सोमवार, 2 अप्रैल 2012

जनमत का प्रहरी , जनमत का निर्माता / किशन पटनायक




अप्रैल 22, 2009 Aflatoon अफ़लातून द्वारा
लेख का भाग एक , दो 
    समाचार-पत्र अगर समाचारों के पत्र होते , तो इतनी सारी बहस की जरूरत नहीं होती । अगर दुनिया मे कभी समाचारों का पत्र होगा तो वह एक बिलकुल भिन्न चीज होगी । मौजूदा सभ्यता में समाचार-पत्र एक तरह से देखें तो जनमत का प्रहरी है , दूसरे ढंग से देखें तो वह जनमत का निर्माता है । यह मत-निर्माण सिर्फ तात्कालिक मुद्दों के बारे में नहीं होता है , बल्कि गहरी मान्यताओं और दीर्घकालीन समस्याओं के स्तर पर भी होता है । यह मत-निर्माण या प्रचार इतना मौलिक और प्रभावशाली है कि इसे मानस-निर्माण ही कहा जा सकता है । प्रचार का सबसे प्रभावशाली रूप है समाचार वाला रूप । अगर आप यह कहें कि गन्दगी से घृणा करनी चाहिए’, तो यह गन्दगी के खिलाफ़ एक कमजोर प्रचार है । अगर आप कहें कि गन्दगी बढ़ गयी है’, तो गन्दगी के खिलाफ़ यह ज्यादा प्रभावशाली वाक्य है । आप कहे कि पाकिस्तान को दुश्मन समझो’, तो इसका असर कम लोगों पर होगा । कुछ लोग पूछेंगे , क्यों ? लेकिन वही लोग जब पढ़ेंगे कि पाकिस्तान को अमरीका से हथियारों का नया भंडार मिलातो दुश्मनी अपने आप मजबूत हो जायेगी । आप प्रचार करेंगे कि हमें पाँच-सितारा होटलों की जरूरत है’, तो लोग कहेंगे नहीं । लेकिन वे जब पढ़ेंगे कि होटल व्यवसाय से सरकार ने १० करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा कमाईतो उन्हें खुशी होगी । प्रचार में द्वन्द्व रहता है । शिक्षा दान में द्वन्द्व रहता है । समाचार में द्वन्द्व नहीं होता है इसलिए समाचारों से मान्यतायें बनती हैं , मानस पैदा होता है । इसीसे अनुमान लगाना चाहिए कि दैत्याकार बहुराष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं का कितना प्रभाव तीसरी दुनिया के शिक्षित वर्ग पर होता है ।
     गांधीजी ने जब हिन्द-स्वराज्यलिखा, डॉक्टरों और वकीलों के पेशे को समाज-विरोधी पेशे के रूप में दिखाया । हो सकता है कि वे उदाहरणॊं की संख्या बढ़ाना नहीं चाहते थे या हो सकता है कि पत्रकारों के समाज विरोधी चरित्र का साक्षात्कार उन दिनों उन्हें नहीं हुआ था । गांधी अति अव्यावहारिक विचारकों की श्रेणी में आते हैं । उनके सपने का समाज नहीं बनने वाला है । हम वकीलों-डॉक्टरों के पेशे को समाज -विरोधी नहीं कह सकते । साधारण नागरिक के लिए पग-पग पर वकील-डॉक्टर की सेवा की जरूरत पड़ जाती है । जैसे हम जानते हैं कि स्कूलों में अच्छी शिक्षा नहीं दी जाती है, लेकिन हम अगर स्कूलों को समाज विरोधी कहेंगे, तो हमारे बच्चे मूर्ख रह जायेंगे । इसी तरह समाचार-पत्र के आधुनिक मनुष्य के लिए  एक बहुत बड़ा बोझ होने पर भी उसे पढ़े बिना रहने पर हम अज्ञानी रह जायेंगे । समाज में बात करने लायक नहीं रह जायेंगे । ज्यादा से ज्यादा आप इसे एक विडम्बनापूर्ण स्थिति कह सकते हैं , जहाँ समाचार-पत्रों की स्वाधीनता है , लेकिन पत्रकार पराधीन है । समाचार-पत्र आधुनिक मनुष्य के ऊपर एक बहुत बड़ा अत्याचार है । साथ ही , वह हमारी सांवैधानिक आजादी का माध्यम भी है ।

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सेंसरशिप पर मुखर पत्रकार संगठन

