बुधवार, 12 सितंबर 2012

एफएम रेडियो से भाषा और मूल्य दोनों का पतन



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समाचार4मीडिया.कॉम
एक समय था जब लोग रेडियो सुनकर भाषा सीखते थे। लेकिन आज के समय में देखे तो एफएम चैनल आ जाने के बाद से रेडियो की भाषा में बहुत गिरावट आई है। ‘घंटा सिंह का घंटा’, ‘बजाते रहो’ और ‘ये बाप के जमाने का नहीं आप के जमाने का रेडियो स्टेशन है’ तो कोई कह रहा है कि ‘सावधान रेडियो बंद किया, तो कान में डंडा कर दिया जायेगा’। यह कहां तक सही है और इससे पीछे क्या मकसद है इस बारे में समाचार4मीडिया ने कुछ रेडियो जॉकी से उनकी राय जानी। प्रस्तुत हैं उनके विचार -
‘रेडियो वन’ की जॉकी मल्लिका का कहना है कि अगर एफएम सकारात्मक बातें रखें और अच्छी भाषा का प्रयोग करें तो वे अपनी पहचान नहीं बना पाते। उन्होंने यह भी कहा, “अगर कोई अच्छी बात करे तो लोग उसे यह कहकर भूल जाते हैं कि अच्छी बात थी। लेकिन अगर उन्हें कोई ऐसी बात कहे कि जो उन्हें खटके तो वे उसे जिंदगी भर याद रखेंगे। इसलिए हमारी कोशिश होती है कि हम लोग को खटकने वाली बात बोलें।” एफएम चैनलों पर किए जाने वाले भद्दे मजाकों के बारे में बताया कि इनकी एक सीमा तय होनी चाहिए। मजाक होना चाहिए लेकिन एक दायरे तक। एक दायरे से बाहर नहीं निकलना चाहिए। आज के समय में हर जगह यही हो रहा है टीवी चैनलों के रियलिटी शो में भी ऐसी ही भाषा का प्रयोग हो रहा है।
वहीं इस मसले पर विविध भारती के अनांउसर कमल शर्मा का कहना है कि इस तरह की भाषा का प्रयोग करके वो भाषा के साथ बहुत बड़ा खिलवाड़ कर रहे हैं। ऐसे लोग भाषा को बदनाम कर रहे हैं। उनमें कोई सरोकार ही नज़र नहीं आता। ‘न्यूज और मनोरंजन का मतलब अश्लीलता फैलाना नहीं है।’ वे लोग इस तरह गैर-जिम्मेदाराना हरकतें कर रहे हैं। रेडियो के माध्यम से एक बहुत बड़े तबके में संदेश जाता है। इस तरह की भाषा का प्रयोग करने पर तो गलत संदेश ही जाएगा। रेडियो के माध्यम से लोग अपनी भाषा तय करते हैं। इन्हें एक जिम्मेदार माध्यम मिला हुआ है जिसका इस तरह से गलत प्रयोग नहीं करना चाहिए। श्रोताओं से कनेक्ट होने वाली बात पर उन्होंने बताया, “यह बिल्कुल गलत है ऐसा कुछ भी नहीं है। ये लोग भाषा के जानकार नहीं होते। भद्दे मजाकों पर कमेंट करने पर टिप्पणी करने पर उन्होंने बताया कि इन मजाकों के जरिए वे लोगों की निजता में घूसे जा रहे हैं। यह बहुत बड़ा मुद्दा है। इस पर गहन चिंतन की जरूरत है। प्रसार भारती में देखें तो आज भी हमें ध्यान रखना पड़ता है कि हमारी भाषा के किसी शब्द से किसी को ठेस तो नहीं पहुंच रही है। इसका एक दायरा निश्चित किया जाना चाहिए।”
विविध भारती के ही अनाउंसर युनुस खान का कहना है, “एक समय था जब हम लोग विविध भारती, बीबीसी को सुनकर भाषा सीखते थे। हम अपनी भाषा को मांजते थे। लेकिन जब से एफएम रेडियो आए हैं तब से अजीब तरह की भाषा का प्रयोग किया जा रहा है। इस पर सफाई देते हुए एफएम चैनल वालों का कहना होता है कि हम आम जनता की भाषा का प्रयोग करते हैं। जनता जो सुनना चाहती है, हम उसी भाषा में बात करते हैं। लेकिन मेरा व्यक्तिगत तौर पर मानना है कि ऐसी भाषा कोई जनता ना तो बोलती है और ना ही सुनना पसंद करती है। हां, यह जरूर है कि कुछ लड़के जो कॉलेज स्तर के होते हैं वो जरूर इस्तेमाल करते हैं, लेकिन चोरी-चुपके से। यह एक भाषाई साजिश है इससे भाषा के साथ खिलवाड़ हो रहा है इसके खिलाफ आवाज उठाई जानी चाहिए। हर कोई सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के लिए अनेकों तरीके अपनाता है और रेडियो चैनल भी वहीं कर रहे हैं।”
रेडियो मिर्ची के जॉकी सौरभ भ्रमर ने बताया कि उनका व्यक्तिगत तौर पर मानना है कि इससे भाषा में ही गिरावट नहीं आई है, बल्कि हमारे मूल्यों का भी पतन हुआ है। ऐसी गिरावट केवल एफएम रेडियो स्टेशनों में ही नहीं, बल्कि हर एक मास मीडियम में आई है। टीवी चैनलों में भी यह बात देखने को मिलती है। मेरा तो यह मानना है कि सरकार को एफएम रेडियो पहले ही लॉन्च कर देने चाहिए थे। क्योंकि पहले टीवी चैनल आए इससे पहले टीवी चैनल वालों ने फूहड़ता फैलाई और वहीं से इन एफएम चैनल वालों ने इसको कॉपी करना शुरू किया है। इसका सबसे बड़ा कारण बॉलीवुड का कंटेंट है। पहले जो फिल्में बनती थी, उनमें एक संदेश छिपा होता था लेकिन आज के समय में ऐसा कुछ भी नहीं है।

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