गुरुवार, 2 फ़रवरी 2012

पत्रकारिता के उद्देश्य / पत्रकारिता : एक नजर में etc




पत्र- पत्रिकाओं में सदा से ही समाज को प्रभावित करने की क्षमता रही है। समाज में जो हुआ, जो हो रहा है, जो होगा, और जो होना चाहिए यानी जिस परिवर्तन की जरूरत है, इन सब पर पत्रकार को नजर रखनी होती है। आज समाज में पत्रकारिता का महत्व काफी बढ़ गया है। इसलिए उसके सामाजिक और व्यावसायिक उत्तरदायित्व भी बढ़ गए हैं। पत्रकारिता का उद्देश्य सच्ची घटनाओं पर प्रकाश डालना है, वास्तविकताओं को सामने लाना है। इसके बावजूद यह आशा की जाती है कि वह इस तरह काम करे कि बहुजन हितायकी भावना सिद्ध हो।
महात्मा गांधी के अनुसार, ‘पत्रकारिता के तीन उद्देश्य हैं- पहला जनता की इच्छाओं, विचारों को समझना और उन्हें व्यक्त करना है। दूसरा उद्देश्य जनता में वांछनीय भावनाएं जागृत करना और तीसरा उद्देश्य सार्वजनिक दोषों को नष्ट करना है। गांधी जी ने पत्रकारिता के जो उद्देश्य बताए हैं, उन पर गौर करें तो प्रतीत होता है कि पत्रकारिता का वही काम है जो किसी समाज सुधारक का हो सकता है।
पत्रकारिता नई जानकारी देता है, लेकिन इतने से संतुष्ट नहीं होता वह घटनाओं, नई बातों नई जानकारियों की व्याख्या करने का प्रयास भी करता है। घटनाओं का कारण, प्रतिक्रियाएं, उनकी अच्छाई बुराइयों की विवेचना भी करता है।
पूर्व राष्ट्रपति शंकरदयाल शर्मा के अनुसार, पत्रकारिता पेशा नहीं, यह जनसेवा का माध्यम है। लोकतांत्रिक परम्पराओ की रक्षा करने शांति और भाईचारे की भावना बढ़ाने में इसकी भूमिका है।
समाज के विस्तृत क्षेत्र के संदर्भ में पत्रकारिता के निम्नलिखित उद्देश्य व दायित्व बताये जा सकते है-
. नई जानकारियां उपलब्ध कराना
. सामाजिक जनमत को अभिव्यक्ति देना
. समाज को उचित दिषा निर्देश देना
. स्वस्थ मनोरंजन की सामग्री देना
. सामाजिक कुरीतियों को मिटाने की दिशा में प्रभावी कदम उठाना
. धार्मिक सांस्कृतिक पक्षों का निष्पक्ष विवेचन करना
. सामान्यजन को उनके अधिकार समझाना
. कृषि जगत व उद्योग जगत की उपलब्धियां जनता के सामने लाना
. सरकारी नीतियों का विश्लेषण और प्रसारण
. स्वास्थ्य जगत के प्रति लोगों को सतर्क करना
. सर्वधर्म समभाव को पुष्ट करना
. संकटकालीन स्थितियों में राष्ट्र का मनोबल बढ़ाना
. वसुधैव कुटुम्बकम की भावना का प्रसार करना
समाज में मानव मूल्यों की स्थापना के साथ जन जीवन को विकासोन्मुख बनाना पत्रकारिता का दायित्व है। पत्रकारिता के सामाजिक और व्यवसायिक उत्तरदायित्व के अनेकानेक आयाम हैं। अपने इन उत्तरदात्वि का निर्वाह करने के लिए पत्रकार का एक हाथ हमेशा समाज की नब्ज पर होता है।

 

 

विकास पत्रकारितासमय की मांग

डा. ब्रजेश पति त्रिपाठी/ विकास के क्षेत्र में सूचना का सबसे अधिक महत्व होता है। किसी क्षेत्र का विकास सूचना के बिना संभव नहीं है। कहां किसे क्या आवश्यकता है? कितनी आवश्यकता है? कैसे उस आवश्यकता की पूर्ति की जाय? विकास के लिए किन-किन बातों का जानना जरूरी है? कौन-कौन से सामान या तकनीकी ज्ञान की आवश्यकता है। वे सभी चीजें सूचना के माध्यम से ही सोचा, समझा और जाना जा सकता है। विकास पत्रकारिता उसी प्रक्रिया को कहते हैं जो लोगों को सभी आवश्यक सूचना देकर विकास को गति प्रदान करते हैं।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से पूरी दुनिया में आर्थिक-सामाजिक विकास की दिशा में चेतना बढ़ी है। 1950 से पहले विकास मुख्य रूप से आर्थिक बिन्दुओं के इर्द-गिर्द घूमते नजर आते थे लेकिन 1950 के बाद विकास में आर्थिक बिन्दु के साथ-साथ सामाजिक भी जुड़ गयी। इसी के साथ विकास का अर्थ आर्थिक विकास नहीं रहकर इसमें समाज के सामाजिक, भौतिक विकास संबंधी पक्षों को भी सम्मिलित किया गया। स्वास्थ्य, चिकित्सा शिक्षा आदि क्षेत्रों का महत्व भी धीरे-धीरे विकास के दायरे में आता चला गया। फिर भी सभी पक्षों की तुलना में आज भी आर्थिक पक्ष ही विकास प्रक्रिया पर अधिक हावी रहा है। विकास की गति को बढ़ाने की आवश्यकता का मुख्य कारण गरीबी, भूखमरी, स्वास्थ्य, शिक्षा और आवास संबंधी समस्याओं का होना है।
