मंगलवार, 3 अप्रैल 2012

कमलेश्वर और हिन्दी में मीडिया लेखन: एक गोष्ठी


बृहस्पतिवार, 27 सितम्बर 2007



नयी कहानी पहली पंक्ति के अग्रणी लेखक तथा मीडिया लेखन में दमदार भूमिका अदा करने वालेसाहित्यकार स्वर्गीय की स्मृति में सफ़र की ओर से विगत 18 फ़रवरी को तिमारपुर में एक गोष्ठी का आयोजन किया गया था जिसमें दिल्ली विश्वविद्यालय में प्राध्यापक श्री प्रभात रंजन और इतिहासकार एवं लेखक तथा 'दीवान-ए-सराय' श्री रविकान्त ने साहित्य के सामान्तर जनसंचार माध्यमों के लिए लेखन में एक समान दख़ल रखने वाले कमलेश्वर के लेखकीय जीवन के दोनों पहलुओं पर विस्तारपूर्वक चर्चा की थी. पेश है उसकी एक संक्षिप्त रपट: 
प्रभात रंजन के मुताबिक़ कमलेश्वर ऐसे वक़्त में दूरदर्शन से जुड़े जब भारत में टेलीविज़न की पहुंच सीमित थी. उस दौर के तमाम साहित्यकार रेडियो के लिए काम में रुतबा महसूस करते थे और टीवी के लिए काम करना दोयम दर्जे का समझा जाता था. तब कौन जानता था कि आज के लगभग दस हज़ार करोड़ के मीडिया साम्राज्य का सिरमौर दूरदर्शन ही बनने वाला है. पॉप्युलर मीडिया के कार्यक्रम, भले ही ज्यादा देखे जाने वाले एकता कपूर की धारावाहिकें ही क्यों न हो, हममें से कितने लोग उनके पटकथा लेखकों को जानते हैं, परंतु चन्द्रकांता जैसे मेगा हिट धारावाहिक हो या मौसम, आंधी, अमानुष, सौतन, हरजाई, गृहप्रवेश, आदि फिल्में – पटकथा लेखक कमलेश्वर को कभी पहचान का संकट नहीं रहा. कमलेश्वर तथा मनोहर श्याम जोशी हिन्दी के ऐसे जाने-माने साहित्यकार हैं जिन्होंने ये साबित कर दिया जनसंचार माध्यमों में भी रचनात्मका की गुंजाइश है, जबकि प्रेमचंद जैसे मूर्धन्य साहित्यकार ने सिनेमा जगत को सृजनात्मकता के लिए दमघोंटू माहौल करार दिया था. मीडियाकर्मी-साहित्यकार के आयामों को समेटे हुए कमलेश्वर ने अगर कितने पाकिस्तान जैसा चित्रात्मक धटनाप्रधान उपन्यास लिखा है तो वहीं डाकबंगला, रेगिस्तान कृतियों के ज़रिए भी उन्होंने अपना लोहा मनवाया है. मीडिया में सफ़ल कमलेश्वर का सामाजिक सरोकार भी उतना ही उल्लेखनीय रहा है. उन्होंने 1984 में कानपुर में चार बहनों की सामूहिक आत्महत्या की विषयवस्तु पर आधारित व़त्तचित्र की पटकथा भी तैयार की. प्रभात रंजन के मुताबिक कमलेश्वर ने केवल टेलीविज़न या रेडियो के लिए ही नहीं लिखा, बल्कि अख़बारी लेखन में भी उनकी धाक लम्बे समय तक कायम रहेगी. और तो और उन्होंने छोटे-छोटे शहरों और दूर-दराज के गांवों में जबरदस्त पहुंच बना लेने वाले ‘दैनिक भास्कर’ और ‘दैनिक जागरण’ जैसे अख़बारों के शुरुआती संपादक की भूमिका भी निभायी. एक ठेठ राजस्थानी तेवर लिए तो दूसरा पश्चिमी उत्तर प्रदेश और बोलियोंं में सना हुआ.
रविकान्त ने कहा कि कमलेश्वर भाषा के मामले में बेहद उदार थे. गंगा-जमुनी तहज़ीब कमलेश्वर के लेखन की बड़ी विशेषता थी. उन्होंने कहा, ‘कुछ भी नया करने के लिए बने-बनाए खांचों और वैचारिक दड़बों को तोड़ना पड़ता है और कमलेश्वर ने यह काम बख़ूबी किया.’ आज अंग्रेज़ी के मुक़ाबले हिन्दी में तकनीकी शब्दों की कमी है, और ऐसे में हमें हिन्दी-उर्दू के मिले-जुले शब्द भंडार को इस्तेमाल करने से नहीं हिचकना चाहिए. इससे हमारा शब्द भंडार और समृद्ध होगा. रविकान्त के अनुसार हिन्दी उर्दू के अल्फ़ाजों का जमकर इस्तेमाल करने वाले कमलेश्वर कॉपीराइट का भी जमकर विरोध करते हैं. कृष्णा सोबती और अमृता प्रीतम के बीच जिन्दगीनामा को लेकर हुआ विवाद हो या ऐसा ही कोई और प्रसंग, उन्होंने भाषा की राजनीतिक लड़ाई खड़ा करने वालों की जमकर खिंचाई की.
कमलेश्वर ऐसे महत्वाकांक्षी लेखक थे जिन्होंने जिस भी विधा में हाथ आज़माया उसको पूरी लगन और तन्मयता के साथ अंजाम तक पहुंचाया और कामयाबी हासिल की. उन्होंने हिन्दीभाषी लेखक के उस दुराग्रह को भी तोड़ा कि व्यावसायिक और कला सिनेमा के साथ रचनात्मक संतुलन नहीं कायम किया जा सकता है. वस्तुत: मनोहर श्याम जोशी और कमलेश्वर के निधन से हिन्दी जगत को बहुत बड़ी क्षति हुई है. आज मीडिया लेखन के नाम पर कुकुरमुत्तों की तरह उग आए मीडिया संस्थानों में रचनात्मक लेखन को लेकर कोई पहल नहीं की जा रही है, और इस लिहाज़ से कमलेश्वर की कमी और खलती है जो न केवल संवेदनशील रचनाकार थे बल्कि अपने आप में एक संस्थान भी.
डीए फ़्लैट्स के निवासियों के अलावा दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों ने भी इस परिचर्चा में भागीदारी की.

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