बुधवार, 1 फ़रवरी 2012

radio/ प्रसारण एक क्रांतिकारी विकास

History
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            मीडिया के इतिहास में प्रसारण एक क्रांतिकारी विकास है। इसके पूर्व लोगों को संगीत कार्यक्रमों को सुनने उस स्थल पर जाना पड़ता था, जहाँ कार्यक्रम हो रहे थे, परन्तु रेडियो के अविष्कार के बाद अब अपने घर बैठे संगीत का आनन्द ले सकते हैं। यहाँ तक कि खेलकूद थिएटरों में चल रहे संगीत कार्यक्रमों का सीधा प्रसारण सुन सकते हैं।  मूक फिल्मो के युग में भी रेडियो जीवंत था। यदि ध्वनि की रिकार्डिंग नहीं की जाती तो आज तो हम फिल्मों में संगीत का जितना आनन्द लेते है; उतना नहीं ले पाते। ध्वनि के द्वारा ही जीवन है। संगीत और ध्वनि के माध्यम से ही हमारे आसपास जीवन जीवंत हो उठता है। , अब तक तार द्वारा केवल ध्वनि ही नहीं बल्कि फोटो भी भेजे जाते हैं, केवल हर्टज ही नहीं और भी कई आविष्कार है; जिन्होंने प्रसारण को सुविधाजनक और आसान बनाया।


मार्कोनी
 20 वर्षों की अल्पआयु में इटली के एक धनिक के इस पुत्र ने  मोर्स, बेल, बोस तथा हटर््ज द्वारा प्रतिदिन ज्ञान को प्राप्त कर लिया था और वायरलेस प्रसारण द्वारा संदेश भेजने की विधि खोज निकाली थी। जब गुगलिएलोमो मोर्कोनी 23 वर्ष का था; तब इसने अपने कमरे से ऊपर जहाँ इसके माता-पिता थे; वहाँ तथा वहाँ से पुनः उसी के कमरे में संदेश भेजने और प्राप्त करने में सफलता पाई थी। मार्कोनी की इन बातों से हैरान माता-पिता ने इस युवक को लंदन भेजा और ब्रिटिश चीफ टेलीग्राफ इंजीनियर से मिलने की प्रेरणा दी और अपने आविष्कार के सम्बंध में बताने को कहा। प्रथम रेडियो वेब के द्वारा संदेश ट्रांसमीटर तक  भेजा गया, जिसमें तारों की सहायता नहीं ली गई। कुछ दिनों के बाद मार्कोनी ने अपने वायरलेस संदेश को नौ मील की दूराी तक भेजने का प्रदर्शन किया।  मार्कोनी एक आविष्कारक ही नहीं था; बल्कि एक व्यवसायी भी था। दूसरे सन 1897 ई. में वायरलेस टेलीग्राफ तथा सिग्नल कम्पनी की स्थापना की। जिसके आधे शेयर इसके पास थे। प्रत्येक वर्ष कम्पनी से इसे 15000 पाउण्ड प्राप्त होते थे। एक 23 वर्षाीय युवा को इससे अधिक क्या चाहिए था।  नये वायरलेस सिस्टम का समाचार सर्वप्रथम ‘न्यूयार्क हेराल्ड’ में प्रकाशित हुआ। अक्टुबर 1899 में स्वयं इस समाचार पत्र के लिए फुटबाल मैच के आॅखों देखा हाल के कुछ अंश रेडियो द्वारा भेजा था।  बहुत से अमेरिकन व्यवसायी भी मिलिट्री फील्ड के लिए मार्कोनी द्वारा खोजी गई विधि को लागु करने के इच्छुक थे। 20वीं सदी के प्रारम्भ में उन्होंने अमेरिकन मार्कोनी कम्पनी की स्थापना की और इस पर 10 मिलियन डालर व्यय किए। मार्कोनी के आविष्कार के बाद रेडियो प्रसारण को आज की स्थिति में पहुँचाने का श्रेय दो अन्य आविष्कारकों को भी है- रंजिनाल्ड ओब्रे फेसेनडेन तथा ली डी फोरेस्ट।
रंजिनाल्ड ओब्रे फेसेनडेन
