सोमवार, 20 अगस्त 2012

गाँव और संचा





अब गाँव तभी जाना होता है जब कोई पर्व-उत्‍सव हो या फिर शादी-विवाह। विगत दिनों पूर्वी उत्‍तर प्रदेश के अपने गाँव कुछ इसी सिलसिले में जाना हुआ। आज भी मेरे गाँव से लगभग डेढ़ कि0मी0 पहले ही पक्‍की सड़क खत्‍म हो जाती है। वहाँ पहुँचा तो जोरदार बारिश हो रही थी।घर तक जाने का मार्ग अवरूद्ध हो चुका था। इसलिए इंतजार करता बैठ गया। वैसे यह भी विचार आया कि भीगते हुए चला जाय, पर फिलहाल के लिए इसे मुल्‍तवी कर दिया गया।चारों ओर जंगल का अलौकिक नजारा था।इतने खुले भूगोल को देखकर मन पुलकित था। बारिश के थमने पर मैं और मेरे फोटोग्राफर मित्र पैदल चलकर घर पहुँचे।
बरसात और आँधी ने बिजली के खंभों को उखाड़ दिया था। इसलिए प्रकृति के साथ जीवन-शेली अपनानी थी।शाम के वक्‍त जंगलों और खेतों की ओर घूमने निकल पड़े। धान की रोपाई चल रही थी। अधिकतर महिलाएँ काम में लगी थी। कुछ पहले से परिचित थीं। जब मैंने उनसे अवधी में बातचीत शुरू की तो उनकी प्रसन्‍नता का ठिकाना न था। दिल्‍ली में रहते हुए भी ठेठ अवधी के शब्द गाँव से आने वालों से मैं सीखता रहता हूँ।फिर उन्‍होंने बताया कि शहर से आने वाले कौन-कौन लोग हैं जो अपनीभाषा मे बात नहीं करते।इन महिलाओं को देखकर ऐसा लगा कि इन्‍हें सशक्‍त होने के लिए न तो सरकारी योजनाओं की जरूरत है और न ही किसी डिस्‍कोर्सकी।ऐसी ऊर्जा और आत्‍मनिर्भरता शहरी महिलाओं में कम दीखती है।कहने की जरूरत नहीं कि ये महिलाएँ दलित-पिछड़े घरों से ताल्‍लुक रखती हैं।
अंधेरा छा गया था। तालों में पानी लबालब था। मेढकों का समूह-गायन शुरू हो गया था।अनेक अनचीन्‍हीं ध्‍वनियाँ का कलरव-सा सुनाई पड़ रहा था। मनुष्‍य निर्मित ध्‍वनियों को चुनौती देता हुआ।जब सोने के लिए चारपाई आयी तो खुले आकाश में ही आसन जमा।अब आसमान साफ था।तारों की जमात चहल-कदमी कर रही थी।मच्‍छरों से निजात पाने के लिए कंडे(उपले) और भूसे का धुआँ कर दिया गया था।चारों ओर पानी भरने से हवा में ठंडक थी।अंधेरा पाख था इसलिए चाँद न दिखा।बगल वाले पीपल पर असंख्‍य जुगनूं मंडरा रहे थे।मेरे मोबाइल की बैट्री कब की खत्‍म हो चुकी थी, दिल्‍ली वालों से संपर्क टूट चुका था। मन और शरीर दोनों शुकून महसूस कर रहे थे। कब नींद ने अपने आगोश में खींचा पता ही न चला।
