शनिवार, 22 सितंबर 2012

हिन्दी भाषा की शुद्धता को परखे

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भाषा को लेकर आज बड़ी उत्तेजक चर्चा चली फेसबुक ग्रुप काफी हाउसमें.
और चूंकि इसमें मेरा ज़िक्र भी हुआ, इसलिए मुझे भी इसमें शामिल होना पड़ा.

इस चर्चा में नया, नयी, नये, नई और नए को लेकर कुछ विचार व्यक्त किये गये.
सवाल यह है कि "नया" से "नयी" और "नये" बनेगा या "नई" और "नए", जैसे कि "हुआ" से "हुई" और "हुए" बनता है.

इस विषय पर पंकज श्रीवास्तव ने "समान्तर कोश" के कोशकार अरविन्द कुमार के एक लेख क...
हवाला दिया है. अरविन्द जी ने लिखा है : जहाँ तक मेरी जानकारी है कई दशक पहले कुछ साहित्यकारोँ ने एक पत्रिका मेँ उपसंपादन करते समय ऐसे हिज्जोँ की विविधता और भ्रामकता से घबरा कर एक अजीब सा (लेकिन पूरी तरह ग़लत और निराधार) नियम बना लिया कि यदि किसी शब्द के अंत मेँ 'या ' है तो उस के स्त्रीलिंग और बहुवचन रूपोँ मेँ 'यी ' और 'ये ' का प्रयोग किया जाए. यानी 'जायेगा, जायेंगे' लिखे जाएँगे.

अरविन्द जी, आप नयीऔर नयेलिखने के तर्क से असहमत हो सकते हैं, बहुत से लोग असहमत हैं बल्कि बहुमत असहमति रखने वालों का है, लेकिन इस तरह की बात लिखना शोभा नहीं देता कि उन लोगों ने अपने हिन्दी के अज्ञान के कारण ऐसा किया था. मेरा मानना है कि यह उनका बहुत तार्किक सोच था. (मैं सोच को "था" ही लिख रहा हूं क्योंकि यही शुद्ध है).

उन तथाकथित "अज्ञानी" लोगों ने "जाय" और "जाये" तक में अन्तर रखा था. जैसे: मोहन स्कूल जायेगा. यहाँ "जायेगा" GO के लिए है. अब दूसरा वाक्य देखिए: समय आने पर उचित फैसला लिया जायगा. यहाँ "जायगा" का अर्थ GO नहीं है, इसलिए "जाये" के बजाय "जाय" लिखा गया.

आजकल जो "नए" स्कूल वाले हैं, वे दोनों वाक्यों में लिखेंगे-- जाएगा. तो घालमेल किसने किया? लिखने में कम झंझट रहे, इसीलिए "जाय" और "जाये" को "जाए" बना दिया गया! सारी मुश्किल ख़त्म!

कहा जा रहा है कि उच्चारण प्रक्रिया के अनुरूप "गाया" का बहुवचन "गाए" और स्त्रीलिंग "गाई" होना चाहिए. तो फिर "गाय" (COW) को "गाए" क्यों न लिखा जाय?

अरविन्द जी ने लिखा है : जहाँ '' शब्द का ही मूल तत्व हो, वहाँ स्वरात्मक परिवर्तन की आवश्यकता नहीँ है. जैसे - स्थायी, अव्ययीभाव, दायित्व आदि. इन्हेँ स्थाई, अव्यईभाव, दाइत्व नहीँ लिखा जाएगा.
इस तर्क से "गाय" को "गाए" नहीं लिखेंगे, मान लिया. लेकिन "साया" को क्या लिखेंगे--- "साये" या "साए"?
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स्थायी" की तरह "साया" भी मूल रूप से "य" पर समाप्त होता है. और अगर "साया" को "साये" लिखेंगे तो "खाया" को "खाए" क्यों लिखेंगे? "खाये" क्यों नहीं लिखेंगे?

