शनिवार, 15 सितंबर 2012

प्रत्येक राज्य में हो प्रेस परिषद की स्थापना





वकीलों की तरह पत्रकारों का पंजीयन जरूरी
सनत जैन
नई दिल्ली। पिछले 20 वर्षों से मीडिया के क्षेत्र में व्यापक परिवर्तन आया है। 1980 तक देश में मीडिया के केवल 3-4 संस्थान थे जिनमें पत्रकारिता से संबंधित शिक्षा प्राप्त होती थी। उसमें अधिक से अधिक 100 छात्र ही भाग लेकर पत्रकारिता की शिक्षा प्राप्त कर पाते थे। इसके बाद उन्हें सरकारी नौकरी मिल पाती थी। पत्रकारिता पेशे में इसके पूर्व जो भी पत्रकार, संपादक इत्यादि बने उन्होंने यह कार्य कर-कर सीखा। लेखन के माध्यम से उन्होंने समाज और पत्रकारिता के क्षेत्र में अपना विशिष्ट स्थान बनाया। उस समय पत्रकारों की नैतिकता, जिम्मेदारी, विषयों की समझ तथा प्रस्तुती के कारण उन्हें सारा समाज बड़ी इज्जत की नजरों से देखता था।
1980 तक भारत में प्रिंट मीडिया का ही बोलबाला था। रेडियो और दूरदर्शन सरकारी क्षेत्र की जरूरतों को पूरा करते थे। 1990 के बाद से मीडिया के क्षेत्र में भारी परिवर्तन आना शुरू हो गया। बड़ी तेजी के साथ समाचार पत्रों का विस्तार शुरू हुआ। भाषायी समाचार पत्र जिले एवं संभाग स्तर पर बड़ी तेजी के साथ प्रसारित होने लगे। 1995 के बाद से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने भी तेजी से पैर पसारना शुरू किया। जिसके फलस्वरूप पत्रकारों तथा मीडिया कर्मियों की मांग तेजी से बढ़ी। इस मांग की पूर्ति के लिए दर्जनों विश्वविद्यालयों ने पत्रकारिता विषय के पाठ्यक्रम तेजी से शुरू किए। पिछले 2 दशकों में पढ़े-लिखे डिग्रीधारी पत्रकारों की संख्या तेजी के साथ बढ़ी है। मीडिया जो पूर्व में अपनी नैतिकता और विचारधारा के आधार पर कार्य करता था, नए मीडिया कर्मियों के आने से उसका स्थान व्यवसायिकता ने ले लिया।
मांग एवं आपूर्ति की विषमता से कई समस्याओं का जन्म होता है। यही विषमता पत्रकारिता के क्षेत्र में देखने को मिल रही है। मीडिया मुगलों ने व्यवसायिक प्रतिस्पर्धा के कारण नैतिक मूल्यों और सामाजिक जिम्मेदारियों से किनारा करते हुए पत्रकारिता को व्यवसायिक स्वरूप दे दिया। बढ़ी हुई मांग को पूरा करने के लिए पढ़े-लिखे डिग्रीधारी तथा पत्रकारिता के पेशे की बारीकियों से अनभिज्ञ तथा अपरिपक्व लोग जिन्हें मीडिया की सही समझ नहीं थी वह नौकरी तथा पैसा कमाने का माध्यम मानकर पत्रकारिता के क्षेत्र में आ गए। जिसके कारण मीडिया क्षेत्र में पिछले दो दशकों से सामाजिक हितों तथा विकास के लिए जो प्रतिबद्धता थी उसका स्वरूप अब बिल्कुल ही बदल गया है।
पहले पत्रकार बनने और जिम्मेदारी मिलने के बीच 5 से 10 वर्षों का समय लगता था। डेस्क पर बैठकर काम करना फिर किसी रिपोर्टर के अंडर में काम करना, तत्पश्चात रिर्पोटिंग और उसके बाद सहायक संपादक बनकर पत्रकारिता के दायित्व को भली-भांति समझकर उसके साथ न्याय करते थे। किन्तु विगत दो दशकों में डिग्रीधारी एवं तकनीकी ज्ञान रखने वालों का बड़ी तेजी के साथ पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रवेश हुआ है। इस पीढ़ी को नैतिक-अनैतिक विषयों की समझ, सामाजिक हित, जिम्मेदारी इत्यादि का ज्ञान नहीं होने से आज मीडिया विश्वसनीयता के संकट के दौर से गुजर रहा है। मीडिया के क्षेत्र में वर्तमान में पूंजी और भौतिकवाद इस कदर हावी हो गया है कि राष्टÑीय और सामाजिक हितों के महत्वपूर्ण पहलू गौण होकर रह गए हैं।
