मंगलवार, 13 मार्च 2012

तिलक जैसी पत्रकारिता समय की मांग: श्रवण गर्ग


जनता के प्रति जवाबदेही कितनी ईमानदार?

२० अक्टूबर २०११
जनता के प्रति जवाबदेह माने जाने वाले मीडिया के भविष्य की चिंता करने वालों में इन दिनों सबसे ज्यादा चर्चा पेड न्यूज को लेकर है। इसलिए कम आश्चर्यजनक नहीं कि जो मीडिया पेड न्यूज से सबसे ज्यादा प्रभावित है उसी में इस विषय को लेकर सबसे ज्यादा बातचीत भी हो रही है। अखबारों में छपने वाले समाचारों अथवा टीवी चैनलों पर चलाई जाने वाली खबरों के संबंध में बरती जाने वाली ईमानदारी को लेकर इतनी चिंता पहले कभी नहीं दिखाई गई। यह एक अच्छा संकेत भी है और आगे आने वाले खतरों के प्रति मुनादी भी। पिछले लोकसभा चुनावों के दौरान पैसे लेकर प्रकाशित और प्रसारित की गई खबरों को आधार बनाकर हम मीडिया के भविष्य को सुरक्षित बनाना चाहते हैं ताकि आगे के चुनाव खबरों के प्रकाशन और प्रसारण के लिहाज से ज्यादा ईमानदार नजर आ सकें। पेड न्यूज को लेकर वर्तमान में चल रही बहस उस मुकाम पर पहुंचाई जा रही है जहां फैसले इस बात के होने हैं कि इस बुराई पर काबू पाने के लिए मौजूदा कानूनों में संशोधन किए जाएं, कोई नए उपाय ढूंढ़े जाएं या मीडिया संस्थानों को स्वानुशासन लागू करने अथवा अपनी ही आचार संहिता का पालन करने के लिए छुट्टा छोड़ दिया जाए। मीडिया और राजनीति दोनों ही क्षेत्रों में इस तरह की वकालत करने वालों की कमी नहीं है कि पेड न्यूज की बुराई पर रोकथाम के लिए कड़े से कड़े कानूनी प्रावधानों की जरूरत है। हम मीडिया प्रतिष्ठानों को अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठानों की तरह पब्लिक इश्यू जारी कर सम्पत्ति उगाहने और शेयर बाजार के उतार-चढ़ाव की अंतहीन दौड़ में शामिल होने की इजाजत भी देना चाहते हैं और उनसे उनके उपभोक्ताओंके प्रति ईमानदार रहने की उम्मीद भी करना चाहते हैं। राजनीति की मदद से अपने व्यावसायिक हितों का विस्तार करते हुए मीडिया प्रतिष्ठान आज इतने आगे बढ़ चुके हैं कि अपने पाठकों के प्रति इस तरह की उदारता की उनसे अपेक्षा ही नहीं की जा सकती। एक बात तो साफ है कि पेड न्यूज से निपटने का मामला हमारी सोच से कहीं ज्यादा पैचीदा है। इस पैचीदगी में यह भी शामिल है कि जो मीडिया राजनेताओं की विज्ञापननुमा जानकारियों को खबरों के रूप में छापकर अपने पाठकों के विश्वास को दाव पर लगाने में भी खौफ नहीं खाता वही मीडिया जब राजनेता पैसा लेकर संसद में सवाल पूछते हैं तो उनके खिलाफ खबरें प्रकाशित करने में भी कोई संकोच नहीं करता। और जब राजनीति करने वालों की एक बड़ी जमात समूची व्यवस्था को ही भ्रष्ट बनाने में जुटी हुई हो तब जनता के प्रति जवाबदेही के नाम पर मीडिया से उम्मीद की जाती है कि कम से कम उसे तो ईमानदार दिखाई देते रहना चाहिए। अपेक्षा यह है कि जनता का चुना हुआ प्रतिनिधि चाहे तो अपने मतदाताओं के प्रति बेईमान हो जाने का अधिकार रख सकता है, पर मीडिया को तो भ्रष्ट होने से बचाने के तमाम प्रयास किए जाना चाहिए। पेड