मंगलवार, 14 अगस्त 2012

गांधी, पराडकर, राजेन्‍द्र माथुर व प्रभाष जोशी पर विमर्श


प्रकाशन :1/21/2011
वर्धा से रपट
र्धा । दैनिक भास्‍कर के समूह संपादक प्रकाश दूबे ने पत्रकारों को सामाजिक सरोकारों से जुड़ने की बात कही। वे रविवार को महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय, वर्धा के जनसंचार विभाग की ओर से पत्रकारिता के भीष्‍म पितामह कहे जाने वाले संपादकाचार्य बाबूराव विष्‍णु पराडकर की स्‍मृति पर्व पर 'मिशनरी पत्रकारिता : संदर्भ और प्रासंगिकता' विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्‍ट्रीय संगोष्‍ठी के चतुर्थ अकादमिक सत्र 'हिंदी पत्रकारिता : मिशनरी के दीपस्‍तंभ गांधी, पराडकर, राजेन्‍द्र माथुर व प्रभाष जोशी के संदर्भ' विषय पर आयोजित सत्र के दौरान वक्‍तव्‍य दे रहे थे।
प्रकाश दूबे ने कहा कि मिशनरी का सामान्‍य अर्थ सेवाभाव है। गांधी, पराडकर, माथुर व जोशी पत्रकारिता के दीप स्‍तंभ हैं या नहीं, इस पर हमें विमर्श करने की ज़रूरत है। गांधी ने हिंद स्‍वराज में भारत के विकास की बुनियाद रखी थी, पर उन्‍होंने 'ग्रीन पंपलेट' दस्‍तावेज में दुनिया का नक्‍शा कैसा हो, का खांका खींचा था। गांधी जी के समकालीन नरेन्‍द्र देव, राम मनोहर लोहिया आदि सभी किसी न किसी पत्र से जुड़े थे। गांधी समाज के सबसे बड़े सम्‍प्रेषणकर्ता थे क्‍योंकि वे सामाजिक सरोकारों से जुड़कर कार्य करते थे। उनके लिए पत्रकारिता जनता से संवाद का एक माध्‍यम था और दूसरों के लिए यह ज्ञान, जानकारी या शौक का हिस्‍सा था। आज हममें से ज्‍यादातर लोग इसी मानसिकता को तय कर पत्रकारिता में आते हैं।
हबीब तनवीर सभागार में खचाखच भरे समारोह की अध्‍यक्षता करते हुए हिंदी विश्‍वविद्यालय के प्रतिकुलपति प्रो. ए अरविंदाक्षन ने कहा कि भारत में चार दिग्‍गज पत्रकार ही नहीं हैं अपितु हर प्रांत में समर्पित पत्रकार हुए हैं, उनपर भी हमें गंभीर विमर्श करना चाहिए। लोकमत समाचार, नागपुर के संपादक गिरीश मिश्र ने चारों पत्रकारों के कृतित्‍व पर गंभीर विमर्श को आगे बढ़ाते हुए कहा कि गांधीजी नैतिकता के धरातल पर पत्रकारिता करते थे आज हमें समाज सापेक्ष नैतिकता को ध्‍यान में रखते हुए पत्रकारिता करने की ज़रूरत है। उन्‍होंने महाभारत के भीष्‍म पितामह के ख़ामोशी का जिक्र करते हुए कहा कि क़लम का धर्म ख़ामोश होगा तो नया महाभारत होगा। इसलिए हमारे समस्‍याओं से आज की पत्रकारिता को जुड़ना चाहिए। उन्‍होंने पत्रकारिता के विद्यार्थियों को बताया कि इसमें गंदगी है और रहेगी भी। हमें पत्रकारिता के लिए क़लम के धर्म और संस्‍कार को बरकरार रखने की ज़रूरत है।
महामना पंडित मदन मोहन मालवीय पत्रकारिता संस्‍थान, वाराणसी के प्रो. राममोहन पाठक ने पराडकर स्‍मृति पर्व पर मिशनरी पत्रकारिता पर राष्‍ट्रीय संगोष्‍ठी कराने के लिए कुलपति विभूति नारायण राय को धन्‍यवाद देते हुए कहा कि यह और भी हर्ष की बात है कि इसकी अगली कड़ी के रूप में पराडकरजी की कर्मभूमि वाराण्‍ासी में संगोष्‍ठी आयोजित की जाएगी। उन्‍होंने कहा कि आज पराडकरजी जैसे रोल मॉडल के सजग संपादक क‍हां मिलेंगे। मराठी ने हिंदी पत्रकारिता की नींव रखी का जिक्र करते हुए कहा कि पराडकरजी मराठी भाषी होते हुए भी हिंदी पत्रकारिता की दिशा तय की व मानदंड निर्धारित किए आज इस लोकतांत्रिक देश में पत्रकारिता के मूल्‍य को बचाए रखने की ज़रूरत है।
जनसंचार के विभागाध्‍यक्ष प्रो. अनिल के.राय 'अंकित' ने अंगवस्‍त्र, चरखा व सूतमाला प्रदान कर मंचस्‍थ अतिथियों का स्‍वागत किया। जनसंचार के असिस्‍टेंट प्रोफेसर डॉ. अख़्तर आलम ने मंच का संचालन किया तथा असिस्‍टेंट प्रोफेसर धरवेश कठेरिया ने आभार माना। समारोह के समापन की घोषणा करते हुए कुलपति विभूति नारायण राय ने देशभर से आए पत्रकारों व मीडियाविदों का आभार व्‍यक्‍त किया। कार्यक्रम के दौरान विश्‍वविद्यालय के जनसंचार के विद्यार्थियों ने मिशनरी पत्रकारिता के संदर्भ में गंभीर सवाल कर चर्चा को जीवंत बनाया।
इस अवसर पर प्रो. प्रदीप माथुर, प्रो. इलीना सेन, पत्रकार राजकिशोर, प्रो. सूरज पालीवाल, डॉ. कृपा शंकर चौबे, हिंदुस्‍तान के पत्रकार प्रदीप सौरव, जनमोर्चा के पूर्व संपादक शीतला प्रसाद सिंह, सहित चीन, थाईलैण्‍ड, मॉरीशस के हिंदी प्राध्‍यापक, पत्रकार, हिंदी विश्‍वविद्यालय के अध्‍यापक, कर्मी, शोधार्थी, विद्यार्थी, शिवाजी महाविद्यालय, अमरावती तथा चिंतामणि महा‍विद्यालय, वर्धा के पत्रकारिता के विद्यार्थी व वर्धा के गणमान्‍य नागरिक उपस्थित थे।

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