रविवार, 12 अगस्त 2012

विश्व में पत्रकारिता का इतिहास


सोमवार, 2 नवम्बर 2009



पत्रकारिता (journalism) आधुनिक सभ्यता का एक प्रमुख व्यवसाय है जिसमें समाचारों का एकत्रीकरण, लिखना, रिपोर्ट करना, सम्पादित करना और सम्यक प्रस्तुतीकरण आदि सम्मिलित हैं। आज के युग में पत्रकारिता के भी अनेक माध्यम हो गये हैं; जैसे - अखबार, पत्रिकायें, रेडियो, दूरदर्शन, वेब-पत्रकारिता आदि।
विश्व में पत्रकारिता का आरंभ सन 131 ईस्वी पूर्व रोम में हुआ था। उस साल पहला दैनिक समाचार-पत्र निकलने लगा। उस का नाम था – “Acta Diurna” (दिन की घटनाएं). वास्तव में यह पत्थर की या धातु की पट्टी होता था जिस पर समाचार अंकित होते थे । ये पट्टियां रोम के मुख्य स्थानों पर रखी जाती थीं और इन में वरिष्ठ अधिकारियों की नियुक्ति, नागरिकों की सभाओं के निर्णयों और ग्लेडिएटरों की लड़ाइयों के परिणामों के बारे में सूचनाएं मिलती थीं।
मध्यकाल में यूरोप के व्यापारिक केंद्रों में ‘सूचना-पत्र ‘ निकलने लगे। उन में कारोबार, क्रय-विक्रय और मुद्रा के मूल्य में उतार-चढ़ाव के समाचार लिखे जाते थे। लेकिन ये सारे ‘सूचना-पत्र ‘ हाथ से ही लिखे जाते थे। 15वीं शताब्दी के मध्य में योहन गूटनबर्ग ने छापने की मशीन का आविष्कार किया। असल में उन्होंने धातु के अक्षरों का आविष्कार किया। इस के फलस्वरूप किताबों का ही नहीं, अख़्बारों का भी प्रकाशन संभव हो गया।
16वीं शताब्दी के अंत में, यूरोप के शहर स्त्रास्बुर्ग में, योहन कारोलूस नाम का कारोबारी धनवान ग्राहकों के लिये सूचना-पत्र लिखवा कर प्रकाशित करता था। लेकिन हाथ से बहुत सी प्रतियों की नक़ल करने का काम महंगा भी था और धीमा भी। तब वह छापे की मशीन ख़रीद कर 1605 में समाचार-पत्र छापने लगा। समाचार-पत्र का नाम था ‘रिलेशन’। यह विश्व का प्रथम मुद्रित समाचार-पत्र माना जाता है।
भारत में हिंदी पत्रकारिता – ऐतिहासिक सम-सामयिक परिदृश्यपंडित बनारसी दास चतुर्वेदी ने एक स्थान पर लिखा है कि “पत्रकारिता को युगों की अवधि में ठीक-ठीक निश्चित करना कोई आसान काम नहीं है । एक युग दूसरे युग से मिलजुल जाता है । की पत्र एक युग में आरंभ होता है, दूसरे युग में उसका यौवन प्रस्फुटित होता है और संभवतः तीसरे युग में उसका अंत भी हो जाता है ।”
वास्तव में हिंदी पत्रकारिता का तार्किक और वैज्ञानिक आधार पर काल विभाजन करना कुछ कठिन कार्य है । सर्वप्रथम राधाकृष्ण दास ने ऐसा प्रारंभिक प्रयास किया था । उसके बाद ‘विशाल भारत’ के नवंबर 1930 के अंक में विष्णुदत्त शुक्ल ने इस प्रश्न पर विचार किया, किन्तु वे किसी अंतिम निर्णय पर नहीं पहुंचे । गुप्त निबंधावली में बालमुकुंद गुप्त ने यह विभाजन इस प्रकार किया –
प्रथम चरण – सन् 1845 से 1877
द्वितीय चरण – सन् 1877 से 1890
त्तीय चरण – सन् 1890 से बाद तक

