सोमवार, 20 अगस्त 2012

हिंदी टीवी मीडिया में सनसनी (खेजीकरण)

समाचार4मीडिया.कॉम का मीडिया राउंड टेबल

समाचार4मीडिया.कॉम
हरेश कुमार
समाचार4मीडिया.कॉम का तीसरा मीडिया राउंड टेबल 25 फरवरी 2010 को नई दिल्ली के इस्लामिक कल्चरल सेंटर में आयोजित किया गया। राउंड टेबल में परिचर्चा का विषय हिंदी मीडिया का सेंसेशनलाइजेशन था। परिचर्चा में ज़ी न्यूज के संपादक सतीश के. सिंह, सीएनईबी के सलाहकार संपादक आलोक तोमर, इंडिया टीवी के प्रबंध संपादक विनोद कापड़ी तथा एमसीसीएस (स्टार ग्रुप) के मार्केटिंग वाइस प्रेजिडेंट नीरज सनन ने शिरकत की। परिचर्चा का संचालन समाचार4मीडिया.कॉम के संपादक पीके खुराना ने किया।
हिंदी टीवी मीडिया के सेंसेशनलाइजेशन पर अपने विचार व्यक्त करते हुए सीएनईबी के कंसल्टिंग एडिटर आलोक तोमर ने कहा कि सारा खेल टीआरपी का है। पहले रोजगार समाचार सबसे अधिक बिकता था, आज की तरह पहले नौकरी.कॉम या मॉन्स्टर.कॉम नहीं था। आज जमाना नौकरी.कॉम का है। समय के साथ चीजें बदलती अवश्य हैं, समाचारों का प्रस्तुतिकरण भी बदला है। परंतु सच सिर्फ एक होता है और उसे सच की तरह ही दिखाया जाना चाहिए। अगर फिक्शन ही दिखाना है तो उसे फिक्शन की तरह दिखाया जाए।
तोमर ने कहा कि हिंदी मीडिया ही नहीं पूरे मीडिया पर यह आरोप है कि हम लोग सनसनी दिखाते हैं। इसमें हम सब लोग बराबर के जिम्मेदार हैं। हम सब टीआरपी के पीछे भागते हैं। हम टीआरपी के आधार पर मार्केटिंग कर रहे हैं। हम अपने दर्शकों की जरूरतों को नहीं समझते जिस दिन हम उनकी जरूरतों को समझ जायेंगे उस दिन ऐसा नहीं होगा। हमारा उद्देश्य अगर टीआरपी बटोरना है तो टीआरपी बटोरने के कई तरीके हैं। विश्व में कई सच हैं जिसे दिखाकर हम टीआरपी बटोर सकते हैं। अगर हम हमारे अंदर हिम्मत है और जुगत कर पायें।
इतनी बड़ी दुनिया में बहुत सी सच्ची खबरें ऐसी हैं जो सनसनी का कारण बन सकती हैं। अगर उन्हें खोजा जाए, उन पर मेहनत की जाए तो किसी को शिकायत नहीं होगी। शिकायत तब होती है जब क्राइम स्टोरी में ओवर-ड्रामाटाइज़ेशन कर डालते हैं। दूसरी ओर स्टार न्यूज का उदाहरण हमारे सामने है। स्टार न्यूज ने अमर उजाला और दैनिक भास्कर के तर्ज पर छोटे शहरों और कस्बों की छोटी-छोटी खबरों के तह में जाकर उन पर रिसर्च की और उन्हें अच्छी तरह से पेश किया। वे छोटी दिखने वाली खबरें बड़ी बन गईं क्योंकि स्टार ने उन्हें सनसनीखेज बनाने के बजाए उन पर मेहनत की। आपके सामने कलर्स चैनल का उदाहरण मौजूद है, जिसमें जिंदगी से जुड़ी चीजें दिखायी जाती हैं। उसके किसी कार्यक्रम में सनसनी नहीं है, फिर भी वह सबसे ज्यादा चल रहा है।
एमसीसीएस (स्टार न्यूज) के मार्केटिंग वाइस प्रेसीडेंट नीरज सनन ने कहा कि सभी खबरें दो गज बाई दो गज के दायरे में घटती हैं, लेकिन उनका असर अलग- अलग हो सकता है। कोई खबर स्थानीय होती है, कोई राष्ट्रीय होती है और कोई खबर अंतरराष्ट्रीय महत्व की हो जाती है। एक आदमी नाचते हुए घर में मर जाता है, माइकल जैक्सन की मैं बात कर रहा हूं, और उसका अंतरराष्ट्रीय असर हुआ। सभी चैनलों के अपने वैल्यू सिस्टम हैं। अपने दिमाग और