सोमवार, 20 अगस्त 2012

भारत में सबसे ज्यादा पत्रकारों की हत्या 1997 में हुई



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समाचार4मीडिया.कॉम ब्यूरो
‘कमेटी फॉर प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट’ की द्वारा जारी किए गए, आकंड़ों के अनुसार 18 सालों के दौरान यानी 1992 से अब तक भारत में, सबसे ज्यादा पत्रकारों की मौत साल 1997 में हुई है। इस साल में 7 पत्रकारों की मौत, ऑन स्पोर्ट हुई। इन 18 सालों में, दुनिया भर में हुई, पत्रकारों में मौत में, भारत का स्थान आठवें नंबर पर है जबकि, ईराक पहले नंबर पर है। इस अवधि के दौरान, साल 1997 में सबसे ज्यादा 7 सात पत्रकारों की मौत हुई।
सन 2010 में इलाहाबाद में, ‘इंडियन एक्सप्रेस’ के वरिष्ठ संवाददाता, विजय प्रताप सिंह की 20 जुलाई को एक बम धमाके में मौत हो गई थी। इस धमाके के पीछे, कुछ राजनीतिज्ञ पार्टियों का हाथ बताया जा रहा है। वहीं साल 2009 में किसी पत्रकार की मौत होने के आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। साल 2008 के आंकड़ों को देखें तो, इस साल में 4 पत्रकारों की मौत हुई थी। ‘हिन्दुस्तान’ के रिपोर्टर, विकास रंजन की बिहार के समस्तीपुर के रोसैया में गोली मारकर 25 नवंबर को हत्या कर दी गई थी। इन्होंने क्राइम और करप्शन पर कुछ स्टोरियां फाइल की थी उसी के बाद इन्हें लगातार धमकियां मिल रही थी। दूसरे, श्रीनगर के लोकल न्यूज़ चैनल, ‘चैनल-9’ के वीडियो जर्नलिस्ट, जावेद अहमद मीर की मौत सुरक्षा कर्मियों की गोली की चपेट में आने से हो गई। वे, एक विरोध रैली को कवर कर रहे थे। साल 2008 में ही, कश्मीर के स्थानीय अंग्रेजी अखबार, ‘डेली इक्सेल्सीअर’ के साथ बतौर, फोटो जर्नलिस्ट काम कर रहे अशोक सोढ़ी की क्रॉसफायर के दौरान मौत हो गई। पुलिस का कहना था कि इनकी हत्या आतंकवादियों ने की है। ‘असमिया प्रतिदिन’ के रिपोर्टर, मोहम्मद मुस्लिमुद्दीन की असम के बरपुखुरी में छह हथियारबंद हमलावरों ने 1 अप्रैल को हत्या कर दी। इन्होंने, क्रिमनल और गैरकानूनी ड्रग ट्रेड पर एक लेख लिखा था। उसके, एक सप्ताह के अंदर ही उनकी हत्या कर दी गई। उनकी हत्या के आरोप में 3 लोगों को गिरफ्तार किया गया था।
साल 2006 में ‘असमिया खबर’ अखबार के रिपोर्टर, प्रहलाद गोला द्वारा भ्रष्टाचार पर लेख की एक सीरिज लिखने पर उनकी हत्या 6 जनवरी को असम के गोलाघाट पर कर दी गई। वे, अपने घर के नजदीक बाइक चला रहे थे तभी एक ट्रक आया और उन्हें रौंदकर चला गया। उन्हें, कई बार धमकियां भी मिली थीं। उनकी हत्या के विरोध में, गुवाहाटी में स्थानीय पत्रकारों ने विरोध प्रर्दशन भी किया था।
साल 2005 में किसी भी पत्रकार की हत्या के आंकड़े मौजूद नहीं है। वहीं, 2004 में दो पत्रकारों की हत्या कर दी गई थी। पहला, कश्मीर में फ्रीलांसर, अशिया जिलानी जो कई अखबारों में अपनी सेवाएं दे रहे थे और एक एनजीओ और ह्यूमन राइट एक्टिविस्ट के तौर पर भी काम कर रहे थे। वे, एक बम ब्लास्ट में मारे गये थे। दूसरे, तमिल भाषा के ‘आंध्र प्रभा’ के स्टाफ संवाददाता, वीराबोईन यादगिरी जिन्होंने गैरकानूनी तरीके से बिक रही दारू पर एक लेख लिखा तो उनकी हत्या कर दी गई थी। उन्होंने, इस लेख में इससे होने वाले नुकसान और बिक्री में शामिल स्थानीय नेताओं का जिक्र किया था। उन्हें, इसके लिए कई बार धमकियां भी मिली थी। जिसकी उन्होंने पुलिस रिपोर्ट भी दर्ज कराई थी। साल 2003 में केवल एक ही पत्रकार की हत्या हुई। इस साल में एनएएफए (न्यूज़ सर्विस और फीचर एजेंसी) चलाने वाले परवेज मोहम्मद सुल्तान की अज्ञात बंदूकधारी ने हत्या कर दी थी। उनके ऑफिस में 31 जनवरी दो लोग पहुंचे बातचीत के बाद उनमें से एक ने उनको गोली मार दी। उनकी न्यूज़ एजेंसी ने इंवेस्टीगेशन स्टोरी और कॉलम उपलब्ध करवाती थी।