कोलकाता : इंडियन जर्नलिस्ट एसोसिएशन (आइजेयू) के अध्यक्ष एसएन सिन्हा और सचिव देवुलापल्ली अमर ने राज्य सरकार के फरमान पर कहा कि ऐसा लगता है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी बंगाल के लोगों के लिए यह तय करना चाहती हैं कि उन्हें कौन-सा अखबार पढ़ना चाहिए.इसे किसी भी हाल में स्वीकार नहीं किया जा सकता है, क्योंकि यह आमलोगों के मौलिक व संवैधानिक अधिकार के खिलाफ है.
सर्कुलर का विरोध आइजेयू की विज्ञप्ति में कहा गया है कि एक तरफ तो राज्य सरकार सर्कुलर जारी कर पुस्तकालयों को यह निर्देश देती है कि उन्हें राजनीतिक दलों से संबंधित अखबार को अपने यहां नहीं रखना है. दूसरी ओर, सरकार के सकरुलर में ऐसे तीन अखबारों को लाइब्रेरी में रखने के लिए कहा गया है, जिनके मालिक व संपादक तृणमूल कांग्रेस की ओर से राज्यसभा के सांसद चुने गये हैं.
उल्लेखनीय है कि हाल के राज्यसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने तीन ऐसे लोगों को चुन कर भेजा है जो किसी अखबार के मालिक हैं अथवा अखबार के सीइओ हैं. उन तीनों के अखबारों को विज्ञापन भी दिये जा रहे हैं और साथ ही सरकारी संस्थाओं में उन अखबारों को ही खरीदने के फरमान भेजे जा रहे हैं.
स्वजनपोषण आइजेयू के अनुसार राज्य सरकार का यह कदम स्वजनपोषण का ज्वलंत उदाहरण है तथा देश में कभी लगायी गयी इमरजेंसी की याद दिलाता है.आइजेयू ने प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया से इस मुद्दे पर हस्तक्षेप करने का आग्रह किया है.इसके साथ ही संस्था ने राज्य सरकार से फौरन अधिसूचना को वापस लेने की मांग की है.
फैसले पर कांग्रेस ने जतायी चिंता
उधर, सरकारी व सरकारी सहायताप्राप्त पुस्तकालयों में कुछ ही अखबारों को रखने की अनुमति देने और बाकियों पर पाबंदी लगाने के सरकारी फैसलों पर कांग्रेस ने तगड़ा विरोध जताया है. इसके खिलाफ प्रदेश कांग्रेस ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को एक पत्र लिखा है. पत्र में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रदीप भट्टाचार्य ने सरकारी फैसले पर गहरी चिंता जताते हुए लिखा है कि यह बिल्कुल अलोकतांत्रिक कदम है.
ऐसा पहले कभी नहीं हुआ
ऐसी घटना पूर्व में कभी नहीं हुई है.यह राजकोष की कीमत पर एक प्रक्रिया को संस्थान बनाने का प्रयास है. कांग्रेस लोकतंत्र और कानून के प्रति प्रतिबद्ध है. ऐसे सरकारी सकरुलर का वह समर्थन नहीं कर सकती जो उसके आदर्शो के खिलाफ है. नागरिक समाज, मीडिया और राजनीतिक दलों ने इसकी निंदा की है.
विज्ञापन रोकने का विरोध
उन्होंने मुख्यमंत्री से ग्रामीण, ब्लॉक और जिला स्तर से प्रकाशित होने वाले प्रकाशनों को सरकारी विज्ञापन न देने के तथाकथित निर्देश को भी वापस लेने का अनुरोध किया. उनका कहना है कि इससे इन छोटे लेकिन महत्वपूर्ण प्रकाशनों का विकास बुरी तरह बाधित होगा.इन दोनों सकरुलर को तुरंत वापस लेने की अपील करते हुए उन्होंने कहा है कि इससे केवल सरकार की छवि पर ही असर पड़ेगा. / This Article Posted on: April 2nd, 2012 in : 
·         कोलकाता
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काटजू ने पत्रकार पर विधायक के हमले पर जवाब मांगा

नई दिल्ली : एक फोटो पत्रकार पर मेघालय के विधायक के कथित हमले की शिकायत के बाद भारतीय प्रेस परिषद प्रमुख मार्कण्डेय काट्जू ने राज्य विधानसभा अध्यक्ष से इस प्रकरण पर आज जवाब मांगा ताकि इस मुद्दे पर आगे कोई कार्रवाई की जा सके.
मेघालय विधानसभा अध्यक्ष चाल्र्स पिंगरोप को लिखे एक पत्र में काट्जू ने कहा कि उन्हें इंडियन जर्नलिस्ट यूनियन से राज्य में एक फोटो पत्रकार पर एक विधायक द्वारा हमला करने की शिकायत मिली है. भारतीय प्रेस परिषद प्रमुख ने कहा, ‘‘यह आरोप लगाया गया है कि फोटो पत्रकार वाल्टन हिल्टन पर विधायक फाउंडर स्ट्रांग साजी ने हमला किया क्योंकि वाल्टन ने विधानसभा में उनकी एक तस्वीर खींची थी. इस हमले के नतीजे में फोटो पत्रकार को शिलांग में अस्पताल में भर्ती कराना पडा.
काट्जू ने कहा कि अगर शिकायत सही है तो यह संविधान की धारा 19 (ए) के तहत गारंटी की गई प्रेस की स्वतंत्रता का एक गंभीर उल्लंघन है. पत्र में कहा गया है, कृपया यथाशीघ्र इस पत्र का जवाब दें ताकि प्रेस परिषद इस मामले में आगे की कार्रवाई कर सके. अनेक अखबारों में विधानसभा सत्र के दौरान सो रहे विधायक की तस्वीर छपने के बाद स्ट्रांग ने पत्रकार पर कथित रुप से हमला किया था.

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