मनुष्य की आवश्यक आवश्यकताएं आखिर क्या है। इस पर अनेक बार अन्तरराष्ट्रीय स्तर के सम्मेलनों में विकसित व विकासशील देशों के बीच अच्छी खासी बहस हुई। आवश्यक आवश्यकताएं को ही हम मूल आवश्यकता भी कहते हैं। आवश्यक आवश्यकता वह है जो व्यक्ति में रचनात्मकता प्रदान करने के लिए स्वस्थ वातावरण पैदा करें, आत्मनिर्भर बनाये और व्यक्ति स्वयं को आर्थिक दृष्टि से स्वतंत्र महसूस करे। इसीलिए विकास ऐसा होना चाहिए जिससे व्यक्ति और समाज का सम्रग विकास हो।
विकास क्षेत्र से जुड़े लोगों के लिए गरीबी के अर्थशास्त्र के साथ-साथ गरीबी का भूगोल पढ़ना बहुत ही जरूरी है। इस दिशा में विकास पत्रकारिता का विशेष योगदान हो सकता है। अत्यंत गरीब किस क्षेत्र में है ? उनकी संख्या क्या है ?उनकी गरीबी का कारण क्या है ? प्रत्येक क्षेत्र के गरीबी के कारण अलग-अलग हो सकते हैं इसलिए जब तक उस स्थिति का सही ज्ञान नहीं होगा तब तक उससे निजात नहीं पाया जा सकता है। सामान्यतः अत्यंत गरीब लोग बहुत सुदूर क्षेत्रों में रहते हैं, लेकिन बहुत से गरीब लोग हमारे आसपास भी रहते हैं। जिनका प्रायः समाज के सम्पन्न लोगों द्वारा शोषण किया जाता रहा है। ऐसे बहुत से लोग हैं, जिन्हें गरीबी के कारण प्राकृतिक संसाध्नों से भी वंचित होना पड़ता है। इस प्रकार लोग प्रायः ग्रामीण क्षेत्रों में पाये जाते हैं जिनकी जमीनें बिक चुकी है और उनके पास गुजर बसर के आवश्यक साधन भी नहीं बचे हैं। इस स्थिति के लिए अलग सोचने, विचारने और कार्य करने की आवश्यकता है। जिसमें विकास पत्रकारिता का विशेष योगदान संभव है।
विकास प्रत्येक क्षेत्र के लिए एक जैसा संभव नहीं हो सकता है। किसी क्षेत्र विशेष के विकास कार्य करने से पहले वहां के लोगों के मानस को जानना जरूरी है। लोग क्या सोचते हैं? उनकी मानसिक दशा क्या ऐसी है जो विकास के प्रति झुकायी जा सकती है? पूरी तरह से अविकसित क्षेत्र में मुख्यतः आदिवासी क्षेत्र आते हैं। जो विकास के प्रति उत्साही नहीं होते हैं।
आवश्यकता इस बात की है कि मानसिक स्थिति के साथ-साथ आर्थिक और सामाजिक दशा के संबंध में भरपूर जानकारी प्राप्त किये बिना विकास के कदम को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता है। इस दायित्व को पत्रकारिता के माध्यम से ही पूरा किया जा सकता है। पत्र पत्रिकाओं के सम्पादक, संवाददाता वैसे अविकसित क्षेत्रों में जाये जहां विकास की शुरूआत ही नहीं हुई है अथवा अभी-अभी शुरू हुई है और वहां की सभी पक्षों का अध्ययन करके समाज और सरकार को बतायें कि वहां के लोगों की मूलभूत आवश्यकताएं क्या हैं? विकास कैसे किया जा सकता है।
भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है। भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करने में पत्रकारिता की महत्वपूर्ण भूमिका है। इसीलिए लोकतंत्र में पत्रकारिता को चैथा स्तम्भ के रूप में जाना जाता है। वस्तुतः लोकतन्त्र की सफलता बहुत हद तक पत्रकारिता की गुणवत्ता पर निर्भर करता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि आजादी के बाद देश में पत्रकारिता के हर विधा में तेजी से प्रगति हुई है। साथ ही साथ इसकी गुणवत्ता में भी काफी वृद्धि हुई है। पत्रकारिता के फैलाव के साथ ही साथ इनके कई क्षेत्रों में ऐसी समस्यायें पैदा हुई जिसका विश्लेषण करना आवश्यक है। वर्तमान समय में इसकी जरूरत और भी बढ़ गयी है। इस समय सरकार का उदेश्य भारत को एक विकसित राष्ट्र बनाना है। जबकि वस्तुस्थिति यह है कि भारत एक गरीब देश है। 18वीं शताब्दी से पहले भारत की गणना तत्कालीन विश्व के उन्नत देशों में होती थी। तीन सौ वर्ष बाद इक्कीसवीं सदी की प्रथम दशक में पहुंचते-पहुंचते इसका आर्थिक विकास इतना अधिक पिछड़ गया कि इसकी पहचान एक बेहद गरीब देश के रूप में होने लगी।
