गुरुवार, 6 सितंबर 2012

रिपोर्टिंग और कानून: बंदिशों के बीच अच्छी रिपोर्टिंग के लिए कुछ सुझाव

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वीओजे डेस्क
     पत्रकारिता में समय का महत्व बढ़ता जा रहा है। समय सापेक्ष गतिविधियों को जल्द विश्लेषित कर पाठकों से समक्ष रखना इस विधा को साहित्य से अलग करता है। कहते भी हैं कि पत्रकारिता जल्दी में रचा गया साहित्य है। टीवी और अखबारों के फैलाव के बाद और मोबाइल व इंटरनेट जर्नलिज्म के आने के बाद यह जल्दी अब जल्दबाजी में बदल गई है। हर कोई जल्द से जल्द खबरें अपने पाठकों तक पहुंचाना चाहता है। ऐसे में कई बार हम मोटी बातों को भूल जाते हैं, जो रिपोर्टिंग या खबर लिखते वक्त जरूर याद रखनी चाहिए। खबर देते हुए हमें अपनी नागरिक जिम्मेदारी नहीं भूलनी चाहिए और इसी से जुड़ी कुछ बातें जरूर ध्यान रखें। जैसे-
  • इन दिनों सेक्स की खबरों को चटकारेदार बनाने का प्रचलन है, और ये खबरें तुरंत ही लिखी जाती हैं। अखबारों के न्यूज रूम से लेकर टीवी तक में बलात्कार के शब्द भर से सनसनी फैल जाती है। ऐसे में यह जरूर ध्यार रखें कि बलात्कार की खबर में शिकार महिला का नाम कतई न दें। न ही उसके पिता का और न मोहल्ले का जिक्र करें। अधिक से अधिक थाने का नाम दें और समुदाय का जिक्र भी न करें। न्यूज रूम से दबाव डाले जाने पर अधिकृत व्यक्ति को ही रिपोर्टर इसकी जानकारी दें।
  • जल्दबाजी में की गई रिपोर्टिंग की सबसे ज्यादा मिशालें दंगों अथवा तनाव की स्थिति में की गई खबरों में देखने को मिलती हैं। चूंकि 24 घंटे के खबरिया चैनल हों या लीड को तरसते अखबार सभी की दिलचस्पी इस तरह की खबरों को ज्यादा से ज्यादा प्रमुखता देने की होती है। इसलिए ध्यान रखें कि ऐसी खबरों में किसी संप्रदाय विशेष का जिक्र बिल्कुल भी न करें। उत्तेजित करने वाली भाषा और अशांति को प्रेरित करने वाले वाक्य दरकिनार कर दें।
  • संसद की रिपोर्टिंग या सांसद-विधायक के बयान की रिपोर्टिंग के वक्त भी अतिरिक्त सतर्कता बरतें। जब कोई सांसद अपनी बात संसद में और विधायक, विधानसभा में कहता है, तो उसकी आपत्तिजनक बात पर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता, लेकिन वही बात जस की तस लिखने पर रिपोर्टर और अखबार के लिए मुश्किलें खड़ी हो जाती हैं। मुकदमा भी हो सकता है। हालांकि कुछ विधानसभाओं ने रिपोर्टर को भी इस मामले में संरक्षण दिया है। लेकिन फिर भी इस मामले में एहतियात जरूरी है। हम रिपोर्टिंग के दौरान जितने दोस्त बनाते हैं, उससे कई गुना ज्यादा दुश्मन होते हैं। सो अतिरिक्त सतर्कता तो रखनी ही चाहिए ताकि विरोधियों को मौका न मिले। पॉलिटिकल रिपोर्टिंग में ही नेताओं के एक-दूसरे के खिलाफ कीचड़ उछालने वाले वक्तव्यों को भी शालीन भाषा में ही लिखें। देखा जाता है कि ग्रामीण रिपोर्टर तो जस-की-तस भाषा में गालियों समेत वाक्य लिख देते हैं। डेस्क पर भी इस संबंध में सतर्कता बरतनी चाहिए। क्योंकि नेता तो बोलकर फारिग हो जाते हैं और लिखित शब्द के कारण हम अपनी बात के लिए प्रतिबद्घ हो जाते हैं।
