मंगलवार, 6 मार्च 2012

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वेब/संगठन: 
आज से चार वर्ष पूर्व जबकि देश भर में रोजगार यात्रायें निकल रहीं थीं, उस समय इन यात्राओं में एक गीत गाया जाता था, जिसके बोल हैं ‘‘मेरे लिये काम नहीं’’। अंततः वर्ष 2005 में रोजगार गारंटी कानून आ गया और देश भर में प्रत्येक ग्रामीण परिवार को साल भर में 100 दिन के काम की गारंटी मिली।

इस कानून की मूल मंशा यही है कि लोगों को गांव में काम मिले, गांव में स्थाई परिसंपत्तियों का सृजन हो और पलायन रूके। महिला और पुरूषों को समान काम व समान मजूदरी मिले। इसके अलावा कई सारे ऐसे प्रावधान जो मजदूरों की हकदारी बुलंद करते हैं। इन सब प्रावधानों के मध्यनजर यह जनता के हितों को संरक्षण करने वाला कानून बना।

मगर आज कानून के क्रियानवयन के तीन वर्ष बाद ‘‘क्या खोया क्या पाया’’ की तर्ज पर इस कानून की समीक्षा करें तो हम पाते हैं कि रोजगार यात्राओं में गाये जाने वाले इस गीत के बोल तो आज भी प्रभावी है और लोगों के पास आज भी काम नहीं। पलायन बदस्तूर जारी है। यदि काम मिल भी गया तो लोगों को 6 से 8 माह तक मजदूरी नहीं मिली है। न ही मजदूरों को बेरोजगारी भत्ता मिल रहा है और न ही अन्य हकदारियां। मजदूरों को उनके श्रम का न्यूनतम मूल्य भी नहीं मिल पा रहा है। इस नजरिये से यह जनता के हितों को संरक्षित करने वाला कानून तो नहीं ही है।

इस साल जबकि सूखा पड़ा तो लगा कि रोजगार गारंटी योजना के चलते लोगों को भूखा नहीं सोना पड़ेगा। अपना घर बार छोड़कर दूसरी जगह पलायन पर भी नहीं जाना पड़ेगा, लेकिन हुआ इसके ठीक विपरीत। लोग भूखे सो रहे हैं। लोग कहते हैं कि वे पलायन पर जाना पसंद करते हैं लेकिन नरेगा में काम करने नहीं आते हैं। उनकी अपनी दिक्कते हैं, अपने तर्क हैं। लेकिन यह चिंताजनक बात सामने आई कि आखिर लोग क्यों नहीं काम पर जाना चाहते हैं?आखिर ऐसे क्या कारण हैं? 

राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी योजना (नरेगा) असंगठित क्षेत्र के मजदूरों, विकास से वंचित क्षेत्रों और समतामूलक अधोसंरचनात्मक ढांचों के विकास के साथ-साथ पर्यावरण-मिट्टी संरक्षण के मामले में अब तक की सबसे एकीकृत और रचनात्मक कानूनी पहल है। हम सब जानते हैं कि इस कानून के जन्म के पीछे जनसंघर्षों की एक महती भूमिका रही है। इन्हीं विचारों को पृष्ठभूमि में रखते हुये भोजन का अधिकार अभियान विगत 3 वर्षों से लगातार एक निश्चित समयान्तराल पर इस योजना के संदर्भ में सघन जमीनी अध्ययन (रैपिड असेसमेंट सर्वे) करता रहा है।

कानून के तीन साल पूरे होने के बाद हम भोजन का अधिकार अभियान सहयोगी समूह व उससे संबद्ध समस्त संस्था/संगठनों ने यह जानने की कोशिश की वास्तव में दिक्कत कहां आ रही है तो हमने जमीनी स्तर पर जाकर अध्ययन किया। इस बार अप्रैल से जून 2009 की अवधि के बीच एक बार फिर ऐसे ही अध्ययन यह जानने के मकसद से किया गया कि व्यवस्थाओं और जवाबदेहिता के स्तर पर नरेगा की दिशा क्या है? 

इस अध्ययन में हमने 23 जिलों के 25 ब्लॉक के 112 गांवों के 2765 वयक्तियों से प्रत्यक्ष बातचीत की। इस अध्ययन में हम कार्यस्थलों पर गये। समूह चर्चायें की। हमारे अधिकतर सवालों के जवाब समूह चर्चाओं से उभरे। इस विश्लेषण में हमने कई बार गांवों को आधार बनाया है तो कई बार हमने व्यक्तियों को आधार बनाया है। दरअसल जो लोगों ने कहा है हमने उसे ही पिरोने की कोशिश की। इस अध्ययन में हम किसी प्रारूप के साथ जमीन पर नहीं गये हैं, बल्कि ज्यादा से ज्यादा खुली चर्चायें की। प्रशासनिक अधिकारियों से साक्षात्कार किये। पोस्टऑफिस और बैंक कर्मियों से बातचीत की। इस अध्ययन में हमने प्रमुख रूप से केस स्टडी पर ज्यादा ध्यान दिया है, जिससे हम जमीनी स्तर की सच्चाईयों को बेहतर तरीके से उकेर सकें। यह एक समन्वित प्रयास है जिसमें प्रदेश के 23 संस्था एवं संगठनों ने केन्द्रीय भूमिका निभाई है। हम सबकी मंशा है कि नरेगा अपने मूल कानूनी स्वरूप में अपने लक्षित वर्ग तक पहुंचे और उसे अपने लक्ष्य तक पहुचाने की दिशा में यह हमारी एक कोशिश है।

