गुरुवार, 23 अगस्त 2012

मीडिया नेतृत्व अपनी जिम्मेदारी महसूस करें : आडवाणी


आज ‘मीडिया’ शब्द में, उस समय की अपेक्षा जब मैं पत्रकार और सूचना एवं प्रसारण मंत्री था, आज एक वृह्द आकार वाला प्रचार-प्रसार मंच शामिल है। उस समय केवल नॉन-प्रिन्ट मीडिया मंच- दूरदर्शन और आकाशवाणी दोनों ही पूरी तरह से सरकार के नियंत्रण में था। आज टीवी चैनलों तथा एफ.एम. रेडियो चैनलों के उद्भव के अलावा हम मीडिया के इतिहास में एक सबसे बड़ी क्रांति : इंटरनेट का विकास देख रहे हैं।
इस नए प्रचार माध्यम की अनेक विशिष्ट बातों में से एक बात पुरानी मीडिया से अलग है जो केवल वन-वे कम्युनिकेशन को प्रोत्साहित करती थी लेकिन नए प्रचार माध्यम में इंटरनेट में टू-वे कम्युनिकेशन को संभव बनाया है। दूसरे शब्दों में कहें, पाठक अथवा दर्शक या श्रोता न केवल सूचना को निश्चेष्ट प्राप्त करने वाला होता है बल्कि वापस उत्तर देकर उस बातचीत में भागीदार बन सकता है। इस परस्पर कार्रवाई ने लोगों को आवाज देकर मजबूती प्रदान की है तथा उन्हें अपने विचार व्यक्त करने का मौका दिया है। हमारे देश में – वास्तव में पूरे विश्व में – राजनीति और शासन के भावी प्रादुर्भाव के लिए इसका अत्यधिक महत्व है जिसे अभी पूरी तरह से समझा नहीं जा सका है।
मैं एक व्यक्तिगत उदाहरण देता हूं। भारतीय जनता पार्टी के मेरे कुछ सहयोगियों ने मेरे लिए एक वेबसाइट बनाई है – वास्तव में वे इसे केवल वेबसाइट न कहकर पोर्टल कहना पसन्द करते हैं। इस पोर्टल का कल नई दिल्ली में जनरल (सेवा-निवृत) एस.के.सिन्हा द्वारा उद्धाटन किया गया। सचमुच मैंने एक दशक पहले यह कल्पना नहीं की थी कि लिखित सामग्री, फोटोग्राफ्स, वीडियो तथा ओडियो क्लिप्स के रूप में इतनी बड़ी सामग्री मुहैया कराना संभव है, जहां कोई भी व्यक्ति विश्व में कहीं भी और किसी भी समय उसे देख सकता है। इसके अलावा, पोर्टल से विजिटर्स को वर्तमान मुद्दों पर अपने विचार पोस्ट करने तथा व्यापक मुद्दों पर भावी एन.डी.ए. सरकार के एजेंडा में शामिल करने हेतु सुझाव भेजने का अवसर मिलेगा। यह सही मायने में जीवन्त भागीदारीपूर्ण लोकतंत्र है।
इस अनुभव से मुझे पक्का विश्वास हो गया है कि यद्यपि इंटरनेट के अनेक अन्य फायदे हैं लेकिन यह मानव इतिहास में लोकतंत्र का सबसे बड़ा रक्षक तथा संवर्धक भी है। हमें अपने देश की सु-राजनीति तथा सु-शासन का बढ़ावा देने हेतु उसकी पूरी संभावना का इस्तेमाल करना चाहिए।
इसलिए यदि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन अगले संसदीय चुनावों में सत्ता में आता है तो यह हमारा पक्का वादा होगा कि हम देश भर में ब्रॉडबेंड क्रांति का समर्थन करेंगे। इंटरनेट के इस्तेमाल को आम आदमी विशेषकर विद्यार्थियों तथा युवाओं के लिए आसान बनायेंगे। हम इंटरनेट को बड़े पैमाने पर भारतीय भाषाओं में भी प्रोत्साहित करेंगे। विशेष रुप से हमारा प्रयास होगा कि हम भारत के उत्तरी और पूर्वी राज्यों जहां इंटरनेट की सुविधाएं अभी भी बहुत कम है, में सूचना प्रौद्योगिकी (आई.टी.) और आई.टी. पर आधारित शिक्षा को बढ़ावा देगें।
पत्रकारिता के बुनियादी सिध्दान्त
मित्रो, प्रौद्योगिकी हमारे व्यवसाय में क्रांति ला रही है उसी तरह जैसे यह जीवन के कई अन्य पहलुओं में पूरी तरह से बदलाव ला रही है। तथापि, प्रौद्योगिकी पत्रकारिता के मूल उद्देश्य और सिध्दान्तों को बदल नहीं सकती। इसीलिए, मैं श्री श्याम खोसला द्वारा मुझे भेजे गये पत्र को देखकर बहुत खुश हुआ जिसमें मुझे इस सम्मेलन जो ”राष्ट्रवाद, व्यावसायिकता, नैतिकता, प्रेस की ंस्वतंत्रता और मीडिया शिक्षा” के प्रति भारतीय मीडिया की प्रतिबध्दता का सशक्त समर्थन करता है, का उद्धाटन करने के लिए आमंत्रित किया गया। चाहे कोई व्यक्ति समाचार पत्र के परम्परागत माध्यम से अथवा इंटरनेट के जरिए मंच से बातचीत करता है तो यही पत्रकारिता के इन बुनियादी सिध्दांतों के काफी अधिक अनुरुप है।