अगले दिन तड़के ही उठ जाना पड़ा।जब गाँव जाता हूँ तो बचपन के अपने स्‍कूल को देखने की स्‍वाभाविक इच्‍छा रहती है। स्‍कूल पहुँचा तो वह बिल्‍कुल नए रूप में था।शौचालय भी बन गए थे।इस बीच ग्राम प्रधान भी आ गए थे। मिड-डे मील की चर्चा चल पड़ी।बताया गया कि गेहूँ-चावल देने के बाद दो रूपये प्रति विद्यार्थी सरकार की ओर से दिया जाता है। इसमें सब्‍जी, मिष्‍ठान और खाना पकाने का खर्च और जलाऊ लकड़ी की कीमत शामिल है।मुझे थोड़ा आश्‍चर्य हुआ।इसी प्रकार ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के बारे में लोगों ने बताया कि कार्ड बन जाते हैं, उनके भी जिन्‍हें इसकी जरूरत नहीं भी है।पेंशन स्‍कीम का लाभ भी कुछ ऐसे ही लोग उठा रहे हैं। सरकार की कल्‍याणकारी योजनाएँ आज भी दबंगों और अफसरों की मिलीभगत से निष्‍प्रभावी हो रही हैं।सूचना का अधिकार जरूर कुछ उत्‍साह देने वाला लगा।
स्‍कूल में बैठे-बैठे सहसा मेरी नज़र एक बोर्ड पर गयी।उस पर ग्राम प्रधान से लेकर ब्‍लॉक और जिला स्‍तर के अधिकारियों के मोबाइल नं0 लिखे हुए थे।स्‍थानीय थानाध्‍यक्ष का भी।मैने पास खड़े एक युवक से पूछा कि ये फोन मिलते भी हैं या केवल दिखाने के लिए यहाँ लिख दिए गए हैं। उसने कहा नहीं ये सभी मिलते हैं। मेरी प्रसन्‍नता का ठिकाना न रहा। तभी वह बोल पड़ा कि इससे हमें कम और अधिकारियों को फायदा कहीं ज्‍यादा है। उसने जो आगे बताया वह चौकाने वाला था। उसकी बात में करुणा और हास्‍य का मिश्रण था। उसने कहा गाँववालों के आपसी फसाद का फायदा अधिकारी अपनी जेब भरने में कर लेते हैं। मौका-ए-वारदात उनके लिए तोहफे लेकर आती है। इसलिए वे पहुँच भी जाते हैं। मैंने सोचा हर क्रांति में क्‍या शोषण की संभावना बनी रहती है। जिस गाँव में आँधी और बरसात से खंभे गिर गए हों, जिसके चलते बिजली न हो। जहाँ आज भी पक्‍की सड़क न हो। पीने का पानी समुचित मात्रा में न हो और अशुद्ध हो वहाँ मोबाइल पूरा काम करता है। विजली न रहने पर बैट्री चार्ज होती है डीजल इंजन या बाइक से। मुझे लगा मूलभूत सुविधाओं से ध्‍यान हटकर अब मोबाइल ग्राम समाज की जरूरत बन गया है।पर शायद यह सच नहीं है। आज भी जब वे फोन करते हैं तो केवल मिस कॉल ही देते हैं।मोबाइल तो है पर बैलेंस नहीं ।टेलीविजन तो है पर बिजली नहीं। ले देकर रेडियो है जो हमेशा उपलब्‍ध है। पर नयी पीढ़ी ध्‍वनि की बजाय दृश्‍य से आकर्षित है।उसे अब देखना अच्‍छा लगता है।कबीर की तरह जिन्‍होने कहा था एक अचंभा देखा भाई। गाँवों की संचार क्रांति भी किसी अचंभे कम नहीं।
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 संचार-आचार-विचार