 वर्ष 1900 में यह कनाड़ा में रहने वाने व्यक्ति अमेरिका आया तथा यहाँ नेशनल इंलेक्ट्रिक कम्पनी प्रारंभ की। वर्श 1900 ई. में क्रिसमस की संध्या पर फेसेनडेन ने सफलता-पूर्वक अपनी ब्रेंट रॉक मेसायूटस से सुइर जहाज पर एक महिला का गीत और वायलिन द्वारा संगीत भेजने में सफलता पाई। जहाज पर साथ-साथ यात्रा करने वाले साथियों को सहज ही अपने कानों पर विश्वास नहीं हो पा रहा था, वे सोच रहे थे; कहीं यह वे सभी आश्र्चय चकित भी थे। वे नहीं जानते थे कि विश्व में प्रयारण के सबसे पहले चरण से वे परिचित हो रहे हैं।   इसके बाद फेसेनडेन के क्रिसमस डिटेक्र्टस का प्रयोग रेडियो वेव को पकड़ने के लिए किया। इसके द्वारा किए गए प्रयोग से सारे श्रेत्र समाप्त हो गए और वह निर्धन हो गया । अतः वह अपने पेटेन्ट वाशिंगटन हाउस इलेक्ट्रिक कम्पनी को बेचने पर मजबुर हो गया।


ली डी फारेस्ट    
          इन्हें हम रेडियो के पिता कह सकते हैं। वर्र्ष 1907 में ही फारेस्ट ने ग्लास बल्ब को रेडियो वेव डिटेक्टर के रूप में विकसित किया। अपने इस प्रयोग को उसने आडियोन नाम दिया। षेरली बियागी के अनुसार उसने इस आविष्कार को वायु का अदृश्य सामा्रज्य नाम दिया। डी फारेस्ष्ट केवल एक आविष्कारक ही नहीं बल्कि एक सफल प्रचारक तथा शोमैन भी था। उसने न्यूर्याक तथा पेरिस के ‘एफिल टॉवर’ से प्रसारण किया। नवम्बर 7,1906 को अमेरिका राष्ट्रपति के चुनाव का प्रसारण भी इसने किया, बहुत से लोग इसे प्रथम रेडियो प्रसारण मानते हैं।  डी फारेस्ट का आडियोन थोड़ा कीमती मगर फेसेनडेन के क्रिसमस डिटेक्टर कम्पनी ने डी फारेस्ट के सभी पेटेन्ट ले लिए। डी  फारेस्ट भी फेसेन्डेन की तरह दरिद्र हो गया; परन्तु एक अन्य कम्युनिकेशन कोर्पोरेशन द्वारा उसे पुनः प्राप्त हुआ। क्योंकि आडियोन रेडियो ब्राडकॉस्टिंग के लिए एक आवश्यक अव्यव बन गया था।


सार्नाफ (Sarnaff)-
 सन 1912 ई. में जब ‘टाइटेनिक’ डूबने को था, तब उसने एस.ओ.एस. (505) संदेश विश्व के विभिन्न भागों में भेजना प्रारंभ किया। इनमें से  एक संदेश मेसाच्पूट्स के नानटकेट आइलैंड से मार्कोनी के सेट द्वारा 21 वर्षीय युवक द्वारा भेजा जा रहा था। यह युवा डेविड सर्नाफ था; जो रूस से आया था।  इसके चार वर्र्ष बाद ‘मार्कोनी वायरलेस’ कम्पनी में इसे अपने आविष्कारियों को लिखा कि अमेरिका में ‘प्रत्येक घर में रेडियो संदेश भेजना चाहता हूँ।’ बेसबाल के स्कोर को  प्रसारित किया जा सकता हैं किसान तथा और अन्य कार्य करने वाले रेडियो के माध्यम से सम्र्पक स्थापित कर सकते हैं। परन्तु मार्कोनी के कम्पनी के लोगों द्वारा इस संदेश को नहीं समझा गया। सर्नाफ उनमें से था; जिसने रेडियो का वास्तविक रूप में एक जन माध्यम के रूप में देखा। जब वह कमर्शियल मैनेजर के रूप में कार्य कर रहा था; तब उसने अपने सपने को सच होते देखा, बाद में रेडियो कार्पोरेशन आॅफ अमेरिका का प्रसीडेन्ट बना। सर्नाफ को तीक्ष्ण बुद्धि केवल रेडियो तक ही सीमित नहीं रही। सन 1953 में उन्होंनें इतिहास रचा; जब इसने टीवी पिक्चर के लिए फिल्म टेप के स्थान पर मैग्नेटिक टेप के उपयोग की खोज की। इलेक्ट्रानिक फोटोग्राफी को भी इसने जन्म दिया और शीर्ष पुरूष बन गया।


रेडियो-
