मंगलवार, 3 अप्रैल 2012

इलेक्ट्रोनिक मीडिया और महिलाएँ




10 APRIL, 2010



इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों (फ़िल्म,रेडियो,टी.वी एवं इंटरनेट) में महिलाओं की छवि का निर्माण प्रिंट माध्यम की अपेक्षा भिन्न तरीके से हु। इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों पर पूँजी का दवाब प्रिंट की तुलना में अधिक गहरा होता है, इसलिए इन माध्यमों में स्त्री-छवि का विकास( Iconography) बाज़ार की ताकत के साथ होता रहा है। इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों में सिनेमा भारत में सबसे पहले दस्तक देता है लेकिन भारतीय स्त्री की छवि का रूपायन दादा साहब फालके की फ़िल्म ‘राजा हरिश्न्द्र’ (1913) सेरम्भ हु। इस फ़िल्म की प्रमुख स्त्री चरित्र रानी तारामती है जो उच्च दर्श, पतिव्रता,त्याग की प्रतिमूर्ति, कष्ट साधक, ममतामयी माँ की प्रतिमा(Icon) के रूप में स्थापित होती है। यहाँ देखने की बात यह भी है कि पुरुष (हरिश्चन्द्र) भी उच्च दर्शों का वाहक है। यह फ़िल्म जो कि एक महत्त्वपूर्ण भारतीय मिथक पर धारित है, में स्त्री और पुरुष का त्याग तो एक जैसा दिखाई देता है परंतु अयोध्या की राजगद्दी का परित्याग (दान स्परूप) करने का निर्णय राजा हरिश्चन्द्र का ही है तारामती तो सिर्फ उसमें ईमानदारी से शामिल हो जाती है। हिन्दी सिनेमा का मूक दौर (1931 तक) अधिकांशत: इसी तरह की स्री छवि का रचयिता है। इस दौर में लगभग 1200 फ़िल्मों का निर्माण हु जो अधिकाशत: भारतीय मिशकों की विषय-वस्तु (Content) को समाहित करती हैं। श्रीकृष्ण जन्म(1918),कालिमा मर्दन(1919), लंका दहन(1917), सुकन्या सावित्री(1922), भस्मासुर मोहिनी(1913), सत्यवान सावित्री(1914), अहिल्या उद्धार(1919),विश्वामित्र मेनका(1919), रूक्मिणी सत्यभामा (1920), सती पार्वती(1920), सती सुलोचना(1921), उर्वशी (1921),रत्नावली(1922), सती अंजना(1922),सती पद्मिनी(1924), सती तारा(1925), जानकी स्वयंवर(1926), द्रौपदी वस्त्र हरण(1927),विश्वमोहिनी(1928), मालविमाग्निमित्र(1929), राधा कृष्ण ( 1930), अन्नपूर्णा (1932) जैसी मूक फ़िल्मों में स्त्री की सिनेमाई छवि उभरती है। यह छवि बहुत कुछ वैसी ही भी जिसे भारतीय मिथक परंपरा ने सुरक्षित रखा था। त्याग की प्रतिमूर्ति,श्रद्धा की देवी, उच्चतर दर्श को पहचानने वाली, पति के प्रति पूर्ण समर्पित सत्री का बिंब इन फ़िल्मों में पिछड़ी दिखाई देती है। यदि हम इसी दौर (1900-1931) का प्रिंट माध्यम देखें तो उसमें स्त्री की राष्ट्रवादी चेतना का विकास और उसका क्रांतिधर्मी चित्र उभरता है। तत्कालीन स्त्री लेखन में अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता दिखाई देती है। सिनेमा और प्रिंट माध्यमों में स्त्री छवि का यह अंतर स्त्रियों का इन माध्यमों पर वर्चस्व के होने या न होने से जुड़ा दिखाई देता है।