रविवार, 8 अप्रैल 2012

प्रभाष जोशी एक महान पत्रकार


प्रभाष जोशी
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प्रभाष जोशी
PrabhashJoshi.jpg
जन्म
१५ जुलाई, १९३६
इंदौर,
 मध्य प्रदेश, भारत
मृत्यु
५ नवंबर, २००९
पेशा
धर्म
प्रभाष जोशी (जन्म १५ जुलाई १९३६- निधन ५ नवंबर २००९)हिन्दी पत्रकारिता के आधार स्तंभों में से एक थे। वे राजनीति तथाक्रिकेट पत्रकारिता के विशेषज्ञ भी माने जाते थे। दिल का दौरा पड़ने के कारण गुरुवार, ५ नवंबर, २००९ मध्यरात्रि के आसपासगाजियाबाद की वसुंधरा कॉलोनी स्थित उनके निवास पर उनकी मृत्यु हो गई।
अनुक्रम
·         देहांत
·         संदर्भ
[संपादित करें]व्यक्तिगत जीवन
प्रभाष जोशी का जन्म भारतीय राज्य मध्य प्रदेश के शहर इंदौर के निकट स्थित बड़वाहा में हुआ था। उनके परिवार में उनकी पत्नी उषा, माँ लीलाबाई, दो बेटे संदीप और सोपान तथा एक बेटी पुत्री सोनल है। उनके पुत्र सोपान जोशी, डाउन टू अर्थ नामक पर्यावरण विषयक अंग्रेजी पत्रिका के प्रबन्ध सम्पादक हैं।[1] प्रभाष जी बंद कमरे में कलम घिसने वाले पत्रकार नहीं होकर एक एक्टिविस्ट / कार्यकर्त्ता थे ,जो गाँव ,शहर ,जंगल की खाक छानते हुए सामाजिक विषमताओं का अध्ययन कर ना केवल समाज को खबर देते थे अपितु उसे दूर करने का हर संभव प्रयास भी उनकी बेमिसाल पत्रकारिता का हीं एक हिस्सा था[2]
[संपादित करें]कार्य जीवन
इंदौर से निकलने वाले हिन्दी दैनिक नई दुनिया से अपनी पत्रकारिता शुरू करने वाले प्रभाष जोशी, राजेन्द्र माथुर और शरद जोशी के समकक्ष थे। देशज संस्कारों और सामाजिक सरोकारों के प्रति समर्पित प्रभाष जोशी सर्वोदय और गांधीवादी विचारधारा में रचे बसे थे। जब १९७२ में जयप्रकाश नारायण ने मुंगावली की खुली जेल में माधो सिंह जैसे दुर्दान्त दस्युओं का आत्मसमर्पण कराया तब प्रभाष जोशी भी इस अभियान से जुड़े सेनानियों में से एक थे। बाद में दिल्ली आने पर उन्होंने १९७४-१९७५ में एक्सप्रेस समूह के हिन्दी साप्ताहिक प्रजानीति का संपादन किया।[3] आपातकाल में साप्ताहिक के बंद होने के बाद इसी समूह की पत्रिका आसपास उन्होंने निकाली। बाद में वे इंडियन एक्सप्रेस के अहमदाबाद, चंडीगढ़ और दिल्ली में स्थानीय संपादक रहे। प्रभाष जोशी और जनसत्ता एक दूसरे के पर्याय रहे। वर्ष १९८३ में एक्सप्रेस समूह के इस हिन्दी दैनिक की शुरुआत करने वाले प्रभाष जोशी ने हिन्दी पत्रकारिता को नई दशा और दिशा दी। उन्होंने सरोकारों के साथ ही शब्दों को भी आम जन की संवेदनाओं और सूचनाओं का संवाद बनाया। प्रभाष जी के लेखन में विविधता और भाषा में लालित्य का अद्भुत समागम रहा। उनकी कलम सत्ता को सलाम करने की जगह सरोकार बताती रही और जनाकांक्षाओं पर चोट करने वालों को निशाना बनाती रही। उन्होंने संपादकीय श्रेष्ठता पर प्रबंधकीय वर्चस्व कभी नहीं होने दिया। १९९५ में जनसत्ता के प्रधान संपादक पद से निवृत्त होने के बाद वे कुछ वर्ष पूर्व तक प्रधान सलाहकार संपादक के पद पर बने रहे। उनका साप्ताहिक स्तंभ कागद कारे उनके रचना संसार और शब्द संस्कार की मिसाल है। प्रभाष जोशी ने जनसत्ता को आम आदमी का अखबारबनाया। उन्होंने उस भाषा में लिखना-लिखवाना शुरू किया जो आम आदमी बोलता है। देखते ही देखते जनसत्ता आम आदमी की भाषा में बोलनेवाला अखबार हो गया। इससे न केवल भाषा समृद्ध हुई बल्कि बोलियों का भाषा के साथ एक सेतु निर्मित हुआ जिससे नये तरह के मुहावरे और अर्थ समाज में प्रचलित हुए।
अब तक उनकी प्रमुख पुस्तकें जो राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हुई हैं वे हैं- हिन्दू होने का धर्म, मसि कागद और कागद कारे। उन्हें हिन्दी भाषा और साहित्य के विकास में योगदान के लिए साल २००७-०८ का शलाका सम्मान भी प्रदान किया गया था।[4]
जोशी जी अनुकरणीय क्यों है और उन्हें पत्रकार क्यों माना जाए ? इन दो सवालों के जबाव उनके जीवनकर्म में समाहित हैं .प्रभाष जी बंद कमरे में कलम घिसने वाले पत्रकार नहीं होकर एक एक्टिविस्ट / कार्यकर्त्ता थे ,जो गाँव ,शहर ,जंगल की खाक छानते हुए सामाजिक विषमताओं का अध्ययन कर ना केवल समाज को खबर देते थे [2] अपितु उसे दूर करने का हर संभव प्रयास भी उनकी बेमिसाल पत्रकारिता का हीं एक हिस्सा था
अपनी धारदार लेखनी और बेबाक टिप्पणियों के लिए मशहूर प्रभाष जोशी अपने क्रिकेट प्रेम के लिए भी चर्चित थे। गुरुवार, 5 नवंबर, 2009 को टीवी पर प्रसारित हो रहे क्रिकेट मैच के रोमांचक क्षणों में तेंडुलकर के आउट होने के बाद उन्होंने कहा कि उनकी तबियत कुछ ठीक नहीं है। इसके कुछ समय बाद उनकी तबियत अचानक ज्यादा बिगड़ गई। रात करीब 11:30 बजे जोशी को नरेंद्र मोहन अस्पताल ले जाया गया , जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।[5] उनकी पार्थिव देह को विमान से शुक्रवार दोपहर बाद उनके गृह नगर इंदौर ले जाया जाएगा जहां उनकी इच्छा के अनुसार, नर्मदा के किनारे अंतिम संस्कार होगा।[6] सुबह जैसे ही उनके दोस्तों, प्रशंसकों और उनका अनुसरण करने वाले लोगों को उनकी मृत्यु की जानकारी मिली तो सभी स्तब्ध रह गए। समूचा पत्रकारिता जगत उनके इस तरह से दुनिया छोड़कर चले जाने से शोक संतप्त है। हर पत्रकार उन्हें अपने अपने अंदाज में श्रद्धांजलि दे रहा है।[7] प्रभाष जी बंद कमरे में कलम घिसने वाले पत्रकार नहीं होकर एक एक्टिविस्ट / कार्यकर्त्ता थे ,जो गाँव ,शहर ,जंगल की खाक छानते हुए सामाजिक विषमताओं का अध्ययन कर ना केवल समाज को खबर देते थे [2] अपितु उसे दूर करने का हर संभव प्रयास भी उनकी बेमिसाल पत्रकारिता का हीं एक हिस्सा था
[संपादित करें]बाहरी कड़ियाँ
§  लुटियन के टीले का भूगोल  (गूगल पुस्तक ; लेखक - प्रभाष जोशी)
§  धन्न नरमदा मइया हो  (गूगल पुस्तक ; लेखक - प्रभाष जोशी)
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·         आधार


सच, साहस और सरोकार, यानी प्रभाष जोशी
विद्रोही तेवर और वैचारिक गहनता के लिए जाने जाने वाले प्रभाष जोशी ने नए पत्रकारों के साथ जनसत्ता शुरू किया और उसे भारतीय पत्रकारिता के सबसे लोकप्रिय, पठनीय एवं प्रबल प्रतीकों में बदल दिया।
- बालेन्दु शर्मा दाधीच
English Summary:
Indian political class is facing a historic challenge
As civil society and opposition leaders take the government to task on the issue of corruption, Indian politicians are finding it increasingly difficult to avoid the limelight.
Balendu Sharma Dadhich
मैंने राजस्थान पत्रिका में अपने पत्रकारिता जीवन की शुरूआत की थी। मेरे लिए वह सीखने का समय था और 'पत्रिका' के दफ्तर में आने वाले प्रांतीय एवं राष्ट्रीय अखबारों को पढ़ने के लिए हम युवा मित्रों में होड़ लगी रहती थी। लेकिन अखबारों के गट्ठर में से जिसे उठाने के लिए हम सबसे पहले लपकते थे, वह था. 'जनसत्ता।' दर्जन भर अखबारों के बीच वह अलग ही दिखाई देता। बहुत प्रबल उपस्थिति थी उसकी। प्रभाषजी के संपादन में निकले इस नए अखबार ने कुछ ही महीनों में देश भर में युवकों को आकर्िषत कर लिया था। जहां हिंदी पत्रकारिता में हम सब एक सी लीक पीटने में लगे हुए थे और रोजमर्रा की खबरों को किसी तरह आकर्षक ले.आउट (अखबार का डिजाइन) में चिपका देने को ही बहुत बड़ी सफलता माने बैठे थे वहीं जनसत्ता ने हम सबको बड़ा झटका दिया था। सिर्फ पाठकों को ही नहीं, प्रबंधकों को भी, पत्रकारों को भी, संपादकों को भी, नेताओं को भी। हिंदी पत्रकारिता के लिए लगभग ठहराव के से उस जमाने में स्व॰ प्रभाष जोशी ने हमें झकझोर कर बताया कि सब कुछ ठहरा हुआ नहीं है। हिंदी में भी नया करने के लिए असीमित गुंजाइश मौजूद है। 'जनसत्ता' से हमने जाना कि अखबार क्या होता है, छपे हुए शब्दों की ताकत क्या होती है, इनोवेशन (नवीनता) क्या होता है। ऐसा लगता था जैसे हर खबर किसी भट्टी में तप कर खरा सोना बनकर निकली है। एक.एक शब्द का महत्व था। सामान्य सी खबरें जब जनसत्ता में छपती थीं तो दिलचस्प हो जाती थीं। रोजमर्रा की घटनाओं के पीछे व्यापक अर्थ दिखाई देने लगते थे। कितनी सरल, देसज, किंतु दमदार भाषा! कितना चुस्त संपादन! खबरों का कितना सटीक चयन! कितनी निष्पक्षता और कितनी निडरता!