न्यूजको लेकर चल रही बहस में इस बात पर भी गौर करना जरूरी है कि इसमें निशाने पर मुख्यत: प्रिंट मीडिया को ही लिया गया है। विजुअल मीडिया या इलेक्ट्रानिक चैनलों द्वारा चुनावों के दौरान प्रसारित की जाने वाली राजनीतिक खबरों के प्रसारण में कथित पेड न्यूजकी भूमिका की ज्यादा तलाश नहीं की गई है। दूसरे यह कि प्रिंट मीडिया में भी व्यावसायिक रूप से प्रकाशित होकर बिकने वाले अखबारों के ही चुनावों के दौरान चाल-चलन को संदेह के घेरे में लाया गया है। राजनीतिक दलों अथवा राजनीतिक विचारधाराओं के साथ प्रतिबद्धता रखने वाले समाचार पत्रों में चुनावों के दौरान प्रकाशित होने वाली खबरों की पाठकीय विश्वसनीयता को लेकर समूची बहस मौन है। यह मान लिया जाता है कि राजनीतिक दलों के पत्र व चैनल्स उनके प्रचार के लिए ही होते हैं। तीसरे यह कि ठीक मतदान के दिन अथवा मतदान के पूर्व तक राज्य और केंद्र सरकारों द्वारा जारी होने वाले विज्ञापनों तथा उनकी उपलब्धियों को दर्शाने वाले पेडपरिशिष्टों तथा वीडियो संदेशों को भी बहस से परे रखा गया है। और अंत में यह कि पेड न्यूजके विवाद की जड़ में उम्मीदवारों के लिए निर्धारित चुनाव खर्च की जो सीमा तय है उसे कम या ज्यादा करने का न तो प्रेस परिषद को और न ही चुनाव आयोग को कोई अधिकार प्राप्त है। चुनाव खर्च की सीमा संसद द्वारा निर्धारित की जाती है। उसमें कोई फेर-बदल भी जनता द्वारा चुने जाने वाले प्रतिनिधि ही कर सकते हैं। इनमें से कतिपय पर आरोप लगाए जा सकते हैं कि वे चुनाव के दौरान अपनी राजनीतिक खबरेंप्रकाशित करवाने के लिए पेड न्यूजजैसे छद्म तरीकों का उपयोग भी करते हैं और जीतने अथवा हारने के बाद मीडिया की जमकर आलोचना भी। पर पेड न्यूजपर चल रही बहस के दायरे को थोड़ा विस्तृत करके देखने की भी जरूरत है। खबरों की विश्वसनीयता के सवाल को अगर चुनावी आईने तक ही सीमित रखकर देखा जाएगा तो सात दिन और चौबीस घंटे वाले इलेक्ट्रानिक चैनलों और अखबारों के पन्नों पर दर्शकों और पाठकों को जो हर रोज उनकी बगैर जानकारी के खबरों के नाम पर जो कुछ भी परोसा जा रहा है वह सब बहस के बाहर ही छूट जाएगा। चुनावों के दौरान प्रकाशित होने वाली सभी तरह की पेड न्यूज’, दर्शकों और पाठकों को प्रत्येक क्षण बांटे जा रहे विज्ञापनों के अरबों खरबों रुपए के संगठित उद्योग के मुकाबले कहीं नहीं ठहरती। और फिर चैनलों और समाचार पत्रों को बिना कुछ प्रसारित/ प्रकाशित किए भी सरकारों की ओर से प्राप्त होने वाले फायदों पर किस मद में चर्चा की जानी चाहिए? चुनावी निष्पक्षता के नाम पर पत्रकारिता को केवल बिकनी पहनाकर ही शहरभर में घूमने की इजाजत दी जाए या नहीं इस पर बातचीत करना जरूरी है। पेड न्यूजके खिलाफ पत्रकार संगठनों के साथ-साथ मुख्य पहल तो उन सांसदों की ओर से भी होनी चाहिए जो कानून बदल भी सकते हैं और नए कानून बना भी सकते हैं। सांसद अगर इस तरह की मांग करते हैं और उसे मनवा लेते हैं कि चुनाव खर्च के लिए वर्तमान में निर्धारित सीमा को या तो समाप्त कर दिया जाए, बढ़ा