सोमवार, 10 सितंबर 2012

जबलपुर में जमाया सम्पादकी का सुर और ताल




by Rajeev Mittal on Friday, 22 April 2011 at 13:26 ·

पत्रकारिता में कदम धरने वालो सावधान......यह कोई गुणगान नहीं.......कृपया इस राह पे कतई न चलें

जो इन्सान हमेशा सुर-ताल में काम करे.....हर पल इतना हो-हल्ला कि चैनल हेड  चुपचाप कहीं सटक ले  ....एकाएक किसी की आवाज सुनायी दे....ओये ...सम्पादक जी चले गये......शुरू हो जाओ......जिसकी अक्सर जनरल मैनेजर  के सामने इसलिये पेशी हो कि पिछले दिन लाइट जाने पर बाकायदा कीर्तन चला था सम्पादकीय विभाग में........(स्पाइक्स बजाने में आज के कुछ बड़े-बड़े सम्पादक शामिल थे)......या सम्पादक के दरवाजे के बाहर लगे लाल बल्ब का कांच अगले दिन सुबह जमीन पर बिखरा हो.....उससे भी बड़ी बात यह कि  अब तक करीब 12  सम्पादकों में से एकाध को छोड़ कर किसी को इस अराजकता पर ऐतराज कभी नहीं हुआ...क्योंकि काम पुख्ता और झटपट.....गेंद अपने पाले में रखने की आदत कभी पाली नहीं......धड़ाधड़ नौकरियां बदलना...पर चलना अपने अंदाज में ही......रात की इंचार्जी में साथ काम करने को ढेरों लालायित........

लखनऊ में इतवार को दिन में सम्पादक जी दफ्तर इसलिये नहीं आते थे कि आज पता नहीं कौन सा नजारा देखने को मिले...उनके बाद वाले आ गये (गल्ती से).....दरवाजे से ही लौट रहे थे कि दिख गये...किसी तरह मनाया...कानपुर में बाकायदा ढोलक और तबले के साथ.......चीफ रिपोर्टर कई बार मुख्य सम्पादक घनश्याम पंकज को लखनऊ फोन लगा कर गायन सुनवाता.....चंडीगढ़ में जनसत्ता से ज्यादा इंडियन एक्सप्रेस वालों की डिमांड  में रहता...बीआईटीवी में इन गुणों में जबरदस्त इजाफा .......इसलिये सुबह का हर बुलेटिन यादगार........अंग्रेजी और हिन्दी ...दोनों बुलेटिनों के कई-कई रंग होते..

सहारा टीवी में चैनल हेड उदयन शर्मा को ये तौर-तरीके इतने भाये कि अपने पास एक घंटा जरूर बैठाते....फिर अपने ही साथ अमर उजाला ले गये.....बाद में मुजफ्फरपुर में न्यूज एडिटरी करते हुए प्रशासक वाले गुण भी सीख लिये....वहां रात दो बजे के बाद गाना-बजाना चलता.. और शाम शुरू होते ही दहाड़...तो इन दो छोर वाले गुणों को एक बोतल में डाल कर खूब हिलाया और  दो घूंट लगा कर पहुंच गया सम्पादकी करने जबलपुर......एक साल बाद जब मेरठ में कुर्सी मिली तो प्रधान सम्पादक ने अपन का परिचय यही दिया---खुराफाती और जुनूनी.............




 राजीव मित्तल
वही चित्रकूट......जिसने तीन साल तक न जाने कितनी बार ढोया....बिलकुल घरवाली के अंदाज में.......रस्ते भर भोपाल वाली से एसएमएस बाजी होती रही...बाकी समय सम्पादक किस तरह का बनना है इस पर गहन चिन्तन..............एकेडमिक...दुकानदारी...एय्याश.....दुनियादार...प्रोफेशनल...फर्जीगिरी.....क्लर्कनुमा......
मिशनरी....गरिमा प्रधान.....या .....फिर अपनी ही कैमेस्ट्री को थामे रखा जाए...

