बुधवार, 12 सितंबर 2012

विकिपीडिया:हिन्दी में सामान्य गलतियाँ - फुल स्टॉप



सामान्य जीवन में, कम्प्यूटर, इण्टरनेट तथा चिट्ठों पर हिन्दी में वर्तनी सम्बंधी अनेक गलतियाँ देखी जाती हैं। अशुद्ध वर्तनी भाषा की सुन्दरता को खराब करती है। इसलिये इस लेख में हिन्दी में की जाने वाली सामान्य गलतियों के बारे में बताया गया है।

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टाइपिंग की गलतियाँ

ये वे अशुद्धियाँ हैं जो आमतौर कम्प्यूटर अथवा अन्य कम्प्यूटिंग डिवाइसों पर टाइपिंग के दौरान होती हैं। अंग्रेजी में इस प्रकार की अशुद्धियों को टाइपो कहा जाता है। कई बार तो इन पर टाइपकर्ता का ध्यान नहीं जाता, कई बार ध्यान जाने पर भी आलस्यवश वह नजरअन्दाज कर देता है। एक अन्य कारण यह भी है कि कई बार टाइपकर्ता को प्रयोग किये जा रहे टाइपिंग औजार द्वारा वह वर्ण या चिह्न टाइप करने का तरीका पता नहीं होता। ऐसा सुविधा के चक्कर में, किसी चिह्न को टाइप करने का सही तरीका न जानने के कारण अथवा चिह्न विशेष को टाइप करने की सुलभता उपलब्ध न होने के कारण होता है।

फुलस्टॉप तथा पूर्णविराम की गलती

कम्प्यूटर पर टंकण के समय अधिकतर लोग आलस्यवश या वर्ण को टाइप करने का तरीका न जानने/सुलभ न होने के कारण पूर्णविराम (।) के स्थान पर फुलस्टॉप (.) का प्रयोग करते हैं। पूर्णविराम के स्थान पर फुलस्टॉप का प्रयोग करने से देवनागरी की सुन्दरता भी प्रभावित होती है तथा कम्प्यूटिंग में अन्य जटिलतायें भी आती हैं। [1][2]

विराम चिह्नों से पहले स्पेस देने की गलती

हिन्दी में किसी भी विराम चिह्न यथा पूर्णविराम, प्रश्नचिह्न आदि से पहले स्पेस नहीं आता। आजकल कई मुद्रित पुस्तकों, पत्रिकाओं में ऐसा होने के कारण लोग ऐसा ही टाइप करने लगते हैं जो कि गलत है। किसी भी विराम चिह्न से पहले स्पेस नहीं आना चाहिये।[3]

फुलस्टॉप तथा लाघव चिह्न की गलती

अंग्रेजी में संक्षेपीकरण (abbreviation) के लिये फुलस्टॉप का प्रयोग किया जाता है, हिन्दी में इस कार्य के लिये लाघव चिह्न (॰) होता है। प्रायः यह चिह्न कीबोर्ड पर सुलभ न होने से लोग इसके स्थान पर फुलस्टॉप का ही प्रयोग कर लेते हैं जबकि वह अशुद्ध है।
इस चिह्न को टाइप करने का सरलतम तरीका है कि किसी भी वर्ड प्रोसैसर में इसके यूनिकोड कूट 0970 को टाइप करें तथा उसे सलैक्ट करके Alt-X दबा दें, वह लाघव चिह्न में बदल जायेगा।
उदाहरण: सही - डॉ॰ राजेन्द्र प्रसाद, गलत - डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, सही - ऍम॰ ए॰, गलत - ऍम. ए.
हिन्दी शून्य अंक का चिह्न (०, यूनिकोड कूट 0966) भी इससे मिलता-जुलता होने से कई बार लोग गलती से लाघव चिह्न की जगह हिन्दी के शून्य अंक का प्रयोग कर लेते हैं। इनमें अन्तर ये है कि एक तो लाघव चिह्न शून्य से छोटा होता है दूसरा शून्य जहाँ क्षैतिज रुप से पंक्ति के मध्य में होता है, लाघव चिह्न क्षैतिज रुप से नीचे की तरफ होता है।