डॉ. रामरतन भटनागर ने अपने शोध प्रबंध ‘द राइज एंड ग्रोथ आफ हिंदी जर्नलिज्म’ काल विभाजन इस प्रकार किया है–
1. आरंभिक युग 1826 से 1867
2. उत्थान एवं अभिवृद्धि
प्रथम चरण (1867-1883) भाषा एवं स्वरूप के समेकन का युग
द्वितीय चरण (1883-1900) प्रेस के प्रचार का युग
3.विकास युग
प्रथम युग (1900-1921) आवधिक पत्रों का युग
द्वितीय युग (1921-1935) दैनिक प्रचार का युग
4.सामयिक पत्रकारिता – 1935-1945

उपरोक्त में से तीन युगों के आरंभिक वर्षों में तीन प्रमुख पत्रिकाओं का प्रकाशन हुआ, जिन्होंने युगीन पत्रकारिता के समक्ष आदर्श स्थापित किए । सन् 1867 में ‘कविवचन सुधा’, सन् 1883 में ‘हिन्दुस्तान’ तथा सन् 1900 में ‘सरस्वती’ का प्रकाशन है ।
काशी नागरी प्रचारणी द्वारा प्रकाशित ‘हिंदी साहित्य के वृहत इतिहास’ के त्रयोदय भाग के तृतीय खंड में यह काल विभाजन इस प्रकार किया गया है –
प्रथम उत्थान – सन् 1826 से 1867
द्वितीय उत्थान – सन् 1868 से 1920
आधुनिक उत्थान – सन् 1920 के बाद

‘ए हिस्ट्री आफ द प्रेस इन इंडिया’ में श्री एस नटराजन ने पत्रकारिता का अध्ययन निम्न प्रमुख बिंदुओं के आधार पर किया है –
1. बीज वपन काल
2. ब्रिटिश विचारधारा का प्रभाव
3. राष्ट्रीय जागरण काल
4. लोकतंत्र और प्रेस

डॉ. कृष्ण बिहारी मिश्र ने ‘हिंदी पत्रकारिता’ का अध्ययन करने की सुविधा की दृष्टि से यह विभाजन मोटे रूप से इस प्रकार किया है –
1. भारतीय नवजागरण और हिंदी पत्रकारिता का उदय (सन् 1826 से 1867)
2. राष्ट्रीय आन्दोलन की प्रगति- दूसरे दौर की हिंदी पत्रकारिता (सन् 1867-1900)
3. बीसवीं शताब्दी का आरंभ और हिंदी पत्रकारिता का तीसरा दौर –
इस काल खण्ड का अध्ययन करते समय उन्होंने इसे तिलक युग तथा गांधी युग में भी विभक्त किया ।

डॉ. रामचन्द्र तिवारी ने अपनी पुस्तक ‘पत्रकारिता के विविध रूप’ में विभाजन के प्रश्न पर विचार करते हुए यह विभाजन किया है –
1. उदय काल – (सन् 1826 से 1867)
2. भारतेंदु युग – (सन् 1867 से 1900)
3. तिलक या द्विवेदी युग – (सन् 1900 से 1920)
4. गांधी युग – (सन् 1920 से 1947)
5. स्वातंत्र्योत्तर युग (सन् 1947 से अब तक)

डॉ. सुशील जोशी ने काल विभाजन कुछ ऐसा प्रस्तुत किया है –
1. हिंदी पत्रकारिता का उद्भव – 1826 से 1867
2. हिंदी पत्रकारिता का विकास – 1867 से 1900
3. हिंदी पत्रकारिता का उत्थान – 1900 से 1947
4. स्वातंत्र्योत्तर पत्रकारिता – 1947 से अब तक