इस अध्ययन में पहला पक्ष ऐसा शामिल किया गया है जो रोजगार गारण्टी योजना के बेहद बुनियादी प्रावधान हैं - काम के लिये आवेदन दिया जाना और पावती मिलना। दूसरा पक्ष व्यवस्थागत मसलों से सम्बन्धित है - काम न मिलना और जॉब कार्ड या ऐसे कारण जिनसे काम नहीं मिलता है। फिर तीसरे पक्ष में मजदूरी के भुगतान में देरी, बैंक एवं डाक घरों के खातों के जरिये भुगतान की नई व्यवस्था के बेहद शुरूआती अनुभवों की पड़ताल करने की कोशिश की गई है। चौथे पक्ष में यह विश्लेषण करने की कोशिश की गई है कि क्या नरेगा का मौजूदा जमीनी क्रियान्वयन बेरोजगारी भत्ते और मजदूरी मुआवजा के अधिकार को पनपने दे रहा है या नहीं? पांचवे पक्ष में कुछ व्यापक सवाल हैं।

इस अध्ययन की एक संक्षिप्त रिपोर्ट आपके समक्ष है। आशा है इस रिपोर्ट से उभरे बिन्दुओं पर आप सभी ध्यान देंगे और कुछ ठोस और सार्थक पहल की जायेगी। इस रिपोर्ट को हमने पांच प्रमुख भागों में विभाजित किया है, काम के लिये आवेदन, मजदूरी भुगतान, बैंक खाते न खुलना, कपिलधारा योजना और अंत में अन्य व्यापक सवाल जिसमें पारदर्शिता से जुडें मसलों को शामिल किया गया है। 

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पंज़ाब राज्य का लगभग 80% भूजल मनुष्यों के पीने लायक नहीं बचा है और इस जल में आर्सेनिक की मात्रा अब तक के सर्वोच्च स्तर पर पहुँच चुकी हैयह चौंकाने वाला खुलासा पंजाब कृषि विश्वविद्यालय द्वारा किये गये एक अध्ययन में सामने आई है। पानी में आर्सेनिक की मात्रा का सुरक्षित मानक स्तर 10 ppb होना चाहिये, जबकि अध्ययन के मुताबिक पंजाब के विभिन्न जिलों से लिये पानी के नमूने में आर्सेनिक की मात्रा 3.5 से 688 ppb तक पाई गई है। यह खतरा दक्षिण-पश्चिम पंजाब पर अधिक है, जहाँ कैंसर के मरीजों की संख्या में भी बढ़ोतरी देखी गई है। जज्जल, मखना, गियाना आदि गाँव आर्सेनिक युक्त पानी से सर्वाधिक प्रभावित हैं और यहाँ इसका स्तर बेहद खतरनाक हो चुका है। 

पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के मृदा-वैज्ञानिकों के एक दल ने इन गाँवों का सघन दौरा किया, उन्होंने आश्चर्यजनक रूप से देखा कि पानी और सब्जियों में रासायनिक खाद का प्रयोग अधिक नहीं किया गया है, लेकिन फ़िर भी पीने और सामान्य उपयोग के लिये जो भू-जल दोहन किया जा रहा है उसमें घातक आर्सेनिक का अंश काफ़ी मात्रा में है। दक्षिण पश्चिम पंजाब के संगरूर, मनसा, फ़रीदकोट, मुक्तसर, बठिण्डा, फ़िरोज़पुर जिलों में भूजल का एक भी नमूना पीने लायक नहीं पाया गया। यहाँ आर्सेनिक की मात्रा 11.4 से 688 ppb तक पाई गई, औसतन 78.8 ppb प्रति भूजल नमूने के हिसाब से। 

वैज्ञानिकों ने इन जिलों खासकर तलवण्डी साबू और गिद्दरबाहा विकासखण्ड में भैंस का दूध भी आर्सेनिक से प्रदूषित पाया। भैंस के दूध में आर्सेनिक का स्तर 208 से 279 ppb तक पाई गई। विश्वविद्यालय के मृदा विभाग के अध्यक्ष डॉ वी बेरी इसके लिये इलाके में स्थित उथले हैण्ड पम्पों को जिम्मेदार मानते हैं, जिनमें खारे पानी और आर्सेनिक वाले पानी की मात्रा ज्यादा है। वे कहते हैं कि जो हैण्ड पम्प नहरों और तालाबों के किनारे पर हैं, उनमें आर्सेनिक की मात्रा काफ़ी कम है। पानी के ज़मीन में सतत प्रवाह के कारण आर्सेनिक की ज़हरीली मात्रा में काफ़ी कमी आ जाती है, जबकि नहरों से दूर स्थित हैण्ड पम्पों में आर्सेनिक की मात्रा घातक हो चुकी है। 

दक्षिण पश्चिम पंजाब में जहाँ पहले भूजल का स्तर 80 फ़ुट तक था वह अब और 30 फ़ुट नीचे जा चुका है। जब तक पुराने गहरे कुओं से पानी लिया जाता था तब तक इलाके में विभिन्न बीमारियों का प्रभाव काफ़ी कम था, लेकिन जैसे-जैसे पुराने कुओं का स्थान नलकूपों और हैण्डपम्प ने लिया तब से क्षेत्र में त्वचा और फ़ेफ़ड़ों के कैंसर में वृद्धि देखी गई। अमेरिका की संस्था एजेंसी फ़ॉर टॉक्सिक सब्स्टेन्सेस एंड डिसिजेज़ रजिस्ट्रीने एक शोध के द्वारा आर्सेनिक का त्वचा और फ़ेफ़ड़ों के कैन्सर से सम्बद्धता को दर्शाया है। पंजाब के अन्य जिलों में भी स्थिति कोई खास अच्छी नहीं है। जोन क्रमांक 1 के अन्तर्गत गुरदासपुर, होशियारपुर, नवाशहर, और रोपड़ में भूजल का आर्सेनिक स्तर 3.5 से 42 ppb (औसत 23.4ppb), ज़ोन 2 में स्थित अमृतसर, तरनतारन, जलन्धर, कपूरथला, लुधियाना, पटियाला, मोहाली, बरनाला, और मोगा में आर्सेनिक स्तर 9.8 से 42.5 ppb (औसत 24.1 ppb) पाया गया है। 