पूर्णविराम तथा डबल डण्डे की गलती

कई लोग जानकारी के अभाव में संस्कृत में श्लोकों के अन्त में लिखे जाने वाले डबल डण्डे के सही चिह्न (॥) के स्थान पर दो पूर्णविराम (।।) डाल देते हैं। सही चिह्न डालने हेतु यदि आपके टाइपिंग औजार में ये चिह्न न हो तो किसी भी वर्ड प्रोसैसर में इसके यूनिकोड कोड 0965 को टाइप करें तथा उसे सलैक्ट करके Alt-X दबा दें, वह डबल दण्ड चिह्न में बदल जायेगा।
वाक्य-अन्त हेतु पूर्णविराम/दण्ड (। - U0964) निर्धारित है। पैराग्राफ-अन्त (छन्द) हेतु डबल-दण्ड (॥ - U0965) निर्धारित है, जिसका सामान्यता कविता/पद्य में तुकबन्दी के अन्त में (पैरा के अन्त में होता है।), किन्तु प्रत्येक पैराग्राफ के अन्त में डबल दण्ड टाइप किया जाए तो पाठ अधिक वैज्ञानिक और तकनीकी रूप से परिशुद्ध होगा।[4]

कॉलन तथा विसर्ग की गलती

कई बार टाइपकर्ता विसर्ग (ः) के स्थान पर उससे मिलते जुलते चिह्न कॉलन (:) को टाइप कर देते हैं जो कि सर्वथा अशुद्ध है। मानक हिन्दी कीबोर्ड इनस्क्रिप्ट में विसर्ग शिफ्ट के साथ - कुञ्जी दबाकर प्राप्त किया जा सकता है। अन्य विकल्प के तौर पर किसी भी वर्ड प्रोसैसर में इसके यूनिकोड कोड 0903 को टाइप करें तथा उसे सलैक्ट करके Alt-X दबा दें, वह विसर्ग चिह्न में बदल जायेगा।

दशमलव चिह्न तथा फुल-स्टॉप की गलती

कई बार टाइपकर्ता दशमलव चिह्न (.) के स्थान पर उससे मिलते जुलते चिह्न फुलस्टॉप () को टाइप कर देते हैं जो कि सर्वथा अशुद्ध है। इन दोनों का अन्तर देखना हो तो दोनों को किसी वर्ड प्रोसैसर में टाइप कर फॉण्ट साइज बहुत बड़ा करके देखें।
दशमलव चिह्न के लिए Middle Dot (U00B7) का प्रयोग किया जाना चाहिए जो Numerical Keypad में Del key के ऊपर है। जबकि Full stop के लिए सिर्फ (U002E) कोड निर्धारित है।[5]