क्रिएटीविटी से एक आदमी खबर को तौलता है और तय करता है कि उसका महत्व क्या है। हर चैनल में यह पैरामीटर अलग-अलग हो सकता है और उस चैनल के लोग उसे अपने ढंग से दिखाते हैं। यह आपके वैल्यू सिस्टम पर डिपेंड करता है कि आप उसे किस तरह से देखते हैं। एक को जो सनसनी लगता है वह दूसरे को नहीं लगता है। यह नज़रिए की बात है। नीरज ने उदाहरण देते हुए बताया कि एक चैनल एक एलिएन को गाय का दूध पीते हुए दिखाया जाता है, यह चैनल पर निर्भर करता है कि वह किस तरह का प्रोग्राम करता है। उस चैनल को रेटिंग में इसका लाभ मिलता है। सर्वे किया गया तो दर्शकों का कहना था कि हमें भी पता है कि यह सब गलत है, लेकिन हमें यह सब देखना अच्छा लगता है इसलिए हम इसे देखेंगे। आपको एक अन्य उदाहरण देकर समझा सकता हूं कि सबको पता है लाल बत्ती पर वाहन जंप करना गलत है, लेकिन वहीं पर कुछ लोग लाल बत्ती पर वाहन जंप करते मिल जायेंगे। यह आपको तय करना है कि आप क्या दिखाना चाहते हैं। पर अब स्थिति सुधरी है, अब पहले जैसा नहीं है। यह कहना भी गलत है कि सभी चैनल सनसनी फैलाते हैं। फिर भी यह आवश्यक है कि अपने आप को सेल्फ रेगुलेट करें ताकि गड़बडिय़ां न हों, या कम से कम हों।
इंडिया टीवी के मैनेजिंग एडिटर विनोद कापड़ी ने कहा कि हिंदी टीवी मीडिया में शुरुआती दौर में सनसनी जैसी कोई चीज नहीं थी लेकिन नौ-दस सालों से चैनलों में सनसनी ने अपनी जगह बनायी है। बाद में चैनलों ने इसे एक नकल के तौर पर अपना लिया, लेकिन 26/11 की घटना के बाद हिंदी टीवी चैनलों में बहुत सुधार आया है। वरिष्ठ संपादकों ने कंटेंट में सुधार के लिए एक मंच बनाया है ताकि खबरों का एक स्तर तय हो सके। ‘ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन’ नाम से संपादकों की एक संस्था बनी है। इस संस्था से लगभग सभी चैलनों के एडिटर्स जुड़े हुए हैं। इस संस्था के सदस्य आपस में बातचीत करते रहते हैं और अक्सर यह तय करते हैं कि कौन सी खबर दिखानी है या नहीं दिखानी। बंगलूरू में एक बड़ी बिल्डिंग में लगी आग की वजह से लोग ऊपरी मंजिलों से कूद रहे थे, जिसे दक्षिण भारत के चैनल लाइव दिखा रहे थे और कुछ हिंदी चैनल भी वहीं से विजुअल उठाकर वह खबर दिखाने लगे। तब सभी चैनलों के संपादकों ने निर्णय किया कि हमें यह नहीं दिखाना चाहिए, उसके बाद किसी ने भी यह खबर नहीं चलाई, जबकि इसके वीडियो हर जगह मौजूद हैं। फिर हैदराबाद में एक आदमी ने तेलंगाना के मुद्दे पर आत्मदाह किया, सभी अखबारों ने उसे प्रकाशित किया। इस वीडियो को किसी ने नहीं दिखाया। कुछ लोगों ने कहा न्यूज में हम इसे दिखा सकते हैं, तो एडिटर्स एसोसिएशन ने कहा कि अगर आपको दिखाना ही है तो आत्मदाह वाली घटना को ब्लर्ब करके दिखाइये। कहीं से कोई दवाब नहीं है, लेकिन अब इस तरह की खबरें नहीं दिखाई जाती हैं। हिंदी टीवी मीडिया सुधार की ओर अग्रसर है। आपको इस सुधार का पाजिटिव रूप भी देखना चाहिए। अगर ऐसा नहीं होगा, अगर आप इस सुधार को एप्रिशियेट नहीं करेंगे तो सुधार का कोई मतलब नहीं रह जाएगा।
