बुधवार, 22 अगस्त 2012

जनसंचार






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जनसंचार (Mass communication) से तात्पर्य उन सभी साधनों के अध्ययन एवं विश्लेषण से है जो एक साथ बहुत बड़ी जनसंख्या के साथ संचार सम्बन्ध स्थापित करने में सहायक होते हैं। प्रायः इसका अर्थ सम्मिलित रूप से समाचार पत्र, पत्रिकाएँ, रेडियो, दूरदर्शन, चलचित्र से लिया जाता है जो समाचार एवं विज्ञापन दोनो के प्रसारण के लिये प्रयुक्त होते हैं।
जनसंचार माध्यम में संचार सब्द की उत्पति संस्कृत के चार धातु से हुई है जिसका अर्थ है चलना अथवा जब हम भव या जानकारी को एक से दुसरे तक पहुचाते है और वह प्रक्रिया सामूहिक रूप मैं होतब वह जनसंचार कहलाती है ! कोम्युनिकेसन शब्द की उत्पति लैटिन के 'कम्युनिस्ट' शब्द से मणि गयी है ! जिसका अर्थ है सम्प्रेसन द्वारा किसी के भावनाओ को उसके विचारो एवं अनुभूतियो को खोलकर पढ़कर देखकर नियंत्रित करना ! जनसंचार का अर्थ बताना चलाना फैलाना भी है मूलतः तीन तत्वों से संचार की सरंचना होती है १) संचालक २) सन्देश ३) प्राप्तकर्ता
जनसंचार के कई स्वरुप है जैसे :- पत्र पत्रिकाए, पुस्तके, रेडिओ, टी.वि, न्यूज़ पेपर, कंप्यूटर, इन्टरनेट, 
जनसंचार के माध्यमो द्वारा हम बहूत से श्रोताओ को प्रभावित कर सकते है! जनसंचार का की सफलता का सारा अर्जन उसमे प्रयुक्त भाषा को जाता है सर्वेश कमलेश तिवारी जी के अनुशार जनसंचार माध्यम उन्मध्यमो को कहा जाता है जिसके द्वारा एक समूह मैं किसी भी सन्देश सुचना को बड़ी तेज़ी से पहुचाया जा सके!

8 टिप्‍पणियां:

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  4. नि:शक्त बच्चों को आत्मनिर्भर बनायाजाना समय की आवश्यकता है। जिस तेजी यह समस्या समाज में बढ़ रही है उसी तेजी से इसके इलाज के उपाय करने के लिए डॉक्टरों और सरकार को गंभीर व सजग होना जरूरी है। इस संबंध में राष्ट्रीय स्तर पर एक परिचर्चा की भी जरूरत है ताकि विशेषज्ञ अपने अनुभवों का आदान-प्रदान कर कुछ सार्थक पहल कर सकें। ये बच्चे विशेषकर सेरेब्रल पाल्सी यानी मस्तिष्क पक्षाघात जैसे रोग की चपेटआने वाले बच्चे किसी से कमतर नहीं। जरूरत है सही दिशा में कारगर प्रयास करने की। लेकिन, इच्छाशक्ति में कमी की वजह से इन बच्चों का कल्याण नहीं हो पा रहा है। आधुनिकता की दुहाई देने और विश्वगुरू बनने भर का राग अलापने से काम नहीं चलने वाला है। प्रत्येक और अंतिम व्यक्ति तक मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराई जाना आवश्यक है। तभी विकास के मायने सार्थक हो सकेंगे। नि:शक्त बच्चों के सही इलाज और पुनर्वास की व्यवस्था गांव और कस्बों तक होना चाहिए। क्या बच्चों को वोट देने का अधिकार नहीं, इसलिए इनकी अब तक इतनी उपेक्षा की जा रही है?

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  5. सेरेब्रल पाल्सी होने की वजह विकसित होते दिमाग की मोटर कंट्रोल सेंटर का खराब होना है। यह बीमारी मुख्यत: गर्भधारण (75 प्रतिशत), बच्चे के जन्म के समय (तकरीबन 5 प्रतिशत) और तीन वर्ष तक की उम्र के बच्चों को होती है। सेरेब्रल पाल्सी पर अभी शोध चल रहा है, क्योंकि वर्तमान उपलब्ध शोध सिर्फ पैडियाट्रिक रोगियों पर फोकस है। इस बीमारी की वजह से कम्युनिकेशन में दिक्कत, संवेदना, पूर्व धारणा, चीजों को पहचानना और व्यवहारिक दिक्कतें आती है। इस बीमारी के बारे में पहली बार अंग्रेजी सर्जन विलियम लिटिल ने 1860 में पता लगाया था।वर्तमान में इस बीमारी की कोई कारगर दवा मौजूद नहीं है। मौजूदा मेडिकल उपचार अभी इस रोग और इसके साइड इफेक्ट के बारे मेंकोई पुख्ता परिणाम नहीं दे पाए हैं। सेरेब्रल पाल्सी को तीन भागों में बांटकर देखा जा सकता है। पहला स्पास्टिक, दूसरा एटॉक्सिक और तीसरा एथिऑइड। स्पास्टिक सेरेब्रल पाल्सी सबसे आम है। तकरीबन 70 से 80 प्रतिशत मामलों में यही होती है।एटॉक्सिक सेरेब्रल पाल्सी की समस्या तकरीबन दस प्रतिशत लोगों में देखने में आती है। इस स्थिति में व्यक्ति को लिखने, टाइप करने में समस्या होती है। इसके अलावा इस बीमारी में चलते वक्त व्यक्ति को संतुलन बनाने में काफी दिक्कत आती है। साथ ही किसी व्यक्ति की दृश्य और श्रवण शक्ति पर भी इसका प्रभाव पड़ता है। एथिऑइड की समस्या में व्यक्ति को सीधा खड़ा होने, बैठने में परेशानी होती है। साथ ही रोगी किसी चीज को सही तरीके से पकड़ नहीं पाता। उदाहरण के तौर पर वह टुथब्रश, पेंसिल को भी ठीक से इस्तेमाल नहीं कर पाता।