उक्त मतों की समीक्षा करने पर स्पष्ट होता है कि हिंदी पत्रकारिता का काल विभाजन विभिन्न विद्वानों पत्रकारों ने अपनी-अपनी सुविधा से अलग-अलग ढंग से किया है । इस संबंध में सर्वसम्मत काल निर्धारण अभी नहीं किया जा सका है । किसी ने व्यक्ति विशेष के नाम से युग का नामकरण करने का प्रयास किया है तो किसी ने परिस्थिति अथवा प्रकृति के आधार पर । इनमें एकरूपता का अभाव है । अध्ययन की सुविदा के लिए हमने डॉ. सुशीला जोशी द्वारा किए गए काल विभाजन के आधार पर विश्लेषण किया है – (जो अग्रलिखित पृष्ठों पर है)
हिंदी पत्रकारिता का उद्भव काल (1826 से 1867)
कलकत्ता से 30 मई, 1826 को ‘उदन्त मार्तण्ड’ के सम्पादन से प्रारंभ हिंदी पत्रकारिता की विकास यात्रा कहीं थमी और कहीं ठहरी नहीं है । पंडित युगल किशोर शुक्ल के संपादन में प्रकाशित इस समाचार पत्र ने हालांकि आर्थिक अभावों के कारण जल्द ही दम तोड़ दिया, पर इसने हिंदी अखबारों के प्रकाशन का जो शुभारंभ किया वह कारवां निरंतर आगे बढ़ा है । साथ ही हिंदी का प्रथम पत्र होने के बावजूद यह भाषा, विचार एवं प्रस्तुति के लिहाज से महत्वपूर्ण बन गया ।