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बायाँ" और "दायाँ" को "बाएँ" और "बाईं", "दाएं" और "दाईं" लिखेंगे तो "दायी" से बननेवाले शब्दों का क्या होगा? "कष्टदायी" या "कष्टदाई", “सुखदायीया "सुखदाई"? अभी तक तो हम "कष्टदायी" और "सुखदायी" ही जानते थे.
इसी तरह जय से बनता है "जयी" और विजय से "विजयी". आजकल काफी लोग "विजई" लिख रहे हैं, कुछ दिन बीतने दीजिए, "कालजयी" को "कालजई" लिखा जाने लगेगा.

इसी तरह "मय" से बनने वाले शब्दों में भ्रम होने लग गया है. "रहस्यमय" से "रहस्यमयी" बनेगा या "रहस्यमई", "दयामयी" या "दयामई"? ज़ाहिर है कि "नए" और "नई" का पाठ पढ़नेवाले "रहस्यमयी" और "दयामयी" को "रहस्यमई" और "दयामई" ही लिखेंगे.

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नए" स्कूल के तर्क से "पाया" (प्राप्त होना) का बहुवचन "पाए" और स्त्रीलिंग "पाई" होगा. तो जो शब्द "पायी" से बनते हैं, जैसे "स्तनपायी", उन्हें क्यों नहीं लोग "स्तनपाई" लिखने लगें.

तो इतना कन्फ्यूज़न फैलाने की क्या ज़रुरत है?
सीधा सरल सा एक नियम अपनाने में क्या परेशानी है कि जो शब्द "आ" पर समाप्त होते हैं उनका स्त्रीलिंग "ई" पर और बहुवचन "ए" पर बनेगा, जैसे "हुआ" से "हुई" और "हुए".
और जो शब्द "या" पर ख़त्म होते हैं, उनका स्त्रीलिंग "यी" और बहुवचन "ये" पर बनेगा, जैसे "गया" से "गयी" और "गये", "नया" से "नयी" और "नये".
इससे आसान और कुछ हो नहीं सकता और इसमें ग़लतियाँ होने या किसी तरह की दुविधा की कोई गुंजाइश नहीं है.

हर्ष रंजन ने पूछा था कि "अच्छा" और "बढ़िया" में क्या फ़र्क़ होता है. उन्हें तो जवाब लिख दिया लेकिन मुझे लगा कि इस जवाब को अलग से पोस्ट करना चाहिए. तो लीजिए, पेश है:
अच्छा का अर्थ है रंग-रूप, रचना, गुण, योग्यता में अन्यों से तुलनात्मक रूप से बेहतर. बढ़िया निकला है बढ़ना से और उसे भी उत्तम और अच्छा के अर्थ में काफ़ी प्रयोग किया जाता है. लेकिन "अच्छा" का जहाँ बहुत व्यापक प्रयोग है, वहीं कुछ जगहों पर...
"बढ़िया" का प्रयोग नहीं कर सकते हैं.
जैसे "आप अच्छे लग रहे हो" के स्थान पर "आप बढ़िया लग रहे हो" नहीं कह सकते हैं.
इसी तरह से, "वह अच्छी लड़की है" के स्थान पर " वह बढ़िया लड़की है" नहीं कहा जा सकता है.
"
अच्छा" के कुछ और भी प्रयोग हैं. जैसे "आप से मिलकर अच्छा लगा", "अच्छा हुआ आप यहाँ आ गये", "आपने उसकी मदद कर अच्छा किया", "यह मुहल्ला अच्छा है" आदि वाक्यों में "अच्छा" की जगह "बढ़िया" कहना प्रायः ठीक नहीं होगा. लेकिन जब हमें ज़ोर डाल कर बताना हो कि कोई चीज़ बहुत अच्छी हुई है तो बढ़िया का इस्तेमाल हो सकता है. जैसे ऊपर के उदाहरण में "आपने उसकी मदद कर अच्छा किया" में यदि इस बात पर ज़ोर हो कि यह बहुत अच्छा हुआ तो कह सकते हैं कि "आपने उसकी मदद कर बढ़िया काम किया". यहाँ "अच्छा" के बजाय "बढ़िया काम" पर बल दिया गया है.
इसी तरह, अच्छा के कुछ और प्रयोग हैं. जैसे, "उसके साथ यह अच्छा नहीं हुआ." यहाँ "अच्छा" की जगह "बढ़िया" नहीं लिख सकते.
या जैसे, "अच्छा-अच्छा अब झगड़ा बन्द करो." यहाँ "अच्छा" बिल्कुल ही अलग अर्थ में आया है. कभी-कभी "अच्छा" व्यंगात्मक लहजे में आता है. जैसे, "तुमने अच्छी दोस्ती निभायी मेरे साथ!"
कभी क्रोध में भी "अच्छा" कहते हैं, जैसे: "अच्छा, तुम मेरी शिकायत करोगे?"
या फिर, "अच्छा तो कल मिलते हैं" या "अच्छा, मैं जा रहा हूँ."
लेकिन सामान्य प्रयोग में बहुत जगहों पर "अच्छा" और "बढ़िया" में से कोई भी शब्द प्रयोग कर सकते हैं, जैसे: अच्छा भोजन या बढ़िया भोजन, धन्धा अच्छा चल रहा है या धन्धा बढ़िया चल रहा है, अच्छी कमाई है या बढ़िया कमाई है, स्वास्थ्य बढ़िया है आदि. मेरे ख़याल से जहाँ अच्छा होने के साथ-साथ बढ़त पर ज़ोर हो, वहाँ बढ़िया का इस्तेमाल होना चाहिए