वर्तनी की गलतियाँ

पञ्चमाक्षर की गलतियाँ

पञ्चमाक्षरों के नियम का सही ज्ञान न होने से बहुधा लोग इनके आधे अक्षरों की जगह अक्सर 'न्' का ही गलत प्रयोग करते हैं जैसे 'पण्डित' के स्थान पर 'पन्डित', 'विण्डोज़' के स्थान पर 'विन्डोज़', 'चञ्चल' के स्थान पर 'चन्चल' आदि। ये अधिकतर अशुद्धियाँ 'ञ्' तथा 'ण्' के स्थान पर 'न्' के प्रयोग की होती हैं।
नियम: वर्णमाला के हर व्यञ्जन वर्ग के पहले चार वर्णों के पहले यदि अनुस्वार की ध्वनि हो तो उस वर्ग का पाँचवा वर्ण आधा (हलन्त) होकर लगता है। अर्थात कवर्ग (क, ख, ग, घ, ङ) के पहले चार वर्णों से पहले आधा (ङ्), चवर्ग (च, छ, ज, झ, ञ) के पहले चार वर्णों से पहले आधा (ण्), तवर्ग (त, थ, द, ध, न) के पहले चार वर्णों से पहले आधा (न्) तथा पवर्ग (प, फ, ब, भ, म) के पहले चार वर्णों से पहले आधा म (म्) आता है। उदाहरण: (ञ्), टवर्ग (ट, ठ, ड, ढ, ण) के पहले चार वर्णों से पहले आधा
  • कवर्ग - पङ्कज, गङ्गा
  • चवर्ग - कुञ्जी, चञ्चल
  • टवर्ग - विण्डोज़, प्रिण्टर
  • तवर्ग - कुन्ती, शान्ति
  • पवर्ग - परम्परा, सम्भव
आधुनिक हिन्दी में पञ्चमाक्षरों के स्थान पर सुविधा हेतु केवल अनुस्वार का भी प्रयोग कर लिया जाता है यद्यपि यह देवनागरी की सुन्दरता को कम करता है। जैसे: पञ्कज - पंकज, शान्ति - शांति, परम्परा - परंपरा। विशेषकर तथा ङ् का प्रयोग काफी कम हो गया है।
विकिपीडिया की परम्परा के अनुसार संस्कृत, धर्म तथा भारतीय संस्कृति सम्बंधी लेखों में पञ्चमाक्षरों का प्रयोग होना चाहिये जबकि विज्ञान, गणित, तकनीक आदि सम्बंधी लेखों में सरलता हेतु आधुनिक हिन्दी का प्रयोग किया जा सकता है। हाँ लेख के शीर्षक (नाम) को शुद्ध उच्चारण तथा वर्तनी की दृष्टि से पञ्चमाक्षर में रखा जाय, चाहे वह किसी भी विषय से सम्बंधित हो। खोज तथा पुनर्निर्देशन हेतु आधुनिक वर्तनी वाले नाम को पारम्परिक (शुद्ध) पञ्चमाक्षर वाले शीर्षक पर पुनर्निर्देशित कर देना चाहिये ताकि शुद्ध उच्चारण एवं वर्तनी रहे। उदाहरण के लिये पंडित को पण्डित पर पुनर्निर्देशित किया जाना चाहिये।
आगत ध्वनि "ऑ" अथवा इसकी मात्रा (ॉ) के बाद शुद्ध वर्तनी का प्रयोग ही उपयुक्त है क्योंकि उसमें अनुस्वार की बिन्दी दिखायी नहीं देती। उदाहरण - फॉंट (बिन्दी दिखती नहीं, टैक्स्ट साइज काफी बड़ा करने पर दिखेगी) के स्थान पर फॉण्ट उपयुक्त है। इसी प्रकार दूसरी आगत ध्वनि "ऍ" तथा इसकी मात्रा (ॅ) के बाद भी अनुस्वार की बिन्दी या तो दिखती नहीं या चन्द्रबिन्दु का भ्रम होता है अतः इसके स्थान पर भी शुद्ध वर्तनी का प्रयोग ही उपयुक्त है। उदाहरण - ऍंड के स्थान पर ऍण्ड उपयुक्त है।
पञ्चम वर्ण की सन्धि से बनने वाले संयुक्ताक्षरों में बाद वाला वर्ण "ङ्" तथा "ञ" के नीचे लगता है। इस प्रकार बनने वाले संयुक्ताक्षरों को मंगल आदि अधिकतर यूनिकोड फॉण्ट सही प्रकार से नहीं दिखा पाते, बायीं तरफ दिखाते हैं। संस्कृत २००३ नामक यूनिकोड फॉण्ट ऐसे संयुक्ताक्षरों को सही प्रकार से प्रदर्शित करता है। उदाहरण - गङ्गा का सही रुप गंगा.JPG है।

अंग्रेजी शब्दों को हिन्दी में लिखने पर होने वाली गलतियाँ

ऑ की गलतियाँ

लेखन की गलती: 'ऑ' तथा 'ऍ' ये दोनों आगत ध्वनियाँ कही जाती हैं जो कि हिन्दी में विदेशी भाषाओं विशेषकर अंग्रेजी से आयी हैं। इनका उपयोग अंग्रेजी की दो विशिष्ट ध्वनियों के लिये होता है। 'ऑ' की ध्वनि 'ओ' तथा 'औ' के लगभग बीच की है, उदाहरण: बॉस (Boss), हॉट (Hot) आदि।
बहुधा लोग सामान्य लेखन में भी तथा कम्प्यूटर पऱ टंकण मे भी 'ॉ' (ऑ की मात्रा) के स्थान पर 'ा' (आ की मात्रा) लिख देते हैं। ऐसा दो कारणों से है एक तो विदेशी ध्वनियाँ होने से भारतीय कई बार इन्हें आत्मसात नहीं कर पाते और दूसरा कम्प्यूटर पर टाइपिंग औजार में 'ऑ' (अथवा इसकी मात्रा) का चिह्न सुलभ न होने से। कई बार टाइपिंग औजार में सुलभ होने पर भी लोग आलस्यवश 'आ' की ही मात्रा लगा देते हैं।
हालाँकि कुछ शब्द ऐसे हैं जिनके हिन्दी में 'आ' वाले रुप भी प्रचलित हैं जैसे डाक्टर (डॉक्टर से बना) तथा कालेज (कॉलेज से बना)। इन मामलों में 'आ' वाला रुप भी चल जाता है क्योंकि इनका 'आ' वाला उच्चारण भी प्रचलित है, यद्यपि 'ऑ' वाला ही लिखना बेहतर है। लेकिन जिन शब्दों के उच्चारण में केवल 'ऑ' की ही ध्वनि हो उन्हें 'आ' रुप में लिखना बिलकुल गलत है। उदाहरण के लिये इण्टरनेट पर 'ब्लॉग' को बहुधा गलत रुप से 'ब्लाग' लिख दिया जाता है यद्यपि 'ब्लाग' बोलता कोई नहीं।
उच्चारण की गलती: चूँकि 'ऑ' विदेशी ध्वनि है इसलिये कई भारतीय इसे आत्मसात नहीं कर पाते तथा 'ऑ' वाले शब्दों का उच्चारण 'आ' की तरह करते हैं। उदाहरण के लिये 'ऑल' के स्थान पर 'आल', 'ऑलसो' के स्थान पर 'आलसो', 'बॉडी' के स्थान पर 'बाडी' आदि।