सुबह दीदार हुए जबलपुर के....स्टेशन पर प्रबंधक (महा) संजय सोनी मौजूद......भंवरताल में गेस्टहाउस.....नागरथ चौक से लगा अपना कार्यालय...दफ्तर में सोनी के कमरे में फूलों के गुलदस्ते से स्वागत....फिलहाल तो एक दड़बे में......चाय-पानी के बाद जबलपुर के दर्शन......अमित दास की मोटरसाइकिल पर.....रांझी...मालवीय चौक....कैन्ट.....और पता नहीं कहां कहां....

चलो...अब  इस शहर से पान की दोस्ती की जाए....शानदार दुकान.....मुंह में रखते ही  पान उगल दिया....अमां ये पान है कि सौंफ का अचार......सर इस पान को खाने के लिये कलकत्ता से लोग आते हैं......कौन सी गाली निकालता......अपना पान बताया तो पूरा शहर अनजान......या खुदा....इस शहर में कैसे निभेगी......मुजफ्फरपुर....पान....केले का पत्ता.... बेतरह याद आने लगे........दफ्तर लौट गम में डूब गया....पहले ही दिन ये हाल.......शाम को गेस्टहाउस पहुंचा तो सरकुलेशन के सूबेदार दिखे...दुआ-सलाम के बाद पुड़िया दिखायी तो उसमें उठती सुगंध से जान में जान आयी...मुंह में डाला तो दिल ने चैन की सांस ली.......अब अपनी दिहाड़ी शुरू...इंटरव्यू में पूछा गया था कि आप अपनी टीम लेकर आएंगे...जी नहीं.....टीम लेकर नहीं चलता....बनाता हूं......तो सम्पादक की दुम..... बना अब अपनी टीम.....

फोन लगाया विनीत जी को .....आपसे फौरन मिलना चाहता हूं.....जीएम को बोलता हूं...आपको लेकर कल पहुंच जाएं...इंदौर पहुंच सामान पटक तैयार होकर भागा नईदुनिया....आपके पीसी में एपेक्स डाल दिया है.....(कुछ पल्ले नहीं पड़ा) .....लीजिये यह फाइल....जिसको रखना हो.....लिस्ट बना लें....खोली तो पांच सौ प्रोफाइल........उनमें एक दर्जन सम्पादक पद के उम्मीदवार.......विदा लेकर सबसे मेल-मुलाकात......रात को चला तो पेट में चाय हिल रही थी और गले तक पोहा ठुंसा था......

होटल में देर रात  लैपटाप भी पहुंच गया....... दूसरे दिन वापसी.....जबलपुर में वो बोरा टाइप फाइल खोली ही थी तभी एक युवक कमरे में घुसा.......संदीप चंसौरिया.......पांच मिनट में ही लग गया कि जिसकी तलाश थी मिल गया...... जिला डेस्क की इंचार्जी......अगर आप कहें तो कुछ और साथियों को भी बुलवा लूं....अगले दिन गेस्टहाउस में दस जन सोफे पर...दो-दो मिनट की बातचीत में पूरी जिला डेस्क तैयार....सर, कल कुछ रिपोर्टरों से.......हां बिल्कुल......अगले दिन छह रिपोर्टर भी शामिल......

अब मेट्रो डेस्क......किसी पत्रकार संस्थान को फोन लगवाया कि फौरन 50 लड़के-लड़कियां भिजवाएं.......दो घंटे बाद बाहर जमावड़ा.......उनके साथ तोता-मैना का जोड़ा यानी दो टीचर भी......डेढ़ घंटे में पंद्रह छात्र-छात्राओं का चयन...तोता-मैना जब अपनी पत्री भी  थमाने लगे तो साफ इनकार......सीखे-सिखायों को नहीं रखना..अब काटूर्निस्ट.......मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव राजेश दुबे......वहीं कुछ बनवाया....वो भी शामिल....