   ‘‘मार्कोनी’’ द्वारा तरंगों को पकड़ लेने की अदभुत खोज रेडियो के नाम से जानी गई। इसके माध्यम से संदेशों को एक सथान से दूसरे स्थान तक भेज सकते हैं। उन स्थानों पर भी जहां समाचार पत्रों एवं चिठ्ठियों का पहुंचना मुशकिल है। रेडियो संदेश “ेजने के लिए मुख्यतः दो केन्द्र आवश्यक हैं एक तो जो संदेशों को प्रसारित करता है दूसरा संदेशों को ग्रहण करता है। ध्वनि तरंगों को रेडिया तरंगों के संकेतों के रूप में बदला जाता हैं प्रसारित तरंग को स्थान-स्थान पर स्थपित ग्रहण केन्द्रों द्वारा ग्रहण किया जाता हैं रेडियो में लगे यंत्र इन्हें ध्वनि तरंगों में परिवर्तित कर देते हैं जो हमें स्पीकर के माध्यम से सुनाई देती है।  जैसा कि हम जानते हैं कि तरंगों के कई प्रकार की होती है और विभिन्न तरंगां का तरंगर्देध्र्य भी अलग होता हे इसलिए आवृति भी अलग-अलग होती है। इसी आधार पर रेडियो को बेंडों मे विभक्त किया जाता है। छोटा   Wavelenght  तथा अधिक Frecquency पर आधारित short wave तथा कम frequency  पर आधारित medium wave कहते हैं। ये दोनों बेण्ड एक स्थायी तिमुनमदबल पर काम करते हैं। संदेश भेजने वाले प्रत्येक सेना की अलग फ्रिक्वेंशी होती है अतः श्रोता अपने अनुसार अपने रेडियो पर कार्यक्रम व्यवस्थित कर लेता है।   सन् 1993 में आॅल इंडिया रेडियो पर 24 घंटे प्रसारण की सेपा दी गई जिसे एफ.एम रेछिरूो कहा गसा। यह सेवा देश के आधा दर्जन महानगरों में शुरू की गई। इसमें फिल्म संगीत से लेकर, टॉक शो, टेलीफोन कॉल आदि अनेक कार्यक्रम आते हैं।कई निजी कंपनीयों ने भी पदार्पण कर अपने अपने एफ.एम की शुरूआत की है।परन्तु 1998 में एफ.एम पर सभी निजी कार्यक्रमों को बंद कर दिया गया। 1999  में सरकार ने देश में 40 शहरों में 150 निजी एफ.एम रेडियो स्टेशनों को मान्यता दी और सन् 2000 में इसने देश के 17% भूभाग पर, 21 % आबादी पर अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया। भारत के सूचना प्रसारण मंत्रालय ने देश भर में 330 निजी एफ.एम रेडियो स्टेशनों को मंजूरी दे दी है जो कि देश के 90 शहरों में काम करेंगे। इन स्टेशनों की एक मुश्त अदायगी के अलावा सरकार के  साथ 4% राजस्व की हिस्सेदारी निभानी हेगी। निजी एफ.एम स्टेशनों को 20% तक की  एफ डी आई की इजाजत् होगी। निजी एफ एम खिलाड़ी को एक ही ‘शहर में दो  से ज्यादा लाइसेंस नहीं मिलेंगे । सूचना प्रसारण मुताबिक भारत में 3000 अतिरिक्त रेडियो स्टेशन शुरू करने की है।इस समय 185 से ज्यादा एफ.एफ स्टेशन हैं जिन्में से 139 विविध भारती चलाता है। सामुदायिक रेडियो भी सरपट दौड़ते है। इस दिशा में अन्य विश्वविधालय पहल कर चुके हैं और अब जामिया मिलिया इस्लामिया और भारतीय जनसंचार संस्थान इस दिशा में प्रयासरत है। संचार की सामान्य प्रणाली पर विभिन्न केन्द्रो के प्रसारण भी सुने जा सकते हैं। इसके अतिरिक्त हमारी आवाज दूसरे हैंम प्रसारकों तक पहुँचती है।   सन् 1889-87 में जर्मन भौतिक वैज्ञानिक हेनरिक रोडाल्फ हटर््ज ने सिद्ध किया कि ऊर्जा को तारों के प्रयोग बिना ही प्रक्षेपित किया जा सकता है। इस खोज ने रेडियो के खोज को सकारात्मक दिशा प्रदान की। इन्हीं दिनों इटली के भौतिक वैज्ञानिक गुगलीतमो मार्कोनी ने रेडियो की खोज का कार्य प्रारंभ किया। लेकिन इटली में उन्हेंे कोई सहायता और प्रोत्साहन नहीं मिला। इसलिए वे इंग्लैण्ड चले गए। ब्रिटिश सरकार ने उन्हें सहयोग दिया और एक अनुबंध के बाद उन्होंने ‘‘मार्कोनी वायरलैस टेलीग्राफी कंपनी की स्थापना की। ’’1825 में मार्कोनी ने एक यंत्र बनाया जिसके द्वारा इलेक्ट्रॉनिक सिग्नल को हवा के द्वारा बदला जा सकता था। इस खोज ने रेडियो के शुरूआत की आधारशिला रखी 1896 में उन्होंने अपने पहले प्रयोग को पेटेन्ट कराया। मार्कोनी ने हटर््ज तथा अन्य वैज्ञानिकों के आविष्कार के आधार पर अपने प्रयोग द्वारा पहला वायरलैस सिग्नल 1902 में अटलांटिक के उस पार भेजने में सफलता पाई।  इसके बाद इस दिशा में लगातार खोज और विकास होता रहा।1906 तक आते-आते अमेरिकी वैज्ञानिक ली.डी.फॉरेस्ट ने आॅडियान तैयार किया जो जॉन फलेमिंग के वैक्यूम ट्यूब की तकनीक पर
आधारित था।  1903 में मेसाचुसेटस में मार्कोनी स्टेशन की स्थापना की गई। 1906 मे  U.S Weather Burasy ने रेडियो की सहायता से मौसम की स्थिति का आंकलन किया। इसी वर्ष 1906 में मार्कोनी ने न्यू जसी में  एक शक्तिशाली रेडियो स्टेशन की स्थापना की इसे 1917 मे अमेरिकी सरकार ने द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान  संचार के लिए ले लिया गया। 1910 में मार्कोनी ने नियमित अमेरिकन-यूरोपियन रेडियो टेलीग्राफ की सेवा की शुरूआत की।   सन् 1914 में प्रथम विश्वयुद्ध होने के बाद इंग्लैण्ड तथा जर्मनी ने नौसेना और थलसेना को सन्देश भेजने के लिए शक्तिशाली वायरलैस केन्द्र की स्थापना की । अमेरिका की Generay Electronic copany ने और ATT American Telephone & telegrapfh ने उन संदेशों को प्राप्त करने के लिए हजारों रेडियो सेटस का निर्माण किया ।  1920 में सोवियत वैज्ञानिक के एक व्यक्ति के स्वर को रेडियो वेव के द्वारा प्रसारित करने में सफलता हासिल किया। 1921 में रशिया में एक शक्तिशाली स्टेशन स्थापित किया गया। 1922 में मास्को में दूनिया का सबसे शक्तिशाली रेडियो प्रसारण स्टेशन था। 1925  में दूनिया का पहला  शोर्ट वेव रेडियो स्टेशन मास्को में स्थापित हुआ। 1920 में अमेरिका में पहला कॉपर्शियल रेडियो स्टेशन की स्थापना की गई। 1922 के अन्त तक अमेरिका में 670 रेडियो स्टेशन की लाइसेंस प्रदान किया गया। इससे रडियो की लोकप्रियता में काफी वुद्धि हुई। इधर ।ज्-ज् ने रेडियो पर विज्ञापन के लिए इच्छुक कम्पनियों को  Airtime Sell करने का निर्णय लिया। जनता में इस निर्णय के विरोध के चलते 1927 में संकट उत्पन्न हो गया। अतः संकट को ध्यान में रखते हुए एफ.आर.सी की स्थापना की गई। और यह ध्यान रखा गया की प्रसारण जनता के हित में हो।  इस प्रकार 1910 से 1954 के बीच बी.बी.सी ,आर.सी.ए, Russian Brodcasting  company, voice of germany, Radio germany जापान की एन एच आर (निपौन होसो क्योकार्ड जापान) आदि राष्ट्रीय प्रसारण संस्थाओं की नवंबर 1922 में बी.बी.सी की स्थापना हुई। मार्कोनी कंपनी ने कई कम्पनियों के सहयोग से इसकी स्थापना की। एक साल के अन्दर बी.बी.सी का प्रसारण पूरे ब्रिटेन में होने लगा। 1924 में ब्रिटेन के पार्लियमेंट ने रॉयल जारी किया गया। इसके तहत-
1 बी.बी.सी के कार्यक्रम जनहित में प्रसारित किए जाए।
2 बी.बी.सी  किसी मुददे पर अपनी राय नहीं देगी।
3 बी.बी.सी  में कोई प्रायोजित कार्यक्रम प्रसारित नहीं होगा।
  1995 में  बी.बी.सी की फंडिग ब्रिटानी सरकार करती थी। 1995 में बी.बी.सी को पुनःस्थापित कर इसे 3 भागों में बाँटा गया।
1 बी.बी.सी रीसोर्स-यह बी.बी.सी की उप कम्पनी है। बी.बी.सी का मुख्यालय, बुश हाउस इसके नियंत्रण में है।यह बी.बी.सी को उपकरण, फर्नीचर, स्टूडियो किराये पर देती है।
2 बी.बी.सी प्रोग्राम-इस विभाग का काम कार्यक्रम निर्माण करती हे।
3 बी.बी.सी. मार्केटिंग- इस विभाग का काम प्रोग्राम की बॉर्डकास्टिंग एवं मार्केटिंग करना है।
 इसके बाद बी.बी.सी की आय में 120 करोड़ पौण्ड की आय में  वृद्धि हुई। बी.बी.सी ने पूरी दूनिया में रेडियो के विकास मेे अहम भूमिका निभाई। भारत सहित एशिया के कई देशों और अफ्रीकी देशों में  रेडियो के विकास को गति प्रदान की।
नवंबर 1922 में बीबीसी की शुरूआत हुई थी। मार्कोनी से इसकी स्थापना की थी। एक साल के अन्दर पूरे ब्रिटेन में बीबीसी का प्रसारण होने लगा।
           उस समय तत्कालीन जर्नल मैनेजर थे- जे.सी.डब्लू राईट इन्हें बीबीसी का निर्माता व संस्थापक माना जाता है। इसकी लोकप्रियता का आलम यह था कि यह जनता के विचारों का माध्यम बन चुका था। 1927 में ब्रिटेन के लोकसभा ने रायल चार्टर जारी किया । इस कानून के अन्तगर्त बीबीसी को पब्लिक र्टस्ट ,व स्वायत्तशासी संस्था माना गया। इस रॉयल चार्टर के अन्तगर्त बीबीसी की कार्य  की सीमाएं तय की गई भी जो निम्न हैं।
1 बीबीसी के कार्यक्रम जनहित मे प्रसारित किए जाएगें।
2 बीबीसी किसी भी मुद्दे पर राय नहीं देगी।
3 बीबीसी में संस्था कोई धार्मिक संदेश नहीं देगी।
4 इस पर कोई प्रायोजित कार्यक्रम प्रसारित नहीं होगा। अर्थात विज्ञापन भी नहीं।
 ब्रोर्ड आफ डायरेक्टरस (11 सदस्यीय)इसमें 12 सदस्य होते हैं। इनमें से 11 सदस्यों की सिफारिश पर 1 सदस्य को डी.जी डायरेक्टर जर्नरल बनाया जाता है। यह बीबीसी की सर्वोच्य पॉलिसी  है।
ब्रॉड आफ गर्वरर्नस (12 सदस्यीय)
इसके सदस्यों की नियुक्ति डी.जी डायरेक्टर जर्नरल करता है। ये बीबीसी का प्रशासनिक काउनसिल हैं। जो ब्रॉड आॅफ डायरेक्टरस के पॉलिसी का क्रियांवयन करती है।
1 बीबीसी के संचालन के लिए ब्रिटिश पार्लियमेंट ग्रान्ट इन ।पक प्रदान करती है।
2 बीबीसी. ब्रिटिश पार्लियमेंट के लिए उत्तरदायी होगी।
3 जे.सी.डब्लू. राइट 1922 से 1940 तक पहले जी.एम फिर डीजी. रहे इन्होंने बीबीसी. में नई नीतियों, कार्यक्रमों और परंपराओं का विस्तार किया।
4 1980 में बीबीसी की फंडिंग ब्रितानी सरकार द्वारा बीबीसी के खर्चे को वहन करने में वित्तीय कठिनाइयाँ आ रहीं थी।
5 1995 में अीअीसी की फंडिंग 700 करोड़ रूपये था बावजूद इसके कठिनाइयाँ हो रहीं थी।