साल 2002 में हरियाणा के सिरसा जिले में राम चंद्र छत्रपति की हत्या कर दी गई थी। वे सिरसा के अखबार, ‘पूरा सच’ के संपादक की भूमिका निभा रहे थे। उन्होंने सिरसा के धार्मिक ग्रुप, डेरा सच्चा के खिलाफ, ‘सेक्सुअल शोषण’ पर एक स्टोरी प्रकाशित की थी। जिसको लेकर 24 अक्टूबर को उन्हें गोली मार दी गई थी। बाकी पत्रकारों को भी डेरा सच्चा सौदा की ओर से धमकियां दी गई थी।
उत्तरप्रदेश के झांसी जिले में भी 30 जुलाई 2001 को फ्रीलांसर पत्रकार, मूलचंद यादव कि हत्या कर दी गई थी। ये फ्रीलांसर के तौर पर, ‘पंजाब केसरी’ और ‘जनसत्ता अखबार’ को अपनी सेवाएं देते थे। इन्होंने, दो स्थानीय भू-माफिया के भ्रष्टाचार का खुलासा किया था। 
साल 2000 में ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ के फोटो जर्नलिस्ट, प्रदीप भाटिया की मौत एक बम अटैक में हो गई थी। इन्हीं के साथ और 6 पत्रकारों की मौत हुई थी। इस हमले की जिम्मेवारी हिजबुल मुजाहिद्दिन ने ली और इसने उनकी मौत पर खेद भी जताया। उनका कहना था कि हमारा लक्ष्य प्रेस पर्सन की हत्या नहीं था बल्कि हमारा उद्देश्य भारतीय फौज को नुकसान पहुंचाना था।
साल 1997 को देखें तो यह पत्रकार बिरादरी के लिए सबसे खराब साल रहा क्योंकि इस साल सात पत्रकारों की हत्या कर दी गई थी। इनमें से, पांच पत्रकार तो ‘ईनाडू ग्रुप’ (ईटीवी) से जुड़े हुए थे। ईटीवी के प्रोड्यूसर, जगदीश बाबू, वीडियो जर्नलिस्ट गंगाधर राजू, सहायक कैमरामैन श्रीनिवास राव और एस कृष्णा और सहायक, राजा शेखर एक कार बम धमाके में मारे गये थे। वे एक फिल्म को कवर करने जा रहे थे। यह हमला किसी राजनीतिक पार्टी के इशारे पर किया गया था। यह हमला 19 नवंबर को किया गया था। इसी साल में, ‘दूरदर्शन’ के दो पत्रकार, सैदान सैफी और अल्ताफ अहमद फकतू की हत्या कर दी गई थी। शैफी की हत्या 16 मार्च को दो बंधूकधारियों द्वारा की गई थी। इसमें उनका व्यक्तिगत गार्ड भी मारा गया था। ‘साप्ताहिक कश्मीर’ फाइल नाम से एक शो आता था और रात में, पांच मिनट का न्यूज़ कैपसूल, ‘आई-विटनेस’ आता था। इस शो में, कश्मीर में अलगाववादियों पर कई रिपोर्टस दिखाई गई थी जिसके बाद उन्हें लगातार धमकियां दी गई। अलगाववादियों ने ही उनकी हत्या कर दी थी। वहीं, श्रीनगर , ‘दूरदर्शन’ के स्टेशन एंकर, फकतू की भी हत्या अलगावादियों द्वारा 1 जनवरी को कर दी गई थी। उन्हें 1994 में आतंकवादियों ने अपहरण भी कर लिया था। उन्होंने अलगाववादी आंदोलन को कवर किया था।
साल 1996 में, ‘असमिया प्रतिदिन’ के एडिटर-इन-चीफ, पराग कुमार दास की 17 मई को गुवाहटी में हत्या कर दी गई थी। जब वो अपने बच्चे को स्कूल से ला रहे थे। वहीं 10 अप्रैल को उर्दू अखबार, ‘रहनुमा-ए-कश्मीर’ और अंग्रेजी साप्ताहिक, ‘सैफरोन टाइम्स’ के एडिटर, गुलाम रसूल शेख की लाश झेलम नदी से मिली थी। उन्होंने, अपने एरिया में हो रही मौतों और आगजनी की घटनाओँ पर एक खबर लिखी थी। उसी को लेकर, उसकी हत्या कर दी गई थी यह पुलिस का मानना है। 
10 सितंबर 1995 को श्रीनगर में, फोटो जर्नलिस्ट, मुस्ताक अली, 29 अगस्त 1994 को फ्रीलांसर पत्रकार, गुलाम मुहम्मद लोन, 22 मई 1993 में बड़ौदा के संदेश अखबार, के रेजिडेंट एडिटर, दिनेश पाठक, 13 जनवरी 1993 को हिंदी समाचार के स्टिंगर और पंजाब और चंडीगढ़ के पत्रकारिता कौंसिल के अध्यक्ष, भोला नाथ मासूम, 18 मई 1992 को पटियाला के ‘आल इंडिया रेडियो स्टेशन’ के डायरेक्टर एम.एल.मनचंदा की बब्बर खालसा के द्वारा और 3 जनवरी 1992 में ‘डेली अजित’ के रिपोर्टर की पुलिस कस्टडी में हत्या कर दी गई थी।
(ये सभी आंकड़े कमेटी फॉर प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट द्वारा जारी किये गए हैं।)

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