गुरुवार, 13 सितंबर 2012

बॉलीवुड की बदलती हिंदी

गैंग्स ऑफ़ वासेपुर
गैंग्स ऑफ़ वासेपुर में जमकर गालियों का इस्तेमाल किया गया.
जल्द ही हिंदी सिनेमा 100 साल पूरे कर लेगा. इन सौ सालों में सिनेमा ने कई बार अपना रूप बदला है. जैसे-जैसे वक़्त बदला सिनेमा की तस्वीर भी बदलती चली गई. ये बदलाव फिल्मों में हिंदी भाषा के प्रयोग में भी आए.
जहाँ हिंदी सिनेमा की शुरुआत 1913 में रिलीज़ हुई मूक फिल्म 'राजा हरिश्चंद्र' से हुई, वहीं बदलते वक़्त ने 1931 में भारत को उसकी पहली टॉकी 'आलम आरा' दी.
अगर फिल्मों में संवादों की बात हो तो ज़ाहिर है शुरुआत आलम आरा से ही करनी होगी. जहां शुरुआती दौर में भाषा साफ और सरल थी, वहीं आधुनिक युग की भाषा के कई रंग हैं.
आज की तारीख में 'स्लैंग' या अशुद्ध या फिर यूं कहें कि हिंगलिश शब्दों का प्रयोग फिल्मों में बेबाक तरीके से हो रहा है.
गुलज़ार के 'मोरा गोरा अंग लई ले' से लेकर अमिताभ भट्टाचार्य के 'डीके बोस' तक भाषा के प्रयोग में कितना फर्क आ गया है ये आप खुद ही देख सकते हैं.
हिंदी फिल्मों में प्रयोग होने वाली हिंदी की शुद्धता दिन-ब-दिन कम होती जा रही है. इस बदलाव के पीछे क्या वजह है?

बदलाव की वजह

"इसमें कोई शक नहीं कि हिंदी को फैलाने में, उसे लोगों क़ी अपनी भाषा बनाने में हिंदी फिल्मों का बहुत बड़ा हाथ रहा है. खास तौर पर युवा पीढ़ी हिंदी को हिंदी फिल्मों के ज़रिए ही जानती है . हमारे देश में ही क्यों विदेश में भी हिंदी के प्रचार-प्रसार का श्रेय हिंदी फिल्मों को ही जाता है."
जावेद अख्तर, गीतकार
'देव डी', 'उड़ान' और 'डैली बैली' जैसी फिल्म के लिए गीत लिखने वाले अमिताभ भट्टाचार्य बीबीसी से कहते हैं, ''आज हिंदुस्तान में जो जुबान बोली जाती है उसमें सबसे कम प्रतिशत हिंदी का ही है. सत्तर प्रतिशत अंग्रेजी है, 20 प्रतिशत उर्दू है और बाकी जो बचता है दस प्रतिशत वो हिंदी के शब्द हैं. सिनेमा तो समाज का आईना होता है, जब असल ज़िन्दगी में ही हिंदी का प्रयोग इतना कम होता है तो फिल्मों में भी तो भाषा में मिलावट होगी.''
अमिताभ का मानना ये भी है फिल्मों में भाषा का प्रयोग फिल्म की कहानी पर भी बहुत हद तक निर्भर करता है.
वो कहते हैं, ''फिल्म किस विषय पर बन रही है, फिल्म के किरदार किस प्रकार के हैं इन्हीं बातों को ध्यान में रखकर गीत लिखने पड़ते हैं.''
फिल्म और समाज के बीच गहरा रिश्ता होता है. जहां फिल्में समाज से विषयों का चुनाव करती हैं वहीं समाज पर अपना असर भी डालती हैं.
गीतकार और लेखक जावेद अख्तर भी यही मानते हैं. वो कहते हैं, ''इसमें कोई शक नहीं कि हिंदी को फैलाने में, उसे लोगों क़ी अपनी भाषा बनाने में हिंदी फिल्मों का बहुत बड़ा हाथ रहा है. खास तौर पर युवा पीढ़ी हिंदी को हिंदी फिल्मों के ज़रिए ही जानती है . हमारे देश में ही क्यों विदेश में भी हिंदी के प्रचार-प्रसार का श्रेय हिंदी फिल्मों को ही जाता है.''