ऍ की गलतियाँ

आगत ध्वनि 'ऍ', 'ए' तथा 'ऐ' के लगभग बीच की है, उदाहरण 'जॅक' (Jack), 'मॅक' (Mac)। हिन्दी में आमतौर पर इसके लिये निकटतम वर्ण 'ऐ' का उपयोग कर लिया जाता है जैसे 'जॅक' की बजाय 'जैक' आदि। यह इतना अशुद्ध नहीं लेकिन 'ऍ' की मात्रा के स्थान पर 'ए' की मात्रा का उपयोग सर्वथा अनुचित है तथा देवनागरी की ध्वन्यात्मकता गुण - उच्चारण और लेखन की समरुपता के विरुद्ध है। इस तरह के गलत प्रयोग के उदाहरण हैं 'रॅड' (Red) के स्थान पर 'रेड' लिखना जो कि Raid का सही लेखन है। इसी प्रकार 'टॅस्ट' (Test) के स्थान पर 'टेस्ट' लिखना जो कि Taste का सही लेखन है, 'गॅस्ट' (Guest) के स्थान पर 'गेस्ट' जो कि गलत है।
एक अन्य अशुद्धि जो कि प्रिण्ट मीडिया में देखने को मिलती है - 'ऍ' के स्थान पर 'अ' के ऊपर 'ॅ' चिह्न लगा वर्ण। ऐसा वर्ण यूनिकोड फॉण्ट में बनाना सम्भव नहीं है लेकिन नॉन-यूनिकोड फॉण्ट में बन जाता है। ऐसी गलती आम तौर पर 'ऍ' से शुरु होने वाले वर्णों में दिखायी देती है।

अनुस्वार तथा अनुनासिक की गलतियाँ

बहुधा अनुस्वार (ं) के स्थान पर अनुनासिक (ँ) तथा अनुनासिक (ँ) के स्थान पर अनुस्वार (ं) लिख दिया जाता है। विशेषकर अनुनासिक के स्थान पर अनुस्वार को लिखे जाने की गलती अधिक प्रचलित है और इसे एक प्रकार की अघोषित स्वीकृति भी मिल गयी है। कुछ उदाहरण हैं, हंसना के स्थान पर हँसना, पँख के स्थान पर पंख आदि।[6]
इन दोनों के अन्तर को स्पष्ट करने के लिये बहुधा हंस (हंसना क्रिया वाला) तथा हँस (पक्षी) का उदाहरण दिया जाता है। अनुस्वार तथा अनुनासिक के उपयोग सम्बंधी जानकारी यहाँ देखें।

