शनिवार, 22 सितंबर 2012

प्रेस क्लब / अनामी शरण बबल - 14

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    23 सितम्बर   2012
बाबाजी जल्दी चलना..................
कांग्रेस के युवराज राहुल बाबा  यदि आपको अपने नाम के आगे पीछे (भूत) पूर्व लिखवाने का शौक है तो संगठन और पार्टी को मारिए गोली और चट मंगनी और पट विवाह की तरह बस्स पीएम बनने की जुगाड़ में लग जाइए.।. हालांकि यह मेरा  मुफ्त में दिया जा रहा एक फालतू सा ही मशविरा है मगर आप यह तय मान लीजिए कि 2014 ( यदि 2013 में भी चुनाव हो जाए तब भी ) में ना पंजा दमदार रहेगा और ना आपको पीएम बनने का मौका मिलने वाला है । फिर एम एम-2 यानी अपन मनमोहन जी और पचास लाख के टॉयलेट के लिए ख्यात हुए मोंटेक .वालिया पार्टी की जड़ों में रोजाना मट्ठा डाल डाल कर इतना मजबूत बनाने में लगे है कि अब तो भगवान ही राखे। मगर 2014 का सपना भूलकर बस्स, यूपी के सीएम जुनियर मुलायम की सलाह को वेदवाक्य मान कर देश गद्दी और जो जो संभालना हो दामन में थाम ले, । सपा के अपन नेताजी भी पीएम का सपना देखने लगे है, और तय मानिए कि कभी कठोर ..कभी मुलायम को बूझ पाना आपके बूते से बाहर है । यानी खतरा और किसी को नहीं है बस्स भूत बनने से पहले पूर्व होकर अमर होने में ही भलाई और भलमनशाहत है। बाकी तो आपकी मर्जी ?

पहली बार, पहली बार दिखा अपन मुन्ना दबंग    
मेरे दोस्तों प्रधानमंत्री सरदार मनमोहन सिंह को पानी पी पी पी कर कोसने वाले तमाम निंदकों और इडियट चर्चा में अपन मनु जी पर लांछन लगाने वालों अब तो बस्स करो। आठ साल में पहली बार देखा ऐसा जलवा  ....पहली बार... ऐसा जलवा कि बस्स अपन दिल सरदार जी पर आ गया। जर्नादन द्विवेदी की मदद से ककहरा सीखने का इल्जाम समेत रबरछाप, दूसरों के संकेत पर काम करने वाला या मैड़म के घर का रबर छाप दरबारी पीएम का आरोप झेलने वाले अपन मुन्ना साहब ने एक ही झटके में सबको ढेर कर दिया। सबसे पहले तो असरदार तरीके से हिन्दी बोलकर दिखा दिया कि वे भले ही हिन्दी कम बोलता हैं, पर वे जर्नादन द्विवेदी को भी हिन्दी पढ़ा सकते है। एकदम शालीन मगर अटैकिंग लहजे में देशवासियों को बता दिया कि हालात बहुत बुरी है, मगर हम हालात को रोके हुए है। और भी मीठी गोली की तरह तमाम कड़वी बातों को बिना लाग लपेट के कहकर यह बता और समझा दिया कि वोटर को जो करना है वो कर ले मगर अब तो हम रूकने वाले नहीं है और ना थमकर रहेंगे। लगता है कि अपन मन साब मोंटेक छाप च्वणप्राश कुछ ज्यादा ही मात्रा में खाने लगे है ?  

ममता की मर्दानगी के लाभ
तुनकमिजाजी और बेलगाम सी अपन ममता दीदी चाहे कोई भी हालात हो मगर उनको कभी रोका नहीं जा सकता। लाभ के गणित को भले ही मुलायम मित्रों की मदद से हमेशा गलत कर देती हो, इसके बावजूद ममता दीदी की हिम्मत का कोई जवाब नहीं। उन्होने दिखा दिया कि मर्दो से भरे संसद में एकांत्र मर्द नेता वहीं है। 14 खंभों की पालकी पर सवार मनमोहन सरकार की चूलें हिलाने में तो वे सफल रही , मगर नये दोस्तों और दलालों की मदद से मनमोहन जी का मनमोहक राज अभी बाकी रह गया दोस्त। हालांकि ममता के पीछे चलने के लिए कमल फिर लगभग राजी हो गया है। मगर सबों को मोदी राज के चुनाव परिणाम पर नजर है।  कि मनमोहन जी के व्रजास्त्र पर देश की जनता कैसे रिएक्ट करती है ?