 अतः 1995 में बीबीसी को पुनःसंगठित किया गया। और इसके अन्तर्गत बीबीसी को तीन भागों में बाँटा।
1 बी.बी.सी रीसोर्स-यह बी.बी.सी की उपकम्पनी है। बी.बी.सी का मुख्यालय, बुश हाउस इसके नियंत्रण में है। यह बी.बी.सी को उपकरण, फर्नीचर, स्टूडियो किराये पर देती है।
2 बी.बी.सी प्रोग्राम-इस विभाग का काम कार्यक्रम निर्माण करती हे।
3 बी.बी.सी. मार्केटिंग- इस विभाग का काम प्रोग्राम की बॉर्डकास्टिंग एवं मार्केटिंग करना है।
 इसके बाद बी.बी.सी की आय में 120 करोड़ पौण्ड की आय में  वृद्धि हुई। बी.बी.सी ने पूरी दूनिया में रेडियो के विकास मेे अहम भूमिका निभाई। व भारत सहित एशिया के कई देशों और अफ्रीकी देशों में  रेडियो के विकास को गति प्रदान की।
  इस समय बीबीसी के नये डीजी बने सर जॉन ब्रीट। सर जॉन ब्रिट बीबीसी के पहले ऐसे निदेशक बने  जिसका उद्देश्य इस संस्था की लाभकारी बनाना था। सरकार को फंडिंग कम करना था इन्होंने बीबीसी में आमूलचूल परिवर्तन किया। इनका परिवर्तन मुख्यतया दो प्रकार से  हुआ।
तकनीकि परिवर्तन इन्होंने ही बीबीसी में डीजिटल टेक्नॉलोजि का प्रयोग किया। इनके कार्यकाल से पहले बीबीसी पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रम बीबीसी स्वयं तैयार करती थी लेकिन इन्होंनें एक नई पहल की स्वतंत्र प्रांग्राम प्रोड्यूसर की सेवायें लेने लगे। इन्होंने 2002 में के लिए स्वतंत्र प्रांग्राम रिसर्च की शुरूआत की। इनके बाद ग्रे डाइक डी.जी बने।  दुनिया में रेडियो का पर्याय माना जाता है। श्रीलंका में पहला रेडियो स्टेशन ,नेपाल में 1950 में ,मलेशिया 1936 में फिलीपीस में 1922 में हुआ। चीनी रेडियो-चाइना रेडियो स्टेशन चीन में काफी लोकप्रिय है।  1960 के बाद रेडियो संचार के संभवत माध्यम के साथ-साथ मनोरंजन के माध्यम के रूप में अपने को स्थापित किया। एफ.एम चैनलों के आविष्कार ने मनोरंजन की दूनिया में क्रांति पैदा कर दी।  टेलीग्राफ के विकास के साथ रेडियो का भी विकास हुआ। इसके फलस्वरूप हैम रेडियो ,वेव रेडियो भी प्रयोग में आने लगे और अब स्काई रेडियो।  कम्व्यूटर और इन्टरनेट के इस युग में भी रेडियो की लाकप्रियता और इसके विकास के नये आयाम इसकी लोकप्रियता, प्राथमिकता और महत्ता में साबित हो रही है।
रेडियो की विकास यात्रा
 संचार के आधुनिकतम माध्यमों में रेडियो ने अपने वर्चस्व एवं महत्व को सर्वत्र कायम रखा हैै। रेडिया अपनी विकास यात्रा के स्वर्णिम सोपानों को स्पर्श करता हुआ यहाँ तक पहुँचता है। रेडियो पर प्रसारित होने वाले  कार्यक्रमों का श्रोताओं पर सबसे तेज प्रभाव पड़ता है। भारत जैसे देश में जहाँ आज भी अस्सी प्रतिशत जनसंख्या गाँवों में निवास करती है, वहाँ रेडियो ही सूचना एवं मनोरंजन का प्राथमिक साधन है। रेडियो भी अपने श्रोताओं के वर्ग की विविधता को दृष्टि में रखकी अपने कार्यक्रमों का निर्माण एवं प्रसारण करता है।  पश्चिम के देशों में रेडियो टीवी पर भारी पड़ा है। आज वहाँ टेलीविजन देखना लोग समय की बरबादी समझते हैं। जबकि रेडियो के चलन में क्रान्तिकारी इजाफा हुआ है। प्र्रायः प्रत्येक गाड़ी में आप वहाँ के लोगों को साधारण रूप से रेडियो सुनते हुए देख सकते हैं। इसका एक कारण यह भी है कि हम जब टीवी को देखते हैंं तो हमें पूर्ण रूप से उसके साथ  उपस्थित रहना पड़ता है, जबकि रेडियो इसका अपवाद है। हम रेडियो को सुनते हुए और भी बहुत से कार्य संपादित कर सकते हैं। एक सर्वेक्षण के उपरांत यह तथ्य सामने आया है कि घरों में किचन में काम करनेवाली गृहिणियाँ सब्जी व खाना पकाते समय रेडियो सुनना सबसे ज्यादा पसंद करती हैं। ये रेडियो पर प्रसारित होनेवाले कार्यक्रमों का ही जादू है कि गाँव की छोरी से लेकर शहर की गोरी तक सब इसकी दीवानी हैं।
रेडियो का आविष्कार
                  अपने प्रारंभिक दौर में यह वैसा नहीं था। इसने अपनी प्रगति के सफर में बहुत से क्रांतिकारी व नूतन आयामों को तय किया है। उन्नीसवीं शताब्दी का यह अंतिम दशक था, जब समूची दुनिया के वैज्ञानिक नित नई खोजों के लिए नए प्रयोगों में जूझ रहे थे। ऐसे में ही इटली के एक वैज्ञानिक गुगलीमो मारकोनी ने इस दिशा में गंभीरतापूर्वक प्रयास शुरू किए। उन्होंनें सन् 1985 में सर्वप्रथम ‘बेतार संकेत’ को इलेक्ट्रोमैग्नेटिक हार्टजियन तरंगों द्वारा प्रसारित करके सुना। जिन सिद्धांतों पर यह प्रसारण किया गया था, उनका विकास लगभग एक दशक पहले ही हो चुका था या दूसरे शब्दों में कहे तो मारकोनी की दस साल की मेहनत पहली बार सफल रूप में सामने आई थी। शुरूआती दौर में अव्यवसायी लोगों द्वारा रेडियो को लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया गया। बेतार का तार और रेडियो टेलीफोन ने समुद्री यातायात के विकास-क्रम भी जारी रहा । प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान सैनिक संचार और प्रचार के लिए रेडियो का खुलकर इस्तेमाल हुआ; लेकिन पूरे विश्व में युद्ध के उपरांत ही प्रसारण युग का सूत्रपात हुआ।
रेडियो का शुरूआती दौर
  दुनिया में रेडियो का प्रथम नियमित प्रसारणा केंद्र सन् 1920 में पीट्सबर्ग(अमेरिका) में प्रारंभ हुआ। इसके तत्काल बाद ‘रेडियो कॉर्पोरेशन आॅफ अमेरिका का गठन किया गया और फिर आर.सी.ए द्वारा कार्यक्रमों का प्रसारण शुरू हुआ। उधर इंग्लैड में जी.एल. मारकोनी ने मारकोनी कंपनी के नाम से  अपनी एक संस्था का गठन कर लिया था। उन्होंने 23 फरवरी,1920 को चेम्सफोर्ड (इंग्लैड) से  अपने पहले रेडियो कार्यक्रम का सफलतापूर्वक प्रसारण किया। सन् 1895 से  लेकर 1920 तक जी.एल मारकोनी रेडियो के विकास को लेकर नित नए प्रयोगों में जुटे रहे। यह वह काल था जब संक्षेप मे बेतार संकेतों को सुने जाने का कार्य चलता रहा। पच्चीस साल के अथक परिश्रम के बाद मारकोनी पहली बार विधिवत् किसी कार्यक्रम को सफलतापूर्वक प्रसारित करने में कामयाब रहे।  लंदन में 14 नवंबर को ’ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कंपनी’ की स्थापना की गई। मारकोनी के सहयोग व निर्देशन में वहाँ से निसमित रेडियो कार्यक्रमों का प्रसारण प्रारंभ हुआ।

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