सोमवार, 2 अप्रैल 2012

एक पत्रकार भी थे क्रांतिकारी भगतसिंह’





23 मार्च 2012
वार्ता

रतलाम (म.प्र.) 
प्रख्यात क्रांतिकारी भगतंसिंह में क्रांति के भाव बचपन से ही मौजूद थे। इसका प्रमाण इस बात से भी मिलता है कि जलियावाला बाग की घटना ने उन्हें इतना व्यथित किया कि वे इस स्थान पर जाकर शहीदों के खून से सनी मिट्टी अपने साथ ले आए। इस घटना ने उन्हें पत्रकारिता की तरफ जाने की भी प्रेरणा दी।

शहीद आजम के इस रूप को उजागर किया है युवा लेखक आशीष दासोत्तर ने हाल ही में उद्भावना प्रकाशन दिल्ली से प्रकाशित पुस्तक ‘समर में शब्द’ में भगतसिंह को एक पत्रकार के रूप में देखने की कोशिश की गई है। आशीष ने इस बारे में बताया कि भगतसिंह जानते थे कि क्रांति के लिए चौतरफा प्रयास किये जाने आवश्यक है। जब उन्हें गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे प्रखर पत्रकार का सन्निध्य मिला तो भगतसिंह की पत्रकारिता जाग उठी।

उस समय ‘प्रताप’ का महत्व चरम पर था। साप्ताहिक ‘प्रताप’ से जुडना और गणेश शंकर विद्यार्थी का सामीप्य हर कोई चाहता था। ‘प्रताप’ ने क्रांति की ऐसी मशाल जला रखी थी जिसने अंग्रेजों को बेचैन कर रखा था। ऐसे वक्त (प्रताप) से जुड़कर भगतसिंह ने अपने भीतर छुपे पत्रकारिता के गुणों को निखारा। यद्यपि पत्रकार बनना ही उनका एकमात्र लक्ष्य नहीं था मगर वे पत्रकार के महत्व से वाकिफ थे। विद्यार्थी जी के साथ रहकर उन्होंने इतना तो समझ ही लिया था कि क्रांति की अलख जगाने का यह सशक्त माध्यम है।

भगतसिंह की फांसी अखबारों में नहीं छपी थी


भगतसिंह अब यह समझ चुके थे कि हमें उस आर्दश का स्पष्ट ज्ञान होना चाहिए जिसके लिए हमें संघर्ष करना है। विद्यार्थी जी और भगतसिंह का साथ जितना भी रहा वह उनके साथियों के लिए भी रहस्यमय बना रहा। वे ‘प्रताप’ में निरंतर लिखते रहे। भगतसिंह काकोरी के अभियुक्तों को जेल से छुडाने की योजना के समय कानपुर आए तब उन्होंने बबर अकाली आन्दोलन के शहीदों पर लेख ‘होली के दिन खून के छींटे’ शीर्षक से लिखा जो 15 मार्च 1926 के साप्ताहिक ‘प्रताप’ में प्रकाशित भी हुआ। यह लेख उन्होंने ‘एक पंजाबी युवक’ के नाम से लिखा था।

दासोत्तर ने अपनी पुस्तक में अनेक संदर्भों का उल्लेख करते हए कहा है कि भगतसिंह अगर क्षणिक पत्रकार होते या सिर्फ क्रांतिकारी ही होते तो पत्रकारिता की राह को कभी का छोड़ देते। यह भी संभव था कि वे पत्रकारिता को समय मिलने पर महत्व देते। मगर ऐसा नहीं था। वे पत्रकारिता से जिस तरह प्रारंभ से जुडे थे आखिरी समय तक उसी सिद्दत से जुडे़ रहे। माडर्न रिव्यू के सम्पादक रामानन्द चटर्जी ने सम्पादकीय टिप्पणी में ‘इन्कलाब जिन्दाबाद’ नारे का मखौल उड़ाया। भगतसिंह को यह उचित नहीं लगा तो उन्होंने ‘सम्पादक के नाम पत्र’ का सहारा लिया। उन्होंने सम्पादक की टिप्पणी का माकूल जवाब इस पत्र में दिया जो बाद में 24 दिसम्बर 1929 के द ट्रिब्यून में छपा भी।

इस पत्र में उन्होंने लिखा दीर्घकाल से प्रयोग में आने के कारण इस नारे को एक ऐसी विशेष भावना प्राप्त हो चुकी है जो सम्भव है भाषा के नियमों एवं कोष के आधार पर इसके शब्दों से उचित तर्क सम्मत रूप में सिद्ध न हो पाये परन्तु इसके साथ ही इस नारे से उन विचारों को पृथक नहीं किया जा सकता जो इसके साथ जुडे हुए हैं। किसी अखबार में सम्पादक को उसकी टिप्पणी पर इस तरह की चुनौती वही दे सकता है जो न सिर्फ अपने मकसद के प्रति संकल्पित हो बल्कि वह अखबार की गरिमा सम्पादक के महत्व और सम्पादकीय टिप्पणी के परिणामों को बखूबी समझता हो। यदि भगतसिंह द्वारा इस तरह सम्पादक के नाम पत्र लिखकर अपनी बात नहीं रखी जाती तो सम्पादक की टिप्पणी को ही सच समझा जाता और ‘इन्कलाब जिन्दाबाद’ के सही अर्थों को समझा ही नहीं जाता।

श्री दसोत्तर ने बताया कि किसी पत्रकार के लिए यह आवश्यक होता है कि वह अपने विचारों के प्रति दृढ़ रहे और अपने तथ्यों के प्रति आश्वस्त। यदि क्रांति की बात भगतसिंह करते थे तो वे अपने अन्य क्रांतिकारी साथियों से इसीलिए बेहतर साबित हुए क्योंकि उनमें मौजूद पत्रकार अपनी इस बात को प्रमाणित करने की क्षमता रखता था।

प्रेम के लिए स्वतंत्रता आवश्यक- भगत सिंह

उन्होंने तभी कहा ‘क्रांति के लिए खूनी लड़ाइयां अनिवार्य नहीं है। न ही उसमें व्यक्तिगत प्रतिहिंसा के लिए कोई स्थान है। ये बम और पिस्तौल का सम्प्रदाय नहीं है। क्रांति से हमारा अभिप्राय अन्याय पर आधारित मौजूद समाज व्यवस्था में आमूल परिवर्तन है। भगतसिंह ने अपने पत्रकारिता जीवन में कई मुद्दों पर अनेक लेख लिखे। वे सिर्फ क्रांति की बात नहीं करते रहे।
उन्हें अपने समाज की विसंगतियों का भी ध्यान था। समाज में बढ़ते भेदभाव पर उन्होंने कहा ‘यह भयानक असमानता और जबरदस्ती लादा गया भेदभाव दुनिया को एक बहुत बडी उथल-पुथल की ओर लिये जा रहा है और यह स्थिति अधिक दिनों तक कायम नहीं रह सकती। आज अगर भगतसिंह की बातें सच साबित हो रही है तो इसका सीधा सा आशय यही है कि सच्चा पत्रकार अपने वर्तमान पर लिखता तो है मगर उसके सामने आने वाले सौ सालों के बदलावों का मंजर भी मौजूद होता है1 यह गुण भी भगतसिंह के एक पत्रकार साबित करता है।

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