कभी मुलायम कभी कठोर

यूपी (इटावा) के सैफई गांव के पहलवान मास्टर मुलायम सिंह यादव को पहलवानी छोड़े भले ही 40 साल हो गए हो, मगर दांवपेंच और  रणनीति बनाकर पटखनी देने के मामले में तो नेताजी और भी स्मार्ट तथा अजेय होते जा रहे दिख रहे है। ममता मनमोहन और इस्तीफा नौटंकी के दो सप्ताह में नेताजी का नाटक सबों के ले मनभावन प्रहसन बना गया ।  इस दौरान कभी मुलायम तो कभी कठोर रूप धारण करके अपन नेताजी ने जनता समेत कांग्रेसी आलाकमानों और भाजपा समेत खुद को भी परेशान करने से नहीं चूके । हालांकि नेताजी कभी यकीन वाले नेता नहीं रहे है, मगर मनमोहन जी के लिए आक्सीजन सिलेण्डर लेकर नेताजी ही दरबार के बाहर हमेशा खड़े रहे। अपनी विश्वसनीयता को इस बार कुछ ज्यादा ही गंवाने वाले नेताजी की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ा। कल तक मन में संकोच रखने वाले नेताजी ने तो अभी से ही  खुलकर खुद को 2014 में भावी प्रधानमंत्री का दावा पेश करके वामपंथियों को अपना लग्गू बना लिया। जय हो नेताजी , मगर अपनी नजर के साथ ही साथ जनता पर भी भरोसा को कायम रखे, नहीं तो क्या होगा यह लिखने से ज्यादा आप खुद दी समझदार हैं। वहीं पीएम बनने के लिए आतुर मायावती जी से भी सावधान रहे, जिनका पत्ता 09 अक्टूबर को खुलने वाला है।

अपन बारी की फिर जगी आस

मनमोहन राज को चाहे जितनी भी गाली क्यों ना दिया जाए, मगर मनमोहन मंत्रीमंडल में जगह पाने वालों के लिए फिर से उम्मीदों का दरवाजा खुला है। ममता दीदी के आधा दर्जन मंत्रियों नें अभी  इस्तीफा सौंपा भी नहीं था कि  ज्यादातर लोगों ने अपनी गोटी फिट करना स्टार्ट कर दिया। सबसे तेजी से पूर्व रेलमंत्री रहे लालू और पासवान भी रेस में शामिल हो गए, मगर अभी तक इन्हें कहीं घास तक नहीं मिला। आईआईटीएएन मुबंईया रह चुके योग्य नेता जयराम रमेश को लेकर नाम रेल की तरह दौड़ने लगा है, मगर इस बार मनमोहन ज्यादा सख्त होकर अपनी टीम को चुनने के लिए पसंद नापसंद को तरजीह दे रहे है। भला हो उन नेताओं को जिन्हें इस बार मौका मिल सकता है।

शिंदे जी जुबांन..........
कांग्रेस में सबसे योग्य दलित नेता के रूप में मान्य उर्जा मंत्री रहे शिंदे का पार्टी में बड़ा सम्मानजनक स्थान है। इस बार होम मिनिस्टर बनते ही शिंदे साहब इतने पावर में आ गए कि संसद में फिल्मी सितारों को संसद में सलीका बताने से नहीं बाज आए। मामला जया बच्चन का था लिहाजा पूरा विपक्ष ही शिंदे पर बरस पड़ा। मामले को बेकाबू होने से पहले शिंदे साहब को माफी मांगकर रफा दफा करना पड़ा। मनमोहन राज के सबसे बड़े कोल घोटाला की आंच अभी मंद भी नहीं हुआ कि एक बार फिर शिंदे साहब यह कहने से नहीं चूके कि लोग बोफोर्स की तरह भविष्य में कोल घोटाला को भी भूल जाएगी। शिंदे की जुबानी आग से मामला इतना प्रज्जवलित हो उठा कि शिंदे समेत बहुतों को इफ बट लगाकर मामले को शांत करना पड़ा। हालात तो काबू में आ गया, मगर सबसे घाटे में शिंदे ही रहे, क्योंकि ओवर स्मार्ट बनने और साबित करने के फिराक में वे यह भूल गए कि मौका आने पर अब कांग्रेसी ही शिंदे साहब को भूल सकते हैं ?