मूक युग के सिनेमा में एक ओर मिथकीय-पौराणिक स्त्री-छवि जीवित हो तो दूसरी ओर ऐतिहासिक सामाजिक किरदारों के माध्यम से भी इस छवि का निर्माण भले ही धुँधले ढ़ंग से हो रहा था। अनारकली(1928), र्य महिला(1928), जाद अबला(1933), बाल विधवा( 1925), बहादुर बेटी(1931), देवदासी(1928,25,30), स्टेज गर्ल(1929), टाइपिस्ट गर्ल(1926), नर्तकी तारा(1922), लेडी टीचर(1922), दि फ़िल्मों में स्त्रियों को पौराणिक छवि से भिन्न एक मानवीय तथा यथार्थ परक छवि उभरने का प्रयास किया गया था। इस प्रयत्न में हालाँकि अधिक सफलता नहीं मिली और फ़िल्म उद्योग पर पुरुषों का दबदबा होने के चलते स्त्री(Heroine) की भूमिका नायक (Hero) के सहयोगी की ही थी। सिनेमा का यह सम्मान बहुत कुछ ज भी बरकरार है जिसमें स्त्री महानायिका तो नहीं बन पाती परंतु पुरुष(Hero) महानायक जरूर बन जाता है। हिन्दी सिनेमा की एक महत्त्वपूर्न कृति ’देवदास’ (1935) थी। ‘देवदास” की पार्वती प्रेम और परंपरा का अन्तर्द्वन्द्व झेलती है और अन्तत: उसे परंपरा के दबाब में प्रेम का परित्याग करना पड़ता है। पार्वती कर्तव्यपरायण हिंदू धर्म पत्नी का फर्ज़ निभाती है। पूरी फ़िल्म स्त्री की इस कशमकश को व्यक्त करती है किन्तु फ़िल्म का अंत ‘परंपरा’ के पुराने पड़ जाने और स्त्री की मुक्त कांक्षा का संकेत कर जाता है। 1935 में इस तरह के संकेत भी महत्त्वपूर्ण माने जा सकते है। शायद यही रूप फ़िल्म की लोकप्रियता का एक बड़ा कारण था। यह फ़िल्म स्त्री का रोमानी चित्र प्रस्तुत करती है तो अछूत कन्या(1936) में इसका थोड़ा विस्तार होता है। ‘देवदास’ अमीर-गरीब के तनाव पर रची गयी तो अछूत कन्या में एक दलित कन्या का ब्राह्मण युवक के प्रति प्रेम दिखाया गया है जो जातिगत रूढ़ियों और धार्मिक ग्रहों के चलते पूरा नहीं हो पाता। कस्तूरी (दलित कन्या) अपनी जाति के युवक के साथ ब्याह दी जाती है और अन्तत: एक दुर्घटना में उसकी मृत्यु हो जाती है। पार्वती और कस्तूरी सवाक युग की फ़िल्मों के प्रथम दशक (1931-40) में स्त्री प्रतिमा का महत्त्वपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत करती हैं। पार्वती का जीवित रहकर और कस्तूरी का मर जाना समाज में स्त्री को विभिन्न बंधनों में घिरा हु दर्शाता है। हिन्दी सिनेमा में यह दौर स्त्री प्रेम को प्रस्तावित कर उसको मानवीय चेहरे को उभारना है और देवी के रूप (पौराणिक ) से मुक्त करते हुए म अनुभव के निकट स्त्री को स्थापित करता है। पितृतंत्र(Patriarchy) से लड़ने या उसे पहचानने का उद्यम इस युग की फ़िल्मों में नहीं है। ‘औरत’ (1940) में स्त्री की छवि स्वायत्तता और त्मनिर्भरता को दर्शाती है। सामाजिक- पारिवारिक उत्तरदायित्व का स्त्री द्वारा वहन इस फ़िल्म में स्पष्ट रूप से उभरता है। जहाँ पुरुष पलायन कर जाता है, वहाँ स्त्री अपने कर्तव्य का पालन करते हुए एक संघर्षपूर्ण जीवन व्यतीत करती है। राधा