हिंदी का स्तर गिरा

जावेद अख्तर
जावेद अख्तर हिंदी फिल्मों के जाने-माने गीतकार और लेखक हैं.
लेकिन अगर जावेद साहब से ये पूछा जाए कि जिस तरह की भाषा का प्रयोग 'डैली बैली' और 'गैंग्स ऑफ़ वासेपुर' में हुआ है क्या उससे हिंदी के स्तर में गिरावट नहीं आई है?
जावेद साहब कहते हैं, ''मैं इस मामले में कोई राय नहीं देना चाहता. क्या गालियां हमारे समाज का हिस्सा नहीं है. लेकिन मैं जब फिल्मों के गाने या संवाद लिखता हूं तो मैं अशुद्ध भाषा या गाली-गलौच का प्रयोग करना पसंद नहीं करता. निजी जीवन में भी मुझे ऐसी भाषा से सख्त परहेज है.''
जावेद अख्तर मानते हैं कि बदलते समय के साथ उन्होंने भी अपनी गीत लेखन में भाषा को बदला है. वे कहते हैं, ''सालों पहले हम अपने गानों में अंग्रेजी शब्दों के इस्तेमाल के बारे में सोच भी नहीं सकते थे.
मेरे अपने गीत, 'देखा एक ख्वाब तो ये सिलसिले हुए' या फिर 'ये कहां आ गए हम' में शायरी अंदाज़ नज़र आता है, मगर फिल्म 'कल हो ना हो' में गाने में एकाध लाइन जैसे ,'ह्वेयर इज द पार्टी टुनाइट' भी लिखा है मैंने. तो ये तो सच है कि गीतों में, कविता में बदलाव आया है.''
आज हिंदी फिल्मों में विदेशों से आई अभिनेत्रियां जैसे कटरीना कैफ, जैकलीन फर्नेंडेज, नर्गिस फखरी हिंदी जाने बगैर भी फिल्मों में जमकर काम कर रही हैं. क्या हिंदी फिल्मों में काम करने की न्यूनतम योग्यता हिंदी आना नहीं होनी चाहिए?

भाषा की समझ

"मैंने अपनी पढ़ाई एक पारसी स्कूल से की और मैं भी अंग्रेजी ज्यादा बोलती थी. लेकिन फिल्मों में आने के बाद मैंने अपनी जबान को साफ करने के लिए एक उर्दू टीचर रखा और उर्दू सीखी."
आशा पारेख, अभिनेत्री
इस सवाल के जवाब में जावेद अख्तर कहते हैं, ''मेरा मानना है कि एक कलाकार को अभिनय आना चाहिए भाषा वो सीख सकता है और लोग सीख भी रहे हैं. आज कटरीना अच्छी-खासी हिंदी बोल लेती हैं. फिल्मों में हमेशा से अलग-अलग भाषाओं के लोग काम करते रहे हैं. ये नई बात नहीं है.''
आज की अभिनेत्रियों का पक्ष तो जावेद साहब ने ले लिया. लेकिन एक वक़्त तो ऐसा भी था जब फिल्मों में काम करने वाले कलाकार अपनी भाषा पर बहुत ध्यान देते थे.
बीबीसी से की गई एक खास बातचीत में बीते ज़माने की मशहूर अभिनेत्री आशा पारेख ने अपना मत रखते हुए कहा, ''मैंने अपनी पढ़ाई एक पारसी स्कूल से की और मैं भी अंग्रेजी ज्यादा बोलती थी. लेकिन फिल्मों में आने के बाद मैंने अपनी जबान को साफ करने के लिए एक उर्दू टीचर रखा और उर्दू सीखी.''
आशा पारेख भी मानती हैं कि बदलते जमाने के साथ हिंदी भाषा ने भी अपना रंग बदला है.
वो कहती हैं, ''आजकल तो बहुत कुछ हिंगलिश हो गया है. हमारी हिंदी जबान भी बहुत कुछ करवटें ले रही है. इस बात का मुझे बहुत दुःख होता है कि अब शुद्ध हिंदी का प्रयोग बहुत कम होता है. लेकिन आजकल तो ग्लोबलाइजेशन का जमान है. हिंदी फिल्में सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि दुनिया भर में दिखाई जा रही हैं तो ऐसे में शुद्ध हिंदी का प्रयोग फिल्मों में हो भी कैसे सकता है.''

इससे जुड़ी और सामग्रियाँ

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें