सोमवार, 2 अप्रैल 2012

जर्नलिज्म और समाज के लिए के लिए शुभ संकेत / राजेंद्र तिवारी





पिछले हफ्ते पटना में पत्रकारिता के छात्रों से डायलाग का मौका मिला. मैं आशंकित था कि जिस तरह पत्रकारिता की पढ़ाई या यूं कहें कि अपने देश में जिस तरह की पढ़ाई होती है, इन युवाओं की बौद्धिक त्वरा और सरोकार को लेकर. हम उनके इंस्टीट्यूट में ही पहंचे. करीब 40 छात्र-छात्राएं वहां मौजूद थे. डायलाग का कार्यक्रम निहायत ही मोनोलाग शैली में रखा गया नजर आ रहा था. मुङो लगा कि यहां भी प्रवचन टाइप भाषणबाजी होगी और फ़िर सम्मान वगैरह. हमने मन ही मन इसका स्वरूप, अपनी बात को बातचीत में बदल कर, डायलाग वाला बना देने की दिशा में ले जाने का निश्चय किया. लेकिन जो दिक्कत नजर आ रही थी, वह यह थी कि छात्र-छात्राएं शायद रेस्पांड न करें.
खैर, कार्यक्रम शुरू हआ. हमें बोलने को बुलाया गया. शुरुआती हिचक खत्म कर पाने में जब मैं कामयाब हआ, तो छात्र-छात्राएं हर मसले पर रेस्पांड करने लगे. इनमें से कई 12वीं पास करके इंस्टीट्यूट में आये थे. इनकी बातें व चिंताएं जमीनी हकीकतों की ओर इशारा कर रही थीं. मैं उनसे बात करते-करते सोच रहा था कि हममें से कितने पत्रकार ऐसे होंगे, जो इस तरह की विचार प्रक्रिया से गुजरते होंगे.
कुछ छात्र-छात्राओं ने प्रभात खबर में प्रकाशित राबिन जेफ्री के साक्षात्कार का जिक़्र करते हए बाजारवाद के कंटेंट का मुद्दा उठाया. कुछ ने काटजू के बयान का जिक़्र किया. कुछ की चिंता कारपोरेट ओनरशिप को लेकर भी थी. खबर और कापी राइटिंग पर भी बात हई.
जर्नलिज्म की फ़ंडिग पर भी बात उठी कि प्रकाशित होनेवाले कंटेंट के बूते अखबारों की मार्केटिंग क्यों नहीं होती? हमारा समाज, हमारा पाठक अपने लिए होनेवाले जर्नलिज्म के पोषण की जिम्मेदारी क्यों नहीं लेता? यह सवाल पत्रकारिता को लेकर इस समय उठ रहे सभी सवालों के मूल में हैं, चाहे वह पेड न्यूज का सवाल हो, मीडिया की ओनरशिप का सवाल हो या मीडिया में जवाबदेही का सवाल हो. इसका मतलब यह हआ कि युवा पाठक इन सवालों पर सोचता है और शायद थोड़ा-बहत अखबारों और चैनलों को इन सवालों के बरक्स तोलता भी होगा. अगर ऐसा है, तो जर्नलिज्म के लिए यह शुभ संकेत है और प्रकारांतर में समूचे समाज और देश-दुनिया के लिए भी.
-लखेरा ब्वाय से सूटेबल ब्वाय-
अभी हाल में ही मैंने आउटलुक पत्रिका के प्रधान संपादक रहे विनोद मेहता की संस्मरणात्मक जीवनी लखनऊ ब्वाय पढ़ी. भारतीय पत्रकारिता, भारतीय अखबारों में कंटेंट के सुरुचिपूर्ण प्रस्तुतीकरण, संपादक संस्था को सुदृढ़ करने में विनोद मेहता का योगदान क्या रहा, इस बारे में तमाम टिप्पणियां और समीक्षाएं उनकी पुस्तक को लेकर आ चुकी हैं और आ रही हैं. संस्मरण में साफ़गोई और ईमानदारी 100 फ़ीसद है, यह भी इस पुस्तक की तारीफ़ में कहा जा रहा है, लेकिन इसका एक पक्ष ऐसा है, जिसके चलते हर एक के लिए यह पुस्तक पढ़नेयोग्य बन जाती है. इस पक्ष को किसी ने जिक़्र करने लायक नहीं समझा.यह पुस्तक बताती है कि यदि कोई व्यक्ति जीवन के किसी मोड़ पर कुछ करने की ठान ले, तो वह कर सकता है. विनोद मेहता पढ़ने में औसत से भी नीचे थे, सामान्य ज्ञान सतही था, छात्र जीवन में उनके क्रियाकलाप बिलकुल लखेरे नौजवानों जैसे थे. साहित्य, राजनीति, समाज में उनकी समझ बिलकुल वैसी ही थी, जैसी सामान्य लोगों की होती है. लेकिन उन्होंने राह बदली, लखेरा ब्वाय से सूटेबल ब्वाय बन गये और वह धीरे-धीरे देश के सबसे काबिल संपादकों में शुमार किये जाने लगे.
-शिक्षक और राष्ट्र-
इन दिनों एक स्कूल की दीवार पर लिखी चंद लाइनों की तसवीर सोशल नेटवर्किंग साइटों पर घूम रही है. यह तसवीर पता नहीं किस स्कूल की है, पर इसमें कही गयी बात बड़ी मौजूं है. आप भी पढ़ें ये चंद लाइनें..
एक इंजीनियर की गलती
ईंट व चूने में दब जाती है.
एक चिकित्सक की गलती
कब्र में दब जाती है.
एक वकील की गलती
फ़ाइल में छिप जाती है.
जबकि, एक शिक्षक की
गलती राष्ट्र के जीवन में झलकती है.
-और अंत में-
हंस के फ़रवरी अंक में सहरसा के गौतम
राजरिशी की गजल पर नजर ठहरी. आप भी पढ़िए..
कितने हाथों में यहा हैं कितने पत्थर, गौर कर
फ़िर भी उठ-उठ आ गये हैं, कितने ही सर, गौर कर
आसमां तक जा चढ़े सेंसेक्स अपने देश का
चीथड़े हैं अब भी कितनों के बदन पर, गौर कर
जो यहां जितना बड़ा, उतनी बड़ी है उसकी भूख
कितने दरियाओं को निगले इक समंदर,गौर कर
घूम आते हैं विदेशों से तो अक्सर यार लोग
अपनी है हर दिन कवायद घर से दफ्तर,गौर कर
उनके ही हाथों देखो बिक रहा है हिंदोस्तान
है पहन रखा जिन्होंने तन पे खद्दर, गौर कर
ये बुजुर्गो की हवेली कब तलक चमकेगी यूं
कहते क्या दीवार से टूटे पलस्तर, गौर कर
जो पढ़ें आंखें मेरी, मुझको वो दीवाना कहे
तू भी तो इनको कभी फ़ुरसत से पढ़ कर, गौर कर
आप सबको होली की बहुत-बहुत मुबारकबाद
(कारपोरेट एडीटर प्रभात खबर)

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