गुरुवार, 6 सितंबर 2012

हिन्दी पत्रकारिता / डॉ. कृष्णबिहारी मिश्र





हिन्दी पत्रकारिता के मर्मज्ञ अध्येता और प्रतिष्ठित साहित्यकार डॉ. कृष्णबिहारी मिश्र की यह कृति हिन्दी-पत्रकारिता-विशेष रूप से प्रारम्भिक हिन्दी पत्रकारिता के इतिहास और उसकी मूल चेतना को पूरी प्रामाणिकता के साथ प्रस्तुत करती है। दरअसल कलकत्ता को केन्द्र-बिन्दु मानकर सम्पूर्ण हिन्दी पत्रकारिता का सार्थक विवेचन और उसकी विकास-कथा अपनी पूरी समग्रता के साथ इस पुस्तक में है।

आशीर्वचन / समीक्षा

प्रस्तुत पुस्तक मेरे छात्र आयुष्मान् डॉ. कृष्णबिहारी मिश्र ने डी फ़िल्. उपाधि के लिए प्रबन्ध के रूप में लिखी थी। इसमें पत्रकारिता के क्षेत्र में कलकत्ता के योगदान का विवेचन है। आधुनिक हिन्दी साहित्य के आरम्भ से ही कलकत्ता का विशिष्ट योग रहा है। हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं के विकास में भी कलकत्ता का महत्वपूर्ण योग रहा है। डा. मिश्र ने भूली-अधभूली कहानियों और पत्र-पत्रिकाओं की खोज करके यह महत्त्वपूर्ण प्रबन्ध लिखा है। वे साहित्य के अच्छे विद्वान हैं, यद्यपि पत्रकारिता के विकास की कहानी ही उन्हें कहनी थी तथापि आनुषंगिक रूप से साहित्यिक  अध्ययन का कार्य भी किया है। वस्तुतः आरम्भ में साहित्य और पत्रकारिता एक-दूसरे से घुले-मिले थे। साहित्य के विकास, में भी पत्र-पत्रिकाओं ने बहुत सहायता पहुँचायी है। इस प्रबंध में आधुनिक हिन्दी के विकास में कलकत्ते का महत्त्व अच्छी तरह स्पष्ट हो गया है।

प्रबन्ध में विस्तृत विवेचना के साथ ‘‘पहली बार यह तथ्य प्रस्तुत करने की चेष्टा की गयी है कि हिन्दी पत्रकारिता की कहानी भारतीय राष्ट्रीयता की कहानी है। हिन्दी पत्रकारिता के आदि उन्नायक जातीय चेतना, युगबोध और अपने महत् दायित्व के प्रति पूर्ण सचेत थे। कदाचित् इसलिए विदेशी सरकार की दमन-नीति का उन्हें शिकार होना पड़ा था, उसके नृशंस व्यवहार की यातना झेलनी पड़ी थी। उन्नीसवीं शताब्दी में हिन्दी गद्य-निर्माण की चेष्ठा और हिन्दी-प्रचार आन्दोलन अत्यन्त प्रतिकूल परिस्थितियों में भयंकर कठिनाइयों का सामना करते हुए भी कितना तेज और पुष्ट था इसका साक्ष्य ‘भारतमित्र’ (सन् 1878 ई, में) ‘सार सुधानिधि’ (सन् 1879 ई.) और ‘उचितवक्ता’ (सन् 1880 ई.) के जीर्ण पष्ठों पर मुखर है।’’

श्री कृष्णबिहारी मित्र ने कलकत्ते की हिन्दी पत्रकारिता के विवेचन के बहाने उस राष्ट्रीय चेतना का विकास भी स्पष्ट किया है जो हिन्दी पत्रकारिता का विशिष्ट रूप रहा है। उन्होंने उस चेतना को विशाल पृष्ठभूमि पर रखकर हिन्दी-गद्य के पुष्ट विकास का संकेत दिया है। हिन्दी-गद्य किसी छोटे उद्देश्य से नहीं बल्कि विशाल राष्ट्रीय चेतना और मानवीय संवेदनाओं के  प्रचार का साधन बनकर निखरा है। वे बताते हैं कि ‘‘हिन्दी के निर्माण में अनेक दिशाओं से प्रयत्न हुए हैं और गद्य का वर्तमान रूप असंख्य साधनाओं का परिणाम है। किन्तु सबसे बलवती साधना पुराने पत्रकारों की है। कलकत्ता के हिन्दी पत्रकारों ने इस गद्य के आरंभिक रूप को सजाया-सँवारा और उसे पुनर्जागरण- कालीन भारतीय राष्ट्र की समस्त आकांक्षाओं और सम्भावनाओं के समर्थ माध्यम के रूप में प्रतिष्ठित किया।’’