अपने पति श्यामू के घर शादी के बाद ती है। सास-ससुर की सेवा करती है और फिर उसके यहाँ एक बेटा जन्म लेता है। इस बीच श्यामू पर कर्ज का बोझ बढ़ जाता है लेकिन दु:ख के इस माहौल में दूसरे बेटे का जन्म नयी खुशियाँ ले ता है। परंतु ये खुशियाँ क्षणिक थीं और कर्जदारों से परेशान हो श्यामू घर छोड़ कर भाग जाता है। राधा का एकाकीपन, असहाय रूप उसे संघर्ष करने की प्रेरणा देता है। श्यामू की अनुपस्थिति का फायदा कर्ज देने वाला उठाना चाहता है परंतु राधा का मातृत्व प्रेम देखकर उसका हृदय परिवर्तन होता है। धीरे-धीरे राधा की र्थिक स्थिति सुधर जाती है परंतु दोनों में एक बेटा डाकू बन जाते है और अन्तत: वह अपने बेटे को मारते हुए खुद भी उसके साथ प्राण त्याग देती है। यह फ़िल्म स्त्री की पारंपरिक छवि के भीतर से उसकी धुनिक छवि गढ़ती है। र्थिक त्मनिर्भरता और पारिवारिक दायित्व के निर्वाह से यह छवि और निखरती है। अशुभ के विनाश और शुभ के विकास में भी स्त्री-योगदान को दर्शाया गया है। सिनेमा में यह छवि स्त्री के सशक्तिकरण का महत्त्वपूर्ण संकेत बनती है जो गे की फ़िल्मों को प्ररेणा देती है। कहा जाता है कि महबूब खान ने अपनी इसी फ़िल्म का विस्तार ’मदर इंडिया’ में किया।
सिनेमा में स्त्री की छवि को रुपायित करने वाली एक प्रामाणिक फ़िल्म ‘मदर इंडिया’ (1957) मानी जा सकती है। ‘मदर इंडिया’ भारतीय समाज को एक महत्त्वपूर्ण स्त्री प्रतिरूप माँ का उद्घाटन करती है। इसमें पारंपरिक और धुनिक छवियों का संतुलित समन्वय किया गया है। दर्श मातृत्व का गुण राधा ( मदर इंडिया) में मौजूद है साथ ही, अपने त्मसम्मान की रक्षा और संरचना के भीतर ऐसी माँ का प्रतिरूपण करती है जो रूढ़ छवि (Stereotype) को ही ठोस बनाती है परंतु मातृत्व का सामाजिक दायित्व में पतिवर्तन स्त्री छवि के नए याम का भी संकेत करना है। ‘माँ’ नायक फ़िल्म में भी इसी तरह का किरदार दिखाई देता है। हिन्दी सिनेमा ने माँ के खलनायक चरित्र का निर्माण सौतेली माँ के रूप में किया। माँ का यह रूप प्रतिगामी मूल्यों से रचा गया और इसे दर्श विहीन छवि के रूप में चित्रित किया गया। फ़िल्म ‘बेटा’ में सौतेली माँ (अरूणा ईरानी) का चरित्र उभारा है।यह चरित्र अपने नकारात्मक स्वरूप के बावजूद भी युक्त कर दिया गया है।
बिन ब्याही माँ का चरित्र भी हिंदी सिनेमा में पर्याप्त लोकप्रिय हु ‘धूल का फूल’, ‘हरे काँच की चूड़िया’, ‘जूली’, त्रिशूल’, ‘लावारिस’, दि फ़िल्मों में स्त्री का यह स्वरूप दिखाई देता है। स्त्री की यह छवि भावुक और न समझ स्त्री का रूप प्रस्तावित करती है। इसमें प्रेम संबंधों के चलते माँ अपनी संतान को अपमान से बचाने के लिए उसके वास्तविक पिता का नाम बताना जैसी घटनाएँ ती है। स्त्री, पितृ सत्तात्मक स्थितियों को ऐसी फ़िल्मों में अपनी नियति मान लेती है और अन्तत: दया का पात्र बनते हुए अपनी स्वीकृति करवा पाने में सफल