  • कानूनी आरोप में भी आरोपी का नाम पुख्ता सबूत होने पर ही लिखें। अगर आरोपपत्र में महज संकेत हैं, तो भी किसी का नाम न दें। आज हालात यह है कि अखबार और चैनल ही अपने रिपोर्टर से पल्ला छाड़ लेते हैं, ऐसे में जरूरी है कि आप खुद को बचाने के बाद ही रिपोर्टिंग करें। आरोपों की पुष्टि न होने पर आरोपी का नाम लिखने के बजाए 'एक मंत्री' अथवा 'एक बड़े अधिकारी' से काम चला लें।
  • अदालती फैसलों की सीमित आलोचना ही की जा सकती है। कानूनन इस तरह की आलोचना में जज या मजिस्ट्रेट की नीयत पर संदेह व्यक्त नहीं किया जा सकता। यह अदालत की अवमानना की श्रेणी में आता है। न्यूज रूम के भीतर अगर इस तरह की टिप्पणियां की जा रही हैं, तब भी उन्हें लिखने में नहीं लाना चाहिए।
  • अदालत में विचाराधीन मामले के पक्ष-विपक्ष में टिप्पणी करना कानून संगत नहीं है।
  • राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मामलों में सूचना का अधिकार असीमित नहीं है। राष्ट्रीय सुरक्षा एवं उसके हितों का ध्यान रखा जाना चाहिए।
  • क्राइम की खबरों को करते वक्त ध्यान रखें कि वीभत्स फोटो या दहलाने वाले दृश्यों से बचा जाये। बहुत से अखबार वीभत्स चित्र (मृतकों आदि के चित्र) नहीं छापते। यूं भी सकारात्मक लेखन में वीभत्स रस से बचना चाहिए।
  • यदि कोई व्यक्ति किसी दूसरे पर कोई आरोप लगाए (चाहे वह हस्ताक्षरित बयान ही क्यों न हो) तो देखना चाहिए कि वे आरोप प्रथम दृष्ट्या छपने लायक भी हैं या नहीं। इसके अतिरिक्त यह भी देखा जाता है कि आरोप लगाने वाले व्यक्ति की सामाजिक प्रतिष्ठा कैसी है? वह कितना जिम्मेदार व्यक्ति है? जिस पर आरोप लगाया जा रहा है, उसकी व्यक्तिगत-सामाजिक स्थिति कैसी है? वगैरह, वगैरह। अन्यथा ऐसे आरोपों का जिक्र करते समय किसी का नाम न लेने की सुरक्षित राह अपनानी चाहिए।
  • इसी तरह खबर लिखते वक्त रिपोर्टर को किसी को आतंकित करने के लिए, ब्लैकमेल करने के लिए, किसी की प्रतिष्ठा को बेवजह चोट पहुंचाने के लिए, कोई लाभ प्राप्त करने के इरादे से, व्यक्तिगत खुंदक के कारण, बदनीयती से अथवा तथ्यों के विपरीत किसी बात का उल्लेख नहीं करना चाहिए।
अब सवाल उठ सकता है कि क्या इन प्रतिबंधों के बावजूद सकारात्मक और जोखिम भरी रिपोर्टिंग की जा सकती है, जिसमें सच भी शामिल हो। यानी ये सब सच को छुपाने की या फिर ताकतवर लोगों को बचाने की तरकीबें भी हो सकती है। यह संभव है, लेकिन इसकी आलोचना करते हुए हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि एक पत्रकार असीमित ताकत नहीं पा सकता। अभी जितनी सुविधाएं मिलीं है, उनका इस्तेमाल भी कई भ्रष्ट पत्रकार ही करते हैं। सिर्फ रिपोर्टिंग और लेखन से जुडऩे की इच्छा रखने वालों को तो सुविधाओं का ध्यान भी नहीं रहता।हालांकि समय-समय पर इस संबंध में बहसें होती रही हैं और हो रही हैं। उम्मीद करना चाहिए कि हम आने वाले समय में और बेहतर माहौल में रिपोर्टिंग कर पायेंगे और खबरें लिख पायेंगे।

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