पत्रकारिता जगत में कलकत्ता का बड़ा महत्वपूर्ण योगदान रहा है । प्रशासनिक, वाणिज्य तथा शैक्षिक दृष्टि से कलकत्ता का उन दिनों विशेष महत्व था । यहीं से 10 मई 1829 को राजा राममोहन राय ने ‘बंगदूत’ समाचार पत्र निकाला जो बंगला, फारसी, अंग्रेजी तथा हिंदी में प्रकाशित हुआ । बंगला पत्र ‘समाचार दर्पण’ के 21 जून 1834 के अंक ‘प्रजामित्र’ नामक हिंदी पत्र के कलकत्ता से प्रकाशित होने की सूचना मिलती है । लेकिन अपने शोध ग्रंथ में डॉ. रामरतन भटनागर ने उसके प्रकाशन को संदिग्ध माना है । ‘बंगदूदत’ के बंद होने के बाद 15 सालों तक हिंदी में कोई पत्र न निकला ।
बनारस अखबार वं सुधाकर – उत्तर-प्रदेश से गोविन्द नारायण थत्ते के सम्पादन में जनवरी, 1845 में ‘बनारस अखबार’ का प्रकाशनन आरंभ हुआ । इसके संचालक राजा शिव प्रसाद सितारेहिन्द थे । बहुत से लोग इसे ही हिंदी का पहला अखबार मानते हैं, परंतु यह हिंदी भाषी क्षेत्र का प्रथम समाचार पत्र माना जा सकता है । इसमें देवनागरी लिपि के प्रयोग के बावजूद अरबी व फारसी के शब्दों की भरमार थी, जिसे समझना साधारण जनता के लिए कठिन था। पंडित अंबिका प्रसाद वाजेपयी लिखतेहैं – ‘बनारस अखबार की निकम्मी भाषा का उत्तरदायित्व यदि किसी एक पुरुष पर है तो वे राजा शिव प्रसाद सिंह हैं ।’ 1850 में बनारस से ही तारा मोहन मैत्रेय के संपादन में ‘सुधाकर’ पत्र का प्रकाशन प्रारंभ हुआ । यह पत्र साप्ताहिक था तथा बंगला एवं हिंदी दोनों में प्रकाशित होता था । भाषा की दृष्टि से ‘सुधाकर’ को हिंदी प्रदेश का पहला पत्र कहना चाहिए । 1853 में यह पत्र सिर्फ हिंदी में छपने लगा। ‘बनारस अखबार’ एवं ‘सुधाकर’ के बाद ‘मार्तण्ड’ (11 जून, 1846), ज्ञान दीपक (1846), मालवा अखबार (1894), जगदीपक भास्कर (1849), सामदण्ड मार्तण्ड (1850), फूलों का हार (1850), बुद्धिप्रकाश (1852), मजहरुल सरुर (1852), ग्वालियर गजट (1853), आदि पत्र निकले । मुंशी सदासुखलाल के संपादन में आगरा से बुद्धि प्रकाश नामक यह पत्र पत्रकारिता के दृष्टि से ही नहीं वरन भाषा व शैली की दृष्टि से विशेष महत्व रखता है । प्रख्यात समालोचक आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने उसकी भाषा की प्रशंसा करते हुए लिखा है – “बुद्धि प्रकाश की भाषा उस समय की भाषा को देखते हुए बहुत अच्छी होती थी ।”
समाचार सुधावर्षण – अब धीरे-धीरे हिंदी पत्रों की संख्या बढ़ने लगी । लोगों की दृष्टि पत्रकारिता की ओर उन्मुख हुई । सन् 1854 में कलकत्ता से श्यामसुंदर सेन के संपादन में हिंदी के पहले दैनिक समाचार पत्र ‘समाचार सुधावर्षण’ का प्रकाशन हुआ । यह द्विभाषीय पत्र था, तथा हिंदी व बंगला में छपता था । अपनी निर्भीकता एवं प्रगतिशीलता के कारण उसे कई बार अंग्रेजी सरकार का कोपभाजन भी बनना पड़ा । 1855 में ‘सर्वहितकारक’ (आगरा) और ‘प्रजा हितैषी’ का प्रकाशन हुआ । 1857 में एकमात्र पत्र निकला जिसका नाम ‘पयामे आजादी’ था ।
पयामे आजादी – दिल्ली से फरवरी 1857 में प्रकाशित पयामे आजादी का प्रकाशन प्रसिद्ध क्रान्तिकारी अजीमुल्ला खां ने किया था । इसके प्रकाशक एवं मुद्रक नवाब बहादुर शाह जफर पौत्र केदार बख्त थे । यह पत्र पहले उर्दू में निकला, बाद में हिंदी में भी इसका प्रकाशन हुआ । इस पत्र में सरकार विरोधी सामग्री होती थी । इस पत्र ने दिल्ली की जनता में स्वतंत्रता प्रेम की आग फूंक दी । इसी पत्र में भारत का तत्कालीन राष्ट्रीय गीत छपा था, उसकी कुछ पंक्तियां इस प्रकार थीं –
“हम हैं इसके मालिक, हिंदुस्तान हमारा ।
पाक वतन है कौम का जन्नत से भी प्यारा ।।
आज शहीदों ने तुझको, अहले वतन ललकारा ।
तोड़ो गुलामी की जंजीरें, बरसाओ अंगारा ।।”