-> संचार हमारे जीवन का आधार है , संचार एक प्रक्रिया है जिसमे हम अपने विचार, भावनाएं , ज्ञान , अनुभव, ज्ञात और अज्ञात सवेंदनाये किसी से सांझी करते है |

->आचार हमारे मन आत्मा का एक हिस्सा है | यह मनुष्य में इंसानियत का घोतक है, पल प्रति पल हम जो कुछ करते है उसमें हमारा आचार झलकता है|

-> विचार हमारे द्वारा वयक्त किये गये भाव है जो हमे हमारे दिल दिमाग और सोच से जोड़ता है।

वस्तुत: हमारे संचार में आचार और हमारे विचारों का बड़ा योगदान है। हम जो कुछ सीखते है वह हमारा अनुभव है और यही अनुभव हमारे संचार को और ज्यादा निखरता है। पढ़ना , देखना और सुनना हमारे अनुभव का इनपुट है । समय के साथ हमारी भावनाओ और विचारों में आया बदलाव इन अनुभवों का आउटपुट है ।
अनुभवों की इस डोर से हमारा संचार बंधा होता है। तो आएये हम अपने संचार में नए अनुभव जोड़कर इसे ज्यादा प्रभावसाली बनायें।

आख़िर संचार क्या है:-
संचार प्रेषक का प्राप्तकर्ता तक सूचना भेजने की प्रक्रिया है, जिसमे सूचना पहुंचाने के लिए ऐसे माध्यम का प्रयोग किया जाता है जिससे संप्रेषित सूचना प्रेषक और प्राप्तकर्ता दोनों समझ सकें ।यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा व्यक्ति विभिन्न माध्यमों के द्वारा सूचना का आदान प्रदान कर सकता हैं संचार की मांग है की संचार से जुड़े सभी पक्ष एक समान भाषा का बोध कर सकें जिसका आदान प्रदान हुआ है । वाणी संचार का एक माध्यम हैं जैसे की बोली, गायन और आवाज़ का स्वर । संचार का अमोखिक माध्यम वह है जिसमे शारीरिक भाषा जैसे की शारीरिक हाव भाव ,संकेत ,सपर्श ,नेत्र अथवा लेखन का प्रयोग किया जाता है
वास्तव में सार्थक चिन्हों द्वारा सूचनाओं को आदान -प्रदान करने की प्रक्रिया संचार है। किसी सूचना या जानकारी को दूसरों तक पहुंचाना संचार है। जब मनुष्य अपने हाव-भाव, संकेतों और वाणी के माध्यम से सूचनाओं का आदान प्रदान आपस में करता है तो वह संचार है। कम्यूनिकेशन अंग्रेजी भाषा का शब्द है जिसकी उत्पत्ति लैटिन भाषा के 'कोम्मुनिस' नामक शब्द से हुई है। इसका अर्थ समुदाय होता है। अर्थात भाईचारा, मैत्री, भाव, सहभागिता, आदि इसके अर्थ हो सकते है। इसलिए संचार का अर्थ एक-दूसरे को जानना, समझना, संबध बनाना, सूचनाओं का आदान प्रदान करना आदि है। इसके माध्यम से मनुष्य अपने विचारों, भावों, अनुभवों को एक दूसरे से बांटता है। वास्तव में विचारों की अभिव्यक्ति जिज्ञासाओं को परस्पर बांटना ही संचार का मुख्य उद्देश्य है।
संचार मनुष्यों के अलावा पशु पक्षियों में भी होता इसके लिए माध्यम का होना अति आवश्यक है। चिड़िया का चहचहाना, कुत्ते का भोंकना, सर्प का भुंकार मारना, शेर का दहाड़ना, गाय का रंभाना, मेंढ़क का टर-टर करना भी संचार है। भाषा ही संचार का पहला माध्यम है। भाषा के द्वारा ही हम अपने विचारों को समाज में आदान प्रदान करते है। इसीलिए कहा जा सकता है कि सूचनाओं, विचारों एवं भावनाओं को एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक भाषा के माध्यम से ही अपने विचारों अनुभवों को समाज के सामने रख कर यथेष्ठ सूचना का प्रेषण करते है।
मे संचार एक प्रक्रिया है संदेश नहीं। इस प्रक्रिया में एक मनुष्य दूसरे मनुष्य से अपने विचार सांझे करता है। संचार ने ही पूरी दुनिया को एक छोटे से गांव में तब्दील कर दिया है।
अमेरिकी विद्वान पसिंग ने मानव संचार के छह घटक बताऐं है।
  • प्रेषक : संदेश भेजने वाला
  • संदेश : विचार, अनुभव, सूचना
  • संकेतीकरण या इकोडिंग : विचार को संकेत चिन्ह में बदलना
  • माध्यम : जिसके द्वारा संदेश भेजा जाता है
  • प्राप्तकर्ता : संदेश प्राप्त करने वाला
  • संकेतवाचन या डीकोडिंग : प्राप्तकर्ता संदेश को अपने मस्तिष्क में उसी अर्थ में ढ़ाल लेना
संचार-प्रक्रिया का पहला चरण प्रेषक होता है। यह अपनी भावना को इनकोड करता है इसलिए इसे इनकोडिंग भी कहा जाता है। एनकोडिंग के बाद विचार शब्दों, प्रतीकों, संकेतों एवं चिन्हों में बदल जाते है। इस प्रक्रिया के बाद विचार सार्थक संदेश के रूप में ढल जाता है। जब प्राप्तकर्ता अपने मस्तिष्क में उक्त संदेश को ढ़ाल लेता है तो संचार की भाषा में इसे डीकोडिंग कहा जाता है। डीकोडिंग के बाद प्राप्तकर्ता अपनी प्रतिक्रिया भेजता है इस स्थिति को फीडबेक या प्रतिपुष्टि कहते है।
शोर अथवा नोइस संचार में हरदम विद्यमान रहने वाले वायरस है। जो संचार को बाधित करते है जेसे परस्पर वार्तालाप के दोरान पंखे या मशीन का शोर इत्यादि






