गुरुवार, 6 सितंबर 2012

कमजोर चौथे खंभे की सर्जरी

  


पत्रकारिता को इतना भर तो जरुर समझ पाया


हूँ कि "खबर" इसका मौलिक तत्व है । इस


लिहाज से खबर जूटाने वाले खबरची किसी भी


मीडिया हाऊस के सबसे अहम कार्मिक हुये ।


जबकि लोगोँ तक यथाशीघ्र खबरोँ के मौलिक


तत्वोँ को छेड़े बगैर खबर खबर पहुँचाना ही


पत्रकारिता का एकमात्र मिशन है । लेकिन


हिन्दूस्तानी मीडिया का इन सब बातोँ से


कोई सरोकार ही नही है ।

कहा जाता है कि पत्रकारिता सम्पूर्ण जीव जगत् के कल्याणार्थ एक सतत आन्दोलन है । इसे लोकतंत्र का पहरुआ भी माना जाता रहा है । यह देश और समाज का आईना भी है । शासन के क्रिया कलापोँ पर पैनी नजर रखते हुये यह इससे जन सामान्य को लगातार अवगत कराते रहता है । सूचना क्रांति के वर्तमान युग मे यह ज्यादा सक्रिय और प्राषंगिक हो गया है ।इन दिनोँ लोगोँ की मीडिया पर निर्भरता भी बढी है । सही मायने मे आज मीडिया समाज की दिशा और दशा तय करने वाला अहम् कारक हो गया है । तभी तो इसे जनतंत्र का चौथा खम्भा माना जाता रहा है । आधुनिक विश्व का इतिहास जन अभिव्यक्ति के इस प्लेटफार्म की कामयाबी के किस्सोँ से अटा पड़ा है । पर्याप्त अधिकारोँ के अभाव और हजारोँ अँकुश के बाबजूद भी भारत की आजादी के आन्दोलन मेँ प्रेस का सक्रिय और असरकारी योगदान रहा है ।


लेकिन बाद के दिनोँ मेँ मीडिया मेँ पूँजी का

समावेश हो जाने से यह धनाढ्योँ की कमाई का

जरिया बन गया । पूँजीपतियोँ ने अपने फायदे

के लिये मीडिया का इस्तेमाल जमकर करना

शुरु कर दिया । यही नही छोटे गैँगस्टरोँ

से लेकर माफिया सरगनाओँ तक और छुटभैय्योँ

से लेकर राष्ट्रीय पार्टियोँ तक ने अपने -

अपने मीडिया हाउसोँ के माध्यम से अपना हित

साधते रहे हैँ । पत्र - पत्रिकायेँ , अखबार

, रेडियो तथा टेलिविजन आदि छद्म

  विज्ञापनों  से अटे पड़े रहते हैँ और आम

आदमी आज हाशिये पड़ चला गया है । गरीबोँ की

आवाज उनकी अपनी ही जुंबा में ही  दबकर दफन होने

को विवश है ।

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