दिया जाए या फिर उसे वास्तविकबना दिया जाए तो इससे न सिर्फ निर्वाचन आयोग का बहुत सारा बोझ कम हो जाएगा, चुनावों के जरिए चलन में आने वाले काले धन पर भी कुछ रोक लगेगी। उस स्थिति में पेड न्यूजजैसे मुद्दों पर बहस भी शायद समाप्त हो जाए। जब तक ऐसा नहीं हो पाता, पत्रकारों को उनके पाठकीय दायित्वों के प्रति शिक्षित करने का काम निश्चित ही जारी रखा जा सकता है। सही में पूछा जाए तो आज जो खतरा मीडिया पर या मीडिया में दिखाई दे रहा है वह पेड न्यूज की चिंता से कहीं ज्यादा बड़ा है। कई बार यह डर भी लगता है कि पाठकों और दर्शकों का ध्यान पेड न्यूज की बहस पर इतना ज्यादा केन्द्रित किया जा रहा है कि किसी और बड़ी मुसीबत की तरफ से हमारा ध्यान ही हट रहा है। विचारवान लोगों का ध्यान इस सवाल की ओर आकर्षित किया जा सकता है कि देश को अगर फिर से किसी आपातकाल जैसी स्थिति का सामना करना पड़ जाए तो उसके प्रतिरोाध में आज के मीडिया की भूमिका क्या होगी? हम अभी इस सवाल पर चर्चा नहीं कर रहे हैं कि वैसी किसी स्थिति में मौजूदा विपक्ष और मौजूदा जनता की भूमिका क्या होगी। दोनों के बारे में अलग से और विस्तार से बहस की जा सकती है। सवाल हायपोथेटिकल है, पर जरूरी नहीं कि भविष्य के आपातकाल से मीडिया का सामना उसकी उसी शकल में हो जो आज से पैंतीस साल पहले उस पीढ़ी से मुखातिब था जिसके कि अब केवल अवशेष ही बचे हैं। उस समय जब लगभग समूचा विपक्ष जेल में बंद था और आपातकाल से मुकाबला मीडिया का केवल एक धारदार तबका ही कर रहा था। मीडिया का एक प्रभावशाली वर्ग तो घुटनों के बल बैठने की मांग करने पर रैंगने को बेताब था। वे वामपंथी जो आज पेड न्यूज के खिलाफ कानून की मांग कर रहे हैं, तब मीडिया पर सेंसरशिप से सबसे ज्यादा प्रसन्न थे। जरा तलाश की जाए कि आज रामनाथ गोयनका जैसे कितने मालिक और कुलदीप नैयर, बी.जी. वर्गिज और राजेन्द्र माथुर जैसे कितने पत्रकार इस समय देश में उपस्थित हैं। पर जो सच्चाई है व इससे भी ज्यादा चौंकाने वाली है। वह यह कि बिना किसी आपातकाल के ही मीडिया के एक बड़े वर्ग ने आज अपने आपको इतने स्वानुशासन में ढाल लिया है कि केंद्र या राज्यों में व्यवस्था के खिलाफ व्यक्त होने वाली अभिव्यक्ति के लिए च्स्पेसज् की गुंजाइश लगातार कम होती जा रही है। पेड न्यूज को लेकर चिंता इस सच्चाई की उपज भी है कि चुनावों के दौरान पैसे लेकर कुछ उम्मीदवारों के पक्ष में खबरें प्रकाशित करने से योग्य व ईमानदार लोग संसद या विधानसभाओं में पहुंचने से वंचित रह जाते हैं। यह कृत्य न सिर्फ जनप्रतिनिधित्व कानून का उल्लंघन है बल्कि अन्य कानूनों जैसे कंपनी कानून और आयकर अधिनियम, आदि का भी मजाक उड़ाता है। पर क्या इसमें इस संभावना को भी जोड़ा जा सकता है कि पेड न्यूज पर प्रतिबंध लग जाने के बाद सवाल पूछने के लिए रिश्वत लेने वाले, सांसद निधि में भ्रष्टाचार करने वाले तथा कबूतरबाजी करने वाले लोग विधायिकाओं में चुनकर नहीं जा सकेंगे। बहस का विषय यह भी बन सकता है कि चुनावों के अलावा साल के तीन