जान पर खेल कर रहीं रिपोर्टिग

रिपोर्टिंग में पत्रकार नहीं करते जान की परवाह

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सीरिया सरकार ने सरकार विरोधी प्रदर्शनों को कवर करने के लिए अंतरराष्ट्रीय मीडिया को अनुमति नहीं दी है. फिर वहां से खबरें कैसे आ रही हैं. अंतरराष्ट्रीय मीडिया के कुछ बहादुर रिपोर्टर जान पर खेल कर वहां जमे हैं.
स्पेन की रिपोर्टर माइटे करासको का कहना है, “हम ऐसा काम कर रहे हैं, जो आने वाले दिनों में लुप्त हो सकता है, वॉर रिपोर्टिंग.करासको एक फ्रीलांसर हैं. वह उन दर्जन भर पत्रकारों और फोटोग्राफरों की दल में चुनी गई हैं, जिन्हें चुपके से सीरिया में खिसका दिया गया है, ताकि वहां की खबरें सामने आ सकें. सीरिया में पिछले 17 महीने से संघर्ष चल रहा है.
इन पत्रकारों को गैरकानूनी तरह से सीरिया में घुसना पड़ा और इस काम में उत्तर के विद्रोहियों ने उनकी मदद की. अगर वे वीजा लेकर वहां जाते, तो उन्हें हर वक्त सरकार की मीडिया गाइड के हिसाब से काम करना पड़ता. इस वजह से उन्हें ज्यादा जगह जाने की अनुमति नहीं मिलती.
इस तरह के पत्रकार अपने दम पर काम करते हैं और इसके लिए पैसे के अलावा साहस और जज्बा ही सब कुछ होता है. उनके पीछे हर वक्त पकड़े जाने या मारे जाने का खतरा मंडरा रहा होता है. पूरे मिशन में इन्हें एक ही चीज सहायता करती है, किस्मत.
मध्य पूर्व में बरसों तक संघर्ष की रिपोर्टिंग करने वाली अर्जेंटीना की कारेन मारोन का कहना है, “फ्रीलांसर को इस बात का ध्यान रखना पड़ता है कि उसे अपना खर्च खुद उठाना पड़ता है. उसके पास कोई मेडिकल बीमा नहीं होता और न ही वह किसी बड़े मीडिया हाउस से एक्रीडेटेड होता है. वह अकेला होता है, बिलकुल अकेला. लेकिन यह उसी का फैसला होता है.