प्रभाषजी के जनसत्ता को हम लगभग उतनी ही तल्लीनता के साथ पढ़ते थे जैसे जेम्स बांड का कोई उपन्यास पढ़ रहे हों। रोज उसके आगमन का वैसे ही इंतजार करते थे जैसे कि छुट्टी पर घर लौटने वाला नया.नवेला रंगरूट विलंब से चल रही रेलगाड़ी का करता है। यह एक चमत्कार था। लगता था, स्वाधीनता आंदोलन के लंबे अरसे बाद पत्रकारिता का गौरवशाली युग लौट आया था। इस सबके पीछे जादू था प्रभाष जोशी का, जो योजनाकार, प्रबंधक, संपादक, भाषा.शास्त्री, एक्टिविस्ट, डिजाइनर और टीम.लीडर जैसी कितनी ही भूमिकाएं एक साथ, एक जैसी कुशलता के साथ निभा रहे थे। पत्रकारिता की जनसत्ता शैली आज प्रिंट से लेकर टेलीविजन और ऑनलाइन मीडिया तक फैल चुकी है। उस शैली के शिल्पकार प्रभाष जोशी ही थे। राजस्थान पत्रिका के बीकानेर संस्करण में बतौर डेस्क इंचार्ज काम करते हुए मैंने इंडियन एक्सप्रेस समूह पर सीबीआई के छापे की खबर पढ़ी। यह देखकर मैं भौंचक्का रह गया कि 'जनसत्ता' ने अपने प्रभात संस्करण में यह खबर एजेंसी के माध्यम से दी थी। प्रभाषजी निष्पक्षता के लिए इस हद तक जा सकते हैं कि खुद अपने ही प्रतिष्ठान पर हुए हमले की खबर दूसरे स्रोतों के जरिए छापें! ऐसा उदाहरण मैंने कोई और नहीं देखा जब किसी संस्थान ने खुद अपने बारे में भी तटस्थ माध्यम से खबर दी हो। रिलायंस और बोफर्स जैसे मुद्दों पर केंद्र सरकार के विरुद्ध खड़े होने का परिणाम एक्सप्रेस समूह ने लंबे समय तक भोगा था। लेकिन प्रभाषजी का 'जनसत्ता' दमन का सामना करते हुए भी सत्यनिष्ठा और निष्पक्षता के पत्रकारीय मानदंडों को नहीं भूला।

मैंने इसी घटना से प्रभावित होकर, प्रभाषजी की टीम का हिस्सा बनने का सपना देखा था। सच की लड़ाई में मेरे जैसे कई युवक उनके साथ खड़े होना चाहते थे। संयोगवश, कुछ महीने बाद मुझे इसका अवसर भी मिला जब 'जनसत्ता' ने नए लोगों की भर्ती का विज्ञापन निकाला। अखबार में चयनित होने के बाद हर दिन प्रभाषजी से कुछ न कुछ सीखा. कभी सीधे, तो कभी परोक्ष रूप में।

कमाल का आदर्शवाद था उनका. जनसत्ता को आम आदमी की आवाज बनना है। सिर्फ उसी के प्रति जवाबदेह हैं हम। हमें प्रतिष्ठान पर अंकुश लगाने वाले जन.माध्यम की भूमिका निभानी है। व्यक्तिवाद के लिए कहीं जगह नहीं थी। निदेर्श था कि प्रभाषजी से जुड़े आयोजनों की खबरें 'जनसत्ता' में नहीं छपेंगी। वह भी क्या जमाना था! रामनाथ गोयनका जैसे प्रबल अखबार मालिक और उनके अधीन प्रभाष जोशी तथा अरुण शौरी (इंडियन एक्सप्रेस) जैसे संपादक। अरुण शौरी भले ही कई मायनों में बड़े पत्रकार, राजनीतिज्ञ और लेखक रहे हों लेकिन प्रभाष जी की बात कुछ और थी। उनकी सोच, ज्ञान, प्रतिभा और क्षमताओं का दायरा कहीं बड़ा और विस्तृत था।

'
जनसत्ता' जो भी लिखता, बड़े अधिकार एवं प्रामाणिकता के साथ लिखता। खबर किसके पक्ष में है और किसके खिलाफ, यह कभी किसी ने नहीं सोचा। अगर कुछ गलत है तो उसका प्रबलता से विरोध करना है। भले ही परिणाम जो भी हो। और अगर कोई सही है तो उसके साथ खड़े होने में संकोच एक किस्म का अपराध है। मुझ जैसे पत्रकारों, जिन्हें जनसत्ता की सफलता के दौर में वहां प्रशिक्षण पाने का मौका मिला, को प्रभाषजी के दिए संस्कारों, उनके सिखाए मूल्यों और आदशर्ों से इतना कुछ मिला है कि वह जीवन भर हमारे मार्ग को निदेर्शित करेगा। नए.नवेले पत्रकारों की टीम को सिर्फ पत्रकारिता, भाषा और प्रयोगवाद की दीक्षा ही नहीं दी, सार्थक जीवन के मायने भी सिखाए। वे सिर्फ सुयोग्य ही नहीं थे। वे सिर्फ प्रतिबद्ध मात्र भी नहीं थे। वे समाज और राजनीति में बदलाव लाने के लिए बेचैन एक्टिविस्ट भी थे। वे समाज में बड़ा बदलाव लाना चाहते थे. उसे सकारात्मक, समावेशी, उदार, जीवंत बनाने के लिए योगदान देना चाहते थे। उन्हें अखबार की दुनिया से बाहर आकर कोई बड़ी भूमिका निभाने का मौका नहीं मिला। यदि मिलता तो शायद वह एक अलग अध्याय होता। उनकी विचारधारा पर गांधी का गहरा असर था। लेकिन प्रभाषजी में ऐसा बहुत कुछ था जो उनका अपना था। बहुत मौलिक, गहन मंथन और अनुभवों के बाद निकला हुआ। 'जनसत्ता' के पन्नों पर कभी यह उनके खून खौला देने वाले विशेष मुखपृष्ठ संपादकीय में दिखता था (ऐसे संपादकीय स्व॰ इंदिरा गांधी और स्व॰ राजीव गांधी सरकारों की ज्यादतियों के प्रति एक्सप्रेस समूह के प्रबल प्रतिरोध की अभिव्यक्ति होते थे), तो कभी साहित्यिक गहराई एवं शिल्प.कौशल्य से परिमार्जित उनके स्तंभों 'मसि.कागद' एवं 'कागद.कारे' में। उनकी लेखन क्षमता को देखकर हैरानी होती थी। साफ.सुंदर, जमा.जमा कर लिखे गए शब्द, जिनकी शिरोरेखाएं घुमावदार होती थीं। एक के बाद एक कितने ही पन्ने लिखते चले जाते थे। जब वे क्रिकेट विश्व कप का कवरेज करने गए तो इतना कुछ लिखा कि दो.तीन किताबें छप जाएं। और सब का सब बेहद दिलचस्प, एक्सक्लूजिव और तेज! लगभग साठ साल की उम्र में उन्होंने ऐसी रिपोर्टिंग की जिसकी उम्मीद पच्चीस के नौजवान से भी नहीं की जा सकती।

