मंगलवार, 10 जुलाई 2012

यशवंत की गिरफ्तारी के विरोध में जंतर मंतर पर प्रदर्शन




पहले पत्रकारों की लड़ाई सरकार और मालिकों के खिलाफ होती थी लेकिन आज ऐसे हालात हो गए हैं कि पत्रकारों को पत्रकारों के खिलाफ लड़ाया जा रहा है. आज भारत में दो प्रकार के पत्रकार हैं. एक वह जो मालिकों के लिए दलाली कर रहे हैं और दूसरे वे जो ईमानदारी से इस पेशे के साथ जुड़े हुए हैं. भड़ास4मीडिया के संपादक यशवंत सिंह को फर्जी आरोपों में फंसाकर गिरफ्तार करने के खिलाफ कल 9 जुलाई को जंतर मंतर, नई दिल्ली में दिल्ली-नोएडा के पत्रकरों ने काली पट्टी बांध कर प्रदर्शन किया. प्रदर्शन का आयोजन जनज्वार डॉट कॉम ने किया था.
इस अवसर पर जनज्वार डॉट कॉम के संपादक अजय प्रकाश ने बताया कि ‘यशवंत की गिरफ्तारी दरअसल बड़े मीडिया के अंदर न्यू मीडिया का तेजी से फैलता भय है. देश के तमाम मीडिया घराने अब विशुद्ध रूप से दलाली का काम कर रहे हैं. लम्बे समय तक समाचार के प्रसार में इनका एकाधिकार रहा है लेकिन अब न्यू मीडिया के उभार से यह एकाधिकार टूट रहा है. इसी से बौखलाए संपादकों ने फंसा कर तमाम ब्लागरों और वेबसाइट संचालकों को चेतावनी देने की कोशिश की है.
यू.एन.आई के वरिष्ठ पत्रकार विनोद विप्लव ने कहा, ‘यह प्रदर्शन एक शुरुआत है और हमें एक लंबी लड़ाई लड़नी होगी. पहले पत्रकारों की लड़ाई सरकार और मालिकों के खिलाफ होती थी लेकिन आज ऐसे हालात हो गए हैं कि पत्रकारों को पत्रकारों के खिलाफ लड़ाया जा रहा है.’ उन्होंने कहा, ‘आज भारत में दो प्रकार के पत्रकार हैं. एक वह जो मालिकों के लिए दलाली कर रहे हैं और दूसरे वे जो ईमानदारी से इस पेशे के साथ जुड़े हुए हैं. इसलिए जरूरी है कि सोशल मीडिया को जन मीडिया बनाया जाए, इसे मजबूत किया जाए.’
दैनिक भास्कर डॉट कॉम के दिलनवाज पाशा ने कहा, ‘हमें इस बात का ख्याल रखना चाहिए कि मीडिया नहीं बिकता पत्रकार बिकते हैं. यह मामला केवल यशवंत बनाम विनोद कापड़ी नहीं है बल्कि हमें यह बात को जनता के सामने लाना चाहिए कि देश का एक बड़ा पत्रकार अपने विरोधी को फंसाने के लिए गलत काम कर रहा है. हमें यह सोचना चाहिए कि हम विनोद कापड़ी के समाचार चैनल के कार्यक्रम क्यों देखें, जबकि वह आदमी अपने मीडिया का प्रयोग गलत काम के लिए कर रहा है. उन्होंने आगे कहा कि न्यू मीडिया और पारंपरिक मीडिया में फर्क करने से चीजें और उलझेंगी.
देश के जाने माने मीडिया आलोचक अनिल चमडिया ने कहा, ‘हमें इस संघर्ष को यशवंत सिंह के मामले तक सीमित करके नहीं देखना चाहिए. आज जरूरी है कि यशवंत जैसे तमाम अन्य पत्रकारों और वेबसाइट पर हो रहे हमलों को आवाज को दबाने की सुनियोजित साजिश के तहत समझा जाए. यह संघर्ष देश भर में इसी तरह के मामलों में फंसे सैकड़ों अन्य पत्रकारों का भी है.’
जंतर मंतर पर हुए इस प्रदर्शन में जनसत्ता के पत्रकार फज़ल इमाम मालिक, क्रांतिकारी युवा संगठन के दिनेश, वरिष्ठ पत्रकार अनामीशरण बब्बल, अफरोज आलम, लेखक कर्नल करपाल सिंह, पीडीएफई के अर्जुन प्रसाद, जाति विरोधी आंदोलन के जे.पी.नरेला, सामाजिक कार्यकर्ता सुनील तथा अन्य पत्रकारों ने भी अपने विचार रखे. प्रदर्शन के बाद में इस मामले में आगामी दिनों में किए जाने वाले कार्यक्रमों की रूपरेखा तैयार की गई. साभार : जनज्‍वार

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