इधर जीएम और उनके लंडूरे परेशान कि उनकी सिफारिशों का क्या होगा.....जबलपुर संजय सोनी की ससुराल....तो  पूरे महाकोशल का दामाद बनने की फिराक में....इसके लिये सम्पादकीय में अपने लोग घुसेड़ने से बढ़िया क्या हो सकता है......लेकिन यहीं आकर उनकी दामादी दम तोड़  गयी...एक दिन ठन्ना के बोले-....आपने तो एक आदमी के कहने पर दस को रख लिया.......जवाब तैयार था....कहिये, पूरे घर को नहीं रख लिया..पहली भरती संदीप की बाकी सब अगस्त में.....उसने जिला प्रोजेक्ट पर यहां-वहां बैठ काम शुरू कर दिया......

एक भरी दोपहरिया में हांपती-कांपती सृष्टि ने अपना लिखा दिखाया.....अगस्त में मिलो.....फिर चश्माधारी दीपिका  हाजिर....बला का आत्मविश्वास.....एक सुबह जैसे घर से भागे हों......दो लड़के हाजिर.....सर, मैं आलोक यह प्रवीन.... इलाहाबाद से सीधे यहां....कालेज की पत्रिका निकाली है..पेज बना लेते हैं...डन.....अब डेस्कों के इंचार्ज.....संदीप ने कुछ नाम सुझाये....शिव शर्मा डेपुटी न्यूज एडिटर और संजय पांडे मेट्रो इंचार्ज...सतना से ज्योति....सब भास्कर या जागरण से जुड़े थे....लोकलिया नवभारत या स्वतंत्र मत से...

दो-चार ज्योतिषी भी चक्कर लगा रहे...कई ने अपन की कुंडली भी बना दी...सही बनायी थी इसलिये किसी को नहीं रखा.......

विनीत जी के साथ अगस्त भी आ गया....दो दिन देखा  अपन सिर्फ चाय-पानी पर...फिर हर दोपहर इस भूखे पेट को पकड़ ले जाते मालवीय चौक काफी हाउस में.....दस दिन संजय सोनी के साथ कई जिलों का ताबड़तोड़ दौरा......एक दिन नजर पड़ी पटना की एक लड़की के प्रोफाइल पर...फौरन फोन कर जबलपुर बुलाया.....पता चला कि शैली मुजफ्फरपुर भी रह चुकी है...कुछ ज्यादा ही अजीज हो गयी......दो सम्पादक मित्रों की सिफारिश मान कार्तिक...अनिल भी.......अब बचे न्यूज एडिटर और सिटी इंचार्ज......यहीं मात खा गया (क्यों...वो बाद में)...... शहर के कुछ बड़े पत्रकारों ने सीधे इंदौर की दौड़ लगायी....फोन करवाए.......एक सज्जन ने बड़ा हंगामा किया कि उनमें क्या कमी है........कमी यही थी कि वो वाया इंदौर थे.....

अखबार शुरू होने में बस एक महीना......आखिरी दौरा शहडोल का....

सर्कुलेशन हेड संतोष सोलंकी के चलते अपनी फोटो वहां के रेस्टहाउस में लगते लगते रह गयी.... भाई ने बरसते पानी में पांच पैग लगा कर रात तीन बजे एक सौ बीस की स्पीड पर दौड़ा दी क्वालिस......अपन कबिरा गा रहे थे......अचानक किसी पुलिया से टकरायी और गाड़ी लुढ़कने लगी खाई की तरफ......माटी कहे कुम्हार से तू क्या रौंदे मोये.....यह क्या कर डाला सोलंकी जी...अरे ठीक से......तू  क्या रौंदे ....संभालो....माटी कहे.......बचिये...माटी...बचिये...माटी....जब लगा कि .....अंतिम बार शीशे में देख लो अपने को.......तभी गाड़ी जोर से किसी दीवार से टकरायी.....पता नही किसने खाई के मुहाने पर कंक्रीट का बंगला बना रखा था....गाड़ी का भुरकस निकल गया..... अपनी हाथ की घड़ी.....जान से प्यारे चार कैसेट बाहर अंधेरे में दफन.......जब इंजन का धुआं छटा तो हमें होश आया और गाड़ी भी हिली.....सड़क तक चढ़  आयी और दस किलोमीटर दूर रेस्टहाउस के अंदर घुस कर खड़ी हो गयी......हम तीन ने एक-दूसरे को छू कर देखा कि कहीं ......दो गज जमीं के नीचे ......वाला हाल तो नहीं .....