एक अकाट्य सत्य यह है कि भारत की एक तिहाई आबादी गरीबी रेखा के नीचे है। एक तिहाई आबादी को दो जून का सन्तुलित भोजन भी उपलब्ध नहीं है। गरीबी का प्रश्न सही अर्थो में बेरोजगारी से जुड़ा हुआ है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि देश के सामने सबसे बड़ी समस्या गरीबी व बेरेाजगारी है। अगर समय रहते इसका समाधान नहीं हुआ तो विकास की सारी उपलब्धियां बेकार साबित होंगी। यह समस्या जितना सरकार के लिए महत्वपूर्ण है उतना ही पत्रकारिता के लिए। पत्रकारिता देश में व्याप्त गरीबी और बेरोजगारी केा किस रूप में देखती है और जनता के समक्ष इसका विश्लेषण किस रूप में करती है। गरीबी और बेरोजगारी की समस्या के साथ सामाजिक-आर्थिक विकास के सारे महत्वपूर्ण सवाल जुड़े हुए हैं। इसका बेवाक विश्लेषण इस रूप में करना चाहिए कि जनता इसके मर्म को आसानी से समझ सके। वैसे भी जब हम विकास की बात करते हैं तो इस बात पर जोर देते हैं कि इसकी सफलता के लिए जनता की जागरूकता व विकास की प्रक्रिया में इसकी भागीदारी सबसे बड़ी शक्ति होती है जो विकास के मार्ग में सही दिशा में प्रशस्त करती है। वस्तुतः विकास की समस्याओं को राजनीतिक नारों से नहीं सुलझाया जा सकता है। इसके लिए जरूरी है कि सरकार और पत्रकारिता जगत को अधिक से अधिक संवेदनशील होना चाहिए। तभी जाकर सामाजिक-आर्थिक विकास में गुणात्मक परिवर्तन सम्भव हो सकता है। जनता की भागीदारी और सरकार की नीतियों की पारदर्शिता की समस्या का हल भी विकास पत्रकारिता के रणनीति में शामिल करना होगा। जिसके माध्यम से हम विकास के लक्ष्य को प्राप्त करने में सफल हो सकते हैं।
सरकार का यह प्रयास रहा है कि विकास-पत्रकारिता का क्षेत्र व्यापक हो। इसी लक्ष्य को सामने रखकर पंचवर्षीय योजनाओं को प्रसारित और प्रचारित करने की दिशा में सरकार ने सक्रिय रूप से कार्य करना शुरू किया। विकास कार्यों की ओर प्रेरित करने की सबसे बड़ी आवश्यकता क्षेत्रा के नवयुवकों के लिए होनी चाहिए। जिसको विकास पत्रकारिता के माध्यम से आसानी से किया जा सकता है। समाचार पत्रों के पाठक सर्वेक्षणों से यह ज्ञात हुआ है कि 21-35 आयु वर्ग के लोग सबसे अधिक समाचार पत्रों केा पढ़ते हैं। महिलाएं ज्यादातर क्षेत्रीय भाषाई पत्रिकाओं को पढ़ती है। ऐसी स्थिति में क्षेत्रीय भाषाई समाचार पत्रों के सम्पादकों का परम पुनीत कार्य राष्ट्रीय स्तर की विकास संबंधी लेखों को प्रकाशित करना होना चाहिए तथा विकास के कार्यो में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने हेतु आलेखों पर वक्त देना चाहिए। सर्वेक्षणों से यह भी पता चला है कि शहरी पाठकों की संख्या में तेजी से वृद्धि होती जा रही है। लेकिन सबसे दुखद पहलू यह है कि ग्रामीण क्षेत्रों के पाठकों की स्थिति क्या है। इसकी सही तस्वीर अभी उभरकर सामने नहीं आयी है। यही कारण है कि ग्रामीण क्षेत्रों का समुचित विकास नहीं हो पा रहा है।
विकास पत्रकारिता को हमारे देश में उचित महत्व नहीं मिलने के लिए एक सीमा तक स्वयं नेता जिम्मेदार हैं। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद शुरूआती दौर में हमारे नेताओं ने विकास को महत्व दिया लेकिन बाद में नेता अपने आपको बड़े नगरों तक सीमित कर लिया। वे जनता के सेवक के बजाय जनता के मालिक की भूमिका में आ गये जिसका कुपरिणाम यह हुआ कि अधिकांश पत्रकार भी गांवों से विमुख हो गये।