होती है। इसी प्रकार बलात्कृत स्त्री का मुवजा उसके बलात्कारी से विवाह करवाने में भी दीखने लगता है। ऐसी स्थिति में भी स्त्री की सिनेमाई छवि अलग से विकसित नहीं होती वरन् वह पुरुष के द्वारा स्वीकृत या अस्बीकृत होने के बीच झूलती रहती है। हिन्दी सिनेमा में स्त्री की स्वतंत्र छवि का निर्माण श्याम बेनेगल( भूमिका),सुबह (जब्बार पटेल), बाजार (सागर सरहरी) और (मासूम) शेखर कपूर के फ़िल्मों में दीखता है। इस दृष्टि से ‘मिर्च मसाला’ भी एक महत्त्वपूर्ण फ़िल्म है। यह ठवाँ दशक था जब स्त्री हिंदी सिनेमा में अपनी सार्थक प्रतिमा गढ़ने की दिशा में सक्रिय दीखती है।
जय संतोषी माँ (1975) फ़िल्म अपने समय की अत्यंत सफल फ़िल्म थी। स्त्री की देवीपरक छवि की सामाजिक एक बार फिर एक लोकप्रिय फ़िल्म का फार्मूला बना। इस फ़िल्म संतोषी माँ एक हिन्दू देवी के रूप में तो स्थापित हुई साथ ही उनकी शक्तियों की संखया में भी इजाफ़ा हु इस फ़िल्म से पितृतंत्र की रक्षा का ही संदेश जाता है। धार्मिक स्था के प्रति स्त्रियों का सम्मान विकसित सरना उनके अन्य सरोकारों- र्थिक , राजनीतिक ,सशक्तिकरण की प्रक्रिया को बाधित करता है। यह फिल्म स्त्रियों को वास्तविक संघर्ष से विमुख कर उन्हें अंधविश्वासी और गैर जरूरी गतिविधियों में शामिल होने की प्रेरणा देती है। फ़िल्म की आंतरिक बुनावट पारंपारिक स्त्री छवि को ही सुदृढ़ करती है। 21वीं सदी के मुहाने पर खड़ा हिन्दी सिनेमा स्त्री की त्मनिर्भर छवि के निर्माण की दिशा में निष्क्रिय ही दिखाई देता है।पिछली सदी का अंतिम दशक बड़े परिवर्तनों के साथ शुरू होता है। सिनेमा में कंप्यूटर का वृहतर प्रयोग होने लगा था।
भारत में टी. वी. कार्यक्रमों का प्रसारण 1960 के बाद सुचारू रूप से रंभ हु। टेलीविजन पर स्त्री की विविध छवियाँ निर्मित हुई जो सच्चाई के ज्यादा करीब थी। ‘हम लोग’ सीरियल के माध्यम से पारिवारिक मूल्यों की स्थापना का प्रयास दिखाई दिया। 1984-85 में 17 महीनों तक प्रसारित इस धारावाहिक में निम्न मध्यवर्गीय परिवार की व्यथा- कथा का वर्णन दिखाई देता है। संयुक्त परिवार की जिम्मेदारी उठाने में नाकामयाब बसेसर-मदिरा के शरणागत हैं। तीन बेटियों के किरदार बड़की,मझली, छुटकी म हिन्दुस्तानी परिवार की भाँति संघर्षों से जूझती हुई अपने-अपने रास्ते तलाश कर लेती है। दादा-दादी की मौजूदगी से परिवार में नए मूल्यों का सूत्रपात होता है। दादी की भूमिका नकारात्मक किस्म की है। इस धारावाहिक के एक एपीसोड में दादा संयुक्त परिवार के महत्त्व को बताते हुए कहते हैं कि परिवार के लोगों को साथ रहना चाहिए और एक दूसरे की शक्ति का उपयोग करते हुए विकास करना चाहिए। ‘हम लोग’ स्त्रियों की छवि में मूलभूत रूपांतरण प्रस्तुत नहीं करता। वह संयुक्त परिवार और उसके मुखिया पुरुष के वर्चस्व तले विकसित होती स्त्री की जद्दोजहद को अवश्य उभार पाता है। इसमें पारंपारिक