शुक्रवार, 6 अप्रैल 2012

क्या है स्टिंग ऑपरेशन ? / बिनित भारती



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स्टिंग शब्द 1930 के अमेरिकन स्लेंग से निकला है जिसका अर्थ है, चोरी या धोखेबाजी की क्रिया, जिसकी योजना पहले से ही तैयार कर ली गई हो।1970 के आस-पास यह शब्द अमेरिकन उपयोग में आने लगा जिसका अर्थ था, पुलिस के द्वारा डिजाइन गुप्त आपरेशन जो किसी अपराधी को फंसाने के लिए जाते थे।
धीरे-धीरे स्टिंग किसी अपराधी को पकड़ने के लिए जाल बिछाने का पर्याय बन गया है। अपराधियों को धोखे में रखकर की जाने वाली इससे क्रिया में कई प्रकार से काम किया जा सकता है। किसी ड्रग सप्लायर को पकडने के लिए अवैध दवा खरीदना, रिश्वतखोर को खास तरह की पेशकश या किसी वेश्या अथवा दलाल को पकड़ने के लिए ग्राहक बनाकर भेजना जैसे काम जो खुफिया पुलिस अपने मिशन के लिए करती थी , वह पत्रकारिता ने अपना लिया है।
भारत में स्टिंग परंपरा के बीज पिछले पांच सालों में पडे़ है और बडी़ राजी से यह अपनी जड़े जमा रहा है। विदेशों से उधार ली गई यह परंपरा आज भारतंीय बाजार पर भी अच्छा खासा असर डाल रही है। पश्चिमी देशों से उधार लिए गए पत्रकारिता मंत्र स्टिंग आपरेशनका इस्तेमाल न्यूज चैनल अपनी टी आर  पी बढ़ाने के लिए बखूबी कर रहे है। इतना ही नहीं बाजार में खड़े दर्शकों व विज्ञापनों को खींचने में एक स्टिंग के लाखों बोली लग रहे है। विभिन्न चैनलों पर धड़ाधड़ दिखाए जा रहे स्टिंग आपरेशन कई तरह के होते है, जिनमें पहले  से गैरकानूनी या असामाजिक कार्य करने वालों को लगाया जाता है फिर बड़े तरीके से पुख्ता सबूतों के साथ फंसा लिया जाता है। इसके और बहुत से पहलू है जिन पर हम  आने वाले अध्यायों में चर्चा करेंगे।

विदेशी स्टिंग आपरेशन
एबस्केमः  एबस्केम 1980 का यू एस स्कैंडल है। एफ बी आई द्वारा चलाया  गया स्टिंग आपरेशन जिसे कांग्रेस की सदस्यों को रिश्वत लेते रंगे हाथों पकड़ने के लिए किया गया था। एफ बी आई ने 1980 में अब्दुल एंटरप्राइजेज लिमिटेड नाम की कंपनी बनाई। अधिकारियों को एक काल्पनिक शेक के राजनीति समर्थन के लिए पैसा दिये जाने का प्रस्ताव रखा। एबस्केम एस बी आई द्वारा  किया जाने वाला बड़ा आपरेशन था जिसमें हैरीसन ए विलियम्स , जॉन जेनरेट , रिचर्ड कैली, रेमंड़, लेडरर, जैसे अनेक वरिष्ठ पकड़े गए। एफ बी आई पर भी एनटेªपमेंट का आरोप लगा। इस केस का रोचक पहलू था। जहां एक-एक करके बड़े नेताओं की पोल खुल रही थी , वही इसमें यू एस सीनेटर लैरी प्रेसलर साफ बच निकले। ऑपरेशन के दौरान उन्हें भी रिश्वत लेने से इंकार कर दिया। इस एबस्केम माॅडल से पूरे यूरोप में 1980 के दौरान कई तरह के इन्वेस्टीगेशन हुए।
कॉप्स इन शॉप्सः यह अमेरिका में एल्कोहल कानून प्रवर्तन प्रोग्राम है,जिसका उद्देश्य 21 साल से कम उम्र के लोगों में शराब की प्रवृत्ति को कम करना है। साधारण वेशभूषा में पुलिस अधिकारी शराब की दुकानों पर तैनात होते हैं ताकि धोखे से युवाओं को पकड़ा जा सके।
आपरेशन पिन: आपरेशन पिन एफ बी आई, इंटरपोल, रॉयल कैनेडियन पुलिस और आस्ट्रेलिया हाइटेक क्राइम सेंटर द्वारा तैयार किया गया है जिसका उद्देश्य चाईल्ड पोर्नोग्राफी में लिप्त लोगों के काले कारनामों को उजागर करना था।इस आपरेशन में ऐसी वेवसाइटों की रचना और संचालन शामिल था जो अवैध तसविरों का बहकावा देती थी। वेवसाइटों के इस नेटवर्क को हनीपॉट कहा जाता था।
बेटकार: बेट कार का उपयोग वाहन चोरों के लिए किया जाता है। इस आपरेशन में उपयोग होने वाली कार को बेट कार कहा जाता है। इस वाहन की  विशेषता होती है कि उसमें बुलेट प्रूफ ग्लास, विडियो कैमरा जिनमें ऑडियो, टाइम और तारीख रिकार्ड हो जाती है और इंजन को खराब करने व दरवाजों को रिमोड के साथ लॉक करने की क्षमता होती है।
एजेंट प्रोवोकेटर: एजेंट प्रॉवोकेटर एक ऐसा व्यक्ति होता है जो हिंसा, वाद-विवाद बहस या अराजक माहौल बनाने का काम करता है। दरअसल वह व्यक्ति खूफिया विभाग या पुलिस का आदमी होता है जो अपराध में लिप्त होकर अपराधियों की जड़ों तक पहुंचाने का काम करता है। इस प्रोवोकेटरों का काम स्टिंग आपरेशन के तहत आता हैं।

भारत में स्टिंग ऑपरेशन

कास्टिंग काऊच

2005 में इंडिया टी वी द्वारा बालीवुड में चलाया गया शक्ति कपूर का चर्चित आपरेशन था- कास्टिंग काऊच। कास्टिंग काऊच में यूरोपीयन खुफिया विभाग के हनी ट्रेप स्टिंग आपरेशन की तकनीक का इस्तेमाल हुआ था।हनी टेªप में अपराधिक और अनैतिक काम करने वालों को धोखे से स्वंय को पुलिस, संगठन के हवाले करने का प्रलोभन दिया जाता है। जहां पर स्टिंग आपरेशन का लक्ष्य कोई संदिग्ध व्यक्ति होता है उसे  किसी विशिष्ट अपराध की स्वीकृति करते हुए पकड़ने के लिए जाल बिछाया जाता है। जासूसी भाषा में हनी टेप का इस्तेमाल सोवियत और इस्टर्न यूरोपियन इंटेलिजेंस सर्विसेज के द्वारा किया जाता रहा है। जिसमें महिलाएं , व्यापारियों और अधिकारियों के अवैध संबंधों को  उजागर करने में मदद करती थी।
एक मशहूर अभिनेता पर कास्टिंग काऊच में अभिनेता को एक लड़की के साथ जबरदत्ती करते हुए दिखाया गया था। यह आपरेशन एक पूर्व तैयार की गई योजना के तहत संपंन हुआ। इसमें कास्टिंग काऊच करने वाली टीम में शामि एक महिला उक्त अभिनेता से मिलने एक होटल के कमरे में जाती है और उससे फिल्मों में रोल दिलवाने के लिए आग्रह करती है और अपने आग्रह को अलंकरित करते हुए मोहक अदाओं के साथ सुरा पान भी कराती है। वह उक्त अभिनेता में उत्तेजना का संचार करती है और जब वह उत्तेजित हो जाता है तो यह बात के साथ रिकार्ड कर ली जाती है। पूरी टीम लड़की का साथ देने पहुंच जाती है और हो गया कॉस्टिंग काऊच।

इस तरह के प्रयोगों का एक उद्धेश्य समाज मंे व्याप्त उन बुराइयों को सामने लाना है जिनके बारे में सिर्फ सुना जाता है, देखा बहुत कम जाता हैं इन छुपी हुई सच्चाइयों से पदा्र उठाने का कार्य कास्टिंग काऊच कर रहा है।

ऑपरेशन दुर्योधन:  एक नजर

धन लेकर संसद में प्रश्न पूछना और क्षेत्र विकास योजना निधि में कमीशन खाने की बिमारी भारत के संसदीय लोकतंत्र में मुद्दत से मिली हुई थी। पैसे लेकर प्रश्न लगाने का रोग तो प्रथम लोकसभा को ही लग गया था। लेकिन तब इक्का दुक्का सांसद ही उसकी गिरफ्त में थे। अब वह महामारी का रुप ग्रहण कर चुका  है। 12 दिसम्बर के स्टिंग आपरेशन दुर्योधन से तो यही संकेत मिलता है। आपरेशन दुर्योधन की चपेट में आए 11 सांसदों के लोकसभा से निष्कासन की आशंका बलवती हो गई है। पवन बंसल की अध्यक्षता में गठित जांच समिति की सिफारिश का सदन में  विरोध करना  कठिन हो गया था। मीडिया का आपरेशन शंकास्पद हो सकता है, परंतु दुर्भाग्यवश राजनीतिज्ञों की जो छवि बन चुकी है उनके समर्थन में खुलकर खड़े होने का साहस शायद ही कोइ्र जुटा सके। विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की सर्वोच्च पंचायत , संसद को अपनों ने ही शर्मशार किया । यह सच है कि आजादी के बाद से ही देश में राजनीति और राजनेताओं की प्रतिष्ठा लगातार गिरी है। आजकल काम कम और हंगामा ज्यादा होने के चलते सवालों के घेरे में तो संसद भी कई बार आई है, पर उसकी साख पर ऐसी चोट कभी नहीं हुई, जैसी 12 दिसम्बर को हुई। चार वर्ष पहले 13 दिसम्बर को पांच फंसाए जाने की शिकायत कर रहे है पर  आपरेशन दुर्योधन में दिखाए गए विडियो- ऑडियो टेपों पर विश्वास करें तो इन लोगों ने 15 हजार रुपये से लेकर एक लाख 10 हजार रुपये तक की रिश्वत ली। सबसे कम 15 हजार भाजपा के छत्रपाल सिंह लोधी को मिले, तो सबसे ज्यादा एक लाख 10 हजार मनोज कुमार को। तहलका प्रकरण से चर्चित हुए अनिरूद्ध बहल की कोबरापोस्ट डॉट कॉम आठ महीने की मेहनत और लगन के बाद किया गया यह खुलासा कितना सनसनीखेज था, इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि संसद पहुंचने से पहले ही स्पीकर सोमनाथ चटर्जी खुद पहल कर सदन के नेता प्रणव मुखर्जी और विपक्ष नेता लालकृष्ण आडवाणी से फोन पर बात कर चुके थे।
जिन 11 सांसदों को आपरेशन दुर्योधनमें नकद रिश्वत लेते हुए दिखाया गया है, उनमें से भाजपा के छत्रसाल ही केवल राज्य सभा सदस्य है, शेष सभी 10 लोकसभा के सदस्य है। 11आरोपी सांसदों में से  सर्वाधिक छह भजपा के है। जाहिर है कि, साफ-सुथरी राजनीति की हामी भाजपा के लिए अपने रजत वर्ष में यह प्रकरण किसी बड़े हादसे से कम नहीं है।

सो, भाजपा नेतृत्व ने सभी छह आरोपी सदस्यों को संसदीय दल से निलंबित कर कारण बताओ नोटिस जारी करने और बाल आप्टे की अध्यक्षता  में जांच समिति बनाने में देर नहीं लगाई। आरोपी सांसदों में दूसरी बड़ी संख्या बसपा के सांसदों की रही। उसके तीन सांसद रिश्वत लेते दिखाए गए। बसपा प्रमुख मायावती ने हालांकि इसके पीछे अपनी राजनीतिक प्रतिद्वंदी समाजवादी पार्टी की साजिश होने का आरोप लगाया पर आरोपी सांसदों को निलंबित कर दिया। अकेले राजद प्रमुख लालू यादव अपने दल  के आरोपी सांसद मनोज कुमार के विरू़द्ध सख्त कार्रवाई करने शुरू में हीला हवाला करते रहे।
प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु के कार्यकाल में महाराष्ट्र के लोकसभा सदस्य एच जी मुदगल को ऐसे ही आरोप में सदस्यता गंवानी पड़ी थी। छह जून 1951 को मुदगल पर आरोप लगा था कि उन्होंने प्रश्न पूछने के लिए एक हजार रुपए लिए थे। खुलासा होने पर स्वंय प्रधानमंत्री नेहरु ने  उनकी सदस्यता समाप्ति का प्रस्ताव रखा। लोकसभा अध्यक्ष ने टी टी कृष्णामाचारी की अध्यक्षता में जांच समिति गठित की। इस समिति ने मुदगल की बर्खास्तगी की सिफारिश की, पर सदन के फैसले से पहले ही खुद मुदगल ने इस्तीफा दे दिया।

सब कुछ कैमरे और टेप पर होने के बावजूद न जांच इतनी आसान है, आर न ही सजा, पर इस प्रकरण के परिणाम पर राजनीति ही नहीं, संसद की साख भी निर्भर करेगी।
राजनीति के गलियारों में चर्चा इस बात की भी है कि कुछ और खोजी कैमरों ने अनेक और सांसदों को रिश्वत तथा कमीशन खाने के साक्ष्यों में जकड़ रखा है। अनेक सांसद इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की नियोजित ढ़ंग से डंक मारने की इस प्रवृत्ति को संसदीय लोकतंत्र से लोक विश्वास को डगमगाने के षडयंत्र के रुप में देखा जा रहे है। जहां तक सांसदों द्वारा क्षेत्र विकास योजना निधि के तहत होने चाले कार्यों में कमीशन खाने की बात है वह एक बहुज्ञात तथ्य है। प्रायः सभी पार्टियों के अनेक सांसद ऐसा करते है। इस लिए लोकसभा में इस निधि को समाप्त करने की सहमति बन सकती है। फिलहाल तो वातावरण इसके पक्ष में दिखाई दे रहा है। दरअसल न केवल सांसदों बल्कि विधानसभाओं के सदस्यों द्वारा भी इस निधि में कमीशान खाने की प्रवृत्ति चर्चा में रही है।क्षेत्र विकास योजना निधि के तहत प्रत्येक सांसद को प्रतिवर्ष करोड़ रुपए मिलते है। दिल्ली का प्रत्येक विधायक प्रति वर्ष 2 करा़ेड़ तक क्षेत्र विकास योजना में खर्च कर सकता है। लंबे समय से शिकायतें मिलती रही हैं कि सांसद और विधायक इस निधि से कराए जाने वाले कार्यों में कमीशन खाते है कही-कही तो यह कमीशन 40 प्रतिशत होने की शिकायतें मिलती रही है। इस आधार पर इसे समाप्त करने की मेंग उठती रही है।

अक्सर कहा जाता है कि सांसद और विधायक धन कमाने के अवैध तरीकें इसलिए अपनाते है कि उन्हें चुनाव लड़ना होता है। चुनाव में दिनों-दिन इस कदर खर्चीले होते जा रहे है कि निष्ठावान सांसद या विधायक अपने साधनों के बूते खर्च की स्पर्धा में टिक नहीं सकते।इसलिए पिले अनेक वर्षों से मांग उठ रही है कि चुनावी खर्च सरकार द्वारा उठाया जाए।
क्षेत्र विकास योजना की निधि में कमीशन की सौदेबाजी के आरोप में जिन पांच सांसदों को आपरेशन चक्रव्यू हके कैमरे में दर्ज किया है, उस पर लोकसभा में चचा्र के दौरान प्रतिपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी ने एक व्यवहारिक सुझाव दिया। उनका कहना था कि सांसद निधि समाप्त कर दी जाए।उस निधि में जो 7,500 करोड़ रुपए चुनाव व्यय दिए जाते है उनका उपयोेग चुनावों  पर खर्च के लिए सरकार एक निधि बना सकती है। बहुत संभव है लोकसभा इस प्रस्ताव को स्वीकार कर ले। इस सुझाव का विरोध करने का साहस कुछ धन-पिशाच ही कर सकेंगे। यह व्यवस्था यथाशीघ्र लागू हो सकती है। यदि सांसद निधि समाप्त करने का निर्णय होता है तो राजनीति के शुद्धिकरण की प्रक्रिया शुरू होगी, जिसका विसतार विधानसभाओं तक किया जाना चाहिए।……जारी………….

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अन्ना को मीडिया ने नहीं,कांग्रेस ने नायक बनाया
 राजदीप सरदेसाई
http://www.wisdomblow.com/hi/wp-content/uploads/2011/12/hazare.jpgआमतौर पर मीडिया जिन्हें चढ़ाता है, उन्हें गिरा भी देता है। सीएनएन आईबीएन के इंडियन ऑफ द ईयर अवार्ड के दौरान अन्ना हजारे ने बड़े भोलेपन से स्वीकारा कि उन्हें महाराष्ट्र के क्षेत्रीय नेता से राष्ट्रीय आइकॉन बनाने के लिए मीडिया जिम्मेदार था। यदि आपके कैमरे हर जगह मेरा पीछा नहीं करते तो भला मुझे कौन जानता?’ यह इस समाजसेवी का ईमानदार वक्तव्य था।
अब वही मीडिया मुंबई में अन्ना के फ्लॉप शो की खबरें मुस्तैदी से दिखा रहा है और हमें बता रहा है कि किस तरह एक आंदोलन एंटी-करप्शन से एंटी-कांग्रेस बन गया और किस तरह अन्ना के अनशन दबाव बनाने वाले ब्लैकमेल की तरह हो गए। गत सप्ताह मणिशंकर अय्यर, जो कि सत्ता-वर्ग के अंतिम मूर्तिभंजक हैं, ने अन्ना को फ्रैंकेंस्टीन मॉन्स्टरबताया। अय्यर अनेक नेताओं के इस दृष्टिकोण को ही प्रतिफलित कर रहे थे कि मीडिया द्वारा रचे गए अन्ना संसदीय लोकतंत्र के लिए खतरा बनते जा रहे हैं। लेकिन क्या अन्ना की लार्जर दैन लाइफ छवि के लिए मीडिया ही जिम्मेदार था?
इसमें कोई शक नहीं कि पिछले नौ माह में अन्ना हजारे के सलाहकारों ने मीडिया का बेहतरीन इस्तेमाल किया। प्राइम टाइम प्रेस वार्ताएं, मेड फॉर टीवी तमाशे, सोशल नेटवर्किग, अन्ना को मीडिया कवरेज की अधिकता से बहुत लाभ मिला। हां, कुछ अवसरों पर मीडिया का कवरेज अतिनाटकीय था और कुछ पत्रकार अन्ना के चीयरलीडर भी बन गए, लेकिन अन्ना को विशुद्ध रूप से मीडिया द्वारा रची गई परिघटना के रूप में देखना एक गंभीर भूल ही होगी। लोग अन्ना की ओर केवल इसीलिए आकर्षित नहीं हुए थे, क्योंकि सभी टीवी कैमरे उनकी ओर खिंचे चले जा रहे थे। लोग अन्ना की ओर इसलिए आकर्षित हुए थे, क्योंकि वे उन्हें नैतिक रूप से कंगाल राजनीतिक नेतृत्व का विलोम जान पड़े थे।
अप्रैल की घटनाओं को याद करें, जब अन्ना पहली बार राष्ट्रीय परिदृश्य पर उभरे थे। जंतर-मंतर पर किए गए अपने पहले अनशन से ठीक पहले अन्ना प्रेस क्लब में एक प्रेस कांफ्रेंस में शामिल हुए थे। कांफ्रेंस में नाममात्र की संख्या में लोग मौजूद थे और अन्ना काफी हद तक राष्ट्रीय मीडिया के लिए विस्मय का विषय ही थे। लेकिन अनशन द्वारा सुर्खियों में जगह बना पाने से भी पहले वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री शरद पवार द्वारा लोकपाल के लिए गठित मंत्रिसमूह से त्यागपत्र देना अन्ना के इस दावे को लगभग उचित ठहराना ही था कि एक भ्रष्टमंत्री एंटी-करप्शन लॉ पेनल में नहीं हो सकता।
दो दिन बाद जब सरकार ने अपने आधिकारिक राजपत्र में औपचारिक अधिसूचना जारी करते हुए एक सशक्त लोकपाल बिल का मसौदा तैयार करने के लिए संयुक्त ड्राफ्टिंग कमेटी गठित की तो इससे अन्ना के आंदोलन को और बल मिला। कमेटी के सदस्यों में आधे सरकार के मंत्री थे और आधे टीम अन्नाके सदस्य। ९ अप्रैल तक अन्ना भ्रष्टाचार-रोधी कानून पर जारी बहस में महज एक और आवाज भर ही थे, लेकिन उन्हें और उनकी टीमको लोकपाल पर सरकार से औपचारिक वार्ता करने की अनुमति मिलते ही वे सिविल सोसायटीके एकमात्र प्रवक्ता बन गए। अचानक वे अरुणा रॉय, लोकसत्ता के जयप्रकाश नारायण सहित लोकपाल कानून पर कड़ी मेहनत कर चुके कई अन्य समाजसेवियों जितने ही प्रतिष्ठित हो गए।
क्या मीडिया ने सरकार से कहा था कि टीम अन्ना को सिविल सोसायटी की ओर से वार्ताकार बनाए या यह एक ऐसी सरकार का विचार था, जो गैरसरकारी संगठनों को संतुष्ट करने को आतुर थी? जब ड्राफ्टिंग कमेटी में सरकार की ओर से चर्चा करने के लिए कांग्रेस के मंत्रियों को नियुक्त कर दिया गया, तब तो यह पूरी जोर-आजमाइश प्रभावी रूप से कांग्रेस बनाम टीम अन्ना बनकर रह गई। यदि 9 अप्रैल को सरकार से गलती हुई थी तो 5 जून को तो वह भारी भूल ही कर बैठी। कालेधन के मसले पर अनशन कर रहे बाबा रामदेव के आंदोलन को समाप्त करने के लिए दिल्ली पुलिस ने आधी रात को बलप्रयोग किया, जबकि महज 72 घंटे पहले सरकार के चार वरिष्ठ मंत्री योग गुरु की अगवानी करने हवाई अड्डे पहुंचे थे।
लेकिन सबसे बड़ी भूल हुई 16 अगस्त को, जब दिल्ली पुलिस ने अपने दूसरे अनशन की तैयारी कर रहे अन्ना को गिरफ्तार कर लिया। पहले अन्ना को अनशन स्थल प्रदान करने में आनाकानी करके और फिर न्यायिक हिरासत में भेजकर सरकार ने उन्हें एक भ्रष्टाचार विरोधी कार्यकर्ता से एक शहादतपूर्ण मसीहा में बदल दिया। अन्ना के अप्रैल अनशन के दौरान उनके मंच पर भारत माता का विशाल पोस्टर था और बाबा रामदेव भी मंचासीन थे, लेकिन अगस्त में रामलीला मैदान पर हुए अनशन के दौरान भारत माता के पोस्टर की जगह महात्मा गांधी के चित्र ने ली और बाबा रामदेव भी मंच से दूर हो गए।
अन्ना की गिरफ्तारी के बाद देशभर में हजारों की संख्या में लोग सड़कों पर उतर आए। अब यह केवल लोकपाल कानून की लड़ाई ही नहीं रह गई थी, बल्कि यह एक भ्रष्ट और अहंकारी माने जाने वाले सत्तातंत्र के प्रति आम जनता का मोहभंग था। आक्रोशित भारतीयों के लिए अन्ना का त्यागपूर्ण व्यक्तित्व सबसे महत्वपूर्ण प्रतीक बन गया। मैं भी अन्नाटोपियों और टी-शर्ट की भारी बिक्री ने इस आंदोलन का पूरी तरह वैयक्तिकरणकर दिया। जब संसद ने अन्ना का अनशन समाप्त कराने के लिए हड़बड़ी में लोकपाल बिल लाने पर प्रस्ताव पारित किया, तो इसे अन्ना की संपूर्ण विजय माना गया। लेकिन क्या मीडिया ने सरकार को अन्ना की गिरफ्तारी के लिए बाध्य किया था या वह एक घबराए हुए सत्तातंत्र का बुद्धिहीन कृत्य था?
वास्तव में सरकार और टीम अन्ना दोनों ने इस माध्यम को समझने में भूल की। टीम अन्ना ने उन्मादी कवरेज को अपना हथियार मान लिया, लेकिन यह भूल गई कि लोकतांत्रिक राजनीति कोई टीवी धारावाहिक नहीं, बल्कि वार्ताओं और समझौतों की एक यंत्रणापूर्ण प्रक्रिया है। दूसरी तरफ सरकार भी नहीं समझ पाई कि कर्कशता हमेशा उस मीडिया के परिवेश का एक अनिवार्य अंग होगी, जिसकी देशभर में 350 से अधिक समाचार चैनल और सैकड़ों ओबी वैन हैं। मीडिया आगे भी न केवल टीम अन्ना, बल्कि अनेक आंदोलनों का लाउडस्पीकर बना रहेगा। सशक्त नेता इस शोरगुल से व्यथित नहीं होंगे और विवेकशील सिविल सोसायटी कैमरा लेंसों के बिना भी समाज की मान्यता पाती रहेगी।
साभार-दैनिक भास्कर
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ऑनलाइन के जमाने में घोड़ागाड़ी का भला क्या काम

प्रकाश प्रियदर्शी
http://www.wisdomblow.com/hi/wp-content/uploads/2011/11/online-account-managing-300.jpg सूचना क्रांति के इस दौर में तकनीक ने जीवन के हर क्षेत्र में अपनी जोरदार उपस्थिति दर्ज कराई है। तकनीक ने अपनी दक्षता से लोगों के जीवन को सरल एवं सुगम बना दिया है। जहां तक बैंकिंग परिचालन की बात है तो तकनीक के इस्तेमाल से अब घंटों का काम मिनटों में हो जाता है। आज जितनी तेजी से बैंकिंग एवं अन्य वित्तीय परिचालन कार्य होते हैं कुछ साल पहले तक इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। अब तमाम तरह के बैंकिंग एवं अन्य वित्तीय परिचालन कार्य ग्राहकों की सुविधा के लिहाज से ऑनलाइन उपलब्ध है। आप इन सेवाओं का लाभ आसानी से ले सकते हैं। इसके लिए आपको घर से बाहर जाने या कोई भारी भरकम प्रयास करने की जरूरत नहीं है। यदि घर में इंटरनेट की सुविधा हो तो इतना ही काफी है। हम यहां विभिन्न प्रकार के बैंकिंग, बीमा एवं अन्य वित्तीय सेवाओं की चर्चा कर रहे हैं जो ग्राहकों के लिए ऑनलाइन उपलब्ध हैं।
बैंकिंग सेवाएं
खाता खोलना -बैंक में यदि आप किसी तरह का खाता खोलना चाहते हैं तो इसे आप कुछ ही मिनटों में कर सकते हैं। इसके लिए आपको संबंधित बैंक की ऑनलाइन सेवाओं का इस्तेमाल करना होगा। मान लें कि आप एचडीएफसी बैंक में सेविंग एकाउंट खोलना चाहते हैं तो इसके लिए आप इस बैंक के ऑनलाइन आवेदन फॉर्म पर क्लिक करिए। वहां आपसे सारी आवश्यक जानकारी मांगी जाएगी मसलन आवेदक का पहला नाम, अंतिम नाम, मोबाइल नंबर, पता, ईमेल आईडी, शहर का नाम, संबंधित बैंक की नजदीकी शाखा आदि। यदि आप ये सारी जानकारी उपलब्ध करा देते हैं तो आवेदन पूर्ण माना जाता है एवं बैंक के प्रतिनिधि शीघ्र ही अन्य प्रक्रियाओं को पूरा करने के लिए आपसे संपर्क करेंगे और इसके बाद संबंधित बैंक में आपका खाता खुल जाएगा। सिर्फ बचत खाता ही नहीं आप चाहें तो कई प्रकार के बैंक खाते ऑनलाइन तरीके से खोल सकते हैं। मसलन-करेंट एकाउंट, डिमैट एवं ट्रेडिंग एकाउंट आदि। इसके अलावा एफडी या रिकरिंग डिपोजिट संबंधी सुविधा भी ऑनलाइन उपलब्ध है।
फंड ट्रांस्फर: ऑनलाइन बैंकिंग के जरिए आप आसानी से फंड ट्रांसफर कर सकते हैं। ग्राहक फंड ट्रांसफर करने के लिए बैंक शाखा में लंबी-लंबी कतारों में लगने से बच सकते हैं। कुछ मिनटों के प्रयास भर से आप घर बैठे फंड ट्रांसफर कर सकते हैं। लेकिन ाइसके लिए आवश्यक है कि आप जिस भी ब्रांच में फंड ट्रांस्फर कर रहे हैं उसका आईएफएससी कोड आपको पता हो। यदि आईएफएससी कोड  आपको पता न हो तो भी घबराने की जरूरत नहीं है। वेबसाइट पर लगभग सभी बैंकों के सभी ब्रांचों का संपर्क पता एवं फोन नंबर दिया रहता है। आप उस नंबर पर कॉल करके संबंधित शाखा से यह कोड पता कर सकते हैं। हम अपने पाठकों को यह भी बताते चलें कि ऑनलाइन फंड ट्रांसफर भी दो तरह के  होते हैं एनईएफटी और आरटीजीएस। यदि ग्राहक एनईएफटी माध्यम से फंड ट्रांसफर करते हैं तो इसे डिलिवर होने में थोड़ा समय लगता है पर आरटीजीएस माध्यम से काफी त्वरित ट्रांसफर होता है इसमें महज 30 सेकेंड का समय लगता है। इसके अलावा एनईएफटी माध्यम से ट्रांसफर की सीमा 2 लाख रुपया है। अब तो बैंकों ने ग्राहकों से इन सेवाओं का लाभ लेने के लिए अलग से आवेदन करने को कहा है।
लोन आवेदन: देश में पिछले कुछ वर्षों के दौरान लोन लेने वालों की संख्या में भारी इजाफा हुआ है। इसमें होम लोन ग्राहकों की संख्या सबसे ज्यादा है। एक घर की चाह में देश का मध्यम वर्ग सबसे ज्यादा हाउसिंग लोन की तरफ आकर्षित हुआ है। बैंकों एवं हाउसिंग कंपनियों ने ऑनलाइन होम लोन आवेदन की सुविधा प्रदान कर रखी है। इसके जरिए बैंक ग्राहक से उनके नाम, पता, फोन नंबर के अलावा उनका, व्यवसाय एवं कुल वार्षिक आय, लोन की राशि, प्रॉपर्टी की कीमत, सह आवेदक की जानकारी, प्रॉपर्टी की पहचान आदि जानकारी मांगते हैं। ग्राहक द्वारा सारी सूचना उपलब्ध करा देने के बाद बैंक के प्रतिनिधि आपसे अन्य आवश्यक जानकारी प्राप्त करने के लिए संपर्क करते हैं। उसके बाद आपके लोन आवेदन पर विचार करके तुरंत इस पर फैसला कर लिया जाता है। इसके अलावा ग्राहक बिजनेस लोन, पर्सनल लोन, कार लोन आदि के लिए भी ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं। हां, बैंक अपनी आवश्यकताओं के अनुसार आपसे पूरी जानकारी अवश्य मांगेगा एवं अपने प्रतिनिधि के जरिए उसकी जांच भी करेगा।
होमलोन ईएमआई का ईपेमेंट: बैंकों ने होम लोन के ईपेमेंट की सुविधा भी उपलब्ध कराई है। सबसे अच्छी बात है कि बैंक ईएमआई के ईपेमेंट पर कुछ फीसदी की रियायत भी देते हैं। ग्राहकों को धन के साथ समय की भी बचत होती है।
यूटिलिटी बिल पेमेंट: अब तो हर तरह के बिल का भुगतान भी ऑनलाइन होने लगा है जैसे-पानी, बिजली, टेलीफोन, केबल आदि। सबसे दिचलस्प है कि इनके ऑनलाइन भुगतान के लिए कई तरह के साइट्स डेवलप किए गए हैं जैसे बिल जंक्शन डॉट कॉम, आईटीजेड आदि। ग्राहक इन वेबसाइट पर एक बार रजिस्टर्ड हो जाएं उसके बाद उन्हें बिल भुगतान का रिमाइंडर भी मिलता रहता है। सबसे अच्छी बात है कि इन वेबसाइट के माध्यम से भुगतान करने पर ग्राहक को 2-3 फीसदी की रियायत भी मिलती है। इसके अलावा समय की बचत होती है वो अलग।
ऑनलाइन क्रेडिट कार्ड/ डेबिट कार्ड आवेदन
यदि डेबिट या क्रेडिट कार्ड प्राप्त करने की इच्छा रखते हैं तो इसके लिए भी ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं। संबंधित बैंक आपसे आपकी इनकम, व्यवसाय, कंपनी का नाम, पता, मोबाइल नंबर आदि की जानकारी मांगेगा। फिर उसके प्रतिनिधि आपसे संपर्क कर अन्य आवश्यक जानकारी प्राप्त करेंगे। यदि आप उनके मानकों पर खरे उतरते हैं तो यह सुविधा आपको दे दी जाएगी।
क्रेडिट कार्ड बिल का ऑनलाइन भुगतान: ग्राहक यदि क्रेडिट कार्ड के इस्तेमाल से खरीददारी करते हैं तो उसे जमा करने के लिए बैंक में भी जाने की जरूरत नहीं है। लगभग सभी बैंकों ने इसके लिए ऑनलाइन भुगतान की सुविधा दी है। साथ ही ऑनलाइन भुगतान की रकम पर कुछ  फीसदी की रियायत भी मिलती है।
बीमा सेवाएं
पॉलिसी खरीदारी: बीमा कंपनियां अब ऑनलाइन पॉलिसी लेने की सुविधा प्रदान करती हैं। इससे समय की बचत के अलावा धन की बचत भी होती है। गौरतलब है कि ऑनलाइन पॉलिसी अन्य के मुकाबले थोड़ी सस्ती पड़ती है एवं इससे बीमा धारक को धन की बचत होती है। लाइफ इंश्योरेंस, हेल्थ इंश्योरेंस, कार इंश्योरेंस, प्रॉपर्टी  इंश्योरेंस आदि जैसी इंश्योरेंस सुविधाएं भी ऑनलाइन प्राप्त की जा सकती हैं।
ऑनलाइन प्रीमियम जमा: इतना ही नहीं अब बीमा प्रीमियम जमा करने के लिए भी आपको ज्यादा माथापच्ची करने की जरुरत नहीं है। प्रीमियम भी ऑनलाइन जमा किया जा सकता है।
ऑनलाइन टैक्स पेमेंट
टैक्स भुगतान करने के लिए ग्राहकों को अब लंबा इंतजार करने की जरूरत नहीं है। इनकम टैक्स विभाग ने अब टैक्स जमा करने की ऑनलाइन सुविधा भी प्रदान की है। करदाताओं में यह काफी तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। क्योंकि इससे समय की बचत होती है। विभाग आपके जमा कर की पूरी जानकारी भी ईमेल के जरिए तुरंत दे देता है। हालांकि बैंकों ने अपने एटीएम के जरिए भी टैक्स जमा करने की सुविधा प्रदान की है पर इनकम टैक्स विभाग की वेबसाइट पर जाकर आईटी रिटर्न जमा करने की सुविधा को करदाताओं ने हाथों हाथ लिया है। इससे विभाग के लिए करदाताओं के डाटाबेस को सुरक्षित रखने में आसानी होती है।
म्युचूअल फंड
ऑनलाइन ट्रेडिंग से म्युचूअल फंड भी अछूता नहीं है। ग्राहक एमएफ यूनिट की खरीद-बिक्री ऑनलाइन कर सकते हैं। बस आपको थोड़ी सी सावधानी बरतने की जरूरत है। इससे समय की बचत तो होती ही है आपको ब्रोकर को कमीशन भी नहीं देना होगा। लेकिन यह जरूर ध्यान रखें कि इस कारोबार के बारे में आपको अच्छी जानकारी हो। एमएफ में कारोबार आप खुद करें या आपका ब्रोकर करे मुख्य उद्देश्य तो यही होता है कि कैसे मुनाफा कमाया जाए। यदि एमएफ कारोबार की सही जानकारी आपको नहीं है तो अपने धन को ऐसे ही व्यर्थ में न गंवाएं। यह सही होगा कि ब्रोकर की सलाह ले लें।
ऑनलाइन एडवाइजरी सर्विस
ग्राहक सिर्फ ऑनलाइन वित्तीय सेवाएं ही नहीं बल्कि ऑनलाइन वित्तीय सलाह भी प्राप्त कर सकते हैं। अब तो स्टॉक मार्केट, म्युचूअल फंडों में निवेश, बीमा कारोबार, लोन, टैक्स से संबंधित ऑनलाइन सेवाएं भी मिलने लगी हैं। इस तरह की फर्में खुल गई हैं जहां वित्त सलाहकार, टैक्स गुरू, बीमा विश्लेषक आपको इन विषयों से संबंधित पूरी जानकारी ऑनलाइन उपलब्ध करा देंगे। इससे ग्राहक इन कारोबार में उतरने से पहले बीमा, टैक्स, बैंकिंग, स्टॉक मार्केट आदि की पूरी जानकारी ले सकते हैं। कई ऐसे वेबसाइट्स हैं जो मुख्य तौर पर इसी तरह की जानकारियों के लिए तैयार किए गए हैं। यदि आप उसके सदस्य बनते हैं तो कुछ चार्ज लेकर विशेषज्ञ आपके प्रश्नों की ऑनलाइन जानकारी भी उपलब्ध
कराते हैं।
हालांकि कई ऐसे वेबसाइट्स हैं जहां आपको इन विषयों की मुफ्त जानकारी भी मिलती है। ग्राहक निवेश या कारोबार संबंधी कोई भी फैसला लेने से पहले इन माध्यमों का भरपूर फायदा उठाएं एवं पूरी जानकारी लेने के बाद ही आगे बढ़ें।
साभार- मनी मंत्र
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http://www.wisdomblow.com/hi/wp-content/uploads/2011/11/vinit1.jpg-nnnn1.jpg(लेखक युवा पत्रकार है)

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सूचना के अधिकार से सुलझाएं वित्तीय उलझनें
http://www.wisdomblow.com/hi/wp-content/uploads/2012/02/ttttttttttttt-300x179.jpgराम सिंह इन दिनों बैंक की कारस्तानी से काफी परेशान चल रहे हैं। सारे दस्तावेज जमा करने के बाद बैंक ने उनका होम लोन आवेदन रद्द कर दिया। ऐसा ही कुछ हाल श्याम लाल का है। वह बीमा पॉलिसी मैच्योर होने के बाद उसका रिटर्न लेने के लिए महीनों से परेशान हैं। बीमा कंपनी उन्हें पैसा देने में आनाकानी कर रही है। अमन के आयकर रिटर्न का मामला भी कई सालों से लटका हुआ है। ऐसे लोगों के लिए सूचना का अधिकार (आरटीआई) रामबाण साबित हो सकता है। ऐसे लोग अगर संबंधित विभाग में आरटीआई के तरह सूचना मांगें तो विभाग को समुचित जवाब देना होगा। आरटीआई का प्रयोग सभी तरह के वित्तीय उत्पादों में होने वाली समस्याओं मसलन टैक्स रिफंड, आवासीय प्रोजेक्ट में देरी, होम लोन का निरस्तीकरण आदि को लेकर कर सकते हैं।
क्या है आरटीआई
आरटीआई अधिनियम जनहित में वर्ष २००५ में बनाया गया। इस अधिनियम के तहत कोई भी नागरिक सरकार और सरकार से सहायता प्राप्त किसी भी विभाग से सूचना मांग सकता है। आरटीआई क्षेत्र में काम करने वाले अरविंद केजरीवाल का कहना है कि इस अधिकार के तहत कोई भी सूचना की मांग कर सकता है। कानून बनने के बाद सभी विभागों में एक अधिकारी को इससे संबंधित जानकारी मुहैया करवाने के लिए नामित किया गया है। संबंधित अधिकारी मांगी गई सूचना के बारे में सारी जानकारी संबंधित व्यक्ति को उपलब्ध करवाएंगे। केजरीवाल का कहना है कि इसके लिए लोगों को कुछ शुल्क भी देना होता है। आरटीआई की खासियत यह भी है कि विभाग यह आप से नहीं पूछ सकता है कि आपने सूचना क्यों मांगी है। उदाहरण के तौर पर विजय शर्मा को ही ले सकते हैं। विजय ने बैंक के काउंटर पर जब चैक जमा की रसीद मांगी तो बैंक के मैनेजर ने रसीद देने से मना कर दिया। बस विजय ने आरटीआई के तहत रिजर्व बैंक से ही जवाब तलब कर डाला। संबंंधित बैंक के मैनेजर को अपने वरिष्ठ अधिकारियों को इस बात को लेकर जवाब देना पड़ा और उसके बाद से बैंक की शाखाओं में यह सूचना भी लिखी जाने लगी कि अगर ग्राहक चैक जमा कराने की रसीद मांगता है तो बैंक को रसीद देना होगा।
कहां फाइल करें आरटीआई
अब सवाल यह उठता है कि आरटीआई कहां पर फाइल किया जा सकता है। आरटीआई नियमानुसार सभी विभाग को आरटीआई अधिकारियों की नियुक्ति करनी होती है।आरटीआई के तहत नामित अधिकारियों को एक पदानुक्रम तैयार करना होता है। लोगों को संबंधित आरटीआई अधिकारियों के पास ही सूचना की बाबत आवेदन देना होता है। इसके लिए सूचना पाने के लिए आवेदन देने वाले लोगों को दस रुपए का शुल्क भी जमा कराना पड़ता है।
बैंक से संबंधित सूचनाएं
सभी बैंकों ने सूचना अधिकारियों की नियुक्ति आरटीआई एक्ट २००५ के तहत की है। भारतीय स्टेट बैंक के डीजीएम अखिलेश कुमार का कहना है कि बैंक ने आरटीआई से संबंधित कार्य के लिए तीन अधिकारियों की नियुक्ति की है। पहला सेंट्रल असिस्टेंट पब्लिक इंफार्मेशन ऑफिसर, सीपीआईओ और अपेलेट अथॉरिटी। कोई भी उपभोक्ता बैंक की वेबसाइट पर जाकर संबंधित जोन के सीपीआईओ और अपेलेट अधिकारियों के बारे में जानकारी इक_ा कर सकता है। आमतौर पर सीएपीआई आवेदन लेकर सीपीआईओ और अपीलेट अथॉरिटी को फारवर्ड कर देता है। यदि मांगी गई सूचना नियम के दायरे में है तो ३० दिन के भीतर उपभोक्ता को उपलब्ध करवा दिया जाता है। अगर सूचना देने लायक नहीं है तो आवेदन को निरस्त कर दिया जाता है। सीपीआईओ के फैसले के विरोध में अपेलेट में अपील की जा सकती है। अगर निजी बैंक की बाबत कोई जानकारी चाहिए तो आप आरटीआई का सहारा ले सकते हैं।
रिजर्व बैंक में आरटीआई
अगर किसी को रिजर्व बैंक से किसी सूचना की मांग करनी हो तो वह आरटीआई के सहारे इसे हासिल कर सकता है। इसके लिए निर्धारित शुल्क के साथ आवेदन करना होगा। रिजर्व बैंक के सभी क्षेत्रीय कार्यालयों में सूचना अधिकारी को नामित किया गया है। इसके अपेलेट अधिकारी के रूप में एक डिप्टी गवर्नर को नामित किया गया है और उनका पता है रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया, अमर बिल्डिंग, प्रथम तल, सर पीएम रोड मुंबई।
बीमा से संबंधित समस्या
अगर बीमा कंपनी, बीमा मैच्योरिटी राशि देने में आनाकानी करे तो इस अधिकार को प्रयोग किया जा सकता है। अगर किसी को एलआईसी से कोई सूचना मांगनी हो तो वे संबंधित शाखा में इस बाबत आवेदन कर सकते हैं। बैंक के शााखा प्रबंधक से इस बारे में बात कर सकते हैं। एलआईसी की वेबसाइट पर जाकर क्षेत्रवार सूचना अधिकारी का नाम पता और नंबर हासिल किया जा सकता है। अगर आपको लगता है कि बीमा कंपनियां आपके मामले में समुचित जानकारी नहीं दे रही हैं तो आप इस बाबत आईआरडीए से भी जानकारी मांग सकते हैं। पता है-आईआरडीए, तीसरा तल, परिश्रम भवन, बशीर बाग, हैदराबाद- ५००००४
ईपीएफ के बारे में
पीएफ निकालने में लोगों को न जाने कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं। ईपीएफ ऑफिस में कर्मचारी और अधिकारी बात करने को तैयार नहीं होते हैं। इस स्थिति में आप सबसे पहले वहां के सूचना अधिकारी के बारे में पता करें और उसके पास आरटीआई के तहत विधिवत आवेदन देकर पीएफ लेट होने की बाबत जानकारी मांगें। अगर आवेदन पहुंचने के ३० दिन के बाद भी वहां से कोई खोज खबर नहीं लेता है तो समझे उस अधिकारी की खैर नहीं है। आप उसके बाद संबंधित अपेलेट में एक शिकायत दायर कर सकते हैं। ईपीएफ को आपके पेमेंट मे हुई देरी की पूरी जानकारी उपलब्ध करवानी होगी और देरी की अवधि के लिए ईपीएफ को अतिरिक्त ब्याज उपलब्ध करवाना होगा।
शेयर और एमएफ का झंझट
शेयर को लेकर किसी तरह की सूचना हासिल करनी हो तो सिक्योरिटी एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (सेबी) से सूचना मांगी जा सकती है। सेबी की वेबसाइट से संबंधित सूचना अधिकारी के बारे में जानकारी ली जा सकती है। उसके बाद विधिवत तरीके से सूचना मांगी जा सकती है। अगर मामला म्यूचुअल फंड से संबंधित है तो भी आरटीआई उतना ही प्रभावी है। सेबी की वेबसाइट  पर इस बाबत जानकारी ली जा सकती है।
साभार-मनी मंत्र
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स्वतन्त्रता के दूसरे जन-आन्दोलन का मुद्दा
डा0 जगपाल सिंह
http://www.wisdomblow.com/hi/wp-content/uploads/2011/11/movement.jpgसह-अस्तित्व, सहभगिता एवं परस्पर निर्भरता के सामाजिक व मानवीय सिद्धान्तो व मूल्यों पर आधारित भारतीय सम्यता, संस्कृति, परम्पराओं के अनुसार पूर्णातः मर्यादित एवं अनुशासित मनुष्यो, संस्थाओं व सम्पूर्णः राष्ट्र के निर्माण तथा विकसित करने का पूर्ण उत्तरदायित्व देश के स्थानीय समाजो का था और है। सभ्य स्वस्थ एवं सशक्त स्थानीय समाजो के निर्माण तथा विकसित करने का पूर्ण उत्तरदायित्व प्रतिनिधि लोकतन्त्र के मूल सिद्धान्त-‘‘निरपेक्ष व बिना किसी शर्त के उम्मीदवार के स्तर तक की सवैंधानिक राजनीतिक समानता’’ – को सुनिश्चित करने वाली शासन तन्त्र की बहुस्तरीय संरचना तथा उसको गठित व संचालित करने वाली चुनाव प्रक्रिया का था और है। निरपेक्ष व बिना किसी शर्त के उम्मीदवार के स्तर तक की सवैंधानिक राजनीतिक समानता को सुनिश्चित करने वाली शासन तन्त्र की बहुस्तरीय संरचना तथा उपयुक्त चुनाव प्रक्रिया को विकसित करने का पूर्ण उत्तरदायित्व देश के बुद्धिजीवियो का था और है। विकसित की गयी शासन तन्त्र की बहुस्तरीय संरचना तथा उपयुक्त चुनाव प्रक्रिया को सैद्धान्तिक, वैधानिक व व्यवहारिक रूप से स्थापित करने के लिए आवश्यक साधनो का ’’प्रबन्ध-प्रयोग’’ करने का पूर्ण उत्तरदायित्व सामाजिक रूप से सक्रिय व्यक्तियो व संगठनो का था और है।
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निरपेक्ष व बिना किसी शर्त के उम्मीदवार के स्तर तक की सवैंधानिक राजनीतिक समानता को सुनिश्चित करने वाली शासन तन्त्र की बहुस्तरीय संरचना तथा उपयुक्त चुनाव प्रक्रिया के अभाव के कारण आज देश के सभी स्थानीय समाज तथा सामाजिक रूप से सक्रिय व्यक्ति व संगठन पूर्णतः ‘‘असंगठित व विघटित’’ है, ‘‘असुरक्षित व निराश’’ है, ‘‘भ्रमित व गुमराह’’ है और अन्ततः अपने-अपने उत्तरदायित्व को पूरा करने में पूर्णतः ‘‘असक्षम व असमर्थ’’ है। आवश्यकता आविष्कार की जननी है। वर्तमान लेख का एकमात्र उद्धेश्य इसी आवश्यकता को पूरा करना है। आगे बढने से पहले शासन तन्त्र की वर्तमान बहुस्तरीय संरचना तथा उसके गठन व संचालन के लिए अपनायी गयी चुनाव प्रक्रिया की चर्चा करना जरूरी हो जाता है।
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स्वतन्त्र भारत मंे प्रतिनिधि लोकतन्त्र की अवधारणा को लागू करने के लिए देश की संविधान सभा ने राजनीतिक समानता के उद्धेश्य को संविधान की प्रस्तावना में ही सम्मलित कर लिया था। संवैधानिक रूप सें राजनीतिक समानता को ‘‘मत के मूल्य (एक व्यक्ति एक मत तथा एक मत एक मूल्य)’’ के रूप में परिभाषित किया गया। मत के मूल्य पर आधारित राजनीतिक समानता की संवैधानिक परिभाषा ने राजनीतिक समानता को मतदाता के स्तर तक सीमित कर शासन तन्त्र की केन्द्रित ऊपर से नीचे वाली पाँच स्तरीय संरचना को विकसित करने के लिए संवैधानिक आधार तैयार कर दिया। शासन तन्त्र की केन्द्रित ऊपर से नीचे वाली पांच स्तरीय संरचना में लोक सभा शीर्ष पर है तथा राज्यो की विधान सभाये दूसरे स्तर पर है। लोक सभा के निर्वाचन क्षेत्रो का औसतन आकार दस लाख मतदाताओं से ऊपर है। प्रत्येक विधान सभा के निर्वाचन क्षेत्रो का औसतन आकार एक लाख तथा पचास हजार से ऊपर है।
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शासन तन्त्र की केन्द्रित ऊपर से नीचे वाली पाँच स्तरीय संरचना को विकसित करने के बाद देश की संविधान सभा ने अपने को अपने ही प्रस्ताव के माध्यम से देश की पहली संसद/लोक सभा में बदल दिया था। पहली संसद / लोकसभा के रूप में कार्य करते हुवे देश की संविधान सभा ने जनप्रतिनिधि अधिनियम 1951 को पारित कर दिया था। जनप्रतिनिधि अधिनियम 1951 के सेक्शन 29ए ने राजनीतिक दलो के पंजीकरण के लिए वैधानिक रास्ता बना दिया है। इस प्रकार से देश के राजनीतिक दल की संस्था को संवैधानिक संस्थाओं के रूप में स्वीकार किया जाए या नही तथा केन्द्रित ऊपर से नीचे वाली पांच स्तरीय संरचना में राजनीतिक दलो का स्थान कहाँ है, इन दोनो प्रश्नो पर विचार करने की आवश्यकता है।
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प्रतिनिधि लोकतन्त्र की अवधारण को ‘‘कानून के राज‘‘ के रूप में भी परिभाषित किया जाता है। भारत की विधायिका ने तो कानूनो का निर्माण ही राजनीतिक दलो तथा उनके द्वारा नामांकित उम्मीदवारो-प्रतिनिधियों के राज को स्थापित व सुरक्षित करने के लिए किया है। उम्मीदवार के रूप में नामांकित होने का आधार मतदाता का चरित्र, व्यवहार नहीं बल्कि चुनाव जीतने के लिए आवश्यक धन-बल की उपलब्धता है तथा उम्मीदवार के रूप में नामांकित करने का अधिकार स्थानीय समाज का नहीं बल्कि राजनीतिक दलो का है। अपनाये गये कानूनो ने चुनाव में अपनी व्यक्तिगत पसन्द को व्यक्त करने के स्थान पर राजनीतिक दलो के द्वारा नामांकित उम्मीदवारो में से किसी भी एक उम्मीदवार के पक्ष में अपनी सहमति को व्यक्त करने के लिए मतदाता को मजबूर कर दिया है। भारतीय विधान के अनुसार ‘‘भारतीय प्रतिनिधि लोकतन्त्र को देश के राजनीतिक दलो के द्वारा नामांकित उम्मीदवारो-प्रतिनिधियो के द्वारा गठित व संचालित केन्द्रित ऊपर से नीचे वाली पाँच स्तरीय बहुदलीय संरचना के रूप में परिभाषित किया जा सकता है’’। इस आधार पर यह कहना अनुचित नहीं होगा कि देश के राजनीतिक दल तथा उनके शीर्ष नेता संसद, सासदों व मतदाताओं से ऊपर है।