हिंदी पत्रकारिता के प्रति उनका योगदान इतना अधिक है कि उन्हें आधुनिक हिंदी पत्रकारिता का पयरय समझा जाने लगा था। लोकप्रियता का आलम ऐसा था कि 'जनसत्ता' हिंदी ही नहीं, अंग्रेजी अखबारों से भी होड़ लेता था। शायद ऐसा पहली बार हुआ था जब किसी हिंदी अखबार के संपादक को विशेष संपादकीय लिखकर अपने पाठकों से अनुरोध करना पड़ा हो कि अब वे अखबार को मिल.बांटकर पढ़ें क्योंकि हमारी मशीनों में इतनी क्षमता नहीं कि वे छपाई की और अधिक मांग पूरी कर सकें।

विद्रोही तेवर और वैचारिक गहनता का प्रतीक जनसत्ता धीरे.धीरे भारतीय पत्रकारिता के सबसे लोकप्रिय, पठनीय एवं प्रबल प्रतीकों में बदल गया था। वहां सनसनीखेज पत्रकारिता नहीं थी, जन.सरोकारों को आगे बढ़ाने वाली पत्रकारिता थी। यह प्रभाषजी के नेतृत्व का ही परिणाम था कि दिल्ली के सिख विरोधी दंगों के दौरान जनसत्ता ने सवर्त्र व्यापी उन्माद के विरुद्ध खड़े होने का साहस दिखाया और दंगापीङ़ितों के पक्ष में पत्रकारिता की। सब जगह से निराश, हारे.थके व्यक्ति के लिए उन दिनों एक ठिकाना जरूर था, और वह था. जनसत्ता। अब वह सब हिंदी पत्रकारिता के इतिहास का हिस्सा है। प्रभाषजी ने दिखाया कि पत्रकारिता के उद्देश्यों और सार्थकता के बारे में जो कुछ हमने पढ़ा था वह सिर्फ किताबी नहीं था।

प्रभाषजी नहीं रहे। लेकिन उनके संस्कार तो हैं! उनके जीवन.मूल्य तो हैं! प्रभाषजी की तराशी हुई टीम तो है, भले ही अलग.अलग स्थानों पर और अलग.अलग भूमिकाओं में। वह उनके सिखाए को आगे बढ़ाएगी। अपने विचारों और मूल्यों के रूप में प्रभाषजी सदा हमारे बीच रहेंगे. एक मार्गदर्शक बनकर।
Posted On: 06/11/09
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Friday, 03 April 2009 04:27 अशोक कुमारभड़ास4मीडिया इंटरव्यू
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प्रभाष जोशीहमारा हीरो - प्रभाष जोशी
प्रख्यात पत्रकार प्रभाष जोशी का इंटरव्यू करनेभड़ास4मीडिया की टीम उनके वसुंधरा स्थित निवास पहुंची तो शुरुआती दुआ-सलाम के बाद जब उनसे बातचीत शुरू करने का अनुरोध किया गया, तो उन्होंने हंसते हुए कहा- भई अपन के अंदर 'भड़ास' नाम की कोई चीज है ही नहीं। हालांकि जब प्रभाष जी से बात शुरू हुई तो बिना रूके दो घंटे से अधिक समय तक चली। इंटरव्यू में प्रभाष जी नए-पुराने सभी मुद्दों पर बोले।
प्रभाष जी का कहना है कि उन्होंने 'हंस' पत्रिका को कभी नहीं पढ़ा। एक ब्लाग पर खुद को दंभीऔर क्रूरकहे जाने का भी जवाब दिया। राकेश कोहरवाल और आलोक तोमर को जनसत्ता से निकाले जाने पर बोले- 'मैं गुडी-गुडी वाला संपादक नहीं रहा। जनसत्ता के मशहूर पत्रकार प्रभाष जोशी (दाएं) से बातचीत करते भड़ास4मीडिया के रिपोर्टर अशोक कुमारहितों का जो भी मामला हुआ, उसमें जो आड़े आया, उसे अपन ने बर्दाश्त नहीं किया। चाहे वो आलोक तोमर रहे हों या उमेश जोशी।'' पेश हैप्रभाष जोशी सेभड़ास4मीडिया के रिपोर्टरअशोक कुमार की बातचीत के अंश-


-अपने बारे में शुरू से बताइए, जन्म से लेकर पढ़ाई-लिखाई तक के बारे में।
--मां का कहना है कि 15 जुलाई 1937 को जिस दिन मैं जन्मा, (मध्य प्रदेश के सिहोर जिले के आस्टा गांव में) दो-तीन दिन पहले से ही खूब बारिश हो रही थी। मेरे प्रसव के लिए मां मौसी के घर गई थीं। आस्टा गांव के किनारे पार्वती नदी बहती है। नदी लबालब थी, बाढ़ की स्थिति थी। मुश्किल इतनी थी कि मुझे और मेरी मां को खटिया पर डालकर जिनिंग फैक्ट्री (कपास के बीज की फैक्ट्री), जो सबसे ऊंची जगह थी, वहां लाया गया। तब जाकर हम बचे। उसके बाद भी बारिश दो दिन तक होती रही। हम 12 भाई बहन थे, जिसमें दो नहीं रहे। तीन बहनों के बाद मैं पहला बेटा था। गरीब परिवार था। मगर अभाव के बावजूद गदगद वातावरण था। मां पढ़ी-लिखी प्रभाष जोशीनहीं थी। सिर्फ गीता पढ़ पाती थी।