यदि आर्सेनिक के सुरक्षित स्तर को देखा जाये तो ज़ोन 1 और ज़ोन 2 में से लिये गये भूजल के नमूनों में से सिर्फ़ 3 और 1 प्रतिशत नमूने ही पीने लायक पाये गये। नमूनों के विभिन्न जाँचों के बाद वैज्ञानिकों ने प्रभावित इलाकों की आबादी के लिये चेतावनी और एहतियात के अलग-अलग स्तर जारी किये हैं। इस अध्ययन के मुख्य शोधकर्ता डॉ एचएस हुन्दल, जिनका यह शोध अमेरिका के जर्नल कम्यूनिकेशन्स इन सॉइल साइंसेज़ एण्ड प्लाण्ट अनालिसिसमे प्रकाशित हो चुका है, कहते हैं कि जहाँ तक सम्भव हो पंजाब के ग्रामीण निवासियों को पीने का पानी आसपास स्थित नहरों या तालाबों से लेना चाहिये अथवा उस हैण्डपम्प से जो कि इनके किनारे पर हो। यदि दूर स्थित किसी हैण्डपम्प से पानी लेना भी पड़े तो उसे रात भर वाष्पीकरण के लिये छोड़ दें और उसके बाद ही उसे उपयोग में लेना चाहिये…”। इस समूचे शोध के अन्य सहयोगी वैज्ञानिक हैं सर्वश्री राजकुमार, धनविन्दर सिंह और कुलदीप सिंह।

मूल रिपोर्ट अदिति टण्डन (ट्रिब्यून न्यूज़ सर्विस) अनुवाद सुरेश चिपलूनकर


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पंज़ाब राज्य का लगभग 80% भूजल मनुष्यों के पीने लायक नहीं बचा है और इस जल में आर्सेनिक की मात्रा अब तक के सर्वोच्च स्तर पर पहुँच चुकी हैयह चौंकाने वाला खुलासा पंजाब कृषि विश्वविद्यालय द्वारा किये गये एक अध्ययन में सामने आई है। पानी में आर्सेनिक की मात्रा का सुरक्षित मानक स्तर 10 ppb होना चाहिये, जबकि अध्ययन के मुताबिक पंजाब के विभिन्न जिलों से लिये पानी के नमूने में आर्सेनिक की मात्रा 3.5 से 688 ppb तक पाई गई है। यह खतरा दक्षिण-पश्चिम पंजाब पर अधिक है, जहाँ कैंसर के मरीजों की संख्या में भी बढ़ोतरी देखी गई है। जज्जल, मखना, गियाना आदि गाँव आर्सेनिक युक्त पानी से सर्वाधिक प्रभावित हैं और यहाँ इसका स्तर बेहद खतरनाक हो चुका है। 

पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के मृदा-वैज्ञानिकों के एक दल ने इन गाँवों का सघन दौरा किया, उन्होंने आश्चर्यजनक रूप से देखा कि पानी और सब्जियों में रासायनिक खाद का प्रयोग अधिक नहीं किया गया है, लेकिन फ़िर भी पीने और सामान्य उपयोग के लिये जो भू-जल दोहन किया जा रहा है उसमें घातक आर्सेनिक का अंश काफ़ी मात्रा में है। दक्षिण पश्चिम पंजाब के संगरूर, मनसा, फ़रीदकोट, मुक्तसर, बठिण्डा, फ़िरोज़पुर जिलों में भूजल का एक भी नमूना पीने लायक नहीं पाया गया। यहाँ आर्सेनिक की मात्रा 11.4 से 688 ppb तक पाई गई, औसतन 78.8 ppb प्रति भूजल नमूने के हिसाब से। 

वैज्ञानिकों ने इन जिलों खासकर तलवण्डी साबू और गिद्दरबाहा विकासखण्ड में भैंस का दूध भी आर्सेनिक से प्रदूषित पाया। भैंस के दूध में आर्सेनिक का स्तर 208 से 279 ppb तक पाई गई। विश्वविद्यालय के मृदा विभाग के अध्यक्ष डॉ वी बेरी इसके लिये इलाके में स्थित उथले हैण्ड पम्पों को जिम्मेदार मानते हैं, जिनमें खारे पानी और आर्सेनिक वाले पानी की मात्रा ज्यादा है। वे कहते हैं कि जो हैण्ड पम्प नहरों और तालाबों के किनारे पर हैं, उनमें आर्सेनिक की मात्रा काफ़ी कम है। पानी के ज़मीन में सतत प्रवाह के कारण आर्सेनिक की ज़हरीली मात्रा में काफ़ी कमी आ जाती है, जबकि नहरों से दूर स्थित हैण्ड पम्पों में आर्सेनिक की मात्रा घातक हो चुकी है। 

