मंगलवार, 13 मार्च 2012

मीडिया से जनता की अपेक्षाएं बढ़ी है - प्रखर समाचार


* पत्रकारिता का पहला उद्देश्य सूचना देकर जनचेतना बढ़ाना

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रायपुर (प्रखर)। राज्यपाल शेखर दत्त ने संगोष्ठी में मुख्य अतिथि के रूप में अपने संबोधन में कहा कि पश्चिम में समाचार पत्रों का मुद्रण और लोकतंत्र शासन प्रणाली का व्यवहार बहुत पहले शुरू हो गया था। इसकी तुलना में भारत में समाचार पत्रों का मुद्रण विलंब से शुरू हुआ और लोकतंत्र की स्थापना आजादी मिलने के बाद हुई। किंतु इसमें भी ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि पत्रकारिता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा लोकतंत्र किसी न किसी रूप में भारत में बहुत पहले से अस्तित्व में था। यही वजह है कि जब भारत में समाचार पत्रों का प्रकाशन आरंभ हुआ तो उसने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का आदर्श स्थापित किया। भारत के स्वतंत्रता संग्राम में समाचार पत्रों ने अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण बिन्दु है कि भारत के महानतम स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भारत के महान पत्रकार भी माने गए है। इन सबमें अग्रणी महात्मा गांधी है और उनके साथ लोकमान्य तिलक और जवाहर लाल नेहरू जैसे महान व्यक्तित्व शामिल है। बहरहाल एक और बड़ी बात यह है कि पत्रकारिता ने भारत में 19वीं शताब्दी में नवजागरण लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। हमारे लिए यह संतोष की बात है कि भारत में पत्रकारिता ने अपने इस स्वरूप को आज भी कायम रखा है और भारतीय समाज में वह विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के साथ यहां सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक स्वतंत्रता, समानता और न्याय सुनिश्चित करने की दिशा में संलग्न है। यह उल्लेखनीय है कि दुनिया ने 20 वीं शताब्दी में राजनीतिक, आर्थिक और विज्ञान के क्षेत्र जितनी तेजी से विकास किया है उतना उसने पिछले हजारों वर्ष में नहीं किया था। दुनिया औद्योगिक युग से निकलकर सीधे सूचना युग में आ गई। इस सूचना तंत्र ने पूरे विश्व में आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक परिवर्तन किए है। इसके साथ ही दुनिया में लोकतंत्र शासन प्रणाली का विस्तार हुआ है। अब हम जब लोकतंत्र के विस्तार और सूचना युग के कारण आए परिवर्तनों को एक साथ मिलाकर देखते है तब पता चलता है कि 21 वीं शताब्दी में मीडिया ने एक सबसे ज्यादा प्रभावशाली तंत्र का स्थान प्राप्त कर लिया है। सूचना प्रौद्योगिकी ने जो परिवर्तन किए है उससे जनसंचार के तंत्र में भारी बदलाव आया है और कुछ दशक पहले तक आधुनिक माने जाने वाले समाचार पत्र याने की प्रिंट मीडिया और टेलीविजन आदि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को अब पारम्परिक संचार माध्यम माना जाने लगा है, और न्यू सोशल मीडिया के रूप में आए इंटरनेट, वेब ब्लॉग, फेसबुक, ट्विटर आदि ने अपनी अत्यंत प्रभावशाली भूमिका को स्थापित कर लिया है। इसमें मोबाइल फोन भी मीडिया कन्वर्जेस की भूमिका निभा रहा है हाल ही के कुछ सप्ताहों में मिडिल ईस्ट में जो राजनीतिक आंदोलन हुए और भारत में भ्रष्टाचार के विरूद्ध जो जनजागृति अभियान चलाया गया, उसमें न्यू सोशल मीडिया की भूमिका सर्वोपरि मानी गई है और यहीं आकर एक बार यह तथ्य पुन: स्थापित हो गया कि राजनीतिक सामाजिक राजनीतिक परिवर्तन लाने का एक प्रभावशाली साधन है।  