प्रभाष जोशीमेरे पिताजी होल्कर स्टेट में फौजदारी में थे। राव साहब कहलाते थे। दुनिया भर के अपराधी जिनमें ज्यादातर मुसलमान थे, अक्सर आया करते थे। एक दिन कोई अपराधी केस जीत गया। घर आया। पिताजी घर पर नहीं थे। उनने पिताजी जहां बैठते थे, वहां माला रखा, मिठाई रखी और चला गया। बड़ी बहनों की शादी हो गई तो मैं मां की मदद के लिए घर के सारे काम करता था। बहनों से भी बड़ा स्नेह था। जब बड़ी बहन का निधन हुआ तो मैने मालवा के लोकगीत म्हारी बेन्या बाई जोवे बाटके शीर्षक से कागद कारेमें लिखा।
प्रभाष जोशीपढ़ने में रुचि नहीं थी। हाई स्कूल तक की शिक्षा महाराजा शिवाजी राव प्राइमरी और मिडिल स्कूल में हुई। बहुत तेज नहीं था, बस पास हो जाता था। एक बार फेल हो गया था तो शिक्षकों के पीछे लग कर सपलमेंटरी ले लिया। घुमक्कड़ी का शौक था। मित्र कैलाश मालवीयऔर मैं साइकिल से जंगल निकल जाते। मां घर से कसार बना कर देती थी। भूख लगती तो जंगल में ही मैं चूल्हा बनाता और मालवीय छाना (पशुओं के सूखे हुए गोबर) लाते। फिर दूध में कसार डालकर दोनों आधा-आधा खाते। कालेज में आकर थोड़ा ठीक हुआ।
सन् 51 या 52 में मैट्रिक के बाद इंदौर में ही होल्कर कालेज में दाखिला लिया, मगर पिताजी चाहते थे कि मैं साइंस और मैथ पढ़ूं तो गुजराती कॉलेज चला आया। नौकरी- करियर जैसी चीजों मे कभी मन नहीं लगा। क्रिश्चियन कॉलेज के समाजशास्त्र के प्रो. पाटिल लड़कों को गांव ले जाते थे। उनसे संबंध निकाल मैं भी साथ जाने लगा। तब देश आजाद हुआ था और देश को नए सिरे से बनाने का सपना था। सन् 1955 में इंटर की परीक्षा छोड़ दी और सुनवानी महाकाल गांव में लोगों के बीच काम करने चला गया।
-उसके बाद?
प्रभाष जोशी--पिताजी इससे काफी दुखी रहते थे। एक दिन बस से घर लौट रहा था तो पास में एक सज्जन बैठे थे। तब दाढ़ी उग आई थी और मैं खादी पहनता था। मुझे देखते रहे, फिर पूछा, किसके बेटे हो? मैने बताया। वो पिताजी के दोस्त थे। वे बोले, तुम्हारे पिता इसीलिए दुखी रहते हैं। फिर उन्होंने सुनवानी महाकाल में मुझे प्राइमरी स्कूल में मास्टरी पर लगवा दिया। सुबह बच्चों को इकठ्ठा कर पूरे गांव में झाड़ू देता था। अपना अनाज खुद पीसता था। गांव की महिलाएं मुझे छेड़ने के लिए अपने घर का अनाज मेरे दरवाजे पर रख जाया करती थीं। वहां गांव के हर घर में, चाहे वह किसी जाति का हो, मैंने खाना खाया। तब रसोई में महिलाएं और लड़कियां मेरे झाड़ू लगाने और अनाज पीसने को लेकर खूब मजाक किया करती। गांव का जब भी कोई बीमार होता तो उसे लेकर पास के शहर देवास जाता था। वहीं 55-56 में कुमार गंधर्व से मुलाकात हुई। दुनिया भर के क्लासिकल किताबों को यहीं पढ़ा। जिस लेखक को शुरू करता उसकी आखिरी किताब तक पढ़ जाता। चाहे वो तोल्सताय हों, शेक्सपीयर या चेखव। गांव वाले भी खूब मानते थे। जब वे अनाज बेचने इंदौर जाते तो मेरे घर पूरे साल का अनाज दे आते थे। 1960 तक मैं यहीं रहा। 60 में मुझे लगा कि या तो प्रभाष जोशीमुझे राजनीति में जाना पड़ेगा या मैं भ्रष्ट हो जाऊंगा, क्योंकि सारा गांव मुझे लिजेंड मानता था। उधर कांग्रेस वालों को लगता था कि मैं कांस्टीट्यूएन्सी बना रहा हूं, जबकि मैं तो देश के नव-निर्माण में लगा था।
-पत्रकारिता में कैसे आए? किन-किन मीडिया हाउसों से जुड़े रहे।
--जब मैंने वहां से हटने का फैसला किया तभी मैने सोचा कि पत्रकारिता में क्यों नहीं आऊं। बिल्ली के भाग से छीका फूटा वाली बात हुई। उसी दौरान विनोबा जीइंदौर आए। वो क्या कह रहे हैं, तब उन्हें समझने वाला कोई नहीं था। नई दुनिया, इंदौर के संपादक राहुल बारपुते ने कहा कि तुम करो। तब मैंने इसे एक महीने तक कवर किया। मैं सिर्फ हथेली पर नोट लेता था और उसी से पूरा पेज भर देता था। (बीच में विषय से हटकर उत्साहित होते हुए कहते हैं- मैनें हंस आज तक नहीं पढ़ा, मगर गंगा प्रसाद विमल ने फोन कर बताया कि उन्होंनेआपके बारे में लिखा है कि उनकी स्मृति से हर्ष होता है।) विनोबा जी सुबह तीन बजे से काम शुरू कर देते थे। मैं 2.45 में ही उनके पास पहुंच जाता। सारा दिन कवर कर वहां से नई दुनिया जाता। इसने पत्रकारिता के दरवाजे खोल दिये। मैं वहां काम करने लगा।
प्रभाष जोशीएक दिन कोई भी आफिस नही आया। तब मैने अकेले चार पन्नों का अखबार निकाला। दूसरे दिन मैं नाराज हुआ तो सभी ने कहा कि हम तो टेस्ट ले रहे थे। राहुल बारपुते, राजेंद्र माथुर और शरद जोशी के साथ वो जो ट्रेनिंग हुई, वो हमेशा काम आई। यहां 60 से 66 तक छह साल तक काम करते हुए मजे में बीता। इसी बीच एक बार प्रेस इंस्टीट्यूट में माइकल हाइट्स, जो लीड्स के किसी अखबार के संपादक थे, से मुलाकात हुई। वह हर क्षेत्र में मेरी रुचि से बेहद खुश थे। उन्होंने इंग्लैंड के प्रतिष्ठित वीकली न्यू स्टेट्समैनके संपादक जॉन फ्रीमन से कहा। इस तरह मैं 1965 में इंग्लैंड गया। वहां इंग्लैंड से निकलने वाले मैनचेस्टर गार्डियनऔर लीड्स के टेलीग्राफ आर्गसमें कुछ महीनों तक काम किया। फिर लौट आया।