दक्षिण पश्चिम पंजाब में जहाँ पहले भूजल का स्तर 80 फ़ुट तक था वह अब और 30 फ़ुट नीचे जा चुका है। जब तक पुराने गहरे कुओं से पानी लिया जाता था तब तक इलाके में विभिन्न बीमारियों का प्रभाव काफ़ी कम था, लेकिन जैसे-जैसे पुराने कुओं का स्थान नलकूपों और हैण्डपम्प ने लिया तब से क्षेत्र में त्वचा और फ़ेफ़ड़ों के कैंसर में वृद्धि देखी गई। अमेरिका की संस्था एजेंसी फ़ॉर टॉक्सिक सब्स्टेन्सेस एंड डिसिजेज़ रजिस्ट्रीने एक शोध के द्वारा आर्सेनिक का त्वचा और फ़ेफ़ड़ों के कैन्सर से सम्बद्धता को दर्शाया है। पंजाब के अन्य जिलों में भी स्थिति कोई खास अच्छी नहीं है। जोन क्रमांक 1 के अन्तर्गत गुरदासपुर, होशियारपुर, नवाशहर, और रोपड़ में भूजल का आर्सेनिक स्तर 3.5 से 42 ppb (औसत 23.4ppb), ज़ोन 2 में स्थित अमृतसर, तरनतारन, जलन्धर, कपूरथला, लुधियाना, पटियाला, मोहाली, बरनाला, और मोगा में आर्सेनिक स्तर 9.8 से 42.5 ppb (औसत 24.1 ppb) पाया गया है। 

यदि आर्सेनिक के सुरक्षित स्तर को देखा जाये तो ज़ोन 1 और ज़ोन 2 में से लिये गये भूजल के नमूनों में से सिर्फ़ 3 और 1 प्रतिशत नमूने ही पीने लायक पाये गये। नमूनों के विभिन्न जाँचों के बाद वैज्ञानिकों ने प्रभावित इलाकों की आबादी के लिये चेतावनी और एहतियात के अलग-अलग स्तर जारी किये हैं। इस अध्ययन के मुख्य शोधकर्ता डॉ एचएस हुन्दल, जिनका यह शोध अमेरिका के जर्नल कम्यूनिकेशन्स इन सॉइल साइंसेज़ एण्ड प्लाण्ट अनालिसिसमे प्रकाशित हो चुका है, कहते हैं कि जहाँ तक सम्भव हो पंजाब के ग्रामीण निवासियों को पीने का पानी आसपास स्थित नहरों या तालाबों से लेना चाहिये अथवा उस हैण्डपम्प से जो कि इनके किनारे पर हो। यदि दूर स्थित किसी हैण्डपम्प से पानी लेना भी पड़े तो उसे रात भर वाष्पीकरण के लिये छोड़ दें और उसके बाद ही उसे उपयोग में लेना चाहिये…”। इस समूचे शोध के अन्य सहयोगी वैज्ञानिक हैं सर्वश्री राजकुमार, धनविन्दर सिंह और कुलदीप सिंह।

मूल रिपोर्ट अदिति टण्डन (ट्रिब्यून न्यूज़ सर्विस) अनुवाद सुरेश चिपलूनकर 

Tags - Arsenic in Punjab, Water contamination with arsenic in Punjab,
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एक तरफ हम विश्व जल दिवस (22 मार्च) मनाने की तैयारी कर रहे हैं, संयुक्त राष्ट्र सहस्त्राब्दी लक्ष्य घोषित किए जा रहे हैं, लोगों को साफ सुरक्षित पेयजल मुहैया कराने के जितने प्रयास किए जा रहे हैं वहीं ऐसा लगता है कि मंजिल कोसों दूर होती जा रही है। हाल में मिलने वाली खबरें कुछ ऐसे ही खतरे का संकेत दे रहीं हैं। 

हाल ही में यूनिसेफ की मदद से उत्तर प्रदेश सरकार ने एक सर्वे करवाया, जिसमें उत्तर प्रदेश के बीस से अधिक जिलों का भूजल आर्सेनिकप्रदूषित पाया गया है। सर्वे की प्राथमिक रिपोर्ट के मुताबिक लगभग 31 जिले और ऐसे हैं जहाँ यह खतरा हो सकता है, हालांकि उनकी विस्तृत जानकारी अभी सामने आना बाकी है। चौंकाने वाली यह खबर उत्तर प्रदेश के ग्रामीण विकास मंत्री दद्दू प्रसाद ने विधानसभा में दी। हिन्दू महासभा के सदस्य राधामोहन अग्रवाल के प्रश्न का उत्तर देते हुए प्रसाद ने बताया कि यूनिसेफ द्वारा यह अध्ययन प्रदेश के 20 जिलों के 322 विकासखण्डों में किया गया, जहां आर्सेनिक अपनी मान्य मात्रा 0.05 माइक्रोग्राम प्रति लीटर से कहीं अधिक पाया गया है। 

डब्ल्यूएचओ के मानकों के अनुसार पानी में आर्सेनिक की मात्रा प्रति अरब 10 पार्ट से ज्यादा नहीं होनी चाहिए या प्रति लीटर में 0.05 माइक्रोग्राम से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। लेकिन शोध बताते हैं कि यह इन क्षेत्रों में 100-150 पार्ट प्रति बिलियन तक पानी में आर्सेनिक पहुंच चुका है। बलिया और लखीमपुर जिले सबसे अधिक प्रभावित पाये गये। एहतिहात के तौर पर सैकड़ों की संख्या में हैण्डपम्प सील कर दिये गये हैं। बहराईच, चन्दौली, गाज़ीपुर, गोरखपुर, बस्ती, सिद्धार्थनगर, बलरामपुर, सन्त कबीर नगर, उन्नाव, बरेली और मुरादाबाद, जिलों में भी आर्सेनिक की अधिक मात्रा पाई गई है, जबकि रायबरेली, मिर्ज़ापुर, बिजनौर, मेरठ, सन्त रविदास नगर, सहारनपुर और गोण्डा आंशिक रूप से प्रभावित जिले हैं । 