एवं धुनिक मूल्यों की टकराहट को एक पारिवारिक ताने-बाने में प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। बड़की और छुटकी का व्यक्तित्व अपने सिद्धांतों के प्रति दृढ़ रहने वाला दिखाया गया है लेकिन इसी के चलते वे हाशिए पर चली जाती हैं। यह कार्यक्रम अत्यंत लोकप्रिय हु। दर्शक इस परिवार की समस्या के समाधान के लिए खत लिखते थे, जिज्ञासाएँ प्रकट करते थे। प्रसिद्ध फ़िल्म अभिनेता अशोक कुमार इन खतों के उत्तर के साथ प्रत्येक एपीसोड का समापन-वाक्य भी प्रस्तुत करते थे। इससे इस सीरियल ने एक उपदेशात्मक स्वरूप भी अख्तियार किया। निम्नमध्यवर्गीय परिवारों की लड़कियों और स्त्रियों को इस धारावाहिक ने अपने ढंग से संबोधित किया और वास्तविक जीवन पर इसका प्रभाव पड़ा। संयुक्त परिवार और सिद्धांतवादी स्त्रियों की भूमिका और संघर्ष एक पछतावे का रूप बनकर उभरे और स्त्री सशक्तिकरन की दिशा बदलने लगी। सैटेलाइट चैनलोम के गमन से पूर्व दूरदर्शन ही टेलीविजन पर छवि का निरुपण कर रहा था। दूरदर्शन के अधिकांश धारावाहिक मध्यवर्गीय परिवार की महिलाओं की छवि उभार में लगे हुए थे। मध्यवर्गीय परिवार केवल र्थिक इकाई नहीं होता वरन् उसका एक विशिष्ट मनोवैज्ञानिक, सामाजिक धार भी होता है। ऐसे परिवार परंपरा और धुनिकता, मूल्य और महात्वकांक्षा, संवेदन और प्रोफेशन के बीच संघर्ष करते हुए दिखावे के शिकार हो जाते हैं। विचार जहाँ उन्हेंआंदोलित करते हैं, वहीं व्यवसाय उन्हें अपनी र्थिक स्थिति सुदृढ़ करने के लिए प्रेरित। इस तरह मध्यवर्गीय परिवार के सदस्यों की दुविधाजीवी जीवनशैली का विकास होता है। ‘हम लोग’ की मझली फ़िल्मों में काम करने का सपना पाले मुंबई चली जाती है और अन्तत: शोषण का शिकार होती है। पितृतंत्र स्त्री की देह को मूल्यांकन मानता है, उसके श्रम और कौशल को नहीं। दूरदर्शन पर प्रसारित एक दूसरे सीरियल ‘रजनी’ (1985,प्रत्येक रविवार, सुबह) की नायिका रजनी, मझली(हम लोग) की तुलना में अधिक सचेत है। वह सामाजिक हस्तक्षेप करने में सक्षम है। भ्रष्टचार,बेईमानी और घरेलू हिंसा के विरोध खड़ी यह नायिका महिला समाय सुधारक की छवि अर्जित करती है। भ्रष्ट अफसरों, बेईमानों और पत्नी उत्पीड़कोम को सबक सिखाने वाली महिला की छवि रजनी के रूप में टेलीविजन पर पहली बार हमारे सामने ती है। यह प्रतिरूप भी मध्यवर्गीय (उच्चवर्गीय) ही है। कुछ इसी तरह से बुनियाद(1987) नामक सीरियल में हवेली राम(मास्टर जी) और लाजो जी का संबंध कथा है। लाजो जी एक युवा विधवा थीं और हवेली राम विभाजन पूर्व पंजाब के स्वाधीनता सेनानी तथा समृद्ध परिवार के सदस्य। हवेलीराम जब युवा विधवा(लाजो जी) से विवाह कर लेते हैं तब परिवार उन्हें छोड़ देता है। लाजो जी की संघर्ष यात्रा यहीं से शुरु होती है। वे पारंपरिक मूल्यों को छोड़ नहीं पाती। यह धारावाहिक संयुक्त परिवार( पिता केन्द्रित ) के टूटने और नाभकीय