आकाशवाणी ने सही अर्थो में अपनी अन्य जिम्मेदारियों को पूरा करते हुए विकास पत्रकारिता की कमी को पूरा करने में अपना विशष्ट योगदान किया है। देशवासियों को स्वस्थ मनोरंजन उपलब्ध कराने तथा देश विदेश की महत्वपूर्ण जानकारियों के साथ-साथ राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत विकास परियोजनाओं की विकास गति और उपलब्धियों को लोगों तक पहुंचाने में अग्रणी भूमिका निभायी है। आकाशवाणी के साथ-साथ दूरदर्शन की भूमिका भी सराहनीय रही है। केन्द्रीय सरकार के अन्य विभागों प्रेस, इन्फारमेशन ब्यूरो, पब्लिकेशन, डिवीजन, कृषि मंत्रालय, ग्रामीण विकास विभाग, सांख्यिकीय व मूल्यांकन इत्यादि ने भी विकास क्षेत्र की गतिविधियों को आम जनता तक पहुंचाते रहे हैं।
पिछले दशक में दूरदर्शन का तेजी से प्रसार हुआ है फिर जितना व्यापक क्षेत्र आकाशवाणी का है उतना किसी माध्यम का नहीं है। आकाशवाणी ने व्यापक स्तर पर सामाजिक आर्थिक विकास की दिशा में योगदान किया है। लोगों को नीत नयी जानकारी देकर उन्हें विकास कार्यो की ओर आकृष्ट किया है जो निश्चय ही भारत जैसे विकासशील देश के लिए वरदान है।
आकाशवाणी ने विकास संबंधी गतिविधियों को जहां एक तरफ समाचार बुलेटिनों में महत्व दिया वहीं अलग से विकास संबंधी कार्यक्रमों को नियमित रूप से प्रसारित भी किया। जिससे इसको प्रोत्साहन भी मिलेगा। गरीबी उन्मूलन, लिंग समानता, शुद्ध पेयजल, परिवार नियेाजन आदि सामाजिक आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण समाचारों को विशेष रूप से अधिक समय दिया।
आकाशवाणी का विदेशी भाषा विभाग एक प्रशंसनीय कार्य कर रहा है कि विकसित तथा विकासशील देशों में विकास के क्षेत्र में जो नयी-नयी बातें हो रही है, उसे भारतीय भाषाओं में अनुवादित कर लोगों के पास पहुंचा रही है। जिससे हमारे देश की जनता वहां के विकास कार्यो के ज्ञान से लाभान्वित होकर अपना सामाजिक आर्थिक उत्थान करने में सफल हो रहे हैं।
विकास के लिए कृषि और उद्योग ही मुख्य आधार है। आकाशवाणी ने समाचार पत्रों से कहीं अधिक ध्यान कृषि क्षेत्रों पर दिया है जहां से दिन में अनेक बार ऐसी महत्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध करायी जाती है जो पढ़े लिखे किसानों के साथ-साथ भोले-भाले किसानों के लिए भी उपयोगी सिुद्ध हो रही है। आकाशवाणी द्वारा ऐसे बुलेटिनें जारी हो रही है। जिनमें विज्ञान के नये-नये प्रयोगों की जानकारी ग्रामीण क्षेत्र के लोगों को उपलब्ध करायी जाती है। कृषि के अलावा मुर्गीपालन, पशुपालन, सहकारिता, जनस्वास्थ्य बाल विकास, पोषण संबंधी जानकारी के साथ-साथ अन्न की वैज्ञानिक ढंग से पैदा करने की महत्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध करायी जाती है जो विकास के लिए आवश्यक है।
आकाशवाणी के बाद सरकारी माध्यमों में दूरदर्शन का दूसरा स्थान आता है। दूरदर्शन ने माध्यम विकास को गति प्रदान करने के लक्ष्य से ग्रामीण क्षेत्रों पर विशेष बल दिया है। कृषि तथा उससे संबंधित अन्य विषयों को प्राथमिकता देकर दूरदर्शन ने विकास को गति प्रदान करने के उदेश्य से विकास संबंधी कार्यक्रमों पर विशेष ध्यान दिया है। मुख्य रूप से कृषि दर्शन कार्यक्रम ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक लोकप्रिय हुआ। विकास और संचार एक दूसरे के पूरक हैं। विकास की दिशा में हमारे यहां सरकारी माध्यमों का भरपूर लाभ नहीं उठाया जा रहा है।