1861 में हिंदी प्रदेश से चार पत्र निकले जिनमें ‘सूरज प्रकाश’ (आगरा), ‘जगलाभ चिंतक’ (अजमेर), ‘प्रजाहित’ (इटावा), ‘ज्ञानदीपक’ (सिकंदरा) शामिल थे । इसके पश्चात 1863 में ‘लोकमित्र’ (मासिक), ‘भारत खंडामृत’ (1864 – आगरा), ‘तत्वबोधिनी’ (1866 – बरेली), ‘ज्ञान प्रदायिनी पत्रिका’ (1866 – लाहौर), आदि पत्र प्रकाशित हुए । अब तक हिंदी में छपने वाले पत्रों की संख्या पर्याप्त हो चली थी, पर पाठकाभाव, अर्थाभाव के चलते ये जल्द ही काल-कवलित हो जाते थे । 1867 में ‘कवि वचन सुधा’ का प्रकाशन एक क्रांतिकारी घटना थी । भारतेंदु हरीश चंद्र के संपादन में प्रकाशित इस पत्र ने हिंदी साहित्य व पत्रकारिता को नए आयाम दिए । डॉ. रामविलास शर्मा लिखते हैं – “कवि वचन सुधा क प्रकाशन कर भारतेंदु ने एक नए युग का सूत्रपात किया ।” 1867 में ‘कवि वचन सुधा’ के अलावा ‘वृतान्त विलास’ (जम्मू), ‘सर्वजनोपकारक’ (आगरा), रतन प्रकाश (रतलाम), विद्याविलास (जम्मू) का प्रकाशन हुआ ।
हिंदी पत्रकारिता का विकास काल (1867-1900)
1867 तक विदेशी शिक्षा के कारण परम्परावादी विचारधारा का लोप हो रहा था, अतः अनेक समाज सुधारकों ने अपनी संस्थाएं कायम की और इसी शिक्षित वर्ग ने पत्रकारिता को नई दिशा प्रदान की । हिंदी पत्रकारिता का यह युग हिंदी गद्य-निर्माण का युग माना जाता है । इस युग के पत्रों में राजनीति, साहित्य, प्रहसन, व्यंग्य तथा ललित निबन्धों की संख्या अधिक रहती थी । इन पत्रों का एकमात्र उद्देश्य सामाजिक, कलुष प्रक्षालन और जातीय उन्नयन था । इस युग का नेतृत्व बाबू हरिशचन्द्र कर रहे थे । यह समय अंग्रेज अधिकारियों की गुलामी का था, परन्तु भारतेंदु जी निडर भाव से राजनैतिक लेख लिखकर जनता-जनार्दन को झकझोर रहे थे । यही कारण है कि यह युग भारतेंदु युग के नाम से भी प्रसिद्ध है । इस युग में अनेक महत्वपूर्ण पत्रिकाओं का प्रकाशन हुआ ।