वापस आने के बाद मैं कुछ नया करना चाहता था। नई दुनिया ट्रेडिशनल अखबार था और वहां प्रयोग की गुंजाइश नहीं थी। तभी शरद जोशी के पास भोपाल से मध्यदेशनाम से अखबार निकालने का प्रस्ताव आया। मुझसे भी बात की गई तो मैने हामी भर दी। हम दोनों ने मिलकर इसे निकाला। बाद में अखबार आर्थिक संकट का शिकार हो गया। पत्नी का जेवर गिरवी रखकर अखबार चलाना पड़ा। रद्दी बेच कर मोटरसाइकिल में पेट्रोल डलवाया। सन् 66-68 तक चलने के बाद इसे बंद करना पड़ा। 68 में ही गांधी शताब्दी समिति में पब्लिकेशन का सचिव होकर दिल्ली आ गया। तब से दिल्ली में धूल फांक रहा हूं।
-आपने कहा कि 'हंस' कभी नहीं पढ़ा, आखिर क्यों?
--बस ऐसे ही। अपन को जंचा नहीं। राजेंद्र यादव ने मेरे बारे में काफी बुरा लिखा है। अच्छा भी लिखा है।
प्रभाष जोशी-जनसत्ता में कैसे आए?
--दिल्ली आने के बाद सन् 70 से 74 तक 'सर्वोदय' निकाला। यह वीकली था और मैं उसका संपादक था। सर्वोदय में श्रवण गर्ग (वर्तमान में दैनिक भास्कर के ग्रुप एडिटर) और अनुपम मिश्रा (फिलवक्त, गांधी शांति प्रतिष्ठान से जुड़े हुए) मेरे साथ थे। रामनाथ गोयनका ने मुझे 'सर्वोदय' में पढ़ा था। उन्हें मेरी भाषा बहुत अच्छी लगी थी। इसी बीच सन् 72 में जयप्रकाश नारायण को चंबल के डाकुओं का समर्पण कराने के लिए कुछ युवाओं की मदद चाहिए थी, जो उनके बीच जाकर उनसे बात कर सके। अनुपम, श्रवण और मैं फरवरी से उनके साथ काम करने लगे। डाकुओं ने अप्रैल में आत्मसमर्पण कर दिया था। इस पर जेपी और मैने पंद्रह दिनों में एक किताब तैयार कर दी थी। इससे जेपी को मुझसे प्रेम था। तभी एवरीमैंसनाम से वीकली पत्रिका शुरू हुई। इसके संपादक अज्ञेय जी थे। हम उसमें मदद करते थे। फिर हिंदी में अखबार निकालने की बात हुई। रामनाथ गोयनका ने पहले से ही प्रजानीतिनाम ले रखा था। तब पहली बार मैं गोयनका जी से मिला। मुलाकात काफी डिजास्टर थी। वह जिस तरह से लोगों के बारे में खुल कर गालियों से बात कर रहे थे, मैने सोचा कैसे काम करूंगा। मैने लौटकर जेपी को पांच पन्नों की चिठ्ठी लिखी। जेपी ने वह गोयनका को दे दी।
एक दिन राधाकृष्ण और गोयनका (74 की शुरुआत में) गांधी नीति, राजघाट कालोनी स्थित मेरे घर पहुंच गए। घर में एक खाट थी औऱ टूटी हुई कुर्सी। राधाकृष्ण काफी मोटे थे। कुर्सी पर उन्हें बैठाने से वह टूट न जाए इसलिए मैने उन्हें खाट पर और गोयनका जी को कुर्सी पर बैठाया। जाते समय मैं और मेरी पत्नी उन्हें छोड़ने आए। मैने हाथ जोड़कर कहा कि बैठने की जगह ठीक नहीं थी। मैंने माफी मांगी। उन्होंने छेड़ते हुए कहा- महावत से दोस्ती, दरवाजो साकलो। (बड़े-बड़े लोगों से दोस्ती रखते हो और घर ऐसा)। इस पर मेरी पत्नी हंस पड़ी थीं। जाते-जाते कहा कि भले ही काम करना या न करना, कल शाम को आना।
प्रभाष जोशीमैं दूसरे दिन गया। वह रोज शाम कनाट प्लेस के हनुमान मंदिर और गोल मार्केट के काली मंदिर जाते थे। गाड़ी से वो मुझे लेकर निकले। दर्शन करने के बाद पूछा- क्या दिक्कत है? क्यों नहीं आते? मैने कहा- मेरी आत्मा में एक टोमस पैकेट है। गोयनका ने कहा- वह कौन होता है? फिर मैने उन्हें वह कहानी सुनाई कि राजा का एक दोस्त था। राजा ने उसे चर्च का मुखिया बना दिया। दोस्त ने जिस दिन चर्च संभाला, विद्रोह कर दिया।उन्होंने कहा, कोई बात नहीं, लड़ लूंगा तेरे से। फिर मैने मंजूर कर लिया। तब 'प्रजानीति' निकाली गई। यह सन् 74 से शुरू हुआ मगर इमरजेंसी के कारण 75 जून में इसे बंद करना पड़ा।
तब कहा जाता था कि इंदिरा जी और संजय दो लोगों से नाराज हैं। इंडियन एक्सप्रेस के संपादक मुलगांवकर से और प्रजानीति के संपादक प्रभाष जोशीसे। हमने इंडियन एक्सप्रेस छोड़ दिया। फिल्म और स्पोर्ट्स का वीकली आस-पासनिकाला। इसे भी छह महीने बाद बंद करना पड़ा। काफी मुश्किल दिन थे, हम घर से बाहर निकलते तो पुलिस वाला बैठा मिलता। इंडियन एक्सप्रेस का घर छोड़ कर गांधी पीस फाउंडेशन के उसी घर में आ गए थे, जहां से बाद में जेपी को पकड़ा गया।
-यह तो 'प्रजानीति' की बात हुई, 'जनसत्ता' कैसे शुरू किया?
