शुक्रवार, 20 अप्रैल 2012

पत्रकारिता का इतिहास



देवर्षि
 नारद घूम-घूम कर संवाद-वहन करनेवालों में अग्रणी थे। उन्हें जनसंचार का आदि आचार्य कहा जाता सकता है। ``बुद्धिमतांवरिष्ठम्´´ हनुमान जनसंचार के नायक थे। महाभारत के कुरूक्षेत्र के 18 दिनों के महायुद्ध का आँखों देखा हाल को सुनानेवाले संजय संचारमाध्यम के पुरोधा माने जाते हैं। भारतीय साहित्य में मेघहंसतोतावायु संचार के माध्यम के रूप में विर्णत है।
बाईबिल में स्वर्ग की पुष्पवाटिका में बाबा आदम और अम्मा हौवा की जो कथा हैवह एक प्रकार से संचार का प्रारिम्भक स्वरूप है। अम्माहौवा ने कहा, `` क्यों  हम वह फल खाँए जो ज्ञान के वृद्ध पर लगता हैजिसको खाने से हमें पाप और पुण्य का ज्ञान हो जायेगा। यहफल हमारे लिए वर्जित तो भी हमें कोई परवाह नहीं करनी चाहिए।´´ यही छोटी-सी वार्ता जनसंचार की एक कड़ी बन गयी।
प्राचीन काल में पठन-पाठनमुद्रण के साधन के अभाव में जनसंचार के माध्यम गुरू या पूर्वज थे जो मौखिक रूप से सूचनाओं को एकपीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचाते थे। लेखन के प्रचलन के बाद भी पत्रों पर संदेश लिखे जाते थे। मौर्यकाल एवं गुप्ताकाल में शिलालेखों द्वाराधार्मिक एवं राजनीतिक सूचनाएँ जन सामान्य तक पहुँचायी जाती थीं। उसी समय वाकयानवीस (संवाददाता), खुफियानवीस (गुप्तसमाचार लेखक), सवानहनवीस (जीवनी लेखकतथा हरकारा (संदेशवाहकसंचार सम्प्रेषण के क्षेत्र में कार्यरत थे।
इस प्रकार मुट्ठीभर लोगों के अध्ययनचिन्तन-मनन और आत्माभिव्यक्ति की प्रवृत्ति तथा `सब जनहिताय सब जनसुखाय´ के प्रतिव्यग्रता ने पत्रकारिता को जन्म दिया।
पत्रकारिता के प्रकार
सांस्कृतिक पत्र-पत्रिकाएँशिक्षा सम्बन्धी पत्रिकाएँधार्मिक पत्र-पत्रिकाएँकृषि पत्रिकाएँस्वास्थ्य सम्बन्धी पत्रिकाएँविज्ञान विषयकपत्रिकाएँउद्योग सम्बन्धी पत्रिकाएँचलचित्र सम्बन्धी पत्रिकाएँमहिल सम्बन्धी पत्रिकाएँखेल सम्बन्धी पत्रिकाएँबाल सम्बंधीपत्रिकाएँ