इस स्थिति में मीडिया को नियंत्रित करने के लिए पत्रकारों की भूमिका तथा जवाबदारी तय करने की आवश्यकता महसूस होने लगी है। भारतीय प्रेस कानून में समाचार पत्र के मुद्रक, प्रकाशक तथा संपादक को ही जिम्मेदार मानकर भारतीय प्रेस परिषद को उसको नियंत्रित करने का कार्य सौंपा गया है। अब स्थितियां पूर्णत: बदल चुकी हैं। ऐसी स्थिति में अब भारतीय प्रेस परिषद को भी बार कौंसिल आॅफ इंडिया की तर्ज पर अधिकार सम्पन्न बनाकर मीडिया कर्मियों को भारतीय प्रेस परिषद तथा प्रेस एक्ट के दायरे में लाकर उन्हें स्वनियंत्रित करना जरूरी हो गया है। प्रत्येक राज्य में प्रेस परिषद तथा जिलों में पत्रकार परिषद का गठन की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
पत्रकारों में रिपोर्टर, सहायक संपादक, संपादक, प्रेस फोटोग्राफर के साथ इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तथा वेब मीडिया को भी शामिल करने पर विचार जरूरी हो गया है। आज समाचार पत्रों में संपादक के पद पर एमबीए तथा पीआर के लोगों की नियुक्तियां बड़े पैमाने पर मीडिया कर्मी समूह कर रहे हैं। उन्हें ही अधिकार सम्पन्न पैसा कमाने की मशीन बनाया जा रहा है। इसके कारण संपादक नाम की संस्था विलुप्त होने के कगार पर पहुंच गई है। रिपोर्टर, डेस्क इन्चार्ज, सहायक संपादक इत्यादि जो समाचार अभिकरण के प्रकाशन और प्रसारण के लिए जिम्मेदार होते हैं, उन्हें भी परिषद के अन्तर्गत लाए जाने की जरूरत है जिससे वह अपनी जिम्मेदारी समझ सकें।
बार कौंसिल की तरह प्रत्येक राज्य में राज्य पत्रकार प्रेस परिषद का गठन हो। प्रत्येक जिले में जिला पत्रकार परिषद तथा तहसील स्तर पर एक ही पत्रकार संघ का गठन हो। प्रत्येक राज्य की पत्रकार परिषद में व्यावसायिक पत्रकारों को सदस्य बनाकर उनकी कार्यप्रणाली तय की जाए। इनके हितों, उनकी जिम्मेदारियों, नैतिकता इत्यादि के संबंध में सभी निर्णय एवं देख-रेख राज्य पत्रकार परिषद करे। उसके लिए विधिवत सारे प्रदेश के पत्रकारों को सदस्यता देकर उनके पदाधिकारियों का चुनाव कराया जाए। जिला एवं तहसील स्तर पर एसोसिएशन तथा संघ के माध्यम से इस पेशे में कार्यरत लोगों का पंजीकरण, व्यवसायिक स्वतंत्रता उनके दायित्व इत्यादि पर नियंत्रण करने के अधिकार विधिक रीति से प्राप्त हों। पत्रकारिता व्यवसाय से जुड़े सभी व्यक्तियों को अनुभव तथा डिग्री के माध्यम से जो भी संभव हो तो उसका परीक्षण करके उन्हें राज्य पत्रकार परिषद का सदस्य बनाकर समाज की मुख्यधारा से जोड़ने की जरूरत है।
आशा है कि इस विषय पर मीडिया जगत में एक नई सोच, समझ और बहस हो। ताकि मीडिया के बदलते परिप्रेक्ष्य में इसको नए स्वरूप में एकजुट किया जा सके। अभी मीडिया कई भागों में बंटा हुआ है। इसका प्रादेशिक एवं राष्टÑीय स्वरूप नहीं है। संपादक, प्रकाशक, मुद्रक नामक पद वर्तमान समय में अस्तित्वविहीन हो रहे हैं। मीडिया वर्तमान में विश्वसनीयता के संकट से गुजर रहा है। पत्रकारिता का क्षेत्र केवल पैसा कमाने का स्रोत नहीं है। इसकी सामाजिक एवं राष्टÑीय प्रतिबद्धता सर्वोपरि है। इस पर पुनर्विचार कर इसे नया स्वरूप दिए जाने की आवश्यकता है।

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