शुक्रवार, 20 अप्रैल 2012

मेरा पक्ष: पत्रकारिता की भूमिका

मेरा पक्ष: पत्रकारिता की भूमिका

पत्रकारिता की भूमिका यह एक बड़ा ही गंभीर और चुनौतीपूर्ण सवाल है। ज्यों-2 प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया का विस्तार हो रहा है, उसी तरह से इसका क्षरण भी भयानक तरीके से ही होता जा रहा है। आज मीडिया की उपयोगिता और बढ़ गयी है, मगर शुद्ध लाभ कमाने की नीयत से मीडिया में काबिज नवीन पीढ़ी पत्रकारिता को एक दुकान की तरह देख और माप तौल रही है। सत्ता से करीबी का मादक अवसर और ब्लैकमेलिंग के साथ साथ प्रीपेड़ पत्रकारिता के इस चलन में (फैशन भी कह सकते है।) तमाम आदर्शो और मूल्यों की बलि (सूली) दे दी गयी है। मीडिया एक साधन सा हो गया है जिसके बूते सता और नौकरशाहों पर लगाम रखकर अरना उल्लू सीधा किया जा रहा है। यह  चिंता की नहीं घोर चिंता की बात है। समाज हित के लिए प्रहरी की तरह काम तरने वाले ज्यादातर अखबार ही करप्ट संस्कृति के वाहक बनते जा रहे है।
एक दौर था जब कहा जाता था कि
जब तोप मुकाबिल हो तो अकबार निकालो
मगर आज तो अकबार और मीडिया का स्वरूप ही बदलता जा रहा है। समाज के दर्पण की तरह अखबार जनता के समक्ष एक सामाजिक आईना की तरह रोजाना सुबह आता है , जिसमें समाज के नब्ज का हाल पता चलता है। डालटेनगंज पलामू के दिवंगत शायर विनोद कुमार गौहर का एक शेर याद आ रहा है जिसमें उन्होनें कहा था या खुदा ये कौन सा दौर है आया हुआ, देखकर अखबार मेरा दिल है घबराया हुआ
इसी तरह औरंगाबाद के हाल ही में दिवंगत हुए युवा शायर प्रदीप कुमार रौशन मीडिया के बारे में कहते हैं कि - मेरे युग में कृष्ण है टीवी ौर गीता अखबार है
सुन ओ नीली छतरी वाले ये दुनिया बीमार है
सही मायने में आज पत्रकारिता अपनी भूमिका भूल गयी है और कहीं से किरण उम्मीद की दिख नहीं रही है, क्योंकि हालात बेहतर होने की बजाय बदतर से हो रहे है। देखना है कि क्या हम इस हालात में आत्मपरीक्षण करने के लिए या अपनी भूमिका से पीछे हटते रहने के सामाजिक कलंक और दाग (लांछन) के प्रति क्या सोच भी रहे हैं ?
इसका उत्तर यदि नहीं है तो मान लिया जाे कि पत्रकारिता का लंका कांड दौर चालू हो गया है , जहां पर संपादकों की तरह ही पत्रकारों (असली पत्रकार) का भी लापत्ता होने का दौर चालू हो गया है। और भयानक तरीके से पत्रकारिता अपनी भूमिका और दायित्व से भटक गयी है।

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