अब संपादक आपस में संवाद करते हैं जो कि बहुत अच्छी बात है। यह आज से दो साल पहले होना चाहिए था। पहले संपादकों में आपस में संवाद नहीं होता था। जिसकी जो मर्जी होती थी वह वहीं दिखाता था, लेकिन अब सब मिलकर चल रहे हैं। टीवी चैनलों के विरुद्ध जो शिकायतें सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय में पहुंचती थीं, वे भी अब 75 फीसदी कम हो गई हैं। यह बात सूचना एवं प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी ने खुद स्वीकार की है। यह टीवी चैलनों के कंटेंट में सुधार का पुख्ता सुबूत है। अभी भी बहुत सी कमियां टीवी चैनलों में हैं जिनको सुधारने के लिए कोशिशें जारी हैं। यह कोशिश चलती रहनी चाहिए, इसी में सबका भला है।
ज़ी न्यूज़, स्टार न्यूज़, इंडिया टीवी सारे चैनल टीआरपी को नजर में रखकर कार्यक्रम बनाते हैं। मुझ पर हमेशा से यह आरोप लगता रहा है कि मैं टीआरपी के लिए काम करता हूं। हां, बिल्कुल टीआरपी हमारा मापदंड है तो हमें टीआरपी के लिए काम क्यों नहीं करना चाहिए? अखबारों में ऐसा कुछ भी नहीं है। टीवी के रिपोर्टर हमेशा टीआरपी के दबाव में रहते हैं जिससे गलतियां होने की आशंका रहती है, लेकिन अखबारों में ऐसा नहीं है। अखबार का रिपोर्टर इस मामले में खुशनसीब है। चैनल के रिपोर्टर की समस्या है कि अगर उसके कार्यक्रम को टीआरपी नहीं मिलेगी तो अगले सप्ताह क्या होगा। टीवी का कंटेंट क्यों गिर रहा है? एक हफ्ते तक एक चैनल ने चीन पर कार्यक्रम दिखाया, उस कार्यक्रम को टीआरपी मिली, फिर दूसरे चैनल ने भी उस तरह की स्टोरी की। स्वाइन फ्लू की तरह रेटिंग के पीछे लोग भागते हैं। मैं इस स्थिति में सुधार चाहता हूं। मैंने सुझाव दिया था कि टीआरपी को एक सप्ताह की जगह चार या छह सप्ताह में आना चाहिए। इससे चैनलों में होड़ कम हो जाएगी, क्योंकि चैलन यह देखते हैं कि इस सप्ताह किस चैनल की किस खबर पर ज्यादा रेटिंग आई है और उसे ही वो लोग फालो करते हैं, इससे उस खबर का तिल का ताड़ बना दिया जाता है। अगर चैनलों को आपस की रेटिंग के बारे में पता नहीं चलेगा तो वह होड़ नहीं मचेगी जो आज मची हुई है और जब रेटिंग आयेगी तब तक वह खबर ठंडी हो चुकी होगी, फिर कोई उसे बिना बात के नहीं बढ़ायेगा। अगर टीआरपी को चार-छह हफ्तों के बाद बताया जाये तो यह काफी हद तक रुक सकता है।
ज़ी न्यूज़ के एडिटर सतीश के. सिंह ने कहा कि हम टीवी वालों पर सनसनी फैलाने का आरोप लगता है जबकि टीआरपी का खेल न्यूज पेपरों ने शुरू किया है। अंग्रेज़ी के एक बड़े अखबार ने न्यूज का फार्मेट बदला है। ज्यादातर अखबारों ने सॉफ्ट स्टोरीज़ और सेंसेशनल स्टोरीज़ को बढ़ावा दिया है। देखिए कि उनकी हेडलाइन कैसी होती है? मैं किसी पर कोई इल्जाम नहीं लगा रहा हूं, पर आप सच को झुठला नहीं सकते। अगर आप आज के समाचारपत्र को देखेंगे तो आप पायेंगे कि कल रेल बजट था लेकिन सभी अखबारों ने रेल बजट पर ध्यान नहीं देकर सचिन तेंदुलकर और क्रिकेट में भारत की ऐतिहासिक विजय का उल्लेख किया। सभी अखबारों में सचिन के दोहरे शतक की विस्तार से चर्चा की गई है और साथ ही सचिन का बड़ा फोटो लगा है। रेल का बजट दूसरी या तीसरी खबर बन गया जिससे करोड़ों लोग प्रभावित होते हैं। इस पर आप क्या कहेंगे?