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प्रारम्म में यह परिभाषा स्वतन्त्र भारत के तथा-कथित सार्वभौम नागरिको को उम्मीदवारो तथा मतदाताओं में विभाजित करती है तथा फिर सभी उम्मीदवारों, सभी मतदाताओं, तथाकथित सभी प्रतिनिधियों और अन्ततः, सभी शासकीय ईकाइयो को राजनीतिक दलो में विभाजित करती है। राजनीतिक दलो के द्वारा नामांकित उम्मीदवारो-प्रतिनिधियों की यह मजबूरी हो जाती है कि वें शासन व्यवस्था के अतिरिक्त अन्य सभी व्यवस्थाओं, सभी ऐसी संस्थाओं, सभी ऐसी नीतियों, सभी ऐसे कानूनो, सभी ऐसे नियमों तथा सभी ऐसे कार्यक्रमो को निर्मित व लागू करे जिससे राजनीतिक दलो का सबसे ऊपर वाला अस्तित्व बना रहे। दूसरे शब्दो में स्वतन्त्रता के एकदम बाद से ही भारत में जनतान्त्रिक शासन तन्त्र के नाम पर दलतान्त्रिक षासन तन्त्र कार्य कर रहा है। देवताओं के द्वारा दिये गये वरदान का अनेक मनुष्यो ने दुरूपयोग कर जनता के साथ-साथ वरदान देने वाले देवता को भी कष्ट पहुँचाया। देश की संविधान सभा के द्वारा प्रदान किये गये संविधान रूपी वरदान का राजनीतिक दल तथा उनके शीर्ष नेता दलतान्त्रिक शासन तन्त्र को बनाये रखने के लिए दुरूपयोग कर रहे है।
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स्वतन्त्रता के दूसरे जन-आन्दोलन को प्रारम्भ व सफल बनाने वाले मुद्दे को स्पष्ट करने के लिए शसन तन्त्र की बहुस्तरीय संरचना तथा चुनाव प्रक्रिया के सम्बन्ध को स्पश्ट करना जरूरी है। शासन तन्त्र की बहुस्तरीय संरचना तथा चुनाव प्रक्रिया में वही सम्बन्ध है जो एक बहुमजली इमारत के नक्शे तथा इमारत के निर्माण के लिए खोदी जाने वाली नीवँ में है। सदैव ही नीवँ की खुदाई निर्मित की जाने वाली बहुमंजली इमारत के नक्शे के अनुसार की जाती है। नीवँ में किसी भी प्रकार के परिवर्तन करने से पहले बहुमंजली इमारत के नक्शे में परिवर्तन करना जरूरी है। ठीक इसी प्रकार से चुनाव की प्रक्रिया में परिवर्तन करने के लिए शासन तन्त्र की वर्तमान पूर्णतः केन्द्रित ऊपर से नीचे वाली पाँच स्तरीय बहुदलीय संरचना में पहले परिवर्तन करना आवश्यक है। जैसा कि पहले भी कहा जा चुका है कि शासन तन्त्र की वर्तमान संरचना तथा उसके गठन व संचालन के लिए अपनायी गयी अल्पमत व बहुमत के विधानो पर आधारित वर्तमान चुनाव प्रक्रिया में परिवर्तन का एकमात्र उद्धेश्य निरपेक्ष व बिना किसी शर्त के उम्मीदवार के स्तर तक की संवैधनिक राजनीतिक समानता को सुनिश्चित करना है।
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उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि निरपेक्ष तथा बिना किसी शर्त के उम्मीदवार के स्तर तक की राजनीतिक समानता, प्रतिनिधि लोकतन्त्र की अवधारण का सैद्धान्तिक पक्ष हे। शासन तन्त्र की बहुस्तरीय संरचना तथा चुनाव प्रक्रिया, प्रतिनिधि लोकतन्त्र की अवधारण का वैधानिक पक्ष है। वैधानिक पक्ष के द्वारा सैद्धान्तिक पक्ष की सुनिश्चितता, प्रतिनिधि लोकतन्त्र की अवधारणा का व्यवहारिक पक्ष है। वैधानिक पक्ष तथा सैद्धान्तिक पक्ष का अन्तर सैद्धान्तिक पक्ष को पूर्णतः अव्यवहारिक, प्रभावहीन व महत्वहीन बना देता है। यहाँ पर यह स्पष्ट करना जरूरी है कि प्रतिनिधि लोकतन्त्र की अवधारण के व्यवहार का सीधा सम्बन्ध वैधानिक पक्ष के व्यवहार से है (कानून का राज) न कि देश के मतदाताओं, राजनीतिक दलो, राज नेताओ, उम्मीदवारो, तथाकथित प्रतिनिधियों के व्यवहार से। भारतीय प्रतिनिधि लोकतन्त्र के वैधानिक पक्ष (शासन तन्त्र की पूर्णतः केन्द्रित ऊपर से नीचे वाली पाँच स्तरीय बहुदलीय संरचना तथा उसके गठन व संचालान के लिए अपनायी गयी अल्पमत व बहुमत के विधानो पर आधारित चुनाव प्रक्रिया) ने निरपेक्ष व बिना किसी शर्त के उम्मीदवार के स्तर तक की राजनीतिक समानता को पूर्णतः अव्यवहारिक, प्रभावहीन एवं महत्त्वहीन बना दिया है।
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भारत तथा भारत-वासियों पर शासन करने वालो को कल अग्रेज नामांकित करते थे आज देश के राजनीतिक दल नामांकित करते हैं। उम्मीदवार को नामांकित करना, मतदाता की व्यक्तिगत पसन्द से सम्बन्धित है जबकि निर्वाचन क्षेत्र के प्रतिनिधि (लोक उम्मीदवार) को नामांकित करने का सम्बन्ध मतदाताओं की सामुहिक पसन्द से है। मतदाता के व्यक्तिगत पसन्द तथा मतदाताओं की सामुहिक पसन्द को एक साथ सुनिष्चित करने के लिए राजनीतिक समानता का उम्मीदवार के स्तर तक होना जरूरी है। चुनाव में अपने उम्मीदवार को नामांकित करने का अधिकार सकारात्मक पक्ष है जबकि इनमें से कोई नही (राइट टू रिजक्ट)  नकारात्मक पक्ष है। ठीक इसी प्रकार से सामुहिक पसन्द के सन्दर्भ में प्रतिनिधि को चुनना सकारात्मक पक्ष है जबकि चुने हुवे प्रतिनिधि को वापिस बुलाने का अधिकार (राईट टू रिकाल) नकारात्मक पक्ष है। नकारात्मक पक्ष कभी भी स्वतन्त्रता के दूसरे जन-आदोलन का मुद्दो नहीं हो सकता और न ही होना चाहिए। भ्रष्टाचार का एकमात्र स्त्रोत ‘‘मत के मूल्य-एक व्यक्ति एक मत और एक मत एक मूल्य’’ पर आधारित राजनीतिक समानता की वैधानिक परिभाषा है। इस स्त्रोत ने ही केन्द्रित दलतान्त्रिक शासन तन्त्र, राजनीतिक दलो तथा उनके द्वारा नामाकिंत उम्मीदवारो-प्रतिनिधियो के द्वारा शासन तन्त्र के गठन व संचालन के लिए वैधानिक आधार तैयार कर दिया था। इस स्त्रोत को समाप्त किये बिना न तो केन्द्रित दलतान्त्रिाक शासन तन्त्र से, न ही राजनीतिक दलो तथा उनके द्वारा नामांकित उम्मीदवारो-प्रतिनिधियों से, न ही एकता में अनेकता की प्रकिया से और न ही भ्रष्टाचार से मुक्ति मिलने वाली है। इस स्त्रोत को समाप्त करने के लिए पूजनीय बापू जी तथा लोकनायक जय प्रकाश नारायण जी के सपनो के अनुसार शासन तन्त्र की पूर्णत विकेन्द्रित नीचे से ऊपर वाली दलरहित बहुस्तरीय जनतान्त्रिक संरचना तथा उसको गठन व संचालन के लिए अधिकतम मत के विधान पर आधारित चुनाव प्रक्रिया को सैद्धान्तिक, वैधानिक व व्यवहारिक रूप से स्थापित करना, स्वतन्त्रता के दूसरे जन-आन्दोलन का मुद्दा होना चाहिए तथा इस जन-आन्दोलन को जन्म् देने के लिए निरपेक्ष व बिना किसी शर्त के उम्मीदवार के स्तर तक की संवैधानिक राजनीतिक समानता की माँग को पैदा करना जरूरी है।
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http://www.wisdomblow.com/hi/wp-content/uploads/2011/11/jp.jpg.
(लेखक  आई आई टी दिल्ली के ग्रामीण विकास एवं प्रौद्योगिकी विभाग में प्रिंसिपल साइअन्टिफिक ऑफिसर रह चुके हैं)
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‘‘समीर कुटीर’, 642/7, जागृति विहार, मेरठ – 250004

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