जिस कोश से मैं ये उच्चारण उद्धृत कर रहा हूँ, उसका नाम है : प्रभात बृहत् हिन्दी शब्दकोश. यह कोश दो खण्डों में है और इसे प्रभात प्रकाशन दिल्ली ने 2010 में छापा है. मैं यहाँ एक से सौ तक की सारी गिनतियों का उच्चारण नहीं दूँगा, बल्कि केवल उन गिनतियों को लूँगा, जिनके उच्चारण में प्रायः दोष देखने में आता है. कोश के अनुसार मानक उच्चारण नीचे दिये जा रहे हैं.

18 : अठारह
23 : तेईस
25 : पच्चीस
26 : छब्बीस
27 : सत्ताईस
28 : अट्ठाईस
29 : उनतीस
39 : उनतालीस
43 : तैंतालीस
44 : चवालीस
49 : उनचास
53 : तिरपन
58 : अठावन
63 : तिरसठ
66 : छियासठ
69 : उनहत्तर
76 : छिहत्तर
77 : सतहत्तर
78 : अठहत्तर
79 : उनासी
87 : सतासी
88 : अठासी
92 : बानवे
93 : तिरानवे
97 : सतानवे
98 : अठानवे
99 : निन्यानवे

सम्भावना या संभावना, सम्बन्ध या संबंध, हिन्दी या हिंदी?