--जब चुनाव की घोषणा हुई मैं पटना में जेपी के यहां था। मैं वापस लौट आया। रामनाथ गोयनका घर आए। कहा कि अब अखबार निकाल सकते हैं। तब देश भर में चुनाव को लेकर क्या चल रहा है, इसको लेकर अखबार निकालने की योजना बनी। सभी प्रांतों से सभी भाषाओं के अखबार रोज हवाई जहाज से आते थे। सभी भाषाओं के जानकार को बुलाया जाता था। अनुवाद के बाद उसका जिस्ट तैयार होता। वह इंडियन एक्सप्रेस में छपता था। यह पूरे चुनाव चला। एक दिन रामनाथ जी ने कहा कि संपादकीय तो सभी लिख रहे हैं हमें न्यूज स्टोरी पर ध्यान देना चाहिए। हमने खबर छापनी शुरू कर दी। मजबूरीवश टाइम्स ऑफ इंडिया और हिंदुस्तान टाइम्स सबको हमें फॉलो करना पड़ा। लोग इंडियन एक्सप्रेस को जनता एक्सप्रेसकहने लगे।
प्रभाष जोशीफिर चंडीगढ़ से इंडियन एक्सप्रेस निकालना तय हुआ। दिल्ली का मोह छोड़ कर कोई जाना नहीं चाहता था। मैं वहां गया। सन् 77-78 से 81 तक वहां इंडियन एक्सप्रेस निकाला। सन् 81-83 तक इंडियन एक्सप्रेस, दिल्ली का आरई रहा। यहीं रहते हुए जनसत्ता की सारी योजना बनी।
-आपने राकेश कोहरवाल और आलोक तोमर को क्यों निकाला?
--(दिवंगत राकेश कोहरवाल के बारे में बचते हुए) मैने कागद कारे में लिखा है उनके बारे में। जहां तक आलोक की बात है, एक आर्टिकल था, गिरिराज किशोर का था। लेख छपने के लिए पूरी तरह तैयार था। उसमें कंप्यूटर पर सब उल्टा-पुल्टा कर दिया था। वह कंप्यूटर आलोक का था। उसे जाना पड़ा।
-आपने लिखा है कि महादेव चौहान, आलोक तोमर और राकेश कोहरवाल आपको अपराध बोध देते हैं। क्या है वह अपराध बोध?
प्रभाष जोशी--ये जब आए थे तो कुछ नहीं थे। जनसत्ता में नाम कमाया था। अखबार ने उन्हें कीर्ति दी थी। इनको उठाया था। सभी के टैलेंट को जनसत्ता ने उभारा था। हिट होने के बाद इनके तौर-तरीके बदल गए, जीवन में ऐसा होता है जब आपकी प्रतिभा को एक बार निखरने का मौका मिल जाता है, तब। आपमें जो प्रतिभा है उसे संभाल कर रोज तराशना और उसे रचनात्मक कार्य में लगाए रखना भी एक प्रतिभा है, वरना जिनमें अधिक प्रतिभा होती है वो विस्फोट करके नष्ट हो जाते हैं। ऐसे कई लोग थे जो जनसत्ता से जाने के बाद फिर कभी नहीं बढ़े।
जब मेरी पांच किताबों का एक साथ विमोचन था, तब अमर-उजाला के समूह संपादक (अब ग्रुप प्रेसीडेंट, न्यूज) शशि शेखर ने कहा था 'हम जनसत्ता में आलोक तोमर का नाम सुनते थे। अब वो कहां हैं, किसी को नहीं पता।'
जब अखबार शुरू हुआ था तभी मैने सबको बुला कर कहा था कि हमें मिलकर एक परिवार बनाना है और यह परिवार अखबार बनाएगा। पांच साल तक पूरे 22 लोगों की टीम थी। इस टीम ने कैसा अखबार निकाला, आप जानते हैं।
प्रभाष जोशी-आज जनसत्ता अपने निम्न स्तर पर है, जबकि आपका नाम इससे जुड़ा हुआ है। इसे सुधारने के लिए आप खुद क्या कर रहे हैं?