क्वालिस विनीत जी की थी....सोलंकी का चेहरा जर्द...सुबह उठ कर बाहर आए तो क्वालिस के प्राण पखेरू उड़ चुके थे..... जीएम को फोन किया.....ट्रालर पर लाद दो लाश को......आए थे एसी वाली गाड़ी में...वापसी ट्रेन की भभकती बोगी से........

सितम्बर .....काउंट डाउन शुरू......सारे ब्यूरो बन गये....बस नरसिंहपुर को लेकर मन परेशान...वहां विधानसभाध्यक्ष रुहाणी जी का कोई चेला प्रबंधन ने पहले ही तय कर दिया था....एक दिन मिलने आया...पत्रकार के अलावा सब कुछ......उसे हटाने में विनीत जी ने मदद की...तो कई सांसदों के पत्र आ गये....ये आपने अच्छा नहीं किया एक वरिष्ठ पत्रकार के साथ...हम दिल्ली में....संसद में....इंदौर में.....मामला उठाएंगे.......

इस रूह का उत्साह बढ़ाने को ग्वालियर सम्पादक राकेश पाठक आ गये...चार-पांच दिन अच्छे कटे....पाठक जी के सौजन्य से स्वदेश ढिमोले......डमी निकलनी शुरू.....न्यूज एडिटर ने दरवाजा खोल अंदर झांका.... आपका मूड ठीक हो तो एक बात कहूं सर....जो इत्तेफाक से ठीक ही था.....सर....एक जानपहचान की लड़की है...आप मिलना चाहेंगे......भेजिये......सामने शालू अग्रवाल.....एई स्साला बनिया....पर प्रोफेशनलिज्म ने जोर मारा...थोड़ी बात की तो लगा दम है....ठीक है आ जाओ........इस तरह पंद्रह बिल्कुल नये-नवेलों की भरती......उनके लिये एक राशि तय करवाई....जबकि जबलपुर में ऐसा कोई रिवाज नहीं था.....

अब घनघोर ट्रेनिंग शुरू........चक दे इंडिया के अंदाज में.......दो-चार को छोड़ दें तो 50 की टीम अपने मन की बना ली.......अचानक बम फटा......24 सितंबर से प्रकाशन शुरू करना है.........फाइनल की पूर्व संध्या....सबके चेहरों पर घबराहट की जगह जबरदस्त उमंग.....हालत सिर्फ अपनी खराब.....हर अंखियां दिलासा दे रही....सर...हम हैं न.....

चौबीस सितम्बर भी गया........इंदौर का सत्ता केन्द्र जबलपुर में मौजूद......हर संस्करण के जीएम और सम्पादक भी.......सबने इस अजूबे को पचा लिया खुशी-खुशी.....अब तक जिससे दूरी बना कर रखी थी....शाम को उस  भरी-पूरी जमात  से आमना-सामना.....दिल्ली-मध्यप्रदेश के कई बड़े मंत्री-नेता.....विभिन्न प्रकार के अफसर .....सौ से ऊपर जबलपुर का गर्व......किसको देखूं....किसको मुस्कराऊं...किसके गले मिलू......किसको गले लगाऊं.......फिर सबको धता बता कर टीम समेट अखबार निकाला......और निकल गया जी 25 की सुबह....नईदुनिया का जबलपुर संस्करण.....बोले तो सम्पादक कौन........                

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