बुधवार, 5 सितंबर 2012

ठहरे हुए कोर्स और बदलता मीडिया / आलोक पुराणिक






आलोक पुराणिक

               पत्रकारिता के ज्यादातर कोर्स तब बने थे जब रिपोर्टिंग और विचार को पत्रकारिता का केन्द्र माना जाता था। माना जाता था कि एक पत्रकार या तो रिपोर्टिग करेगा या फिर संपादकीय में अपने विचार पेश करेगा। फीचर और विशेषज्ञ ज्ञान पर आधारित कंटेट मीडिया में हाल में आया है। मसलन लगभग हर अख़बार में मोबाइल हैंडसेटों पर आर्टिकल होता है। पर इस विषय के जानकार बहुत कम हैं। हिंदी में तो के बराबर।
मीडिया के किसी कोर्स में मोबाइल हैंडसेट के बारे में बताए जाने का प्रावधान नहीं है। वहां पर दूसरे विषय पढ़ाए जा रहे हैं। सीडीएमए और जीएसएम मोबाइल सेवाओं में क्या फर्क है। 3जी और 4जी मोबाइल सेवाओं में क्या फर्क है। मल्टी सिम वाले और सिंगल सिम वाले मोबाइल हैंडसेट की तकनीक में क्या फर्क है। कंप्यूटर टेबलेट और मोबाइल हैंडसेट में क्या समानताएं हैं। इस तरह के सवालों के बारे में तमाम पाठक जानना चाहते हैं। पर कई बार अखबार वालों के लिए यह बताना आसान नहीं होता।
हिंदी या इंगलिश के किसी मीडिया कोर्स में मोबाइल से जुड़े मसले नहीं पढ़ाए जाते। ये कोर्स जब डिजाइन किए गए थे, तब मोबाइल अस्तित्व में नहीं था। अब मोबाइल है, पर उसकी ओर ध्यान मीडिया प्रोफेसरों का है ही नहीं।
अखबारों में ऑटोमोबाइल यानी कार, स्कूटर, बाइक वगैरह पर लेख छपते हैं। इन्हें पेश करने वाले पत्रकार वे हैं, जिन्होंने अपनी रुचि से, अपनी लगन से इन विषयों की जानकारी हासिल की है। किसी संस्थागत तरीके से उन्हें ऑटोमोबाइल पत्रकारिता का ज्ञान नहीं दिया गया, जबकि स्थिति यह है कि कारों और मोटरसाइकिलों में अंग्रेजी में कम से कम पांच पत्रिकाएं निकलती हैं और हिंदी के तमाम अखबार कारों और मोटरसाइकिलों पर लगातार सामग्री देने के इच्छुक हैं। पर इस विषय के जानकार उपलब्ध नहीं हैं। चंद सीमित जानकार अपनी तमाम सीमाओं के साथ तमाम जगहों पर दिखायी देते हैं।
खाने-पीने की चीजों से जुड़ी रिपोर्टिग लगातार पापुलर हो रही है। कई अखबार अपने यहां महत्वपूर्ण रेस्टोरेंटों और होटलों के बारे में जानकारी देते हैं। पर इस तरह का कोई कोर्स विकसित नहीं किया गया, जिसमें किसी इलाके की खाद्य संस्कृति और विशेषताओं की ओर ध्यान दिया जाए। खाने पर कभी- कभार कुछ पत्रकार और प्रोफेसर काम करते हैं, पर वह निजी रुचि के कारण ही।
इस संबंध में दो काम हो सकते हैं। एक काम तो यह है कि तमाम पत्रकारिता कोर्सो के आखिरी छह महीने में विशेषज्ञ किस्म का काम कराया जाए। आखिरी छह महीनों में खाद्य पत्रकारिता, फैशन पत्रकारिता, मोबाइल पत्रकारिता और ऑटोमोबाइल पत्रकारिता पर विशेषज्ञ कंटेट पढ़ाए जाएं।
जो पत्रकार पहले ही किसी संस्थान में कार्यरत हैं, उनके लिए शार्ट टर्म कोर्सेस की व्यवस्था होनी चाहिए। उदाहरण के लिए रक्षा से जुड़े संस्थान तमाम अखबारों के पत्रकारों को रक्षा पत्रकारिता पर शार्ट टर्म अध्ययन कराते हैं। रक्षा पत्रकारिता के लिए तमाम पत्रकारों को तैयार करते हैं। ऐसी तैयारी तमाम होटल, मोबाइल कंपनियां, ऑटोमोबाइल कंपनियां भी कर सकती हैं। इसका फायदा अंतत: उद्योग को ही होगा, तमाम तकनीकी जानकारियां बहुत आसानी से वर्तमान उपभोक्ताओं और भविष्य के उपभोक्ताओं तक पहुंचाई जा सकती हैं
तमाम उद्योगों के प्रतिनिधि संगठनों को इस संबंध में पहल करके ऐसे शार्ट टर्म कोर्सो को कराना चाहिए। साथ में तमाम उद्योगों के प्रतिनिधि संगठनों को तमाम विश्वविद्यालयों, पत्रकारिता संस्थानों को अपनी बदलती टेक्नोलोजी के बारे में लगातार बताना चाहिए, ताकि विश्वविद्यालय और पत्रकारिता संस्थान बदलते हुए वक्त के साथ खुद को लैस कर सकें। जैसे कई पत्रकारिता संस्थानों में अभी भी टाइपराइटिंग सिखायी जा रही है, जबकि मीडिया संस्थान बहुत पहले ही कंप्यूटरों पर पहुंच चुके हैं।
       अपराध पत्रकारिता आज अपने आप में बहुत विकसित रूप ले चुकी है। कई टीवी चैनलों के टॉप कार्यक्रमों में अपराध कार्यक्रम शामिल हैं, पर तमाम संस्थानों में अपराध पत्रकारिता पर विशेषज्ञ जानकारियां देने का प्रावधान नहीं है। विशेषज्ञ मीडिया वक्त की जरूरत है। मीडिया बहुत तेजी से विशेषज्ञ कंटेट की तरफ जा रहा है। कुल मिलाकर मसला यह है कि मीडिया बहुत तेजी से बदल गया है, पर मीडिया संस्थान कब बदलेंगे। देखिए, इस सवाल का सही जवाब कब तक मिलता है

(दैनिक हिंदुस्तान से साभार)

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