--अभी भी खबर पढ़ने वालों का अखबार जनसत्ता ही है। यह एक अखबार के लिए बड़ा सम्मान है। इंडियन एक्सप्रेस के विभाजन के बाद हालात गड़बड़ हो गए। गोयनका की मृत्यु हुई और तभी मनमोहन सिंह के कारण भारत का खुले बाजार में प्रवेश हुआ। तब एड और सर्कुलेशन हावी हो गया। संपादकीय पीछे छूट गया। अब अखबार नो प्राफिट नो लॉस पर चल रहा है। विज्ञापन पाने के लिए हम ऐसा-वैसा कुछ नहीं करते। इंडियन एक्सप्रेस और जनसत्ता में संपादक आज भी संपादक हैं। यह दिवंगत रामनाथ गोयनका की परंपरा है। मुझसे 99 में सीईओ बनने के लिए कहा गया था, मैने मना कर दिया।
-उमेश जोशी ने अपने ब्लॉग पर आपको दंभीऔर क्रूरकहा है। क्या अदावत है उनसे?
--कोई अदावत नहीं। वो हमारे यहां रहते हुए टीवी पर काम करने लगे। हमारे यहां ऐसा नहीं होता था। इसलिए हमने उन्हें कभी प्रमोट नहीं किया। अभय कुमार दुबे ने भी ऐसा ही किया था। हमने उन्हें कई बार समझाया कि क्यों करते हो। टीवी पर काम करना चाहते हो तो अखबार छोड़ दो भाई। जनसत्ता के हितों का जो भी मामला हुआ, उसमें जो भी आड़े आया हो, उसे अपन ने कभी बर्दाश्त नहीं किया। चाहे वो आलोक तोमर हों या जोशी। मैं गुडी-गुडी वाला संपादक कभी नहीं था। अच्छा एडमिनिस्ट्रेटर था।
प्रभाष जोशी-अभय छजलानी के सम्मान समारोह में आप नहीं थे, क्या आपको नहीं बुलाया गया था?
--बुलाया था। प्रेस क्लब वालों ने, जिन्होंने समारोह रखा था, मुझे बुलाया था। मगर मुझे हिंदी विद्यापीठ के वार्षिक बैठक में जाना था। मैं वहां का कुलाधिपति हूं। तारीख मुझसे पूछ कर ही तय की गई थी। कैसे जाता, मैने मना कर दिया।
-टीवी न्यूज का स्तर इतना घटिया क्यों हो गया है?
--दुनिया में हर जगह टीवी इंटरटेनमेंट का माध्यम है। अपना इंटरटेनमेंट का आदर्श बालीवुड है। वैसे ही वहां फोर सीसे मामला चलता है, जिसमें सिनेमा, क्राइम, क्रिकेट और चौथा कॉमेडी भी शामिल है। मैने एक बार बीबीसी पर कहा था कि टीवी सभी चीजों को नाकुछकिए बिना नहीं दिखा सकता।
-आपको कौन-कौन से सम्मान मिल चुके हैं?
--कई मिल चुके हैं भई। साहित्य अकादमी का प्रतिष्ठित शलाका पुरस्कार’ (07-08) मिल चुका है। उत्तर प्रदेश का लोहिया विशिष्ट सम्मानभी मिला है। बिहार में भी सम्मानित हुआ हूं। मध्य प्रदेश जो अपना राज्य है, उसे छोड़कर बाकी लगभग सभी राज्य मुझे सम्मानित कर चुके हैं।
-किन-किन पत्र-पत्रिकाओं में लिख रहे हैं?
--'प्रथम प्रवक्ता' और 'तहलका' में। जनसत्ता में लिखना जारी ही है। कई बार लोग पीछे पड़ जाते हैं तो लिखना पड़ता है। कभी-कभी भाषण भी लिखने पड़ते हैं।
अशोक कुमार और प्रभाष जोशी -कौन-कौन सी किताबें लिखी हैं, आगे क्या लिख रहे हैं?
--अब तक नौ किताबें लिखी है। चंबल की बंदूक गांधी के चरणों में, हिंदू होने का धर्म, मसि कागद, कागद कारे। पांच किताबें एक साथ आई थी। जीने के बहाने, धन्न नर्वदा मैय्या हो, लुटियन के टीले का भूगोल, खेल सिर्फ खेल नहीं है और जब तोप मुकाबिल हो। इन दिनों मैं हिंसा-दान के ऊपर लिख रहा हूं, ‘अटका कहां स्वराज। एक किताब रामनाथ गोयनका, कुमार गंधर्व और गांधी के ऊपर लिखने की योजना है।
मैं अपना आत्म-वृतांत भी लिखना चाहता हूं। फिलहाल शीर्षक दिया है ओटत रहे कपास5 अप्रैल सन् 1992 को पहली बार कागद कारे लिखा था। इसे 2012 तक लिखूंगा, पूरे बीस साल हो जाएंगे तब। 75 की उम्र तक सब निपटा दूंगा। 75 के बाद कोई लिखना नहीं। 20-25 साल की उम्र में जैसा सोचा करता था वैसा हो गया हूं।
-परिवार में कौन-कौन है?
पत्नी, दो बेटे और एक बेटी। पत्नी का नाम ऊषा है। बेटी सोनाल की शादी हो चुकी है। वह एनडीटीवी इमेजिन की मुखिया है। बेटा संदीप जोशी क्रिकेट खिलाड़ी रह चुका है। फिलहाल दिल्ली में एयर इंडिया अकादमी में क्रिकेट और हॉकी की कोचिंग देता है। एक बेटा सोपान जोशी देश की प्रमुख विज्ञान एवं पर्यावरण पत्रिका डाउन टू अर्थमें मैनेजिंग एडिटर है।
--प्रभाष जोशी को वर्तमान में कोई दूसरा प्रभाष जोशी नजर आता है?
--कोई आदमी दूसरे जैसा नहीं बन सकता। हां, अखबार में हरिवंश को अच्छा मानता हूं, क्योंकि वह हर तरह की जिम्मेदारी लेने को तैयार रहते हैं। पूरा अखबार अपने माथे पर लेता है। टीवी में रवीश कुमार अच्छी पत्रकारिता कर रहा है। वैसे ही 'तलहका' में प्रतिष्ठान विरोधी स्वर हैं।
-शुक्रिया सर
- धन्यवाद।

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