विकास पत्रकारिता के लिए संकेत और सत्य दोनों पर समान रूप से ध्यान देना चाहिए। आम तौर पर अधिकांश समाचार सांकेतिक होते हैं। उन्हें पढ़ने से घटनाओं के बारे में संकेत मिल सकते हैं। लेकिन सत्य शब्द विशेष ध्यान देकर छिपी हुई बातों को भी प्रकाश में लाना होगा। जो संबद्ध विषय की पूरी तस्वीर पेश करे।
विकास पत्रकारिता का क्षेत्र अभी भी काफी पिछड़ा हुआ है। आई.आई.एम. के निदेशक प्रो. एन.एम. रामास्वामी का मानना है कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने में मीडिया की उल्लेखनीय योगदान नहीं है। जिम्मेदारी तथा संबंद्धता दोनों अलग-अलग शब्द हैं लेकिन दोनों एक-दूसरे से घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए हैं। पत्रकारिता जब समाज से अपने आपको सम्बद्ध कर लेती है। तब ऐसी स्थिति में पत्रकारिता अपनी जिम्मेदारी भी पूरी कर लेती है। राष्ट्रीय लक्ष्य तक पहुंचने में पत्रकार एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। राष्ट्रीय विकास में देश के करोड़ों लागों को जोड़ने का कार्य विकास पत्रकारिता के माध्यम से आसानी से हो सकता है। मीडिया के बिना करोड़ों लोगों तक पहुंचना मुश्किल ही नहीं असंभव है। आर्थिक, सामाजिक विकास के क्षेत्रा में मीडिया का महत्वपूर्ण योगदान है। लेकिन विकास पत्रकारिता का जितना ध्यान दिया जाना चाहिए था उतना ध्यान नहीं दिया गया। इस कुपरिणाम भी हमारे सामने आया कि समाज में ऐसा वातावरण नहीं बन पाया कि विकास को उच्च प्राथमिकता मिल सके।
समाचार पत्रों में विकास संबंधी समाचारों को उतना स्थान नहीं दिया जितना विदेशी व अन्य समाचारों को दिया। जबकि भारत जैसे विकासशील देश के लिए इसकी आवश्यकता है। सामाजिक उत्थान के प्रति समाचार पत्रों की जिम्मेदारी है। लेकिन अधिकांश समाचार पत्रों का मुख्य कार्यक्षेत्र नगरों तक ही सीमित हो गया है। सम्पादक विकास पत्रकारिता से अपने आपको नहीं जोड़ पाये हैं। ग्रामीण समाज को विकास व ज्ञान की अधिक आवश्यकता है। जबकि सम्पादक इनसे काफी दूर बैठे हुए हैं और उनकी दृष्टि उन पिछड़े हुए क्षेत्रों तक नहीं पहुंच पा रही है।
आर्थिक सम्पन्नता प्रायः लोगों को पतन की गर्त के तरफ ले जाती है। भारतीय समाचार पत्र भी इससे विमुख नहीं हैं, क्योंकि अधिकांश समाचार पत्रों के मालिक लक्ष्मी पुत्रउद्योगपति हैं और वे अपने स्वार्थ सिद्धि अधिक से अधिक विज्ञापन बटोरना तथा सनसनी खबरों के माध्यम से समाचार पत्र का सरकुलेशन को बढ़ाना उनका लक्ष्य है। उनको सामाजिक जिम्मेदारी व विकास पत्रकारिता से कोई मतलब नहीं है।
विकास पत्रकारिता के लिए राष्ट्र की ओर से जो सौंपी जानी चाहिए थी व सोची समझी होनी चाहिए थी। विकास पत्रकारिता के माध्यम से देशवासियों को यह बताने का प्रयास किया गया कि भारत एक कल्याणकारी राज्य है। भारत एक प्रभुता सम्पन्न धर्मनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य है। भारतवासियों को न्याय, स्वतंत्रता तथा समानता का वचन दिया गया है। संविधन में कमजोर वर्ग के लोगों के कल्याण के लिए विशेष व्यवस्था की गयी है। समाज कल्याण क्षेत्र में सभी विकासशील नीतियों और दृष्टिकोणों की सम्पूर्ण मानव संसाधन के लिए तेज करने की आवश्यकता है।
ग्रामीण क्षेत्रों में बहुसंख्य लोगों के जीविका का आधार खेती-बारी है। जबकि गांवों में खेती योग्य जमीन सीमित लोगों के पास है। अधिकांश लोग खेतिहर मजदूर हैं। लेकिन विकास-पत्रकारिता से जुड़े हुए लोग ऐसे पिछड़े व कमजोर वर्ग के लोगों पर कम कलम चलाते हैं। उनकी कलम गांव के सम्पन्न किसान या सेठ साहुकारों की तरफदारी करते नजर आते हैं। विकास पत्रकारिता ने जहां-जहां प्रवेश किया है वहां की समस्याओं पर सरकार और समाज का ध्यान गया और उनका निराकरण हेतु प्रयास भी हुए हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों का तेजी से विकास