परिवार (अपेक्षा अधिक समतामूलक ) के विकसित होने का संकेत करता है। सुलोचना (लाजो जी की बहू) अपने पति को माता-पिता का घर छोड़कर अलग रहने को विवश करती है जिससे वह अपने थिएटर-कैरियर को पा सके। ‘बुनियाद ‘ वस्तुत: स्त्री की उन छवियों को प्रस्तावित करने की दिशा में बढ़ता है जो उसे केवल एक भावुक इकाई पर निर्भर नहीं बने रहने देना चाहती वरन् वह अपने भाविष्य के प्रति जागरूक और त्मनिर्भरता को पाने के लिए एक बेचैन स्त्री की छवि बनाती है।इन धारावाहिकों के अतिरिक्त ‘स्त्री’, ‘अधिकार’, ‘स्वयंसिद्ध’, ‘उड़ान’,1 एवं 2 ‘पुकार’,’हमराही’जैसे सीरियलों में भी स्त्रियों की छवि निर्माण प्रक्रिया चलती रही है। ‘अधिकार’ स्त्री के अधिकारोम को दिखाने चाला सीरियल ‘उड़ान’ था जिसकी नायिका कल्याणी अपने पिता की प्ररेणा से ईमानदार तथा ताकतवर पुलिस अधिकारी बनती है। कैद से मुक्त होती हुई एक चिडिया का दृश्य इसके हर एपीसोड की शुरुत में ता था जो कल्याणी के सशक्तिकरण को दर्शाता था। कल्याणी, यदि ध्यान से देखें तो अपने पिता (जिनका गैर- सामाजिक तत्वों द्वारा उत्पीड़न उसे पुलिस अधिकारी बनने की प्रेरणा देता है) की प्रतिकृति है। अपने पित ाके द्वारा नियंत्रित और निरीक्षत। स्त्री,मध्यमवर्गीय परिवार में ‘मर्यादा’ का पर्याय थी। मर्यादा का बचाव उसी के चाल-चलन और चरित्र पर निर्भर था। इसी वजह से स्त्री के ऐसे रूप जो यौनिक रूप से नैतिक बने रहे उन्हें समाज और दर्शकों ने स्वीकार कर लिया लेकिन जो चरित्र ऐसा नहीं कर पाए उन्हें दोषी मान लिया गया। ‘हम लोग’ की मझली फ़िल्मों में काम पाने में असफल होती है इसलिए उसकी महत्त्वाकांक्षा एवं पारिवारिक विरोध समाज की लोचना का शिकार बनते है। इसी तरह ‘बुनियाद’ की वीरावाली’ विभाजन के बाद अपने प्रेमी के लापता होने और गर्भवती होने से सामाजिक अपमान झेलती है परंतु जब वह अपना गर्भपात करा लेती है तथा एक श्रम में उच्चाजीवन शैली अपनाती है तब उसे पुन: प्रतिष्ठा मिल जाती है भारतीय मध्यवर्गीय परिवारों में इज्ज्त बनाने और बचाने का रास्ता उसकी स्त्री सदस्यों के यौन-चरण से सीधे जुड़ता है इसलिए इस पर सख्त निगरानी रखी जाती है। मंझली जहाँ लोचित होती है वहीं कल्याणी सम्माननीय। मंझली अपनी स्वायत्त महत्वाकांक्षा ( फ़िल्म में अभिनय) को फलीभूत करना चाहती है तो कल्याणी अपने पिता केदर्शों से निर्मित (पुलिस अधिकारी) कार्य को अंजाम देती है। टेलीविजन पर उकेरी गई स्त्री की विभिन्न छवियाँ उसके दर्शकों की इच्छा का परिणाम थीं। दर्शकों की स्वीकृति और अस्वीकृति उनके सामाजिक पूर्वग्रहों से ही बनी थी। कल्याणी का स्वीकार और मंझली तथा वीरांवाली का अस्वीकार स्त्री विषयक हमारे नजरिए को सहज ही उद्घाटित कर देते हैं। दूरदर्शन सरकारी नियंत्रित टेलीविजन का इस वजह से भी स्त्री की रूढ़ छवियों को तोड़ने का रेडिकल प्रयास इस पर प्रसारित सीरियलों में