मथुरा में बैराज के कारण यमुना का रुका जल स्थानीय भू गर्भ के लिए खतरा बन रहा है तो मथुरा के आसपास के कुछ स्थानों पर बोरिंग के दौरान लाल रंग का पानी निकलने लगा है।

दिल्ली के मेडिकल संस्थान एम्स की जांच आख्या के अनुसार दिल्ली के दक्षिण-पश्चिम में दो सौ किलोमीटर के दायरे में आर्सेनिक का एंडमिक क्षेत्र विकसित हो रहा है। इस क्षेत्र को आर्सेनिक के मामले में विश्व के दो सर्वाधिक प्रभावित क्षेत्रों में से एक कहा गया है। रिपोर्ट के मुताबिक इसका एक कारण बांग्लादेश से आने वाली गहरी अंत: नलिका तो है ही, गोकुल बैराज से भी जो जल जमीन के नीचे जा रहा है, वह भयंकर रूप से आर्सेनिक को अपने साथ भू गर्भ में ले जा रहा है। यमुना जल में भारी मात्रा में केमिकल कचरा तथा ब‌र्स्ट बोरिंग इसका दूसरा बड़ा कारण माना जा रहा है। 

बिहार में तो पटना सहित 12 जिलों के लोग आर्सेनिक युक्त जहरीला पानी पाने के लिए मजबूर हैं। आर्सेनिक युक्त पेयजल के कारण गैंग्रीन, आंत, लीवर, किडनी और मूत्राशय के कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियां हो रही हैं। राज्य के जन स्वास्थ्य और अभियंत्रण विभाग के मंत्री प्रेम कुमार के अनुसार, “गंगा के किनारे रहने वाले 1,20,000 लोगों के जीवन को आर्सेनिक युक्त भू-जल से खतरा है। केंद्रीय जल संसाधन राज्यमंत्री जयप्रकाश यादव बताते हैं कि कानपुर से आगे बढ़ने पर गंगा में आर्सेनिक का जहर घुलना शुरू हो जाता है। कानपुर से लेकर बनारस, आरा, भोजपुर, पटना, मुंगेर, फर्रुखा तथा पश्चिम बंगाल तक के कई शहरों में गंगा के दोनों तटों पर बसी आबादी में आर्सेनिक से जुड़ी बीमारियां बढ़ रही हैं।

पश्चिम बंगाल में आर्सेनिक का कहर सबसे भयानक है, करीब 70 लाख लोग बीमारियों की चपेट में आ गए हैं। लगभग 20 जिले आर्सेनिक प्रभावित हैं। केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय ने राज्यों को सलाह दी है कि जल को शुद्ध किए बगैर पीने के लिए उपयोग में नहीं लाया जाए। 

सरकार इस खतरे से निपटने के लिये काम कर रही है और इससे समु्चित ढंग से निपटा जायेगा, उत्तर प्रदेश के ग्रामीण विकास मंत्री कहते हैं। वे बताते हैं कि उत्तरप्रदेश जल निगम के अधिकारियों, केन्द्रीय भूजल बोर्ड, यूनिसेफ़, इंडस्ट्रियल टॉक्सिकोलोजिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट लखनऊ, CSM मेडीकल यूनिवर्सिटी और आईआईटी कानपुर के विशेषज्ञों की एक टास्क फ़ोर्स का गठन किया था जिसने अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी है। मंत्री जी ने खुलासा किया कि टास्क फ़ोर्स द्वारा सुझाये गये सभी उपायों पर तत्परता से अमल किया जा रहा है और जनता को आर्सेनिक संदूषित पानी के खतरों के बारे में आगाह किया जा रहा है और साथ ही लोगों से अपील की जा रही है कि वे इस पानी का उपयोग पीने के लिये न करें। विभिन्न इलाकों में खतरे की सम्भावना वाले हैण्डपम्पों पर लाल ‘X’ का निशान लगाया जा रहा है ताकि उसका पानी लोग उपयोग न करें, इसी प्रकार कुछ अन्य जिलों में गहरे हैण्डपम्प खुदवाये जा रहे हैं। बलिया जिले में तो जगह- जगह बोर्ड लगाकर हिदायत दी जा रही है है कि यहां का पानी पीना मना है! और साथ ही गंगा किनारे के गांवों के 117 हैंड पंपों पर लाल निशान लगाए गये हैं। 
आर्सेनिक के खतरे

आर्सेनिक के जहर वाला पानी नमकीन हो जाता है। अगर आर्सेनिक मिले पानी को लंबे समय तक पिया जाए तो इससे कई भयंकर बीमारियां होनी शुरू हो जाती हैं। पानी में घुलित आर्सेनिक कैंसर के कई रूप, त्वचा कैंसर और किडनी फेल होने जैसी बीमारियों का कारक है। मथुरा के शंकर कैंसर चिकित्सालय के डॉ. दीपक शर्मा के अनुसार आर्सेनिक के प्रभाव से गाल ब्लैडर में कैंसर हो सकता है। वृंदावन पैलिएटिक केयर सेंटर के डॉ. संजय पिशारोड़ी के अनुसार आर्सेनिक और नाइट्रेट के कारण मनुष्य का इम्यून सिस्टम प्रभावित होता है। इससे समय से पहले वृद्धावस्था के लक्षण नजर आते हैं। इम्यून सिस्टम प्रभावित होने पर मस्तिष्क में कैंसर का खतरा बढ़ जाता है। आर्सेनिक से टाइप दो की डायबिटीज का भी खतरा बढ़ जाता है। 