इस प्रकार प्रबंध में हिन्दी पत्रकारिता के विकास के माध्यम से हिन्दी की सशक्त गद्यशैली और मानवीय संवेदना की उदार परम्परा का आकलन किया गया है।

मुझे आशा है कि आधुनिक हिन्दी इतिहास के विद्यार्थियों के लिए यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी। मेरी हार्दिक शुभकामना है कि इस पुस्तक के लेखक डॉ. कृष्णबिहारी मिश्र निरन्तर प्रबुद्ध भाव से साहित्य की सेवा करते रहें। मैं इनके उज्जवल भविष्य की  कामना करता हूँ।

हजारी प्रसाद द्विवेदी


आभार


मेरी पहली प्रणति और कृतज्ञता सामान्य प्रो. कल्याणमय लोढ़ों के प्रति है जिनके मन में प्रस्तुत प्रबन्ध की योजना उदित हुई और बड़े विश्वास के साथ जिसकी क्रियान्विति का दायित्व उन्होंने मेरे ऊपर सौंपा। सहज उत्साह के चलते विषय की दुरुहता की ओर शुरू में मेरा ध्यान न गया। लोढ़ाजी कठिनाइयों और अवरोधों से परिचित थे। इसलिए उस ओर उनका सदैव ध्यान रहा। कार्य शुरू होने से पहले ही उन्होंने भारतीय ज्ञानपीठ से, विश्वविद्यालय के माध्यम से, आर्थिक सहायता का अनुबन्ध कराया। प्रबन्ध की प्रारम्भिक रूप-रेखा तैयार की। शोध विषयक नित्य की क्रमिक प्रगति से अवगत होते रहने की उत्सुकता और सक्रिय रुचि दिखायी।

भारतीय ज्ञानपीठ की अध्यक्ष श्रीमती रमा जैन ने मेरे अनुशीलनकार्य की सारस्वत महत्ता को समझकर कलकत्ता विश्वविद्यालय के माध्यम से अपेक्षित सहायता देकर मुझे उपकृत किया। श्रीमती जैन की उदारता तथा भारतीय ज्ञानपीठ के मन्त्री आदरणीय श्री लक्ष्मीचन्द्र जैन की सहज सदाशयता का मेरे मन पर गहरा असर है।

हिन्दी के प्रख्यात विद्वान आचार्य नन्दुलारे बाजपेयी ने भौगोलिक दूरी के बावजूद अपने निर्देशन द्वारा मुझे अनुशीलन-दृष्टि दी। इस प्रबन्ध की भूमिका लिखने की उनकी सहज इच्छा थी। किन्तु दुर्भाग्यवश वे समय से पहले चले गये। मेरी पुस्तक को प्रकाशित देखकर उन्हें ही सबसे अधिक प्रसन्नता होती।

सामग्री-संकलन के उदेश्य से मुझे विभिन्न स्थानों की यात्रा करनी पड़ी। काशी प्रवास में हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रख्यात प्राध्यापक आदरणीय डॉ. विजयशंकर मल्ल से अपने शोध-कार्य के प्रबन्ध में विचार-विमर्श किया और उनके महत्त्वपूर्ण सुझावों से लाभान्वित हुआ। आदरणीय भाई डॉ. शिवप्रसाद सिंह ने मुझे सदा विद्या विषयक प्रेरणा-दृष्टि दी है। शीर्षस्थ कृति साहित्यकार होने के साथ ही डॉ. शिवप्रसाद जी प्राचीन साहित्य के मर्मज्ञ और भाषाविद् भी हैं। प्रस्तुत प्रबन्ध में भाषा का भी एक स्वतन्त्र अध्याय है जिसे तैयार करने में श्री शिवप्रसाद जी से विशेष सहायता मिली है। इन दोनों विद्वानों के प्रति मैं हृदय से कृतज्ञ हूँ।

हिन्दी के प्रख्यात मनीषी गुरुवर आचार्य पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी ने अपने मुखर आशीर्वचन ने मुझे प्रेरणा और बल दिया है। पत्रकारिता के पुराने आचार्य डॉ. रामसुभग सिंह ने अपनी व्यस्त राजकीय चर्या से समय निकालकर मेरी पुस्तक पढ़ी और मेरे अनुरोध से पुस्तक का प्राक्कथन लिखने की कृपा की। इस कृपा को पुरानी पीढ़ी ने अनुसन्धित्सु को मैं आशीर्वाद मानता हूँ। गुरुजनों के आशीर्वाद से मुझे हार्दिक बल ही नहीं मिला है, मेरी पुस्तक की महत्ता-वृद्धि हुई है।