हरिश्चन्द्र मैगजीन – 15 अक्टूबर, 1873 को काशी से भारतेंदु हरिश चन्द्र ने ही ‘हरिश्चन्द्र मैगजीन’ को जन्म दिया । यह मासिक पत्रिका थी । इसमें पुरातत्व, उपन्यास, कविता, आलोचना, ऐतिहासिक, राजनीतिक, साहित्यिक तथा दार्शनिक लेख, कहानियाँ एवं व्यंग्य आदि प्रकाशित होते थे । लेकिन जब इसमें देशभक्तिपूर्ण लेख निकलने लगे तो इसे बंद कर दिया गया । ‘बाला-बोधिनी पत्रिका’ 9 जनवरी, 1874 को भारतेंदु ने निकाली । यह पत्रिका महिलाओं की मासिक पत्रिका थी ।
हिंदी प्रदीप – 1 सितम्बर, 1877 को बालकृष्ण भट्ट ने ‘हिंदी प्रदीप’ नाम का मासिक पत्र निकाला । यह पत्र घोर संकट के बावजूद भी 35 वर्षों तक निकलता रहा । भारतेंदु जी ने इस पत्र का उद्घाटन किया । पत्रकारिता की दृष्टि से हींदी प्रदीप का जन्म हिंदी साहित्य के इतिहास में क्रांतिकारी घटना है । इसने हिंदी पत्रकारिता को एक नई दिशा प्रदान की । इसका स्वर राष्ट्रीयता, निर्भीकता तथा तेजस्विता का था, अतः सरकार इर पर कड़ी नजर रखती थी । इसमे हिंदी साहित्य और पत्रकारिता पर सामग्री रहती थी ।
भारत मित्र - 17 मई, 1878 को कलकत्त से यह पत्र प्रकाशित हुआ । जिस समय यह पत्र प्रकाशित हुआ, उस समय वहां से हिंदी का कोई भी पत्र नहीं निकलता था । यह बड़ा प्रसिद्ध और कर्मशील पत्र था । भारत मित्र के कुशल संपादन के कारण इसकी गणना अच्छे पत्रों में होने लगी थी । भारत मित्र की सबसे पहले वैतनिक संपादक पंडित हरमुकुन्द शास्त्री लाहौर से बुलाए गए । इस पत्र की आयु काफी रही । यह पत्र 37 वर्षों तक चला ।
सार सुधानिधि – 13 अप्रैल, 1879 को प्रकाशित सार सुधानिधि पंडित सदानन्दजी के सम्पादन में निकला । इसके संयुक्त संपादक पंडित दुर्गाप्रसाद, सहायक संपादक गोविन्द नारायण और व्यवस्थापक शम्भूनाथ थे । इसकी भाषा संस्कृत मिश्रित थी, अतः कुछ कठिन होती थी, पर साफ थी । लेख अच्छे गंभीर होते थे । यह पत्र राजनीति ही नहीं, अन्य विषयों का भी आलोचक था । यह पत्र राजनीति ही नहीं, अन्य विषयों का भी आलोचक था ।
सज्जन कीर्ति सुधाकर – ज्यों से निकलने वाला पहला हिंदी पत्र था, क्योंकि राज्यों के सभी पत्र उर्दू व हिंदी में निकलते थे, जिनमें उर्दू का ही प्रथम स्थान होता था । मेवाड़ के महाराणा सज्जनसिंह के नाम पर यह पत्र निकला था, यह पत्र 1879 में आगरा के पंडित बंशीधर वाजपेयी के सम्पादन में प्रकाशित हुआ ।
उचित वक्ता – पंडित दुर्गाप्रसाद मिश्र ने 7 अगस्त, 1880 को उचित वक्ता को जन्म दिया । मीठी-मीठी कटारी मारने, व्यंग्य, मुंह चिढ़ाने में उचित वक्ता पंच का काम करता था । यह पत्र 15 वर्षों तक प्रकाशित हुआ । इसने इल्बर्ट बिल, प्रेस कानून, वर्नाक्यूलर एक्ट का बड़ी निर्भीकता से विरोध किया ।
भारत जीवन – बाबू रामकृष्ण वर्मा ने काशी से 3 मार्च 1884 को भारत जीवन प्रकाशित किया । यह पहले चार पृष्ठ का था, बाद में 8 पृष्ठों में छपने लगा । इसका वार्षिक मूल्य डेढ़ रुपया था । यह पत्र 30 वर्षों तक प्रकाशित हुआ । भारत जीवन सदा एक दब्बू अखबार रहा । स्वाधीनता पूर्व साहस से इसने कभी नहीं लिखा ।