Press and Letters
1631 E 0 in the France of the ' Gazette de France ", 1667 in Beiljaym the ` Gazette van gut ' 
Mughal period in the
मुगल काल में संवाद-लेखकों की नियुक्ति हुई जिन्हें `वाकयानवीस´ कहा जाता था। `वाकयानवीस´ द्वारा प्रेषित खतों के सारांश को बादशाहोंको सुनाया जाता था। अखबाराते--दरबारे-झुपल्लापैगामें हिन्दपुणे अखबार जैसे हस्तलिखित पत्रों को पत्रकारिता का पूर्वज कहा जासकता है।
Press and Mr. Bolt
1780 E 0, ` Bengal Journal '1784 and ` Indian Blrd ' 
उन्नीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक में मद्रास के गवर्नर से सर टॉमस मुनरों ने प्रेस की आजादी को आंग्ल सत्ता समाप्ति का पर्याय माना।उनके ही शब्दों में, ``इनको प्रेस की आजादी देना हमारे लिए खतरनाक है। विदेशी शासन और समाचारपत्रों की स्वतन्त्रता दोनों एक-साथनहीं चल सकते। स्वतंत्र प्रेस का पहला कर्तव्य क्या स्वतन्ता दोनों एक-साथ नहीं चल सकते। स्वतंत्र प्रेस का पहला कर्तव्य क्या होगा?यही कि देश को विदेशी चंगुल से स्वतंत्र कराया जाएइसलिए अगर हिन्दुस्तान में प्रेस को स्वतंत्रता दे दी गयी तो इसका जो परिणामहोगावह दिखायी दे रहा है।´´
आजादी पूर्व पत्रकारिता में प्रवेश करने का तत्पर्य आंग्ल सत्ता के फौलादी पंजे से मुकाबला करना थाआर्थिक संकट से जूझना तथा सदैवकंटकाकीर्ण पथ का अनुगामी बनना था।

(1829),
सन 1885 में ही हिन्दुस्तान में राष्ट्रीय जागरण के भैरवी मंत्र को फूँकने के लिए राजा रामपाल सिंह ने प्रथम हिन्दी दैनिक`हिन्दोस्थान´ का प्रकाशन प्रारम्भ किया। अत: 1885 से 1919 अवधि को `जागरण काल´ के नाम से अभिहित करना सुसंगत होगा।
सन 1885 से 1919 तक की अवधि के पत्रों ने राष्ट्रीय चेतना को पल्लवित किया तथा `स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है´ इसनारे को सार्थक करने के लिए जन-जन में जागरण का संचार किया। एक और `भारत ´ के `अभ्युदय´ हेतु `हिन्दी केसरी´ स्वराज´ का मंत्रफँूकता था तो दूसरी और भावात्मक एकता के लिए `देवनागर´ सबसे एक सूत्र में बंध जाने की अपील करता थाजैसा कि स्वतंत्रता केअक्षय-स्रोत वीर सावरकर का लक्ष्य था-
एक देवएक देशएक भाषा
एक जातिएक जीवएक आशा

सन 1920 से 1947 तक संघर्षोंअभावोंअभिशापों और प्रताड़नाओं के बीच दबे रहकर पत्र-पत्रिकाओं ने आग और शोलों से भरीउत्तेजक कथा सुनायी। पत्रकारों की हुंकार और फुँफकार वाली वाणी ने भारतीयों को झकझोर दिया। सामूहिक उत्पीड़नबेबसीवेदना केकरूण-क्रन्दन को  सुनाकर पत्र-पत्रिकाओं ने फिरंगियों के प्रति घोर गर्जन किया। हो उथल-पुथल अब देश बीच खौले खून जवानों का।

बलिवेदी पर बलि चढ़ने को अब चले झुंड मर्दानों का।



क्रान्तिकारी पत्रकार पराड़करजी ने भी 1930 में `रणभेरी´ में लिखा:-

Revolution ',' uprisings ', ` trick '( malignancy ), ` mutiny '

tirade ', ` spark ', windstorm ,
गांधी जी ने स्वतंत्रता का अर्थ राजनीतिक आजादी ही नहीं बतलाया बल्किा उसक सािा आर्थिकसामाहिकसंास्कृति नवनिर्माणपर जोर दिया। उन्होनें कहा-``स्वराज्य का अर्थ है-विदेशी शासन से पूर्ण स्वतंत्रता और पूर्ण आर्थिक स्वतंत्रता। इस प्रकार स्वराज्य के एकसिरे पर राजनीतिक स्वतंत्रता है तो दूसरे सिरे पर आर्थिक स्वतंत्रता। उसके दो सिरे और है। तीसरा सिरा हैनैतिक या सामाजिक औरचौथा है धर्म का।

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