सोमवार, 23 जुलाई 2012

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चक्रव्‍यूह में फंसाये गये यशवंत, उन्‍हें निकालना जरूरी है
[1 Jul 2012 | 26 Comments | ]
चक्रव्‍यूह में फंसाये गये यशवंत, उन्‍हें निकालना जरूरी है

अविनाश ♦ खबर में जितने भी आरोप गिनाये गये हैं, यकीनन उनमें से साठ फीसदी झूठ है, होगा। जिन चालीस फीसदी आरोपों के सच होने की सूरत बनती है, वह शर्तिया शराबनोशी के आलम में किया गया जुर्म होगा। यशवंत को शराब पीकर आपा खोने के मामले में ऐसी एक जोरदार ठोकर मिलनी उनके लिए ही जरूरी थी, पर इस मामले में मुझे कुछ और चीजों की भी गंध आ रही है। मुझे नहीं मालूम कि कानून इस पूरे मामले को कैसे देखेगा, लेकिन हम इस मामले को ऐसे देखते हैं कि सांस्‍थानिक मीडिया के खिलाफ व्‍यक्ति-संचालित मीडिया की मुहिम को खत्‍म करने की साजिश के तहत यशवंत को चक्रव्‍यूह में फंसाया गया है। अपने मूर्खतापूर्ण अहंकार के चलते यशवंत आसानी से उस चक्रव्‍यूह की तरफ दौड़ पड़े।
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भारतीय लोकतंत्र, जनाधिकार और पत्रकारिता की हालत
[28 Jun 2012 | One Comment | ]
भारतीय लोकतंत्र, जनाधिकार और पत्रकारिता की हालत

भूपेन सिंह ♦ हेम की मौत के बाद उनके हम-ख्याल पत्रकारों ने मिलकर हेम चंद्र पांडे मेमोरियल कमेटी बनायी थी। तब हमने तय किया था कि हेम के आदर्शों को जिंदा रखने के लिए हर साल उनके शहादत दिवस पर एक व्याख्यान करवाएंगे। इस बहाने भारतीय समाज, राजनीति और पत्रकारिता के रिश्तों पर बात की जाएगी और बेहतर समाज का विकल्प तलाशने की कोशिश भी जारी रहेगी। इस बार दूसरा हेम स्मृति व्याख्यान होना है। पहला व्याख्यान वरिष्ठ पत्रकार और लेखक सुमंता बनर्जी ने दिया था। उन्होंने पत्रकारिता और जन-पक्षधरता पर बात करते हुए कहा था कि “हेम एक्टिविस्ट पत्रकारों की उस परंपरा में आते हैं, जो जॉन रीड, एडगर स्नो, जैक बेल्डेन, हरीश मुखर्जी, ब्रह्मा बंधोपाध्याय से लेकर सरोज दत्त तक फैली है…”
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फिलहाल हम हार गये हैं, लेकिन फिर भी हम लड़ेंगे साथी
[3 Jun 2012 | 6 Comments | ]
फिलहाल हम हार गये हैं, लेकिन फिर भी हम लड़ेंगे साथी

आलोक दीक्षित ♦ दुनियाभर में इंटरनेट को डेवलप करने वाली कंपनियों और आईटी एक्सपर्ट्स ने इसे ओपेन और एक्सेसबल बनाते हुए खुद भी नहीं सोचा होगा कि यह इंसान और इंसानी दुनिया के इतने आयामों को अपने आगोश में ले लेगा। फिलहाल जब इंटरनेट की कमान किसी एक देश या एक शक्ति के हाथ में नहीं है, दुनिया भर के अलग अलग देशों में यह समाज, शिक्षा, निजी क्षेत्रों, सेल्फ स्टैंडर्ड्स के डेवलपमेंट के साथ साथ आपसी सहयोग के तमाम पत्थर गाड़ता जा रहा है। खुले और स्वैक्षित नेट के ही ये सारे वरदान हैं। इसके विपरीत आईटीयू के होते सिविल सोसाइटी की भागीदारी में तमाम बाधाएं आएंगी।

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सिंहासन खाली करो कि जनता आती है #SocialMedia
[31 May 2012 | No Comment | ]
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है #SocialMedia

ओसामा मंज़र ♦ सोशल मीडिया सही अर्थो में पत्रकारिता नहीं है, फिर भी विभिन्न डिजिटल माध्यमों ने सूचना के महत्व और उसके लोकतंत्र को मजबूत किया है। राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की सदस्य अरुणा रॉय ने हाल ही में इंटरनेट अधिकारों पर आयोजित एक बहस के दौरान कहा था कि ‘इंटरनेट एक जटिल, मगर बेहद उपयोगी माध्यम है, जो पारंपरिक मीडिया के सनसनी फैलाने व पीत पत्रकारिता की प्रवृत्ति को दुरुस्त करने की क्षमता रखता है।’ मेरी निगाह में मीडिया और पत्रकारिता के आगे पिछले दो दशक में जो सबसे गंभीर चुनौती रही है, वह यही कि अब हम श्रोता, पाठक या दर्शक नहीं रहे। आज का आम नागरिक एक लेखक, पत्रकार और प्रस्तोता की तरह ही ताकतवर हो गया है।
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बिहार का मतलब सिर्फ नालंदा जिला नहीं है नीतीश कुमार जी
[29 May 2012 | 2 Comments | ]
बिहार का मतलब सिर्फ नालंदा जिला नहीं है नीतीश कुमार जी

नवनीत नीरव ♦ विकास होना चाहिए, मैं भी मानता हूं। विकास संबंधित सारे स्कीम्स भी ढंग से लागू हों। नालंदा जिले में बदलाव भी आये हैं। पर इतनी सारी सुविधाओं के हिसाब से वे नाकाफी हैं। मसलन जिले के चंद किसानों को ही सुविधाएं मिलती हैं। अन्य के लिए कोई विशेष व्यवस्था नहीं है। अप्रैल महीने में ही मैंने लगभग पंचायतों का दौरा किया था। शुद्ध पेय जल की समस्या आने वाले समय में विकराल रूप धारण कर सकती है। कुछ क्षेत्र फ्लोराइड प्रभावित क्षेत्रों में आते हैं। एक दो पंचायत तो ऐसे रहे, जहां के सारे स्कूलों के हैंडपंप फ्लोराइड प्रभावित हैं और कोई फिल्टर की व्यवस्था नहीं है। आखिरकार स्कूलों में ग्रीष्म अवकाश घोषित हो गया, पर अभी तक उन हैंड पंप्स की स्थिति न सुधरी।
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गैर क्‍या जानिए क्‍यों मुझको बुरा कहते हैं? #Anantar
[28 May 2012 | 3 Comments | ]
गैर क्‍या जानिए क्‍यों मुझको बुरा कहते हैं? #Anantar

ओम थानवी ♦ न्यूयॉर्क में हुए आठवें विश्व हिंदी सम्मेलन की कार्यसमिति का मैं भी एक सदस्य था। उस वक्त भाजपा की नहीं, मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार थी, जो वाम मोर्चे के बाहरी समर्थन से चल रही थी। एक सीपीएम सांसद – जो मेरे भी मित्र हैं – के हवाले से तत्कालीन विदेश राज्यमंत्री आनंद शर्मा ने जनवादी लेखक संघ के चंचल चौहान और ‘सहमत’ के एमके रैना का नाम आखिरी दौर में अमेरिका जाने वालों की सूची में जुड़वाया था। हैरानी है कि न्यूयॉर्क सम्मेलन के पीछे भाजपा का नाम लेकर मंगलेश यहां भी ‘त्याग’ का पुण्य कमाना चाहते हैं। तो चंचल चौहान के खाते में ‘पाप’ जाएगा?

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न उनकी रस्म नयी है न अपनी रीत नयी #SupportPiracy
[26 May 2012 | 3 Comments | ]
न उनकी रस्म नयी है न अपनी रीत नयी #SupportPiracy

अभिनव आलोक ♦ को ब्‍लॉक करने के इंडियन इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर्स के मूर्खतापूर्ण फैसले के विरोध में मैं अपने एक दोस्त (Amit Mishra) के सहयोग से 1981 में बनी Krzysztof Kieślowski की फिल्म Blind Chance (Polish: Przypadek) डाउनलोड कर रहा हूं। मेरे दोस्त जो कि जापान में रहते है, उन्होंने इस फिल्म के टोरेंट को डाउनलोड कर मुझे ई-मेल कर दिया और अब मैं उस टोरेंट के इस्तेमाल से पूरी फिल्म सफलतापूर्वक डाउनलोड कर रहा हूं। मैं अभी फैज़ की ये पंक्तियां गुनगुना सकता हूं… यूं ही हमेशा उलझती रही है जुल्म से खल्‍क | न उनकी रस्म नयी है, न अपनी रीत नयी | यूं ही हमेशा खिलाये हैं हमने आग में फूल | न उनकी हार नयी है न अपनी जीत नयी!
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कॉरपोरेट कंपनियों के पे रोल पर खड़ा है भारतीय मीडिया!
[19 May 2012 | 2 Comments | ]
कॉरपोरेट कंपनियों के पे रोल पर खड़ा है भारतीय मीडिया!

रामचंद्र गुहा ♦ पत्र-पत्रिकाएं कंपनियों के दिए हुए प्रचार के पर्चे इस तरह छापते हैं, जैसे वे निष्पक्ष खबरें हों। कई अखबारों ने तो बड़ी कंपनियों के साथ सुविधाजनक खबरों के बदले कंपनी के शेयर हासिल करने के समझौते किये हैं। पेड न्यूज तो एक सीधा, बल्कि खुला मीडिया भ्रष्टाचार है। निजी कंपनियां खबरों को बहुत महीन तरीके से भी तोड़ती-मरोड़ती हैं। 80 के दशक में चिपको और नर्मदा बचाओ आंदोलन काफी लोकप्रिय हुए थे, तब पर्यावरण के मुद्दों पर मीडिया कवरेज की बाढ़ आ गयी थी। अनिल अग्रवाल, कल्पना शर्मा, उषा राय, डेरिल डिमोंटे जैसे प्रतिभाशाली पत्रकारों ने पर्यावरण और उसके सामाजिक-आर्थिक पहलुओं पर बहुत लिखा। उदारीकरण के बाद कई अखबारों ने शायद विज्ञापनदाताओं के दबाव में पर्यावरण रिपोर्टिंग कम कर दी।
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ओह, कितने संवेदनशील हैं पी चिदंबरम!
[19 May 2012 | One Comment | ]
ओह, कितने संवेदनशील हैं पी चिदंबरम!

संपादकीय, हिंदुस्‍तान ♦ गृहमंत्री पी चिदंबरम ने जब लोकसभा में ‘हम रउआ सबके भावना समझतानी’ वाक्य कहा, तो यकीनन इसने करोड़ों लोगों के मर्म को छू लिया। और यह जरूरी नहीं कि गृह मंत्री के इस सदाशयी अंदाज के सिर्फ भोजपुरीभाषी ही कायल हुए हों, बल्कि भारतीय मानस की बुनावट ही ऐसी है कि जब भी कोई समन्वयवादी पहल होती है, तो वह दिल खोलकर उस पहल का स्वागत करता है। फिर हमारे जैसे बहुभाषी और बहुधार्मिक समाज में यह सामंजस्य ही तो वह तंतु है, जो हमें एक राष्ट्र के रूप में पिरोता है। बहरहाल, गृह मंत्री अपना दायित्व निभा रहे थे और उन्हें इस बात का पूरा इलहाम था और है कि भोजपुरी भाषा देश-विदेश के करोड़ों लोगों के दिलों में बसती है।
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मेरे शब्‍द उस दीये में तेल की जगह जलना चाहते हैं! #Pash
[14 May 2012 | 31 Comments | ]
मेरे शब्‍द उस दीये में तेल की जगह जलना चाहते हैं! #Pash

ओम थानवी ♦ कुछ अखबारों में आतंकवादियों की तरफ से मिलने वाली विज्ञप्तियां और आपत्तिजनक विज्ञापन प्रमुखता से छपने लगे। पंजाब सरकार ने अखबारों को एक धमकी भरी हिदायत जारी की। उसका असर पड़ा। इस पर आतंकवादियों ने नया दांव खेला। डॉ सोहन सिंह के नेतृत्व वाली पंथक कमेटी (जो पांच प्रमुख आतंकवादी गुटों का समूह थी) ने पूरे मीडिया के लिए एक ‘आचार संहिता’ जारी की। आतंकवादियों को खबरों में आतंकवादी, उग्रवादी आदि की जगह ‘मिलिटैंट, खालिस्तानी सेनानी या खालिस्तानी मुजाहिद्दीन’ लिखने का निर्देश था। इसी तरह, भिंडरावाले के नाम से पहले संत लिखना जरूरी था। पंथिक कमेटी के साथ पाकिस्तान स्थित लिखने की मनाही थी।

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