हिन्दोस्थान – 1885 में राजा रामपाल सिंह लन्दन से इसे कालाकांकर (प्रतापगढ़) ले आए और यहां इसके हिंदी, अंग्रेज संस्करण प्रकाशित होने लगे । यह उत्तर प्रदेश से महामना पंडित मदनमोहन मालवीय के संपादन में निकला । यह हिंदी क्षेत्र से प्रकाशित होने वाला प्रथम संपूर्ण हिंदी दैनिक पत्र था । इसके सहयोगी नवरतन प्रसिद्ध थे ।
शुभचिन्तक – 1887 में जबलपुर से पंडित रामगुलाम अवस्थी के समपादन में शुभ-चिन्तक पत्र निकला । यह पत्र साप्ताहिक था । बाद में इसके संपादक हितकारिणी स्कूल के हैटमास्टर रायसाहब रघुवरप्रसाद द्विवेदी हो गए ।
हिंदी बंगवासी – हिंदी बंगवासी 1890 में कलकत्ता से पंडित अमृतलाल चक्रवर्ती के सम्पादन में निकला । यह एकदम नए ढंग का अखबार था । इस पत्र का अपना ऐतिहासिक महत्व है, क्योंकि सभी श्रेष्ठ पत्रकारों ने इसका सम्पादन कार्य किया था । जिनमें सर्वश्री बालमुकुन्द गुप्त, बाबूराव विष्णु पराड़कर, अम्बिका प्रसाद वाजपेयी, लक्ष्मीनारायण गर्दे आदि प्रमुख थे । यह पत्र दीर्घजीवी रहा । इस प्रकार यह पत्र हिंदी के वरिष्ठ पत्रकारों का प्राथमिक विद्यालय सिद्ध हुआ ।
साहित्य सुधानिधि – हिंदी बंगवासी के बाद मुजफ्फरपुर से जनवरी 1893 को बाबू देवकीनन्दन खत्री ने साहित्य सुधानिधि का प्रकाशन किया । इसके सम्पादक मण्डल में बड़े-बड़े साहित्यकार – बाबू जगन्नाथदास रत्नाकर, बाबू राधाराम, राय कृष्णदास, बाबू कीर्तिप्रसाद धे ।
नागरी प्रचारिणी पत्रिका – यह पत्रिका 1896 में नागरी प्रचारिणी सभा ने त्रैमासिक रूप में प्रकाशित की थी । इसके सम्पाक बाबू श्यामसुन्दर दास, महामहोपाध्याय सुधाकर द्विवेदी, कालीदास और राधाकृष्ण दास थे । 1907 में यह मासिक पत्रिका हो गई और इसके सम्पादक श्यामसुन्दर दास, रामचन्द्र शुक्ल, रामचन्द्र शर्मा और वेणीप्रसाद बनाए गए ।
हिंदी पत्रकारिता का उत्थान काल (1900-1947)
सरस्वती – सन 1900 का वर्ष हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में महत्वपूर्ण है । 1900 में प्रकाशित सरस्वती पत्रिका अपने समय की युगान्तरकारी पत्रिका रही है । वह अपनी छपाई, सफाई, कागज और चित्रों के कारण शीघ्र ही लोकप्रिय हो गई । इसे बंगाली बाबू चिन्तामणि घोष ने प्रकाशित किया था तथा इसे नागरी प्रचारिणी सभा का अनुमोदन प्राप्त था । इसके सम्पादक मण्डल में बाबू राधाकृष्ण दास, बाबू कार्तिका प्रसाद खत्री, जगन्नाथदास रत्नाकर, किशोरीदास गोस्वामी तथा बाबू श्यामसुन्दरदास थे । 1903 में इसके सम्पादन का भार आचार्य महावर प्रसाद द्विवेदी पर पड़ा । इसका मुख्य उद्देश्य हिंदी-रसिकों के मनोरंजन के साथ भाषा के सरस्वती भण्डार की अंगपुष्टि, वृद्धि और पूर्ति करन था । इस प्रकार 19वी शताब्दी में हिंदी पत्रकारिता का उद्भव व विकास बड़ी ही विषम परिस्थिति में हुआ । इस समय जो भी पत्र-पत्रिकाएं निकलती उनके सामने अनेक बाधाएं आ जातीं, लेकिन इन बाधाओं से टक्कर लेती हुई हिंदी पत्रकारिता शनैः-शनैः गति पाती गई ।