बहुत से लोगों ने इस विषय में कई बार सवाल पूछे हैं कि सम्भावना सही है या संभावना? सम्बन्ध लिखना ठीक है या संबंध? हिन्दी या हिंदी, उत्तराखण्ड या उत्तराखंड?
दरअसल, यह सवाल काफ़ी पुराना है. और सच कहें तो यह सवाल भी हिन्दी को "आधुनिक", सरल (यानी Less Complicated) व "टेक्नाॅलाॅजी फ़्रेण्डली" (वैसे मैं फ़्रेंडली भी लिख सकता था) बनाने के दौर में ही ...
शुरू हुआ. यह भी तर्क दिया गया कि "आधा म" या "आधा न" के मुकाबले अनुस्वार कम स्थान लेता है, इसलिए शीर्षक लगाने, कैप्शन लिखने में तो आसानी होगी ही, साथ ही "बाॅडी काॅपी" में भी कुछ जगह बचेगी, जिससे उसी स्थान में अपेक्षाकृत ज़्यादा सामग्री दी जा सकेगी. इसी स्कूल के लोगों ने उस समय उर्दू शब्दों में नुक़्ता न लगाने की पुरज़ोर वकालत भी की और अपने प्रयास में सफल भी हुए. इसी तरह, टाइपराइटर के की बोर्ड में "बटनों" की संख्या को सीमित रखने के इरादे से "हाॅकी" को "हाकी", "डाॅक्टर" को "डाक्टर", "आँटी" को "आंटी", "पाँव" को "पांव", "अँधेरा" को "अंधेरा" और "अन्धेर" को "अंधेर" लिखे जाने की शुरुआत हुई. "हँस" (Laugh) और "हंस" (पक्षी) का भेद समाप्त हो गया और यह पाठक की बुिद्ध पर छोड़ दिया गया कि वह सन्दर्भ के अनुसार तय करे कि बात हँसने के बारे में हो रही है या हंस पक्षी की. इसी तरह, उर्दू शब्द "राज़" (RAAZ) और हिन्दी शब्द "राज" (RAAJ) में नुक़्ते की अनुपस्थिति में अन्तर कर पाना असम्भव हो गया.
हिन्दी भाषा देवनागरी लिपि में लिखी जाती है, जो अपने आप में अत्यन्त वैज्ञानिक लिपि है.
"
कवर्ग" (यानी क ख ग घ ङ के अन्त में "ङ"), "चवर्ग" (यानी च छ ज झ ञ के अन्त में "ञ"), "टवर्ग" (यानी ट ठ ड ढ ण के अन्त में "ण"), "तवर्ग" (यानी त थ द ध न के अन्त में "न") और "पवर्ग" (यानी प फ ब भ म के अन्त में "म") से ही परम्परागत देवनागरी में अनुनासिक ध्वनि को व्यक्त किया जाता है.
जैसे यदि हमें घण्टा लिखना हो तो "आधा ण" से अनुनासिक ध्वनि आयेगी, क्योंकि "घण्टा" में "ट" अक्षर "टवर्ग" का है. इसी तरह, इस वर्ग के बाक़ी अक्षरों से बनने वाले शब्दों में भी अनुनासिक ध्वनि के लिए आधा "ण" आयेगा. जैसे: डण्डा, खण्ड, कण्ठ, पण्ढरपुर आदि.
इसी तरह "तवर्ग" के शब्दों में आधा "न" से अनुनासिक ध्वनि आयेगी. जैसे: अन्त, चिन्ता, मन्थर, कन्द, मन्द, अन्धड़, बन्धन, सन्देह आदि.
"
पवर्ग" से बनने वाले शब्दों में आधा "म" से अनुनासिक ध्वनि आयेगी. जैसे कम्पन, चम्बल, कम्बल, दम्भ, चम्पा, खम्भा आदि.
अब "सम्बन्ध" शब्द को लें. इसे अगर रोमन स्क्रिप्ट में लिखें तो लिखेंगे: SAMBANDH. लेकिन जब हम इसी शब्द को "संबंध" लिखते हैं, तो निस्सन्देह "सम्बन्ध" के मुकाबले यह कम स्थान घेरता है, लेकिन "संबंध" में हम M और N दोनों ध्वनियाँ अनुस्वार से ही व्यक्त करते हैं जो तकनीकी रूप से ग़लत है.
चूँकि अब "ङ" और "ञ" प्रायः सभी "की बोर्ड" से बाहर हैं और इनकी अनुनासिक ध्वनि अनुस्वार से काफ़ी निकटतम रूप से व्यक्त हो सकती है, इसलिए "कवर्ग" और "चवर्ग" के शब्दों जैसे गंगा, पंजाब, चंचल आदि शब्दों का सही उच्चारण अनुस्वार से निकल सकता है. इसलिए मेरे विचार से यहाँ अनुस्वार से काम चल सकता है.
लेकिन मैं इस मत का हूँ कि "टवर्ग", "तवर्ग" और "पवर्ग" के लिए क्रमशः "ण", "न" और "म" के प्रयोग को वापस लाया जाना चाहिए. क्योंकि इन वर्गों में अनुस्वार के प्रयोग से हम बहुत मामूली जगह बचाते हैं, पर बड़े उच्चारण दोष का ख़तरा उठाते हैं.
दूसरी बात यह कि इन वर्गों में अनुस्वार के प्रयोग से हम "की बोर्ड" के बटनों की संख्या भी नहीं घटा पाये क्योंकि आधा ण, आधा न और आधा म को "की बोर्ड" से हटाया ही नहीं जा सकता. हिन्दी के बहुत से शब्द इनके बिना लिखे ही नहीं जा सकते. जैसे: उम्मीद, निकम्मा, पुण्य, अरण्य, उन्नीस, उन्हें, पन्ना, संन्यासी आदि.
और अब टेक्नाॅलाॅजी ने भी यह सम्भव कर दिया है कि हम चन्द्र बिन्दु, नुक़्ता आदि का इस्तेमाल आसानी से कर सकते हैं तो अपनी समृद्ध उच्चारण क्षमता के लिए जानी जाने वाली हिन्दी को उसकी पुरानी गरिमा और शान-शौकत लौटाने की कोशिश क्यों न की जाय. देर आयद, दुरुस्त आयद.
अनुस्वार से जगह बच सकती है, इस तर्क से मैं क़तई सहमत नहीं हूँ. अगर आप अच्छे सम्पादक हैं तो अपने कुशल सम्पादन से आप कहीं ज़्यादा जगह बचा सकते हैं और काॅपी को कहीं ज़्यादा चुस्त बना सकते हैं.

