में वित्त अंकेक्षण विभाग की आपत्तियों को रहस्यमय ढंग से विलोपित कर दिया गया। सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग, पटना ने वित्त अंकेक्षण विभाग की एक करोड़ पन्द्रह हजार नौ सौ पचपन रूपए के अवैध भुगतान की हिन्दुस्तान से वसूली की सिफारिश को भी कूड़ेदान में डाल दिया। केन्द्र और राज्य सरकार की सभी जांच एजेंसियों और सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीशों के लिए यह जांच का विषय है कि किन-किन लोगों ने किन-किन स्तर पर दैनिक हिन्दुस्तान के सरकारी विज्ञापन घोटाले की संचिकाओं को जमीन के अन्दर गाड़ने का काम किया?

प्रिंट मीडिया के आर्थिक भ्रष्टाचार में लिप्त होने के पर्याप्त कागजी साक्ष्य आने के बाद भी 2006 से 2012 तक किसी भी स्तर से सरकारी जांच एजेंसियों ने दैनिक हिन्दुस्तान और दैनिक जागरण के सरकारी विज्ञापन घोटालों की जांच शुरू नहीं की। जांच शुरू नहीं होने से आम लोगों की आस्था केन्द्र और राज्य सरकारों की घोषणाओं पर से उठती जा रही है। बिहार सरकार को हर स्तर पर कागजात के साथ दैनिक हिन्दुस्तान के विज्ञापन घोटाले में कानूनी कार्रवाई का अनुरोध किया गया, परन्तु सरकार ने 2006 से लेकर अब तक अपने स्तर से दोषी कारपोरेट प्रिंट मीडिया के मालिकों और संपादकों के विरूद्ध कोई कानूनी कार्रवाई नहीं की। अंत में हार कर सामाजिक कार्यकर्ता मन्टू शर्मा ने मुंगेर में मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी के न्यायालय में परिवाद पत्र दायर किया और न्यायालय ने पूरे मामले में अनुसंधान का आदेश मुंगेर कोतवाली को दिया। इस कांड के पर्यवेक्षण में अभियोजन पक्ष ने वित्त अंकेक्षण विभाग के अंकेक्षण प्रतिवेदन -195।2005-06 को जांच कर रहे पुलिस अधिकारी के समक्ष सहायक साक्ष्य के रूप में पेश कर दिया।
मुंगेर से श्रीकृष्ण प्रसाद की रिपोर्ट.

इससे संबंधित पिछली सभी रिपोर्टों को पढ़ने के लिए आगे दिए गए रंगीन शीर्षक पर क्लिक करें- हिंदुस्तान अखबार ने बिहार में किया अरबों का घोटाला

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