नुक्ते की गलतियाँ

उर्दू से हिन्दी में लिये गये शब्दों में नुक्ता लगाया जाता है। इसके अतिरिक्त अंग्रेजी आदि विदेशी भाषाओं के कुछ शब्दों में भी नुक्ते का उपयोग होता है। नुक्ता भाषा विशेष की सही ध्वनि को प्रकट करता है लेकिन हिन्दी में लिखते समय प्रायः कई बार लोग नुक्ता लोप कर देते हैं।[7] यद्यपि इसे गम्भीर गलती नहीं माना जाता। नुक्ता छोड़ देना विशेष नोटिस नहीं किया जाता लेकिन जहाँ नुक्ता न लगना हो वहाँ लगा देना अजीब लगता है जैसे 'फल' के स्थान पर 'फ़ल' तथा 'फिर' के स्थान पर 'फ़िर' सरासर गलत है।
बेवजह नुक्ता लगाने का एक कारण टाइपिंग सम्बंधी भी है। उदाहरण के लिये बरह आइऍमई नामक औजार से टाइप करते समय 'F' कुञ्जी दबाने से 'फ़' छपता है जबकि 'फ' के लिये 'P+H' दबाना पड़ता है। इसलिये कई लोग आलस्यवश 'F' द्वारा 'फ' लिखने को ही आदत बना लेते हैं।
कई बार नुक्ता अपरिहार्य भी हो सकता है। एक उदाहरण देखें: अंग्रेजी के वर्ण 'G' का उच्चारण है 'जी', तथा 'Z' का उच्चारण (अमेरिकी) है 'ज़ी'। इन दोनों के उच्चारण का अन्तर नुक्ते बिना स्पष्ट नहीं हो सकता।
एक अन्य सुझाव यह दिया जाता है कि जहाँ अर्थ बदलने की आशंका हो, वहीं नुक्ता जैसे विक्षिप्तिकारक का प्रयोग किया जाए। जहाँ बिना नुक्ते के अर्थ सही समझा जा सके, वहाँ बिना नुक्ते के काम चलाया जाना चाहिए।
नुक्ते के बारे में एक सामान्य नियम याद रखा जाना चाहिये - हाँ पर नुक्ते के प्रयोग के विषय में शंका हो, वहाँ नुक्ते का प्रयोग न करें। 'ज़रूरत' के स्थान पर 'जरूरत' चल जाएगा, पर 'मजबूरी' के स्थान पर 'मज़बूरी' नहीं। नुक्ते के सही प्रयोग हेतु यह लेख देखें।

शुद्ध-अशुद्ध शब्दकोश

हिन्दी में बहुत से शब्द हैं जिनकी वर्तनी आम तौर पर गलत लिखी जाती है। ये वर्तनियाँ प्रिण्ट मीडिया में मौजूद होने से आम आदमी इन्हें ही सही समझने लगता है। उपरोक्त मुख्य लेख में इस प्रकार के शब्दों की सूची दी गयी है।

उच्चारण की गलतियाँ

व्यञ्जनों का अशुद्ध उच्चारण

क --> कै, ख --> खै आदि

स, श तथा ष का अशुद्ध उच्चारण

कई लोग 'श' तथा 'ष' का उच्चारण भी 'स' की तरह ही करते हैं जैसे 'इंगलिश' को 'इंगलिस' बोलना, 'षडयन्त्र' को 'सडयन्त्र' बोलना आदि।

ऋ का अशुद्ध उच्चारण

'ऋ' का उत्तर भारत में उच्चारण 'रि' की तरह तथा दक्षिण भारत में 'रु' की तरह होता है। इसका सही उच्चारण कालक्रम में लुप्त हो चुका है।[8]

ज्ञ का अशुद्ध उच्चारण

'ज्ञ' का भारत के विभिन्न हिस्सों में उच्चारण भिन्न-भिन्न तरीके से होता है, उत्तर भारत के हिन्दी भाषा क्षेत्रों में प्रायः इसका उच्चारण 'ग्य' की तरह किया जाता है। इसका सही उच्चारण भी वर्तमान में लुप्त हो चुका है।[9]

क्ष का अशुद्ध उच्चारण

आजकल 'क्ष' का उच्चारण 'छ' की तरह आम तौर पर सुनने को मिलता है जैसे 'क्षत्रिय' को 'छत्रिय' बोलना।

ङ का अशुद्ध उच्चारण

प्रायः पञ्चमाक्षरों से अपरिचित लोग 'ङ' का उच्चारण 'ड़' की तरह करते हैं।

आधे अक्षरों का पूरे अक्षरों की तरह उच्चारण

कुछ लोग कुछ शब्दों में आने वाले आधे अक्षरों (हलन्त युक्त) का पूरे अक्षरों की तरह उच्चारण करते हैं। उदाहरण के लिये 'प्रश्न' का उच्चारण 'प्रशन' की तरह, 'महत्व' का उच्चारण 'महतव' की तरह, 'प्रयत्न' का उच्चारण 'प्रयतन' की तरह आदि।

गलत अर्थ में प्रयुक्त होने वाले शब्द

कई ऐसे शब्द हैं जिनका अर्थ तो कुछ और था लेकिन वे गलत अर्थ समझे जाने से भिन्न अर्थ में प्रयुक्त होने लगे हैं। उदाहरण के लिये ख़िलाफ़त का अर्थ "ख़लीफ़ा का पद और उसकी सत्ता" होता है लेकिन आम जनता जिसमें पढ़े-लिखे पत्रकार भी शामिल हैं, ख़िलाफ़त को मुख़ालिफ़त (विरोध) के अर्थ में ही धड़ल्ले से इस्तेमाल कर रहे हैं।

सन्दर्भ

इन्हें भी देखें

बाहरी कड़ियाँ



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