लेकिन इन पत्रकारों को पता है कि ऐसे किसी मिशन में सफल होने के बाद उनका करियर बिलकुल बदल सकता है. इटली के जूलियो पिसिटेली का कहना है, “पिछले साल मैं लीबिया नहीं जा पाया, जिसका मुझे अफसोस है. लेकिन मुझे उम्मीद है कि सीरिया का अनुभव मेरे करियर के लिए बहुत बड़ा साबित होगा.पहली बार वॉर रिपोर्टिंग कर रहे पिसिटेली का कहना है, “बड़ी एजेंसियां अपनी जरूरत के हिसाब से लोगों को नहीं भेज पातीं. इसकी वजह से मेरी पूछ बढ़ती है.
स्पेन के वीडियो पत्रकार रोबर्तो फ्राइले का कहना है कि इसके बावजूद हमारा शोषण होता है, “हम हमेशा संकट में रहते हैं. बहुत से पत्रकारों के पास सुरक्षा कवच या हेलमेट भी नहीं है, बहुत कम लोगों के पास सैटेलाइट फोन है. हमारे पास नकद पैसे भी नहीं होते.स्पेन के ही फोटो पत्रकार अलबर्तो प्रियतो भी उनकी बात को सही बताते हैं, “मुझे नहीं लगता कि मैं जिस मीडिया के लिए काम करता हूं, वह मेरी कद्र करता है. कभी कभी तो वे मेरे ईमेल का जवाब भी नहीं देते और मेरी तस्वीरें भी नहीं छापते. और अगर लेते भी हैं, तो कम पैसा देना चाहते हैं.
पर ऐसे काम पैसों के लिए कौन करता है. पिसिटेली का कहना है, “मुझे अपना काम पसंद है और मुझे लगता है कि हम जो कर रहे हैं वह बहुत जरूरी है.