आज पूरा समाज जब यह देख रहा है कि हमारे लोकतंत्र के तीनों पाए कुछ लडख़ड़ा रहे हैं तब मीडिया से अपेक्षा की जा रही है ..कि वह आम आदमी की भावना को सामने लाए और उसकी अपेक्षा के अनुसार विधायिका, कार्यपालिका और न्यायापालिका को यह सोचने के लिए मजबूर करे कि जनता की क्या अपेक्षाएं हैं और उन्हें पूरा करने के लिए क्या करना चाहिए। मुझे खुशी है कि संचार और मीडिया के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए बड़ी संख्या में युवा वर्ग इस क्षेत्र में अपना कैरियर बनाना चाहते हैं। हमारे राज्य छत्तीसगढ़ में मीडिया और इसकी शिक्षा के महत्व को समझा गया है। यही कारण है कि यहां कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय की स्थापना की गई है। यह विश्वविद्यालय प्रयास कर रहा है कि मीडिया के क्षेत्र में आ रहे लगातार बदलावों के अनुरूप विद्यार्थियों को शिक्षा दी जाए। एक बार पुन: हम पीछे लौटकर देखें तो पाते हैं कि भारत में योजनाबद्ध विकास शुरू होने पर देश में चल रही पारंपरिक शिक्षा प्रणाली में हटकर इंजीनियरिंग, मेडिकल और प्रबंधन आदि नये विषयों के शिक्षा के संस्थान खुले और इन संस्थाओं से निकले युवाओ ने देश के नवनिर्माण के योगदान किया। इसी वजह से भारत में प्रबंधकों, वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और डॉक्टरों की बड़ी संख्या में आपूर्ति हुई, जिन्होंने न केवल भारत में बल्कि पश्चिम देशों में भी अपनी योग्यता को सिद्ध किया । इसी दौर से पत्रकारिता की भी पारंपरिक शिक्षा उपलब्ध कराने का कार्य प्रारंभी हुआ। जब बात प्रोफेशनल की आती है तब कहा जाता है कि आजादी के समय और आजादी के कुछ दशकों तक पत्रकारिता एक मिशन थी लेकिन अब वह एक व्यवसायिक उपक्रम का रूप ले रही है। यही वजह है कि पत्रकारिता और मीडिया पर कुछ आरोप भी लगते है। मेरा मानना यह है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा के लिए मीडिया द्वारा किया जाना प्रयास एक मिशन होता है, और नवीनतम तकनीकी ज्ञान तथा प्रबंधन की आवश्यकता के अनुरूप समाचार पत्रों का प्रकाशन या मीडिया और सोशल मीडिया से प्रसारण एक प्रोफेशनल कार्य है। इससे आगे बढक़र यदि कोई अन्य आकर्षण मीडिया को प्रभावित करें तो यह गैर-प्रोफेशनल बात है। देश के लिए यह उचित है कि हम चाहेंगे कि मीडिया शिक्षा के द्वारा युवाओं को समाचार की शुद्धता, यथा-तथ्यता और प्रमाणिकता को प्रस्तुत करने के आदर्श से आपूरित किया जाए और नवीनतम टेक्नोलॉजिकल तथा प्रबंधकीय ज्ञान से सक्षम बनाया जाए। इस तरह देश और समाज के प्रति कत्र्तव्य की पूर्ति होगी और आधुनिकता से तालमेल रहेगा। मीडिया की शिक्षा मूल रूप से दो द्वंद्वों के बीच झूलती रही है। पहला द्वंद्व है नैसर्गिंक प्रतिभा और विधिवत शिक्षा के बीच, इसी तरह दूसरा द्वंद्व है मिशन और प्रोफेशन के बीच। इन्हीं द्वंद्वों के बीच सही रास्ता खोजकर मीडिया शिक्षा की संभावनाएं खोजने की जरूरत है। पत्रकारिता का पहला उद्देश्य सूचना देकर जनचेतना बढ़ाना है। जब जन चेतना जागृत हो जाता है, तब विकास अपना रास्ता स्वयं तलाश कर लेता है। यदि हम भारत को विकसित देश के रूप में देखना चाहते है तो गांवों का विकास जरूरी है। मेरा मीडिया से आग्रह है कि ग्रामीण अंचलों के आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक विकास के लिए उत्प्रेरक का कार्य करें। हमारे देश और राज्य का अधिकांश क्षेत्र ग्रामीण है, जहां शिक्षा का स्तर कम है। यहां मीडिया की पहुंच भी कम है। यह बेहद जरूरी है कि मीडिया की पहुंच ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़े जिससे यहां के लोगों को सामाजिक-आर्थिक उन्नति के अवसरों का ज्ञान मिल सकें और वे उन अवसरों का लाभ लें सकें। इससे देश की मुख्यधारा के साथ उनका जीवंत और सतत संपर्क बनेगा और देश में समावेशी तथा समान विकास संभव हो सकेगा। अब मैं यहां शिक्षा को लेकर एक सुस्थापित विचार की ओर ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं। शिक्षा का सबसे पहला उद्देश्य होता है ज्ञान देना और फिर विद्यार्थी की निरीक्षण तथा विश्लेषण करने की क्षमता बढ़ाना। यह मानी हुई बात है कि अगर विद्यार्थी को सही ज्ञान प्राप्त हो जाता है और वह आसपास के वातावरण का सही तरीके से निरीक्षण कर लेता है तो उस निरीक्षण के आधार पर घटनाओं का विश्लेषण कर सकता है तो वह स्वयं को और अपने आसपास के वातावरण को अपने समुदाय, अपने राष्ट्र और विश्व को बेहतर ढंग से समझ सकता है। एक बार ज्ञान प्राप्त हो जाए, उपयुक्त ढंग से निरीक्षण और विश्लेषण किया जाए तो फिर व्यक्ति अपनी बात को पूरी तरह से अभिव्यक्त कर सकता है और यही अभिव्यक्ति प्रामाणिक और प्रभावशाली सिद्ध होगी। मैं सोचता हूं कि मीडिया शिक्षा में हमें इन तीन गुणों ज्ञान, निरीक्षण और विश्लेषण तथा अभिव्यक्ति की क्षमता को बढ़ाना होगा। में यह जानता हूं कि इन तीन गुणों से युक्त पत्रकार या मीडिया कर्मी जहां कहीं भी जाएंगे अपनी छाप छोड़ेंगे। ज्ञान को प्राप्त करने के लिए शिक्षकों और विद्यार्थियों को बहुत मेहनत करनी होगी। निरीक्षण और विश्लेषण की क्षमता को धीरे-धीरे अनुभव के आधार पर विकसित किया जा सकता है और फिर ज्ञान के आधार पर किए गए निरीक्षण और विश्लेषण से अभिव्यक्ति की योग्यता को भी विकसित किया जा सकता है, क्योंकि अंतत: समाचार पत्र का पाठक या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का दर्शक पत्रकार की अभिव्यक्ति की क्षमता से ही संपर्क में आता है और वह उससे ही प्रभावित होता है, प्रेरित होता है और आगे बढ़ता है। मीडिया में शिक्षा और मीडिया की स्वतंत्रता उसकी सीमा को लेकर अब चर्चा जरूर होनी चाहिए। मैं मीडिया की स्वतंत्रता पर अंकुश के पक्ष में नहीं हूं परंतु स्वतंत्रता का उपयोग कैसे हो यह मीडिया को भी तय करना चाहिए। मीडिया व पत्रकार का केन्द्रबिंदु आम आदमी होना चाहिए। प्रशिक्षण की महत्ता को नकारा नहीं जा सकता। आज परिवर्तन का दौर है आज नई तकनीक का दौर आ गया है इसलिए उस पर भी जोर देना होगा। विधानसभा अध्यक्ष धरमलाल कौशिक ने पत्रकारिता विश्वविद्यालय में आयोजित मीडिया शिक्षा भविष्य एवं दिशा पर आयोजित दो दिवसीय कार्यशाला के अवसर पर उपरोक्त बातें कहीं। उन्होंने शिक्षा सबके लिए जरूरी है और शिक्षा ही सबको समाज सेवा का अवसर प्रदान करता है। मीडिया को चाहिए कि वह समाज, राष्ट्र और समाज के विकास को लेकर जो उन्हें अवसर है उस दिशा में पहल करे। आजादी की लड़ाई में पत्रकारिता की भूमिका व अखबार का महत्व खूब रहा है और उसके बाद भी उसका महत्व कम नहीं हुआ है। पत्रकारों को प्रशिक्षण देना बहुत अच्छी बात होगी और प्रशिक्षण का महत्व हमेशा रहा है। आज परिवर्तन के दौर में जो नई तकनीक आ रही उसका उपयोग हम किस प्रकार समाज व राष्ट्रहित में कर सकते हैं इस दिशा में हमें पहल करनी होगी। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विवि के कुलपति व्ही. के कथूलिया ने मीडिया शिक्षा ग्रास रूट तथा मीडिया के संकट काल की दिशा पर प्रभावी वक्तव्य रखा। उन्होंने कहा कि मीडिया में गिरावट को लेकर मीडिया में काम करने वाले अच्छे लोग ही इसकी चिंता करते हैं। मीडिया में काम करने वाले लोग ही इसे सुसंस्कारित भी कर सकते हैं। इसके लिए हमें अपने सामाजिक दायित्वों और समाज के साथ व्यवहार पर भी मीडिया को चिंतन करना होगा। राजनीति विज्ञान, समाज तथा राजनीतिज्ञ इस विषय की चिंता नहीं करते। मीडिया समाज के लिए महत्वपूर्ण अंग हो गया है और इस विषय पर भी आज व्यापक चर्चा हो रही है। उन्होंने कहा कि हमें अपने दायित्व बोधों को समझकर काम करना होगा और समाज तय करे कि मीडिया का दायित्व क्या हो? उन्होंने भाषा की शुद्धता पर जोर दिया ताकि मीडिया समाज की सही भाषा बन सके। उन्होंने कहा कि अब दौर आ गया है कि मीडिया की दिशा तय करने का परंतु दिशा कौन तय करेगा। हम सामाजिक हित में नए मडिया को तैयार करना होगा। नए मीडिया को अपने हाथ में ले लिया है। उन्होंने कहा कि लिखने का और प्रबंधन का काम दो अलग-अलग काम है परंतु मीडिया की भूमिका निभाने वालों को अब प्रबंधन के विषय पर भी ध्यान देना पड़ता है जिसके कारण आज यह एक चुनौती भी बन चुकी है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विवि के कुलपति ने जोरदेकर कहा कि हमें अपनी भाषा को भी तय करना होगा और मीडिया के शिक्षा, भविष्य और दिशा में काफी कुछ करने की जरूरत है।  उन्होंने कहा कि आज की मीडिया पहचान में नहीं आती परंतु पारंपरिक व आधुनिक मीडिया के बीच का अंतर काफी है हमें इसके उपयोग की दिशा मेें और भाषा की शुद्धता को लेकर समाज की मीडिया से जो अपेक्षा है और आज बिकाउ हो गया है उससे हम कैसे निपटे इन सारे विषयों पर भी विचार की आवश्यकता है। पत्रकारिता विवि के कुलपति सच्चिदानंद जोशी ने अपने स्वागत भाषण में आयोजन के महत्व पर प्रकाश डाला और संस्थान के इतिहास के साथ साथ अन्य कई बातें भी उन्होंने रखी। और कहा कि संस्थान पिछले कुछ समय में ही संचार और संवाद के साथ गुणवत्तायुक्त शिक्षा की दिशा में अग्रसर है। इस अवसर पर भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष न्यायमूर्ति जी.एन. राय ने भी अपनी बात रखी और फिर अपनी बात रखते हुए उन्होंने कहा कि मीडिया की कार्यप्रणाली में वर्तमान में बहुत परिवर्तन आया है एक वो दौर था जब आजादी के पूर्व महात्मा गांधी राजाराम मोहन राय, लोक मान्य तिलक, आजादी की लड़ाई के समय जो समाचार पत्र निकालते थे उसका वास्ता सामाजिक सरोकार से होता था उन्होंने कहा कि आजादी के पूर्व तथा 1947 से 1970 का एक दौर था और उसके बाद आज मीडिया में बहुत बदलाव आया है। आज देश में 400 चैनल और 30 हजार पत्र पत्रिकाएं हैं। आज संचार के युग में एक नई दिशा तय करनी होगी। आज मीडिया प्रोफेशन हो गया है जिसके कारण उसके सामने कई चुनौतियां और संकट भी है। उन्होन े मीडिया की शिक्षा् पर विशेष जोर दिया और मीडिया की शुद्धता की भी उन्होंने बात की। उन्होंने कहा कि मीडिया का कार्यक्षेत्र सामाजिक सरोकार तथा समाज व देश के आर्थिक विकास पर केन्द्रित होना चाहिए जबकि आज व्यवसायिकरण के चलते मीडिया प्रोफेशनल हो चुका है। उन्होंने पेड न्यूज को गलत करार दिया और कहा यह प्रथा बंद होनी चाहिए।

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