पाया। ‘उड़ान’ की कल्याणी (कविता चौधरी) दूसरे भाग में पुलिस अधिकारी जैसी सक्षम पद पर होती है परंतु वह स्त्री अधिकारों के बजाय सामाजिक प्रशासनिक भ्रष्टाचार की ही लड़ाई लड़ती है। पितृतंत्र में स्त्री शोषण से मुक्ति का रास्ता उसे वहाँ ले जाता है जो हर नागरिक की लड़ाई से जुड़या है न कि स्त्री मात्र की। भ्रष्टाचार रहित समाज का निर्माण और सत्य तथा न्याय की स्थापना कर बेहतर राष्ट्र-निर्माण का स्वप्न कल्याणी का भी स्वप्न बन जाता है। वह स्त्री के बजाय एक जागरुक एवं सबल नागरिक की भूमिका में अधिक दिखाई देती है। वह इस भारतीय अंतरविरोध को नहीं समझ पाती कि संविधान में नागरिकों को समान अधिकारों की गारंटी के बावजूद स्त्रियाँ उनसे वंचित रही हैं। अपने समापन एपीसोड में कल्याणी राजनीतिक कार्यकर्ती बनती है। नागरिकों को राजनीतिक एक्टिविस्ट बनने की प्रेरणा देती है और शायद एक समाधान का रास्ता भी दिखाती है।’उड़ान’ के इस समाधान को ‘पारंपारिक’ ही कहा जाएगा।कल्याणी स्त्रियों की स्टीरियोटाइप छवि को तोड़ने के बजाय सिस्टम का हिस्सा बनकर, उसमें भीतर से सुधार करने की प्रेरणा देकर सभ्य नागरिक, ज्ञाकारिणी बेटी के रूप में उसे और भी अधिक मजवूती प्रदान करती है।
स्त्री अधिकारों की लड़ाई अपनों से, अपने परिवार, समाज और राष्ट्र के भीतर लड़नी पड़ती है इसे कल्याणी ने नहीं समझा।इसके द्वारा रना गया ‘स्त्री संदेश’ भारत के ‘पितृसत्ता’ के द्वारा बनाए गएदर्श मॉडल की ही प्रस्तावना है। कारण साफ है- दूरदर्शन पर सरकारी नियंत्रण की ही प्रस्तावना है। कारण साफ है- दूरदर्शन पर सरकारी नियंत्रण और म स्त्री समाज को संबोधित करने और उनके बीच अपनी स्वीकृति पाने की इच्छा रखने वाले मीडिया कार्यक्रमों में से सीमाएँ उभरती भी है।
यहीं दूरदर्शन पर प्रसारित एक दूसरे धारावाहिक ‘रजनी’ की भी थोड़ी पड़ताल कर लेना जरूरी हो सकता है। एक कर्तव्यनिष्ट पत्नी, माँ और बहू के रूपों में रजनी पारंपारिक और धुनिक कामकारी स्त्री की छवि का मिश्रण प्रस्तुत करती है। रजनी स्त्री की मुख्य छवि प्रस्तुत करती है वह स्त्रियों,खासतौर पर घरेलू स्त्रियों की ‘गूँगी गुड़िया’ वाली छवि को तोड़ने अपनी अभिव्यक्ति को सुनिश्चित करने की प्रेरणा रचती है। पारिवारिक संरचना में भले ही वह किसी फेरबदल की माँग न करती दीखती हो परंतु उसने बोलना और जरूरत पड़ने पर चिल्लाना सीख लिया है। रजनी की तेज तर्रार छवि में स्त्री की वाज़ पितृसत्ता में शंखवाद-सा फूकती दिखाई देती है। घरेलू हिंसा के विरूद्ध अभी हाल ही में एक कानून पारित हु है लेकिन इसकी अनुगूँज हम ‘रजनी’ के एक एपीसोड में देख सकते हैं जहाँ रजनी अपनी नौकरानी को उसके पति के अत्याचारों से बचाती है। ‘रजनी’ और ‘उड़ान’ जैसे धारावाहिक अपने मुख्य चारित्रों के माध्यम से एक ऐसी स्त्री का प्रतिरूप गढ़ते हैं जो धुनिक दीखती है, संघर्षशील और जुझारू छवियों की रचना करता है तथा भारतियता के दर्श को चिना चोट पहुँचाए एक बेहतर समाज,परिवार और राष्ट्र कि निर्माण में तत्पर दिखाई देता है। स्त्री को इस छवि को दर्शमूलक धुनिक छवि का निर्माण भारतीय टेलीविजन में अभी भी होना बाकी था।
मुख्यधारा में औरत सैटेलाइट टी.वी ने स्त्री को मुख्य धारा में शामिल होने का मार्ग दिखाया। दूरदर्शन का एकाधिकार ज्यों -ज्यों कम हु स्त्री के प्रतिरूपों में भी विविधता का गमन हु। सैटेलाइट टी.वी. पर खासतौर पर एकता कपूर के सीरियलों से दो बातें साफ होती हैं। कपूर के धारावाहियों में अधिकांश गतिविधियों (अच्छी या बुरी) को अंजाम देने का काम औरतें ही करती है और पुरुष उनका दर्शक भर होता है। स्त्री अधिपत्य से रचे गए घटनाचक्र का पुरुष एक उपकरण भर बनकर रह जाता है। वह स्त्री तंत्र में एक गुमशुदा इकाई मात्र होती है जैसे कि पहले औरतें हु करती थी। यह स्त्री छवि निर्माण में एक महत्त्वपूर्ण मोड़ दिखाता है और दूसरी बात जो टी.वी. के के लिए महत्त्वपूर्ण है वह है इस धारावाहिकों का ‘प्राइम टाइम’( टी.वी. का महत्त्वपूर्ण समय (सलॉट) जिसका बुनियाद पर उसका सारा अर्थतंत्र टिका होता है) पर प्रसारण दूरदर्शन के युग में प्राइम टाइम समाचार तथा समसामयिक कार्यक्रमों के लिए सुरक्षित या जिसे परिवार के सदस्यों में पुरुष मूलत: कार्यक्रमों को देखने के लेकिन सैटेलाइट टी.वी. ने इसी समय महिलाओं से संबंधित मनोरंजन कार्यक्रम ( समाचार जैसे गंभीर कार्यक्रम के बाक्स ) प्रस्तुत कर स्त्रियोम की छवि को पुख्ता ढ़ंग से समान के बीच पहुँचाया। इस तरह पिछले डेढ़-दो दशकों में स्त्री संकुल धारावाहिक और उनका प्राइम टाइम पर प्रसारण स्त्री को विविध वर्ग छवि के निर्माण के सबसे बड़े कारक सिद्ध हुए।
उपभोक्ता ग्राहक में अन्तर होता है। ग्राहक हु करते हैं, उपभोक्ता निर्मित किए जाते हैं। स्त्रियों की यह छवि समाज में औरतों को एक उपभोक्ता के रूप में चिन्तित करती है। दरअसल पहली बार घरेलू औरतें टी.वी. की दर्शक इतने बड़े पैमाने पर बनी और टेलीविजन और टी. र. पी . का एक सघन संबंध है जिसके चलते उसकी विज्ञापनगत य में बढ़ोतरी होती है। टी. र. पी. दर्शक संख्या का खेल है इसलिए घरेलू महिलाओं ने जब टी.वी. देखना शुरू किया तो परोक्ष रूप से उन्होंने टेलीविजन पर सास-बहू जैसे पारिवारिक रिश्ते, घरेलू माहौल, छोटी-छोटी अच्छाइयाँ तथा बुराइयों पर धारित सीरियलों की भरमार हुई। चूँकि टेलीविजन का विकसित होता दर्शक वर्ग मध्यवर्गीय महिलाओं का था इसलिए इन धारावाहिकों का कथानक (घटना चक्र ), जीवन शैली, संवाद, वेशभूषा, और मनोभाव इसी मध्यवर्गीय मानसिकता के इर्द-गिर्द रचे गए। अभी भी भारतीय समाज में स्त्रियों के प्रति कोई विशेष प्रगतिशील नजरिया विकसित नहीं हो पाया है इसलिए इन धारावाहिकों में भी वह सीमा उभरती दिखाई देती है।
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