अर्जेंटीनी मारोन कहती हैं, “इंसानी नजर से देखें, तो कभी कभी जीना भी मुहाल हो जाता है. फ्रीलांसर गजब का काम करता है और उसे इसकी शाबाशी भी मिलती है. लेकिन इसके बाद कभी ऐसे दिन भी आते हैं, जब बिना किसी वजह से उसे किनारे कर दिया जाता है.फ्रीलांसर पत्रकार और मीडिया ग्रुपों में कोई लिखित कांट्रैक्ट नहीं होता. यह आपसी रिश्तों पर निर्भर करता है कि उनसे कितना काम लिया जाएगा और इसकी क्या कीमत मिलेगी.
ब्रिटेन के वीडियो पत्रकार जॉन रॉबर्ट्स का कहना है कि उन्होंने बहुत सोच समझ कर अपनी मर्जी से फ्रीलांस पत्रकार बनने का फैसला किया, “जाहिर है मुझे भी जीवन चलाने के लिए कमाना है. मैं अपने साथियों से मिलने वाली प्रशंसा का कायल रहता हूं लेकिन इससे अलग बात यह है कि मैंने अपनी पसंद से यह काम चुना है.
फ्रीलांसर पत्रकारों को पता है कि वॉर रिपोर्टिंग में खतरे कितने बड़े हैं और यहां तक की जान की भी कोई गारंटी नहीं है. उन्हें पता है कि पैसे और शोहरत भी नहीं मिलने वाली. फिर भी जुनून के आगे इन बातों की भला कौन फिक्र करता है
Home » Education Express » 14 July 2012 »
किताबों से दोस्ती करेंगे, तो पाएंगे उम्दा करियर
भारत में प्रकाशन उद्योग काफी फैला हुआ है। सदियों पुराने इस फील्ड में प्रकाशक अब आधुनिक तौर-तरीके अपना रहे हैं, फिर बात चाहे प्रिंटिंग की हो, मार्केटिंग की या डिलिवरी की। जाहिर है, प्रकाशन जगत करियर की भी अच्छी संभावनाएं सहेजे हुए है। आज की डिजिटल दुनिया में भी किताबों ने अपनी जगह बरकरार रखी है, बल्कि यह कहना चाहिए कि प्रकाशन उद्योग आज एक रोचक दौर से गुजर रहा है। इस फील्ड में बढ़ती प्रतियोगिता से न सिर्फ किताबों का बाजार फैला है, बल्कि प्रॉडक्ट की क्वॉलिटी भी सुधरी है। साथ ही पाठकों तक किताबों की काफी ज्यादा वैराइटी भी पहुंचने लगी है। रिटेल बाजार के विस्तार, बढ़ते पाठक और डिजिटल मीडिया के सहयोग ने इस इंडस्ट्री के लिए संभावनाओं के नए दरवाजे खोले हैं।
कार्यक्षेत्र : प्रकाशन जगत में कार्यक्षेत्र कंटेंट की एडिटिंग या कुछ डिजाइन पैटर्न देने से कहीं आगे जा चुका है। एक संपादक के रूप में कार्य करने के लिए कंटेंट की गहरी समझ और चीजों को विस्तार से समझने की ललक होनी चाहिए। संबंधित भाषा और विषय पर अच्छी पकड़ भी होनी चाहिए। विषय के बारे में सतही जानकारी रखने से संपादक का काम नहीं चलता। विस्तृत जानकारी जरूरी है। आज बुक्स का ले-आउट किसी बंधे-बधाए ढरेर् पर नहीं होता, इसलिए इस फील्ड में डिजाइनर्स की डिमांड भी काफी बढ़ गई है। इलस्ट्रेटर, कार्टोग्राफर, डीटीपी ऑपरेटर आदि के रूप में अच्छे अवसर मिलते हैं। प्रकाशन उद्योग फ्रीलांसर के रूप में भी काम करने के मौके उपलब्ध कराता है, जैसे- अनुवादक और प्रूफ रीडर के रूप में।
योग्यता : यह कहना गलत होगा कि इस फील्ड में काम करने के लिए मीडिया या पब्लिशिंग इंडस्ट्री का ही अनुभव होना चाहिए। शैक्षिक योग्यता की बात करें, तो कम से कम ग्रैजुएट होने पर रोजगार के ज्यादा अवसर उपलब्ध होंगे। आप प्रकाशन के क्षेत्र में जिस भाषा में करियर बनाना चाहते हैं, उस पर काफी अच्छी पकड़ होनी जरूरी है। अन्य लोगों से आगे कुछ अलग तरीके से सोचने की क्षमता आपको इस क्षेत्र में सफल बनाएगी। डिजाइन के क्षेत्र में करियर बनाने के लिए प्रफेशनल डिग्री हासिल करना लाभदायक रहेगा। शॉर्ट टर्म कोर्स करने पर आप डीटीपी प्रफेशनल के रूप में करियर बना सकते हैं। किताबों में नक्शे आदि के प्रयोग के लिए कार्टोग्राफर की जरूरत पड़ती है। इस रूप में काम करने के लिए जियोग्राफी या जियोग्राफिक इंफरमेशन सिस्टम बैकग्राउंड होना चाहिए। सबसे अहम है, किताबों से आपकी दोस्ती होनी चाहिए। प्रकाशन जगत में क्रिएटिविटी की भी बहुत जरूरत होती है। किताबें चाहे साहित्य से जुड़ी हों या कमर्शल, क्रिएटिविटी से उनकी गुणवत्ता बेहतर की जा सकती है।
सावधानियां : प्रकाशन के क्षेत्र में काम करते समय विभिन्न मुद्दों पर सावधान रहना चाहिए, जैसे- लाइसेंसिंग, कॉपी राइट, इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स आदि। इन मुद्दों को क्लास रूम में यदा-कदा ही पढ़ाया जाता है और इनसे जुड़े प्रफेशनल कोर्स भी शायद ही कहीं उपलब्ध हैं। ऐसे में अतिरिक्त सावधानी की जरूरत है।
आमदनी : इस क्षेत्र में अधिक प्रतियोगिता के चलते सैलरी स्ट्रक्चर काफी बेहतर है। फ्रीलांसर के रूप में भी अच्छी आमदनी पा सकते हैं।