नहीं होने के पीछे केवल गरीबी ही कारण नहीं है। गरीबी के अलावे अज्ञानता विकास को अवरूद्ध करने में महती भूमिका अदा करता है। ग्रामीण क्षेत्र के लेाग गरीबी और अज्ञानता के चलते जिस चीज को पाने के हकदार हैं उसे प्राप्त नहीं कर पाये हैं। ऐसे पत्रकार और साहित्यकारों का यह दायित्व है कि वे उनके बीच जाकर उनके कष्ट और अनुभवों को प्रकाश में लाने का प्रयास करना चाहिए। ग्रामीण क्षेत्रों में अज्ञानता के कारण विकास तो दूर उनका जीवन भी बहुत कष्टमय है और लोग अपने आपको कुचक्र से नहीं बचा पाते हैं। ऐसे में विकास पत्रकारिता को इन कुचक्रों से मुक्ति का वीणा उठाना चाहिए।
(लेखक अर्थशास्त्र विभाग, श्री गुरूगोविन्द सिंह कालेज, पटना सिटी, बिहार में एसोसिएट प्रोफेसर हैं।)
ईमेल- bpatitripathi@gmail.com
January 24, 2012 at 11:00 amadmin

पश्चिमी मीडिया की भारत-दृष्टि

शंकर शरण / कुछ वर्ष पहले विश्व-प्रसिद्ध टाइम मैगजीन ने अमेरिकी पत्रकार डैनियल पर्ल के हत्यारे तथा 11 सितंबर की तबाही में संलग्न कुख्यात आतंकवादी मुहम्मद शेख पर पूरे एक पृष्ट का लेख छापा था। उस में शेख का चित्रण अनेक प्रशंसनीय विशेषणों के साथ किया गया था। कि वह भला, मददगार, मृदुभाषी आदि जैसा व्यक्तित्व था। इस का प्रमाण? आपको जानकर आश्चर्य होगा कि इतने सुंदर गुणों से उस भयंकर आतंकवादी को विभूषित करने के लिए, जिसने पशु की तरह गला रेत कर पर्ल की हत्या की थी, टाइम ने शेख के अपने भाई के कथन को ही प्रमाण मान लिया ! कितना सरल विश्वास। संपादकों को यह भी ध्यान न रहा कि किसी भयंकर आतंकवादी, हत्यारे के व्यक्तिगत गुण, यदि हो भी, तो उस के बखान की कोई तुक नहीं। क्योंकि उस की पूरी कुख्याति जिस कारण बनी, वह बात कुछ और है। (क्या आपने कभी नाथूराम गोडसे के निजी गुणों और मनोहर चरित्र का बखान कहीं पढ़ा है?)
किंतु पश्चिमी मीडिया में इस्लामी आतंकवादियों के विवरणों में सदैव एक संजीदगी, लगभग आदरपूर्ण भाव प्रायः मिलता है। तब इसे कैसे समझें कि उसी मीडिया में गुजरात के मुख्य मंत्री नरेंद्र मोदी का उल्लेख करते हुए कभी संजीदगी तक नहीं पाई जाती! मोदी के प्रति सम्मान या किसी गुण का उल्लेख तो दूर की बात रही। यदि ओसामा बिन लादेन, जिस से पश्चिम दस वर्ष से अधिक समय से सब से आतंकित रहा, उस के बारे में भी पश्चिमी मीडिया के सभी विवरण कोई एकत्र करें तो कुल मिलाकर लादेन की एक सम्मानजनक, चाहे दबदबे वाली छवि उभरती है। इस की तुलना में नरेंद्र मोदी के बारे में पश्चिमी मीडिया में आए सभी विवरणों से निकलने वाली छवि घृणा और वितृष्णा की बनती है। इतने विचित्र असंतुलन को किस प्रकार समझा जाए?
पिछले दो दशकों में पूरे विश्व में आतंकवाद से सबसे अधिक पीड़ित देशों में भारत संभवतः सर्वोपरि है। किंतु यदि अमेरिकी, यूरोपीय मीडिया और अकादमिक जगत के विश्लेषणों की समीक्षा करें तो आश्चर्यजनक रूप से उन में भारत का उल्लेख लगभग नदारद रहता है। यहाँ तक कि वे पाकिस्तान को भीआतंकवाद से पीड़ितदेशों में गिनने लगे हैं जहाँ सभी आतंकवादी संगठनों के मजबूत ठिकाने और सहयोगी जमे हुए हैं। पिछले दस-बारह वर्षों में विश्व में ऐसी एक भी आतंकवादी घटना नहीं ढूँढी जा सकती जिस के तार कहीं न कहीं पाकिस्तान से न जुड़े हुए हों! उस पाकिस्तान को तो पश्चिमी मीडिया में आतंकवाद से पीड़ित देश कह दिया जाता है। किंतु भारत में हुए अंतहीन आतंकी विध्वंस और देश के कोने-कोने वंधामा, गोधरा, अक्षरधाम, नंदीमर्ग, मराड, मुंबई, जम्मू, दिल्ली, मऊ, वाराणसी, जयपुर, आदि में केवल हिन्दुओं या मुख्यतः हिन्दुओं की सामूहिक हत्याओं के बारे में कहा जाता है कि यह सबकथित रूप सेआतंकवादी कारवाइयाँ थीं। यानी कुछ और थीं या हो सकती हैं!
भारत में होने वाली आतंकवादी घटनाओं का समाचार भी पश्चिमी मीडिया बिना संपादकीय मिलावट के कम ही देता है। छित्तीसिंहपुरा, गोधरा, आदि बड़े-बड़े आंतकवादी हमलों को संदिग्ध रूप में पेश किया गया था। जयपुर में हुए पिछले आतंकवादी हमले पर सी.एन.एन. के स्क्रॉल पर समाचार ऐसे था कि भारत इन विस्फोटों को आतंकवादीहमला कह रहा है। इस प्रकार दुनिया भर को सी.एन.एन. ने यह संदेश दिया कि प्रथम, उसे यह मालूम नहीं है कि वे विस्फोट किस प्रकृति के हैं, तथा दूसरे, भारत का उसे आतंकवादी घटना कहना विश्वसनीय नहीं भी हो सकता है। बाद में भी सी.एन.एन. ने कभी नहीं बताया कि उस की अपनी सूचना के अनुसार वह क्या था?
अर्थात, सी.एन.एन. नितांत भोला, अनजान बना रहा कि जयपुर में क्या हुआ था। वह कोई अपवाद प्रस्तुति नहीं थी। न ही केवल एक विशेष विदेशी समाचार चैनल की विशेषता। बी.बी.सी. लंदन में होने वाली आतंकी गतिविधियों के जिम्मेदार लोगों, संगठनों आदि के लिए आतकंवादीसंज्ञा, विशेषण का प्रओग करता है, किन्तु भारत में होने वाली बड़ी से बड़ी आतंकवादी कार्रवाइयों पर भी वह करने वालों को मिलिटेंट्सकहने से आगे नहीं बढ़ता।
दरअसल, घटिया मनोरंजन कार्यक्रमों, मुंबइया सिनेमा तथा क्रिकेट मात्र इन तीन में चाहे-अनचाहे आकंठ डूबे सामान्य भारतवासी विदेशी मीडिया की भारत संबंधी प्रस्तुति पर ध्यान नहीं देते। किंतु यदि नियमित ध्यान दें, और उस का फलितार्थ समझने का कष्ट करें तो अत्यंत चिंताजनक परिदृश्य बनता है।
पश्चिमी मीडिया में विश्वव्यापी आतंकवाद के विश्लेषणों में भी सक्रिय आतंकवादी संगठनों के क्रियाकलापों में भी प्रायः अल-कायदा, हमास, तालिबान, मुस्लिम ब्रद्ररहुड आदि की ही चिंता की जाती है। हरकत-उल-मुजाहिदीन, जैशे-मुहम्मद, लश्करे तोयबा, हूजी, सिमी, इंडियन मुजाहिदीन आदि संगठनों की चर्चा नगण्य रहती है। यह इस के बावजूद कि इन संगठनों की अंतर्राष्ट्रीय सक्रियता और आपसी संबंध बारं-बार प्रकट होते रहे हैं। अमेरिकी, यूरोपीय नेतागण भी विश्व-व्यापी आंतकवाद पर भाषणों में केवल अपने देशों और पश्चिम एसिया की चिंता करते हैं। भारत में हुई बड़ी से बडी आतंकवादी घटना उन के मस्तिष्क में या तो दर्ज भी नहीं होती, अथवा तुरत विस्मृत हो जाती है। यह मात्र आतंकवाद संबंधी विषयों में ही नहीं है।
सी.एन.एन. और बी.बी.सी समाचार चैनलों अथवा टाइम, न्यूजवीक जैसी विश्व-प्रसिद्ध समाचार-पत्रिकाओं को नियमित देखने वाले पाएंगे कि भारत संबंधित समाचारों, वक्तव्यों के चयन व प्रस्तुति में सदैव एक अमैत्रीपूर्ण, दया-प्रदर्शन या नकचढ़ा रुख रहता है। इन पत्रिकाओं में चीन, सऊदी अरब, पाकिस्तान, जैसे तानाशाही प्रणाली वाले देशों के बारे में भी नियमित लेख और टिप्पणियाँ मिलती हैं जो संवेदना, सहानुभूति, आदर या सदभाव से भरी होती हैं। पर वहीं भारत के बारे में ऐसा एक भी लेख, टिप्पणी, तस्वीर या कुछ भी खोजना बहुत कठिन है जो नितांत सकारात्मक कही जा सके। कभी-कभार भारत की आर्थिक, वैज्ञानिक उपलब्धियों की चर्चा में भी नकारात्मक छौंक इतनी तीखी होती है कि पढ़कर अंतिम निष्कर्ष भारत के प्रति बेचारगी या नाराजगी का ही रहता है।