सौ पैंसठ दिनों जो कुछ भी छपता या दिखाया जाता है उसमें ऐसा कितना होता है जो भरोसा करने के काबिल है, जिसमें पाठकों और दर्शकों के साथ धोखाधड़ी की गुंजाइश नहीं होती अथवा जिसे इस राजनेता या उस राजनेता, किसी धर्मगुरु, कार्पोरेट हाउस या माफिया के दबाव में न तो छापा और दिखाया जाता है और न ही छपने या दिखाए जाने से रोका जाता है। अधिकांश लोगों को कभी पता ही नहीं चल पाता कि कौन किसके लिए क्या काम या लॉबिंग कर रहा है। अत: वास्तविक चिंता का विषय तो यह है कि मीडिया की जनता के प्रति जवाबदेही तय करने की कोशिशों में कहीं असली सवाल पूरी बहस से बाहर ही नहीं धकेल दिए जाएं और चुनावी पेड न्यूजके मुद्दे को एक ऐसे हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की छूट मिल जाए जिससे पूरे मीडिया की आजादी को ही प्रतिबंधित कर दिया जाए।
भास्कर न्यूज नेटवर्क, पुणे
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी लोकमान्य तिलक की पत्रकारिता की आज के समय में आवश्यकता है। लेकिन वह पत्रकारिता दिखाई नहीं देती। यह बात दैनिक भास्कर के समूह संपादक श्रवण गर्ग ने बुधवार को कही।
Shravan Garg Tilak Award
केसरी-मराठा ट्रस्ट द्वारा गर्ग को पत्रकारिता क्षेत्र में अतुलनीय कार्य करने के लिए लोकमान्य तिलक पत्रकारिता राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया। पूर्व में एन. राम, वीर संघवी तथा एचके दुआ इस पुरस्कार से सम्मानित हो चुके हैं। इस अवसर पर श्रवण गर्ग ने कहा कि जनहित के लिए सरकार से संघर्ष कर जेल में जाने की हिम्मत आज की पत्रकारिता दिखाएगी क्या? वास्तव में लोकमान्य तिलक की पत्रकारिता की आज के समय में आवश्यकता है। केसरी द्वारा मुझे प्रदान किया गया यह पुरस्कार मेरे आज तक किए हुए कार्य का मूल्यांकन जैसा है। यह मेरे लिए आनंद का क्षण है। इस पुरस्कार ने मेरे सामने पत्रकारिता की विश्वसनीयता बरकरार रखने की बड़ी चुनौती पैदा कर दी है। उन्होंने कहा, ‘मुझे ऐसा लग रहा है जैसे मैं किसी तीर्थयात्रा पर हूं। इस नारायण पेठ में स्वतंत्रता की कई कहानियां हैं। नारायण पेठ की स्वतंत्रता की कहानियों की खोज कर जनता तक पहुंचनी चाहिए। मैं पिछले 40 वर्षों से पत्रकारिता कर रहा हूं, लेकिन मेरे काम का इतनी खूबसूरती से मूल्यांकन होगा यह मैंने कभी सोचा भी नहीं था’।
राजनीति के बारे में गर्ग ने कहा कि लोकपाल को संसद में समर्थन देने वाली भारतीय जनता पार्टी ने उस नेता को पार्टी में स्वीकार कर लिया है जिसे बसपा ने भ्रष्टाचार के कारण पार्टी से निकाल बाहर किया था। यह अनुचित है। राजनीति बाहर से जैसी दिखती है वैसी नहीं है। समारोह में केसरी-मराठा ट्रस्ट के न्यासी डॉ. दीपक तिलक, रोहित तिलक, वरिष्ठ पत्रकार एसके कुलकर्णी और अन्य लोग भी उपस्थित थे।
इस मौके पर लोकमान्य तिलक द्वारा लिखे संपादकीय पर आधारित एसके कुलकर्णी द्वारा संपादित अक्षर वांग्मय का विमोचन भी श्रवण गर्ग के हाथों किया
गया।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें