बुधवार, 25 जुलाई 2012

प्रभाष जोशी के संपादक काल

प्रभाष जोशी कितना भी कोशिश कर लें प्रभाष जोशी के संपादक काल की तुलना आप दूसरे समकालीन संपादकों के काल और कर्म से करना चाहें तो राजेन्द्र माथुर के बाद तीसरा नाम सामने नहीं आता। चयन की कसौटियां हैं – उनके संपादकत्व में निकले अखबार का प्रभाव, संपादकीय-पत्रकारीय लेखन की गुणवत्ता, वृहत्तर हिन्दी जगत में अखबार और संपादक दोनों का स्थान और समकालीन हमपेशाओं का आकलन। यह भी कि यह तुलना तथाकथित राष्ट्रीय यानी दिल्ली से निकलने वाले और हिन्दी क्षेत्र के बड़े अखबारों के संपादकों के बीच है। पत्रिकाओं के संपादकों को भी शामिल किया जा सकता था लेकिन शायद उस काल में रविवार और दिनमान की अपने पुराने संपादकों सुरेन्द्र प्रताप सिंह और रघुवीर सहाय के बाद वह श्री और तेज नहीं बचे थे।
यूं तो उस समय दैनिक हिन्दुस्तान भी था दिल्ली में, पंजाब केसरी था, नवभारत टाइम्स और जनसत्ता के साथ साथ। आस पास के इलाकों से निकलते और प्रांतीय स्तर पर खूब मजबूत जागरण, भास्कर, अमर उजाला, नई दुनिया, राजस्थान पत्रिका आदि थे। लेकिन पंजाब केसरी की बात करना बेमानी होगा, वह व्यावसायिक, मुख्यधारा की पत्रकारिता की धारा से बाहर अपनी अकेली ही श्रेणी में चलने-जीने वाला अखबार है इसलिए इस गिनती से बाहर है। बाकी जागरण, भास्कर, राजस्थान पत्रिका और राजेन्द्र माथुर के बाद नई दुनिया भी मालिक-संपादक वाले अखबार रहे हैं और उन्होंने बड़े संपादक तो दूर हिन्दी को बड़े पत्रकार देने की भी जरूरत नहीं समझी। बाद में भास्कर ने श्रवण गर्ग को संपादक, समूह संपादक बनाया जरूर लेकिन यह हम जानते हैं कि बड़े संपादकीय निर्णय मालिक और प्रबंधक ही लेते रहे हैं वहां। अकेला हरिवंश के नेतृत्व में झारखंड का प्रभात खबर है जिसने इन वर्षों में अपने काम, उत्कृष्टता, सामाजिक सक्रियता और प्रामाणिकता में अपने संसाधनों-प्रसार से कई गुना बड़ा मानक स्थापित किया।
हम नहीं जानते राजेन्द्र माथुर को भी प्रभाष जी जितना लंबा जीवन और खेलने के लिए इतनी लंबी पारी मिली होती तो क्या होता…तब हिन्दी पत्रकारिता कैसी होती? उसका समकालीन इतिहास कैसे अलग और कितना बेहतर होता? सिवा इसके कि हिन्दी पत्रकारिता तब कहीं ज्यादा रोशन, मजबूत, शक्तिशाली और श्रेष्ठ होती। लेकिन उनके अकाल देहावसान के बाद 2009 तक हिन्दी पत्रकारिता के आकाश में एक ही सूर्य अप्रतिहत दीप्ति के साथ अपनी कीर्ति और तेजस्विता में दमकता रहा। अंततः अपने सारे संकोच के साथ आप अगर पिछले तीन दशकों में किसी एक पत्रकार-संपादक के साथ महान शब्द लगा सकते हैं तो वह हैं प्रभाष जोशी।

ऐसा नहीं कि इस दौरान प्रभाष जी और उनके जनसत्ता पर बादल नहीं घिरे। सती प्रकरण पर जनसत्ता के संपादकीय और उसके प्रभाष जी द्वारा बचाव पर घनघोर विवाद हुआ। प्रदर्शन हुए। आज भी वह उनके यश पर एक प्रश्नचिन्ह के रूप में कई लोगों को लटका दिख सकता है। बाबरी विध्वंस से पहले उनपर और जनसत्ता पर हिन्दुत्व समर्थक रिपोर्टिंग के आरोप लगे। हालांकि यह याद रखना यहां जरूरी है कि जनसत्ता की संपादकीय टिप्पणियों पर यह कभी नहीं कहा जा सका।
उन्हें परंपरामुग्ध ब्राम्हणवादी भी कहा गया। अपने स्तंभ कागद कारे के कारण उन्हें अतिपारिवारिक होने, अपने क्रिकेट प्रेम में अतिवादी, एकांगी और संभ्रांतवादी होने, पत्रकारीय लेखन में भावुकता मिलाने और कई बार व्यक्तियों के साथ अपने राग और द्वेष दोनों में असंतुलित और अतिवादी होने के आरोप लगे। इन बातों पर उन्होने समय समय पर थोड़ा कहा, लिखा और जवाब भी दिया पर वह बदले नहीं। अपने ऊपर किसी आलोचना का कोई प्रभाव या दबाव नहीं पड़ने दिया। वह अपनी एक अंतर्धुन पर जीने और काम करने वाले आदमी थे, बाहरी चीजें उन्हें ज्यादा हिला नहीं पाती थीं।
क्या बनाता है उन्हें महान ?संपादक का पहला गुण – निर्भीकता। फिर मूल्यनिष्ठा, कर्मठता, संघर्षशीलता, प्रतिभा, नया सोचने-करने-करवाने की क्षमता, सामाजिक सक्रियता, अच्छी टीम बनाने और चलाने का सांस्थानिक कौशल, लोगों को प्रेरित करने की क्षमता, जीने और काम में उत्कटता, गहराई, उदारता, व्यक्तित्व का चुम्बकत्व…सूची और लंबी होती रह सकती है।
नजर दौड़ा कर देखें और सोचें – किस संपादक ने राष्ट्रीय महत्व के बड़े मुद्दों पर इतनी हिम्मत के साथ, ताल ठोंक कर इतनी उत्कट निरंतरता के साथ अभियान चलाए, लिखा? अपने संपादकीय विवेक में जिन्हें और जिसे उन्होंने गलत माना उनके खिलाफ ऐसा तीखा, तिलमिलाने वाला मारक लेखन और किसने किया चाहे वह भिंडरावाले के खाड़कू हों, बाबरी विध्वंस के बाद संघ परिवार हो, नरसिंह राव हों, कांग्रेस का अलोकतांत्रिक परिवारवाद हो, खबर बेचने वाले अखबारी मालिक हों या फिर नागरिक को उपभोक्ता, मूल्यों-प्रकृति-मानवीयता को बिकाऊ माल बना देने वाला वैश्विक और अपने मनमोहन सिंह का नवउदारवादी आर्थिक दर्शन और व्यवहार?
किसने लोकतांत्रिक और मानवीय स्वतंत्रताओं पर अंकुश की हर कोशिश पर इतना तीखा प्रतिरोध किया? किसने समूची हिन्दी पट्टी में युवा-प्रौढ़ हजारों पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और चिन्तनशील नागरिकों को ऐसे प्रभावित और प्रेरित किया? किसने युवा पत्रकारों में सार्थक और नैतिक पत्रकारिता की प्रेरणा और उसमें विश्वास भरा? किसने हिन्दी पत्रकारिता को एक ऐसे समय में नैतिक चमक, बौद्धिक ऊर्जा, गरिमा और गौरव से भरा जब वह साख और मूल्यों के सबसे गहरे संकटकाल से गुजर रही थी? किसने राज्य और समाज की तमाम संस्थाओं और मंचों पर हिन्दी पत्रकारों और पत्रकारिता की शक्ति, महत्व और भूमिका को इस ठोस ढंग से पुनर्स्थापित किया जब अंग्रेजी पत्रकार और पत्रकारिता ही प्रामाणिकता, गंभीरता और महत्व के पर्याय बनते जा रहे हों? यानी किसने हिन्दी को सत्ता में एक नई धाक और धमक दी?
किसने दिखाया कि एक आदमकद, समग्र और स्वायत्त संपादक कैसा होता है? किसने हिन्दी पत्रकारिता को भाषा, शैली, ऊर्जा, दृष्टि, विषयवैविध्य, गंभीरता, प्रस्तुतीकरण और धारदार लेखन के नए प्रतिमान दिए, जड़ताएं तोड़ीं, नए आदर्श बनाए, बेजोड़ टीम दी? किस दूसरे हिन्दी संपादक ने क्रिकेट, टेनिस और खिलाड़ियों, अभिनेताओं, शास्त्रीय गायकों, लोकविधाओं, लोकपरंपराओं पर ऐसा मार्मिक, ऐसा अर्थपूर्ण, रस से ऐसा लबालब लेखन किया है? कितने संपादकों ने अपने लेखों से इतने सारे लोगों को रुलाया है, हिलाया है, चलाया है, संवारा है, समृद्ध किया है? और कितने हिन्दी पत्रकारों ने संपादक पद छोड़ने के बाद भी सोद्देश्य, समर्पित, मूल्यसंचालित, सतत सक्रिय, सतत प्रेरक, सतत उद्बोधक ढंग से वैश्वीकरण की अनंत उपभोगवादी मरीचिका के पीछे भागते भारत के लोक को अपनी सनातन प्रज्ञा, अपनी लोकमनीषा, अपने गांधी, अपनी लोकशक्ति की ओर देखने और लौट कर एक नए भारत का एक नया सपना फिर से देखने का ऐसा मरणपर्यंत यज्ञ किया है?
शायद, मां लीलाबाई जोशी के शब्दों और कुंडली बनाने वाले वासुदेवशास्त्री की भविष्यवाणी में, ‘सिंगासन योग’ लिखा कर लाए अकेले प्रभाष जोशी ने।
राष्ट्रीय सहारा के “हस्तक्षेप से साभार

राहुल देव,


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