शोध-कार्य अत्यन्त श्रम-साध्य व्यापार है। मेरे पूज्य पिताजी ने गार्हस्थिक दायित्व से मुझे मुक्त न कर दिया होता, पूज्य पितृव्य का उलाहना उत्साह नहीं  मिला होता, परम आत्मीय श्री राधागोविन्द जी और श्री रंगन अपनी सुख-सुविधा की चिन्ता छोड़कर मेरी अनुकूल व्यवस्था के लिए सदैव सजग न रहे होते तो निश्चित रूप से मेरे कार्य में अपेक्षित रुचि, नैरन्तर्य और सक्रियता न आ पाती। मैं उन्हीं का आभारी हूँ। मेरी साध को पल्लवित-पुष्पित होता देखकर इनका मनःलोक उल्लसित होता है। इसे मैं अपना सौभाग्य मानता हूँ और परमात्मा के प्रति हृदय से कृतज्ञ हूँ कि इसे कोटि की शुभचिन्ता और उच्छ्वसित स्नेह मुझे उपलब्ध है।

परिशिष्ट की सामग्री मेरे निर्देशन में मेरे आत्मीय श्री अवधेश्वरनाथ मिश्र ने तैयार की है। विषयानुक्रमणिका और नामानुक्रणिका मेरे स्नेहभाजन डॉ. प्रेमचन्द जैन ने तैयार की है। इन दोनों की आत्मीय और श्रम मेरे  लिए अविस्मरणीय है।

भारतीय ज्ञानपीठ के उन कर्मचारियों के प्रति, जिनके हृदय में मेरे लिए स्नेह है और जिन्होंने इस पुस्तक के प्रकाशन में विशेष रुचि ली है, आभारी हूं।
प्रस्तुत पुस्तक कलकत्ता विश्वविद्यालय द्वारा डॉक्टरेट उपाधि के लिए स्वीकृति शोध-प्रबन्ध है। अनुसन्धान का मूल विषय था। ‘कलकत्ता की हिन्दी पत्रकारिताः उद्भव और विकास’। उद्देश्य था कलकत्ता की हिन्दी पत्रकारिता (सन् 1826 से 1930 तक) का अनुशीलन। प्रस्तुत प्रबन्ध चूँकि हिन्दी पत्रकारिता के पूरे परिदृश्य को स्पर्श करता है; पुनर्जागरणकालीन राष्ट्रीय चेतना, जातीय संस्कृति और खड़ी बोली साहित्य-भूमि का अध्यन प्रस्तुत करता है, इसलिए इसके मूल नाम को बदलकर पुस्तक को उपयुक्त नाम देकर प्रकाशित करना उचित हुआ।

पूरा प्रबन्ध पाँच खण्डों में विभाजित है। पहले खण्ड में आरम्भिक भारतीय पत्रकारिता का परिवेश-विवेचना और उपलब्ध सामग्री की वैशिष्ट्य-चर्चा है। दूसरे खण्ड में भी दो अध्याय हैं जिनमें पत्रकारिता के दूसरे चरण की पृष्ठिका-चर्चा और और उस काल के प्रमुख पत्रों की विशद विवेचना जातीय चेतना के आलोक में की गयी है। तीसरे खण्ड में भी दो अध्याय हैं-(1) बीसवीं शताब्दी का आरम्भ और हिन्दी पत्रकारिता का तीसरा दौर, (2) तिलक युग की हिन्दी पत्रकारिता की विवेचना और पत्रकारिता के कला-विकाश की समीक्षा है। चौथे खण्ड में गाँधी युग की पत्रकारिता और दैनिक पत्रों का विवेचना है। पाँचवे खण्ड में तीन अध्याय हैं। पहले अध्याय में कलकत्ता के विशिष्ट हिन्दी पत्रकारों का परिचय देते हुए पुरानी आलोकवर्षी पीढ़ी की विवेचना की गयी है।

दूसरे अध्याय में साम्प्रतिक पत्रकारिता की अभाव-उपलब्धि की विस्तृत समीक्षा की गयी है। तीसरा अध्याय पत्रकारिता की सन्दर्भ-सरणि से भाषा-विकास की विवेचना प्रस्तुत करता है। पुस्तक के प्रारम्भ में ‘प्रस्ताविका’ है और अन्त में ‘उपसंहार’। शुरू में कुछ महत्त्वपूर्ण पुराने पत्रों की चित्र-लिपियाँ दी गयी हैं और ‘परिशिष्ट’ में पुराने पत्रों के प्रथम अंक की संपादकीय टिप्पणी अविकस उद्धृत की गयी है; कुछ पत्रों की वार्षिक विषय-सूची दी गयी है। जिससे हिन्दी पत्रकारिता के पुराकाल का समग्र स्वरूप पाठकों के सामने स्पष्ट हो सके। अपने सहयोगियों, शुभचिन्तकों और उन तमाम लोगों के प्रति, जिनके किसी भी रूप में कुछ भी सहायता मिली है, मेरे मन में अशेष सम्मान और कृतज्ञता का भाव है।  

कृष्णबिहारी मिश्र

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