नियति, नियत और नीयत;
हम हिन्दी वाले अकसर इस बात को कोई महत्व नहीं देते कि मात्राओं की समझ कितनी ज़रूरी है और ग़लत मात्राएं लगाने या ग़लत जगह मात्राएं लगा देने से शब्द का अर्थ कहाँ से कहाँ पहुँच जाता है. एक उदाहरण देखिए:
ये तीन शब्द हैं: "नियति", "नियत" और "नीयत".
ये तीनों ही शब्द एक नज़र में एक-दूसरे से काफ़ी मिलते-जुलते से दिखते हैं, लेकिन इनके अर्थ बिल्कुल अलग-अलग हैं और मात्राएं लगाने में हुई...
ज़रा-सी असावधानी किसी वाक्य में इन शब्दों की उपस्थिति को विचित्र बना सकती है.
"
नियति" का अर्थ है DESTINY, नियत का अर्थ है निर्धारित या तय या SCHEDULED या FIXED और "नीयत" का मतलब है INTENT. अब इन शब्दों के प्रयोग का एक उदाहरण देखें:
1.
दिन-रात आँसू बहाते जीवन बिताना ही शायद उस अभागिन की "नियति" है.
2.
कार्यक्रम "नियत" समय पर शुरू होगा.
3.
उसकी "नीयत" में अचानक खोट आ गया.
ऐसे सैंकड़ों शब्द हो सकते हैं, जहाँ मात्रा के हेर-फेर से मामला बिगड़ सकता है. जैसे: "चूकना" और "चुकना".
"
चुक जाना" का अर्थ है समाप्त हो जाना, अन्त हो जाना, जबकि "चूक जाना" का अर्थ है मौका खो देना.
क्या हम हिन्दी वाले इस ओर थोड़ी गम्भीरता से सोचेंगे क्योंकि आजकल हिन्दी के ज़्यादातर चैनलों ( चाहे न्यूज़ चैनल हों या मनोरंजन ), और हिन्दी के विज्ञापनों में मात्राओं की ग़लतियाँ आम हैंं.

1 टिप्पणी:

  1. अच्छा लगा पढ़ कर...
    बढ़िया आलेख...
    सीखने को मिला बहुत कुछ...
    आभार...

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