सरकार ने एक आदेश में कहा है कि हम किसी भी आतंकवादी का इंटरव्यू नहीं करें जिसका देश-विदेश में गलत संदेश जाए। सरकार के पास हिम्मत नहीं है कि वह समाचारपत्र को भी यह कहे कि आप ऐसा न करें। समाचारपत्र और मैंगजीन भी टीआरपी के लिए ऐसा करते हैं। वहां भी आईआरएस है। टीवी चैनल को ऑडिएंस चाहिए। सरकार किसी चैनल का लाइसेंस कैंसल कर सकती है, समाचारपत्रों पर उनका कोई नियंत्रण नहीं है। इसलिए सारे नियम, सारी बंदिशें चैनलों के लिए ही हैं, अखबारों के लिए क्यों नहीं?
सतीश के. सिंह ने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि समाचार4मीडिया.कॉम की जरूरत क्यों है? और फिर खुद ही जवाब भी दिया कि समाचार4मीडिया.कॉम इंडस्ट्री के इन सवालों को उठा सकता है, हम नहीं उठा सकते। समाचार4मीडिया.कॉम इंडस्ट्री का एक बढिय़ा मंच है, जहां ऐसी बहस संभव है। मुझे खुशी है कि आप यह कर रहे हैं। हमें प्रोफेशनल बनना पड़ेगा। क्यों हम लोग टीआरपी के लिए भागते हैं? यह बिजनेस का एक हिस्सा है। जहां पूरे देश में सिर्फ 62 प्रतिशत लोग ही शिक्षित हों वहां पर आप कैसी उम्मीद कर सकते हैं? सिर्फ पुनर्जन्म जैसी खबरें टीआरपी बटोरती है। हम लोग सही खबर को दिखाने के बजाए टीआरपी बटोरू शो चलाते हैं। मैं इस बात से खुश हूं कि मेरे चैनल ने एक सैकेंड भी राखी सावंत या राजू श्रीवास्तव को नहीं दिखाया। हमने सफलता पूर्वक इसे किया और आगे भी ऐसा ही करेंगे। हमने छठे वेतन आयोग पर कई कार्यक्रम किए और उसका हमें लाभ मिला। हमें अच्छी टीआरपी मिली। हम ऐसी लोकप्रियता के चक्कर में नहीं पड़ते, और वह भी तब है जब कि हम अकेले ऐसे न्यूज़ चैनल हैं जो पेड है। कोई अन्य न्यूज चैनल आपसे चैनल देखने के लिए भुगतान नहीं मांगता, हम मांगते हैं, फिर भी हम सनसनी नहीं दिखाते। यह हमारा नियम है।
एमसीसीएस (स्टार ग्रुप) के मार्केटिंग वाइस पे्रसिडेंट नीरज सनन ने टीआरपी के दवाब के बारे में बोलते हुए कहा कि टीआरपी दो कम्पनियां देती है। एक टैम है और दूसरे ऐम है। आज तो टीआरपी रोजना की हो गई है। टीआरपी की रेस पागलपन की रेस है। प्रेशर की यह एक अंधी दौड़ है, जिसमें हम सभी कूपमंडूक की तरह हिस्सा ले रहे हैं। हमारे पास बहुत सारे स्टोरी आइडिया है। हमें किसी को फालो नहीं करना चाहिए। हमारे अंदर टेलेंट होना चाहिए, हम किसी भी स्टोरी से रेटिंग ले सकते हैं। प्रेशर तो हमेशा रहेगा, प्रेशर में रह कर भी हमें अच्छा काम करना है, प्रोफेशनलिज़्म दिखानी है।
समाचार4मीडिया.कॉम के संपादक पीके खुराना ने एक इंटेरेस्टिंग सवाल पूछा कि सड़क पर चलते समय इस नियम का पालन किया जाता है कि दुर्घटना से देर भली, लेकिन टीवी चैनलों में खबरों की ट्रीटमेंट, खासकर ब्रेक्रिंग न्यूज़ के मामले में तो ऐसा लगता है कि टीवी चैनल देर से दुघर्टना भली की नीति पर चल रहे हैं।