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  6. ऑटिज्म के मरीज अपनी ही दुनिया में खोए रहते हैं।रोगियों को जानने के लिए उनसे प्यार से बात करें।


    रोगियों को नयी-नयी चीजें सिखने के लिए प्रेरित
    करें।

    अपनी जरूरत के बारे में उन्हें खुद बोलना सिखाएं।

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  7. ऑटिज्म के मरीज अपनी ही दुनिया में खोए रहते हैं।रोगियों को जानने के लिए उनसे प्यार से बात करें।


    रोगियों को नयी-नयी चीजें सिखने के लिए प्रेरित
    करें।

    अपनी जरूरत के बारे में उन्हें खुद बोलना सिखाएं।

    ऑटिज्म से ग्रस्त रोगियों का शारीरिक विकास तो होता है,लेकिन मानसिक विकास धीमा हो जाता है। इससे पीड़ित लोग अपनी ही दुनिया में खोएं रहते हैं। उन्हें बोलने में समस्या होती है। वे हर किसी से खुल नहीं पाते हैं इसके अलावा कभी-कभी वे इतने आक्रमक हो जाते हैं कि खुद को ही चोट पहुंचा लते हैं।

    ऑटिज्म मस्तिष्क की उस प्रक्रिया पर असर डालता है, जिसका काम भावों, संचार और शरीर की हलचल को नियंत्रित करना होता है। कुछ ऑटिस्टिक बच्चों में हाथ और मस्तिष्क का बड़ा आकार भी देखने को मिलता है। ऑटिज्म सिंड्रोम डिस्ऑर्डर से प्रभावित बच्चों में कुछ अन्य जुड़ी हुई स्थितियां भी देखने को मिलती हैं। ऑटिज्म के रोगियों को उपचार देने से पहले चिकित्सक यह जानने की कोशिश करते हैं कि बच्चे की वास्तविक समस्या क्या है।ऑटिज्म के रोगियों का जीवन काफी चुनौतीपूर्ण होता है। ऐसे में उन्हें प्यार व दुलार की काफी जरूरत होती है। उन्हें अपने आसपास ऐसे लोगों की जरूरत होती है जो उन्हें समझे और ऐसी स्थिति से बाहर आने में मदद करें। ज्यादातर माता-पिता अपने बच्चे की ऐसी स्थिति कोस्वीकार नहीं कर पाते हैं और वे बच्चे की अनदेखी व उससे दूरी बनाने लगते हैं जो कि बच्चे के लिए बहुत नुकसानदेह

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  8. जानिए ऑटिज्म में ध्यान रखने वाली बातों के बारे में-बच्चों को दुत्कारने नहीं, बल्कि उनकी ओर विशेष ध्यान दें।खेल-खेल में बच्चों के साथ नए शब्दोंका प्रयोग करें।शारीरिक खेल गतिविधियों के लिए ऑटिज्म रोगियों को प्रोत्साहित करें।रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाले शब्दों को जोड़कर बोलना सिखाएं ।बच्चों को तनाव मुक्त जगहों पर लेकर जाएं।बच्चों को खिलौनों के साथ खेलने का सही तरीका दिखाएं।धीरे-धीरे खेल में लोगो की संख्या कोबढ़ते जाएं।रोगियों से छोटे-छोटे वाक्यों में बात करें। इसके अलावा साधारण वाक्यों का प्रयोग करें जिससे रोगी उसे समझ सके।रोगियों को पहले समझना फिर बोलना सिखाएं।यदि बच्चा बोल पा रहा है तो उसे प्रोत्साहित करें और बार-बार बोलने के लिए प्रेरित करें।बच्चो को अपनी जरूरतों को बोलने का मौका दें।यदि बच्चा बिल्कुल बोल नही पाए तो उसे तस्वीर की तरफ इशारा करके अपनी जरूरतों के बारे में बोलना सिखाये।बच्चो को घर के अलावा अन्य लोगो से नियमित रूप से मिलने का मौका दे।बच्चे को तनाव मुक्त स्थानों जैसे पार्क आदि में ले जाएं। अन्य लोगो को बच्चो से बात करने के लिए प्रेरित करे।यदि बच्चा कोई एक व्यवहार बार-बार करता है तो उसे रोकने के लिए उसे किसी दुसरे काम में व्यस्त रखे।ग़लत व्यवहार दोहराने पर बच्चो से कुछ ऐसा करवाए जो उसे पसंद ना हो।यदि बच्चा कुछ देर ग़लत व्यवहार न करे तो उसे तुंरत प्रोत्साहित करे।प्रोत्साहन के लिए रंग-बिरंगी , चमकीली तथा ध्यान खींचने वाली चीजो का इस्तेमाल करे।बच्चो को अपनी शक्ति को इस्तेमाल करने के लिए उसे शारिरीक खेल के लिए प्रोत्साहित करे।अगर परेशानी ज्यादा हो तो मनोचिकित्सक द्वारा दी गई दवाओ को प्रयोग करें।

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