पत्रकार से ज्यादा नेता बन गए राजीव शुक्ला

मौके का फायदा उठाने और गिरगिट की तरह रंग बदलने में भूत (पूर्व) पत्रकार राजीव शुक्ला वाकई में असली नेता और नकली पत्रकार साबित हो गए। हालांकि मनमोहगन के संकट मोचक सारथी की तरह अपने पत्रकारीय संपर्को के बूते हालात को अनुकूल बनाने में राजीव हमेशा खरे उतरे हैं। मगर मनमोहन संकट और संसद ठप्प को रूकवाने में फेल रहे शुक्ला ने इस बार दम लगाकर एक्सरसाईज किया और ममता के भाग खड़े होने के बावजूद मनमोहन को बेखौफ रखकर अपनी सारी कसर पूरी कर दी। और तो और मनमोहन के मर्दोवाली सफाई को भी भूत( ? ) पत्रकार रह चुके शुक्ला ने ही शब्दबद्ध किया। जिससे मनमोहन की भोला भाला  और दब्बू छवि से भी उन्हें राहत मिली। मीडिया और खबरों की जमकर आलोचना कर रहे शुक्ला  इस बार सपाई नेताजी पर इस तरह की दमदार सवारी की है कि नेताजी को लाभ हो न हो मगर अपनी विश्वसनीयता को हासिल करने में वे जरूर कामयाब हो गए। कांग्रेसी प्रमोद महाजन के रूप में (कु) ख्यात शुक्ला जी फिलहाल मनमोहन सिंह की तरह ही चैन की वंशी बजा सकते हैं।

यह जनता के साथ घात है अन्ना- अरविंद

चले तो थे इस दावे के साथ कि देश की तस्वीर और तकदीर बदल देंगे, मगर अभी साल डेढ़ साल भी नहीं हुआ कि सारे के सारे सब बिखर गए। टीम अन्ना नहीं रही। ना रहा जोश और ना रहा कुछ करने का हौसला। सब पस्त हो गए। कभी गांधी मान लिए गए तो कभी कबीर की तरह जो घर फूंके आपना का ......नारा बुलंद करके लोकपाल के बूते देश के नए सिपाही और सिपहसालार बनने का सपना पूरे देश को दिखाया। इसी बहाने करप्शन के खिलाफ नारा बुलंद करके देशवासियों से करोड़ों की सहयोग राशि से वारे न्यारे कर लिए। अब अन्ना अरविंद कथा पर बात करके हम अपने पाठकों का मूड खराब करना नहीं चाहते। भगवान दोनों को सेहतमंद रखे।, मगर मेरे मन में यह सवाल बार बार खड़ा ही रह जा रहा है कि करोड़ों रूपये का जो चंदा जनता से मिली थी उसका क्या हुआ ?  करप्शन के कमांडरों से यह निवेदन है कि उस रकम का भी हिसाब जनता को दें, कि जनता के धन का जनता के लिए खर्च करने के बाद कितना धन शेष महेश बचा रह गया है।
इडियट (बॉक्स) चर्चा
देश की संसद से भी बड़ी ताकत के रूप में इन दिनों इडियट बॉक्स दिखने लगा है। संसद में तो इन दिनों अवकाश का माहौल है। रोज रोज के बंद और ठप्प से लोग बेहाल और नेता लोग खुशहाल हैं, मगर इडियट बॉक्स  पर होने वाली रोजाना की इडियट (बॉक्स) चर्चा से देश का जनमानस बिह्वल बेहाल और व्याकुल है। प्राइम टाईम के नाम पर न्यूज की जगह नेता और बहस के नाम पर गाली गलौज और जोरदार भाषम चालू हो गया है। अब टीवी नेताओं को कौन बते और समझाएं कि जुबानी जमग से इमेज खराब और भद्दा हो जाता है। हमारे इडियट (बॉक्स चर्चा) नेता इसे कब मानेंगे।

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