इस पर विनोद कापड़ी ने कहा कि मुझे इसके निदान के लिए एक ही चीज दिखती है कि खबर आये तो उस पर ठंडे दिमाग से सोचना चाहिए। कोई भी चैनल जब तक अपने रिपोर्टर से कन्फर्म नहीं कर लेता, किसी दूसरे चैनल में दिखाई गई खबर नहीं चलाता। रिपोर्टर लोग आपस में एक दूसरे को खबरों की सूचना देते हैं, यह अच्छा है। पर अब एक कमी है जो नज़र आती है, वह बहुत बड़ी कमी है जिसके लिए हमारी आत्मा रोती है। पांच साल में इतने चैनल आ गये हैं, लेकिन आज तक कोई पांच रिपोर्टर, एंकर या प्रोड्यूसर नये तैयार नहीं कर सका। कई तो ऐसे है कि उनको हिंदी का भी सही ढंग से ज्ञान नहीं होता। कई चैनल रिपोर्टरों को बिना किसी ट्रेनिंग के उनको फील्ड में भेज देते हैं। जिसे 15,000 रुपये मिलने चाहिए थे उसे आज 1.50 लाख मिल रहे हैं। दिक्कत क्या है इतने सारे चैनल आ गये बिना किसी तैयारी के। ज्वाइन करने के दो दिन बाद रिपोर्टर को फील्ड में भेज देते हैं। पार्लियामेंट की स्टोरी कवर करने भेज देते हैं, जिसे पार्लियामेंट का क ख ग का ज्ञान नहीं है, वह वहां जाकर खबर लाता है। पहले हमारी बाइलाइन दो-दो साल नहीं आती थी लेकिन अब दो दिन के बाद ही नए रिपोर्टर का ओबी वैन से लाइव चला दिया जाता है। पहले जिस भ_ी से गुजरते थे, अब नए लोगों को उसमें से गुजरने का मौका ही नहीं मिलता। टेलिविजन पत्रकारिता में जल्दी मची हुई है, यही प्राब्लम है। यही चैनलों में गलतियों की वजह बन जाती है। किसी भी चैनल को देखिए, वहां सब से ज्य़ादा ट्रेनी मिलेंगे। लेकिन क्या उन्हें ट्रेनी की तरह ट्रीट किया जाता है? काम के दबाव में ट्रेनी को ओबी वैन देकर भेजेंगे तो वह खबरों को कैसी ट्रीटमेंट देगा, समझा जा सकता है। बीबीसी के 50-60 रिपोर्टर क्यों फील्ड में जाते हैं? क्यों हम यहां फटाफट नये लोगों को प्रमोशन दे देते हैं? अगर भारत में रिपोर्टरों के सतत प्रशिक्षण की व्यवस्था होती तो अच्छा रहता। अभी की स्थिति में इस तरह की गलतियां होंगी, लेकिन हमें इसे गंभीरता से लेना होगा।
इसी पर बोलते हुए सतीश के सिंह ने बताया कि चैनलों में खबरों का सही ढंग से ट्रीटमेंट नहीं होता। नए लोगों को अच्छे तरीके से से ट्रेनिंग नहीं दी जाती। हर एक ट्रेनी पोलिटिकल रिपोर्टर बनना चाहता है। चैनलों में काम करने वाले कई बड़े लोग पार्लियामेंट की एबीसी नहीं जानते, लेकिन वे चैनलों में अच्छे पदों पर काम कर रहे हैं। ऐसे में गलतियां नहीं होंगी तो और क्या होगा? इसके समाधान के लिए चैनलों को सही ढंग से नए लोगों को ट्रेनिंग देनी चाहिए, रिफ्रेशर कोर्स चलाने चाहिएं, ताकि गलतियां न हों। दूसरे ढंग से देखें तो कोई भी चैनल पवित्र नही है सभी चैनल सनसनी फैलाते हैं, फिर चाहे वह मेरा ही चैनल क्यों न हो। टीआरपी की हाई रेटिंग पुनर्जन्म और ज्योतिष से ही मिलती है।
मैंने पहले भी कहा कि रिपोर्टरों को पूरी ट्रेनिंग की जरूरत है, प्रापर कोर्स की जरूरत है, ट्रेनिंग मैटीरियल की जरूरत है। इस पर ज्य़ादा काम होना चाहिए। इंडस्ट्री को इस बारे में सोचना चाहिए।