हिंदी पत्रकारिता का उत्कर्ष काल (1947 से प्रारंभ)
अपने क्रमिक विकास में हिंदी पत्रकारिता के उत्कर्ष का समय आजादी के बाद आया । 1947 में देश को आजादी मिली । लोगों में नई उत्सुकता का संचार हुआ । औद्योगिक विकास के साथ-साथ मुद्रण कला भी विकसित हुई । जिससे पत्रों का संगठन पक्ष सुदृढ़ हुआ । रूप-विन्यास में भी सुरूचि दिखाई देने लगी ।

आजादी के बाद पत्रकारिता के क्षेत्र में अपूर्व उन्नति होने पर भी यह दुख का विषय है कि आज हिंदी पत्रकारिता विकृतियों से घिरकर स्वार्थसिद्धि और प्रचार का माध्यम बनती जा रही है । परन्तु फिर भी यह निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि भारतीय प्रेस की प्रगति स्वतंत्रता के बाद ही हुई ।
यद्यपि स्वातंत्र्योत्तर पत्रकारिता ने पर्याप्त प्रगति कर ली है किन्तु उसके उत्कर्षकारी विकास के मार्ग में आने वाली बाधाएं भी कम नहीं हैं । पत्रकारिता एक निष्ठापूर्ण कर्म है और पत्रकार एक दायित्वशील व्यक्ति होता है । अतः यदि हमें स्वच्छ पत्रकारिता को विकसित करना है तो पत्रकारिता के क्षेत्र में हुई अनधिकृत घुसपैठ को समाप्त करना होगा, उसे जीवन मूल्यों से जोड़ना होगा, उसे आचरणिक कर्मों का प्रतीक बनाना होगा और प्रचारवादी मूल्यों को पीछे धकेल कर पत्रकारिता को जीवन, समाज, संस्कृति और कला का स्वच्छ दर्पण बनाना होगा, पत्रकारिता के क्षेत्र में कार्यरत व्यक्तियों को अतीत से शिक्षा लेकर वर्तमान को समेटते हुए भविष्य का दिशानिर्देशन भी करना चाहिए ।
स्वतंत्रता प्राप्ति के आसपास यानी दो-चार वर्ष आगे-पीछे कई दैनिक, साप्ताहिक पत्र पत्रिकाओं का प्रकाशन हुआ । जिसमें कुच तो निरंतर प्रगति कर रही हैं तथा कुछ बंद हो गई हैं ।
प्रमुख पत्रों में नवभारत टाइम्स (1947), हिन्दुस्तान (1936), नवभारत (1938), नई दुनिया (1947), आर्यावर्त (1941), आज (1920), इंदौर समाचार (1946), जागरण (1947), स्वतंत्र भारत (1947), युगधर्म (1951), सन्मार्ग (1951), वीर-अर्जुन (1954), पंजाब केसरी (1964), दैनिक ट्रिब्यून, राजस्थान पत्रिका (1956), अमर उजाल (1948), दैनिक भास्कर (1958), तरूण भारत (1974), नवजीवन (1974), स्वदेश (1966), देशबंधु (1956), जनसत्ता 1903), रांची एक्सप्रेस, प्रभात खबर आदि शामिल हैं ।इसमें तरूण भारत और युगधर्म का प्रकाशन बंद हो चुका है । शेष निरन्तर प्रगति कर रहे हैं । साप्ताहिक पत्रों में ब्लिट्ज (1962), पाञ्चजन्य (1947), करंट, चौथी दुनिया (1986), संडे मेल (1987), संडे आब्जर्वर (1947), दिनमान टाइम्स (1990) प्रमुख रहे । इनमें से पाञ्चजन्य के अलावा सभी बंद हो चुके हैं । प्रमुख पत्रिकाओं में धर्मयुग (1950), साप्ताहिक हिन्दुस्तान (1950), दिनमान (1964), रविवार (1977), अवकाश 1982), खेल भारती (1982), कल्याण (1926), माधुरी (1964), पराग (1960), कादम्बिनी (1960), नन्दन (1964), सारिका (1970), चन्दामा (1949), नवनीत (1952), सरिता (1964), मनोहर कहानियां (1939), मनोरमा (1924), गृहशोभा, वामा, गंगा (1985), इंडिया टुडे (1986), माया हैं । इनमें से दिनमान, रविवार, अवकाश, पराग, गंगा, माधुरी अब बंद हो चुकी हैं । इनमें से दिनमान ने नई प्रवृत्तियां प्रारंभ की थी । अतिथि सम्पादक की परम्परा प्रारम्भ की, जिसमें कई राजनेता, साहित्यकार व कलाप्रेमी अतिथि सम्पादक बने । वहीं रविवार खोजपूर्ण रिपोर्टिंग के लिए विख्यात रहा है ।

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