मेरे विचार में, पत्रकारों को अपने व्यवसाय में आंतरिक तथा बाहरी चुनौतियां, दोनों की जानकारी होनी चाहिए। उदाहरण के लिए आज प्रेस की स्वतंत्रता को सरकार से इतना अधिक खतरा नहीं है जितना आपातकाल के दौरान था। यह अन्य स्रोतों से है। आपातकाल के दौरान प्रेस की स्वतंत्रता को बंधक बना दिया गया था। अनेक साहसी पत्रकारों ने असहमति और विरोध को दबाने हेतु किए गये सरकार के उन निष्ठुर कदमों का विरोध किया था और इसके लिए उन्हें भारी कीमत भी चुकानी पड़ी थी। तथापि, अनेक दूसरे ऐसे दूसरे लोग भी थे जो सरकार के सामने झुक गये थे। आपातकाल के दौरान प्रेस पर लगाये गये प्रतिबंधों को उठा लेने के बाद सूचना एवं प्रसारण मंत्री के रुप में मुझे एक बार पत्रकारों के साथ बातचीत करने का मौका मिला था। मैंने उनसे कहा ”जब आपसे झुकने के लिए कहा गया, तो आप में से कई पत्रकार रेंगकर चलने लगे।”
आपातकाल के दौरान विद्यमान वे ताकतें अब नष्ट हो गयी हैं जिन्होंने पत्रकारों को झुकने और रेंगकर चलने के लिए मजबूर कर दिया था। भारतीय मीडिया में कई तरह से धन-शक्ति का बोलबाला है और कई तरह से निहित स्वार्थ वाले व्यक्ति पनप गये हैं जो इस व्यवसाय के लिए और हमारे लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है।
मीडिया प्रोफेशनल द्वारा आत्म-नियंत्रण
मुझे यकीन है कि मीडिया में सुधार लाने का आदेश देना न तो संभव है अथवा न ही वांछनीय है। मुख्यत: यह एक ऐसा विषय है जिस पर मीडिया से सम्बन्धित लोगों को बहस और चर्चा करनी पड़ेगी। जहां तक मींडिया का सम्बंध है, आत्म-नियंत्रण विनियमन का सर्वोत्तम तरीका है।
तथापि, ऐसे कई नीति विषयक मामले हैं जो भारतीय मीडिया को मजबूत बनाने में मदद दे सकते हैं। मैं इस सम्बंध में आप जैसे मीडिया प्रोफेशनलों के सुझाव प्राप्त करना चाहता हूं। विशेषकर आपसे यह जानना चाहता हूं कि हम छोटे तथा मझौले समाचार-पत्रों और मीडिया संगठनों को किस तरह से मजबूत बना सकते हैं और किस तरह से मजबूत बना सकते हैं और किस तरह से गैर-अंग्रेजी भाषाओं में विभिन्न मीडिया को और सुदृढ़ बना सकते हैं।
मैं आपसे यह भी सुझाव देने का आग्रह करता हूं कि मीडिया संगठन और सरकार मिलकर सेवा-निवृत पत्रकारों तथा मीडिया प्रोफेशनलों के लिए किस तरह से कल्याणकारी योजनाएं शुरु कर सकते हैं।
एक और भी बात है जिस पर मै आपके समक्ष अपने विचार रखना चाहूंगा। वास्तव में, मैं देश के करोड़ों आम नागरिकों के बारे में चिन्तित हूं और मीडिया में व्याप्त सनसनीखेज प्रवृत्ति के बारे में भी चिन्तित है। मीडिया में जो लोग जिम्मेदार पदों पर बैठे हैं उन्हें अपनी व्यावसायिक चिन्ता की अवहेलना करके प्रतियोगियों पर बढ़त हासिल करने के लालच में तथाकथित ”टीआरपी वार” का विरोध करना चाहिए। यदि राजनीतिज्ञों के लिए विश्वसनीयता महत्वपूर्ण है तो यह मीडिया संगठनों और मीडिया व्यावसायियों के लिए भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं।
यह मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि हाल के दशकों में मीडिया की भूमिका हमारे राष्ट्रीय जीवन में काफी बढ़ गई है। मीडिया में समाज को सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तरह से समाज को प्रभावित करने की शक्ति है। यह जरूरी है कि मीडिया व्यवसाय में लगे लोग विशेषकर जो नेतृत्व के पदों पर बैठे हैं वे समाज और राष्ट्र के प्रति अपनी जिम्मेदारी को महसूस करें।
-दिनांक 9 नवम्बर, 2008 को लुधियाना में इंडियन मिडिया सेन्टर के दो-दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन में लाल कृष्णआडवाणी द्वारा दिए गए भाषण से उध्दरण।

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