पीके खुराना के इस सवाल के जवाब में कि अब चैनल सामाजिक सरोकारों की बात क्यों नहीं करते, आलोक तोमर ने कहा कि मेरी जि़ंदगी का बहुत बड़ा हिस्सा अखबारों में कटा है। मैं कोई भी टीवी चैनल अपवाद में भी नहीं सोच पा रहा हूं जहां पर सामाजिक सरोकारों की बात होती है। कल खबर थी कि बोलांगीर में 40-50 लोग भूख से मारे गए, लेकिन जब हमने पता किया तो मुश्किल से 34 लोगों की पुष्टि हो पायी। कालाहांडी में भूख से मौत पर हमने एक खबर की है। बोलांगीर की खबर को हमने महाखबर (सीएनईबी का एक शो) में दिखाया है। टीआरपी एक सच्चा मिथक है, जैसे भूत-प्रेत का मिथक है। हम लोगों को सवालों से लैस नहीं कर रहे हैं। एक बार आपने टीवी सेट खरीद लिया और केबल का कनेक्शन ले लिया तो आप सारे चैनल देख सकते हैं, लेकिन चैनल को 24 घंटे खबरें देनी होती हैं और उसमें बराबर इन्वेस्टमेंट की जरूरत होती है। जिम्मेदारी हमारी है कि हम 25,000 की जगह 2.5 लाख तक वेतन लेने लगे हैं लेकिन हमने अपनी जिम्मेदारियों को नहीं समझा। बड़ी तनखाह का लालच हमसे हर उल्टा सीधा काम करवा रहा है। स्थिति में सुधार के लिए सतत प्रयास की जरूरत है, जो नहीं हो रहा है। इसे बदला जाना चाहिए।
समाचार4मीडिया.कॉम के मीडिया राउंड टेबल में समाचार4मीडिया.कॉम की प्रवर्तक कंपनी एक्सचेंज4मीडिया समूह के चेयरमैन अनुराग बत्रा, मार्केटिंग टीम के रोहित सरदाना, अब्दुला मजूमदर आदि भी शामिल हुए। अंत में समाचार4मीडिया.कॉम के संपादक पीके खुराना ने परिचर्चा में आये सभी प्रतिभागियों का धन्यवाद किया और आशा व्यक्त की कि आने वाले दिनों में स्थिति में परिवर्तन होगा।
नोट: समाचार4मीडिया देश के प्रतिष्ठित और नं.1 मीडिया पोर्टल एक्सचेंज4मीडिया का नया उपक्रम है। समाचार4मीडिया.कॉम में हम आपकी राय और सुझावों की कद्र करते हैं। आप अपनी राय, सुझाव और ख़बरें हमें samachar4media@exchange4media.com पर भेज सकते हैं।



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  • 17/02/2010
    “मीडिया प्लानर, टीवी न्यूज़ चैनल और एडवरटाइजर्स हिंदी मीडिया के उज्ज्वल भविष्य को लेकर आशान्वित; कहा, आने वाला दशक हिंदी का ही होगा।”
  • 26/02/2010
    एक्सचेंज4मीडिया समूह के नए उपक्रम समाचार4मीडिया.कॉम ने 12 फरवरी को नई दिल्ली स्थित इंडियन हैबिटैट सेंटर में “हिंदी मीडिया की व्यावसायिक चुनौतियां” विषय पर एक परिचर्चा का आयोजन किया।
  • 18/08/2011
    अमेरिका के मशहूर वित्तीय अखबार ‘वाल स्ट्रीट जनरल’ ने लिखा कि गांधीवादी कार्यकर्ता अन्ना हजारे के समर्थन में भारत की जनता भले ही सड़कों पर उतर आई हो लेकिन इसकी तुलना अरब जगत में हुए विद्रोह से नहीं की जा सकती है। पत्र ने कहा कि भ्रष्टाचार से उब चुके लोगों का सड़कों पर उतरना मतदान की तरह ही भारत के स्थिर और जीवंत लोकतंत्र का हिस्सा है जबकि अरब जगत में हुए ज्यादातर जन विद्रोहों में सत्ता के पूर्ण परिवर्तन पर जोर दिया गया।

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