आर्सेनिक से प्रदूषित जल के सेवन से धमनियों से संबंधित बीमारियाँ होने और परिणामस्वरूप दिल का दौरा पड़ने और पक्षाघात के ख़तरे बढ़ जाते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार उन्होंने शरीर में आर्सेनिक के निरंतर प्रवेश का मस्तिष्क से जुड़ी धमनियों में सिकुड़न और अलीचलेपन से प्रत्यक्ष संबंध पाया है। अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन में छपी अनुसंधान रिपोर्ट में आर्सेनिक और कई जल अशुद्धियों को रक्तवाहनियों से जुड़े रोगों का कारण बताया गया है। बांग्लादेश और चीन सहित दुनिया के विभिन्न देशों में चट्टानों में आर्सेनिक की मात्रा पाई जाती है। लंबे समय तक आर्सेनिक प्रदूषित जल के सेवन से त्वचा संबंधी बीमारियाँ भी होती हैं, लेकिन कपड़े धोने या स्नान के लिए इस जल का उपयोग ख़तरनाक नहीं माना जाता है।
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आर्सेनिक से मुक्ति का उपायः

आर्सेनिक युक्त जल को अगर खुली धूप में 12-14 घंटे तक रख दिया जाए तो उसमें से 50 फीसदी आर्सेनिक उड़ जाता है। उसके बाद उस जल का इस्तेमाल पेयजल के रूप में किया जा सकता है। इसके अलावा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर किए जा रहे प्रयासों के तहत बंगाल कालेज ऑफ इंजीनियरिंग ने कम्युनिटी एक्टिव एलुमिना फिल्टर का निर्माण भी किया है जो पानी से आर्सेनिक निकालने में मददगार साबित हो सकता है। 

वहीं राष्ट्रीय वनस्पति शोध संस्थान के वैज्ञानिक भी इस समस्या से निजात दिलाने के रास्ते खोज रहे हैं संस्थान के वैज्ञानिकों ने उस जीन का पता लगा लिया है जो सिंचाई के बाद आर्सेनिक के स्तर को कम करने के साथ साथ उसे अनाज व सब्जियों में पहुंचने से रोकेगा। इस शोधकार्य में महती भूमिका निभाने वाले वैज्ञानिक डॉ. देवाषीश चक्रवर्ती ने कहा, “यह शोध प्लांट डिदेंस मैकेनिज्म को आधार बनाकर किया गया है 

ब्रिटेन के बेलफास्ट स्थित क्वींस यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने भी ऐसी किफायती तकनीक विकसित करने का दावा किया है, जिससे आर्सेनिक संदूषित जल की समस्या से निजात मिल सकती है। इस परियोजना के समन्वयक भास्कर सेनगुप्ता ने कहा,"क्वींस के शोधकर्ताओं द्वारा तैयार की गई यह तकनीक पर्यावरण के अनुकूल, इस्तेमाल में सरल, किफायती और ग्रामीण क्षेत्रों में उपलब्ध कराई जा सकने वाली दुनिया की एकमात्र तकनीक है।" यह तकनीक आर्सेनिक संदूषित भूमिगत जल के एक हिस्से को पारगम्य पत्थरों में रिचार्जिग पर आधारित है। इन पत्थरों में जल धारण करने की क्षमता होती है। यह तकनीक भूमिगत जल में ऑक्सीजन स्तर को बढ़ा देती है और मिट्टी से आर्सेनिक निकलने की प्रक्रिया धीमी कर देती है। इस तकनीक से पानी में आर्सेनिक की मात्रा धीरे-धीरे कम होने लगती है। 

इस तरह के वैज्ञानिक दावों से उम्मीद की डोर तो बांधी जा सकती है, पर पानी के प्रति सरकारों और पानी के संगठनों को जिम्मेदारी थोड़ा ईमानदारी से निभानी होगी, तभी शायद कोई रास्ता निकले . . . 

Tags - Groundwater in Hindi, contaminated by arsenic in Hindi, arsenic contamination in Balia and Lakhimpur in Hindi, arsenic content in its ground water in Hindi, arsenic contamination in Uttar Pradesh in Hindi, Industrial Toxicology Research Institute of Lucknow in Hindi,
 
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Submitted by Mahendra Agrawal (not verified) on Tue, 04/20/2010 - 20:38.
Arsenic contain water also found in many places/villages of Sonebhadra district. CPCB report shows this facts.
·         reply
Submitted by Mr Sukumar Das (not verified) on Thu, 03/19/2009 - 13:38.
Ignorancy to use water for drinking is one of the major problem in South Asian Countries. The Govt. of india should conduct an NSS Survey on Drinking Water. The Schedule canvas by the Field Investigators may aware the villagers and slum
·         reply
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नदी का संग्रहण क्षेत्र (River Basins)


सभी महत्त्वपूर्ण प्राचीन सभ्यताओं का विकास प्रमुख नदियों के किनारे ही हुआ है। इसीलिए नदियों का अपना अलग ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्त्व है। हम हमारी नदियों की रक्षा और बेहतर रुप से कैसे कर सकते हैं ताकि वे अगली पीढियों के लिए भी ऐसा ही योगदान दे पाएँ? 
हमारी नदियों की आज की दशा देखते हुए हमारे लिए यह जानना बहुत ही आवश्यक है। इसी समझ को बढ़ावा देने के लिए हमने विभिन्न स्थानों से जानकारी इकट्ठा करने की कोशिश की है। 

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जल-संतुलन (Water Balance)


यदि जमीन के बताए गए हिस्से में उस जमीन में जितना पानी जमा होता है यानी वर्षा के जरिए या किसी अन्य तरीके से साफ पानी जमा होता है; उसकी तुलना में यदि उस क्षेत्र से अधिक पानी निकल जाता हो ( जैसे -वाष्पीकरण (evaporation), पंप द्वारा निकासी आदि के कारण), तो उसके परिणामस्वरूप जल-स्तर घट जाता है, जो एक दीर्घकालीन संकट का कारण बनता है। जल-संतुलन एक पहले से ही प्रबंध करने योग्य कृती है जिसमें वर्षाजल के प्रमाण, जिससे कि छोटे जल-प्रवाह, वाष्पीकरण द्वारा रिसाव, भू-जल पुनर्भरण होता है, का मूल्यांकन किया जाता है। हम एक ऐसा अभ्यास/ अध्ययन चलाते हैं जिसमें जल-संतुलन के सिद्धांत एवं व्यावहारिक रूप में जल-संतुलन करना सिख़ाया जाता है। 

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Author: 
 Bharat Dogra
Source: 
 Sarvodaya Press Service, February 2012
To sustain the spirit of the law.
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Source: 
 Brainstorm Study Centre
Antiadisiel information - right in the range: Madras High Court

Recent public - private partnership project in the Madras High Court by the New Tirupur Area is an important decision Divelpmt Corp. Ltd. (Antiadisiel) has rejected the petition.
 कंपनी ने यह याचिका तमिलनाडु राज्य सूचना आयोग के उस आदेश के खिलाफ दायर की थी जिसमें आयोग ने कंपनी को मंथन अध्ययन केन्द्र द्वारा मांगी गई जानकारी उपलब्ध करवाने का आदेश दिया था। एक हजार करोड़ की लागत वाली एनटीएडीसीएल देश की पहली ऐसी जलप्रदाय परियोजना थी जिसे Under private partnership was launched in March 2004. There are a lot of public resources in the project Anshpugi 50 million, 25 million loan, paying 50 million loan guarantee fund is 71 million Shartej water.
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Web / Organization: 
http://hindi.indiawaterportal.org/sites/hindi.indiawaterportal.org/files/images/water_Rajasthan.jpgराजस्थान की जल नीति को 15 फरवरी 2010 को कैबिनेट सब-कमेटी ने प्रदेश की पहली जल नीति के रूप में मंजूरी दे दी है। राज्य जल नीति के उद्देश्य हैं:सस्टेनेबल आधार पर नदी बेसिन और उप बेसिन को इकाई के रूप में लेते हुए जल resources planning, development and management, integrated and multi-sectoral approach, and for surface water and Upsathi unitary approach. Policy priority in the drinking water,
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Government of Bihar on the occasion of World Water Day on March 22, 2010 drinking water and sanitation policy will be announced. The government is working on dual water supply. So that water can be recycled.Government district level and state level monitoring committees also Bnaiegi Jo surface water and rain water surface पानी max of Control on using Smucit would. Bihar government will set up a water regulatory authority will control the ground water protection and use.


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Varanasi. Every morning with eight quad-Talian soil Duffy - Shukreshwar lake reach Lanka route. Shukreshwar pond is a historic pond that gradually tails is. Kudon - ponds serious about the survival of the municipal pool Shukreshwar fresh sample.

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भारत में पानी

भारत में पानीपानीप्रेमचन्द्र श्रीवास्तव / पर्यावरण संदेश 


सामान्य तौर पर देखने से ऐसा लगता है कि भारत में पानी की कमी नहीं है। एक व्यक्ति को प्रतिदिन 140 लीटर जल उपलब्ध है। किन्तु यह तथ्य वास्तविकता से बहुत दूर है। संयुक्त राष्ट्र विकास संघ (यूएनडीओ) की मानव विकास रिपोर्ट कुछ दूसरे ही तथ्यों को उद्घाटित करती है। रिपोर्ट जहां एक ओर चौंकाने वाली है, वहीं दूसरी ओर घोर निराशा जगाती है। 


इस रिपोर्ट के अनुसार भारतीय आंकड़ा भ्रामक हैं वास्तव में जल वितरण में क्षेत्रों के बीच, विभिन्न समूहों के बीच, निर्धन और धनवान के बीच, गांवों और नगरों के लोगों के बीच काफी विषमता है। 


यहां विकासशील देशों की बातें न करके यदि सम्पन्न देश ब्रिटेन की बात करें तो वहां भी प्रति व्यक्ति प्रतिदिन जल की उपलब्धता मात्र 150 लीटर ही हैं। यह भारतीय आंकड़े से कुछ ही अधिक है। यही नहीं पड़ोसी बांग्लादेश की स्थिति तो और भी बद्तर है। प्रत्येक बांग्लादेशी के लिए प्रतिदिन की जल उपलब्धता मात्र 50 लीटर ही है। 


भारत के विभिन्न क्षेत्रों में जल की उपलब्धता पर यदि हम विहंगम दृष्टि डालें तो ज्ञात होता है कि बहुत से ऐसे क्षेत्र हैं जहां जल की उपलब्धता अत्यंत निराशाजनक है। लाखों ऐसे लोग हैं जिन्हें प्रतिदिन प्रतिव्यक्ति की दर से 20 लीटर साफ पानी भी उपलब्ध नहीं है। 


यदि मुम्बई नगर के सरकारी आंकड़ों पर विश्वास करें तो 90 प्रतिशत लोगों को सुरक्षित जल उपलब्ध है, किंतु मानव विकास रिपोर्ट के अनुसार मुम्बई नगर की लगभग आधी आबादी गंदी बस्तियों में निवास करती है और अधिकांश आंकड़े सुचीबध्द भी नहीं हैं। इन गंदी बस्तियों के लोग पानी के लिए कुओं, टैंकरों और असुरक्षित जल-स्त्रोतों पर निर्भर हैं। गरीब लोगों को लोहे के पाइपों, रिसती हुई अथवा टूटी टोटियों या गंदी हो चली टंकियों के जल से ही काम चलाना पड़ात हैं। 


इस रिपोर्ट के अनुसार 15 परिवारों को मात्र एक नल से ही काम चलाना पड़ता है और इस नल से एक दिन में मात्र दो घंटे ही जल आपूर्ति होती है। 


चेन्नई में औसत जल आपूर्ति एक दिन में 68 लीटर हैं किंतु टैंकरों पर निर्भर व्यक्ति प्रतिदिन मात्र 8 लीटर जल ही प्राप्त कर पाता है। अहमदाबाद की रिपोर्ट तो और भी चौंकाने वाली है। यहां के 25 प्रतिशत निवासी 90 प्रतिशत जल का इस्तेमाल करते हैं। पानी की अनुपलब्धता की चरम स्थिति तो अधिकांश नगरों में कभी-कभार ही समस्या के रुप में खड़ी होती है। किंतु यह समस्या जल के वितरण की कुव्यवस्था के कारण अधिक होती है। 


रिपोर्ट में गुजरात के जल स्वामियों की भी चर्चा की गई है। कुछ ऐसे भू-स्वामी हैं जिन्होंने जमीन में गहरे कुएं खोद रखे हैं, इससे आस-पास के गांवों के कुओं का जल सूख गया है। फिर गहरे कुओं के स्वामी आस-पास के गांवों के लोगों को अधिक मूल्य पर जल का विक्रय करते हैं।


आंध्रप्रदेश में दलित महिलाओं को उच्च जाति के लोगों के कुओं से जल की अनुमति तो मिली हुई है किंतु वे स्वयं उन कुओं से जल नहीं खींच सकती हैं। इसके लिए उन्हें दूसरों अर्थात उच्च जाति के लोगों पर निर्भर रहना पड़ता है और इसके लिए लम्बे समय तक प्रतीक्षा करनी पड़ती है। 


अर्जेन्टाईना, बोलिविया और लेटिन अमेरिका के अनुभवों से पता चलता है कि गैर सरकारी संस्थानों के पास ऐसी जादुई छड़ी नहीं है जिससे कि वे समस्या का समाधान प्रस्तुत कर सकें और सभी के लिए जल वितरण की उचित व्यवस्था कर सकें । अनेक देशों में इन उद्यमों की स्थिति निराशापूर्ण हैं। रिपोर्ट यह भी सूचित करती है कि निर्धनतम व्यक्तियों तक पानी के लिए दी गई सहायता राशि उन तक नहीं पहुंच पाती हैं । उदाहरण के लिए बंगलोर में सबसे धनी 20 प्रतिशत घरों के लिए जल की आर्थिक सहायता राशि उपलब्ध राशि का 30 प्रतिशत जल सहायता राशि ही मिलती है। यह रिपोर्ट संस्तुति करती है कि जल और सफाई के लिए व्यय की दी जाने वाली राशि में वृद्धि की जानी चाहिए क्योंकि इससे स्वास्थ्य पर होने वाले खर्च में और मृत्यु दर में कमी आयेगी जिसके फलस्वरुप लाभांश में बढ़ोतरी होगी। 


इस रिपोर्ट में निष्कर्ष के रुप में यह कहा गया है कि स्वच्छ पेय जल और सफाई सभी नागरिकों के लिए मूलभूत आवश्यकता के रुप उपलब्ध होना चाहिए। भारतीय संदर्भो के देखे तो ये कुछ आंकड़ें है जिन पर गौर करने से स्थितियां और भी स्पष्ट होती हैं। 


1.
यह विडम्बना है कि सैन्य व्यवस्था पर होने वाला खर्च सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 3प्रतिशत है जबकि जल और सफाई पर मात्र 0.5 प्रतिशत खर्च किया जाता है। 


2.
भारत में मात्र अतिसार (दस्त की बीमारी) से 4 लाख 50 हजार व्यक्ति प्रतिवर्ष काल के गाल में समा जाते हैं। 


3.
भारत में महिलाओं की एक संस्था सेवा (सेल्फ ईम्प्लायड वीमेन्स एसोसिएशन) ने शोध के पश्चात् यह पाया कि जल का संग्रह करने वाली महिला यदि अपने जल-संग्रह के समय में मात्र एक घंटे कम कर दे, तो वर्षभर में 100 डॉलर या 4500 रुपयों की अतिरिक्त आय कर सकती हैं। 


4.
दिल्ली, कराची और काठमाण्डू में 10 प्रतिशत से भी कम घर ऐसे हैं जिन्हें प्रतिदिन 24 घंटे जल की आपूर्ति प्राप्त होती है। वैसे आमतौर पर यहां मात्र दो या तीन घंटे प्रतिदिन ही जल उपलब्ध है। 


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