यदि अमेरिकी पत्र-पत्रिकाओं के कथ्य पर नियमित दृष्टि रखें तो स्पष्ट दिखेगा कि उन के तथा अमेरिकी विदेश विभाग के दृष्टिकोण में जबर्दस्त ताल-मेल रहता है। जब पाकिस्तान में जनरल मुशर्रफ ने तख्ता पलट कर जबरन सत्ता हथियाई थी (1999) तो अमेरिकी साप्ताहिक न्यूजवीक ने तीखी आलोचना के साथ उस की पहली रिपोर्ट छापी। कि किस तरह पाकिस्तान में सैनिक तानाशाही का दौर-दौरा रहा है, किस तरह बेचारी जनता तरह-तरह के जेनरलों के हाथ पिसती रही है, आदि। किंतु अगले ही अंक में जेंटील जेनरलकहकर मुशरर्फ की और पाकिस्तान के भविष्य की इतनी गुलाबी तस्वीर खींची गई कि इस पूरी तरह बदले स्वर पर दंग रह जाना पड़ा! मजे की बात है कि दोनों ही रिपोर्ट-विश्लेषण एक ही वरिष्ट रिपोर्टर द्वारा लिखित थे। विदेशों में प्रसारित होने वाले अमेरिकी पत्र-पत्रिकाओं की यही सामान्य रीति-नीति है। कि वे अमेरिकी विदेश विभाग की तात्कालिक नीति के अनुरूप ही अपना वैदेशिक दृष्टिकोण रखते हैं।
इस के उदाहरण अनगिनत हैं और रोज मिलते रहते हैं। कम्युनिस्ट चीन 1979 से पहले तक पश्चिमी विश्व के भयंकर शत्रु के रूप में चित्रित होता था। किंतु जब अमेरिका ने सोवियत रूस के विरुद्ध चीन को अपनी ओर खींचने की नीति अपनाई और चीन को सबसे चहेता देश (मोस्ट फेवर्ड नेशन’) का दर्जा दिया तब से अमेरिकी मीडिया में भी चीन के प्रति एक स्थाई सदभावना पैदा हो गई। वही कम्युनिस्ट सत्ता जिस ने अपने करोड़ों लोगों को मूर्खतापूर्ण माओवादी प्रयोगों में होम कर दिया; जहाँ आज भी एक पार्टी की तानाशाही है; प्रेस पर प्रतिबंध है; तिब्बत में दमन जारी है; जिस ने अवैध रूप से परमाणु आयुधों के प्रसार का काम भी किया; जहाँ ईसाई मिशनरियों पर आज भी अंकुश है; जहाँ स्वयं पोप को भी पैर रखने तक की अनुमति आज तक नहीं दी गई है ऐसे रिकॉर्ड और मानवाधिकार-विरोधी छवि के बावजूद चीन अमेरिकी मीडिया में सर्वाधिक आदर-मान पाने वाला देश है! उस देश के सत्ताधारियों की चिंताको सहानुभूतिपूर्वक समझने, वहाँ विकास की चुनौतियों का आकलन करने, प्रगति का स्वरूप दिखाने आदि में अमेरिकी मीडिया गजब की संवेदना प्रदर्शित करता है। जबकि वही मीडिया भारत को सदैव किसी न किसी बात पर नीचा दिखाने, निंदित करने, उपदेश देने या खिल्ली उड़ाने के अतिरिक्त शायद ही कभी कुछ करता है।
जब देंग सियाओ पिंग पूर्णतः अशक्त हो चुके थे, तब भी चीनी कम्युनिस्ट पार्टी और संपूर्ण सत्ता उन के आदेश पर चलती थी (4 जून 1989 को ताइनानमेन स्क्वायर पर निह्त्थे छात्रों पर उन्हीं की सलाह से टैंक चलवाए गए थे)। लेकिन देंग के बारे में कभी कोई खिल्ली उड़ाता लेख टाइम मैगजीन ने नहीं छापा था। पर जब यहाँ अटल बिहारी वाजपेई प्रधान मंत्री थे तो उस ने ऐसा कुत्सापूर्ण लेख प्रकाशित किया कि यह रोगी, भोगी, अशक्त आदमी है जिस के पास न्यूक्लियर अस्त्रों के प्रयोग का अधिकार भी है। इस से भारत को और दुनिया को कितना खतरा है, आदि। जब इस की यहाँ आलोचना हुई तो स्वयं कुछ प्रमुख भारतीय बुद्धिजीवियों ने टाइम की ही उग्र पैरोकारी की। उन्होंने उस लेख की दुर्भावना और स्पष्ट भारत-विरोध का कोई नोटिस नहीं लिया।
और ठीक इसी बात में हमारी विडंबना का संकेत मिलता है।
आखिर, पश्चिमी मीडिया भारत के प्रति उपेक्षा या हिकारत किस बूते रखता है? उत्तर बड़ा दुखद है। जब दिल्ली स्थित विदेशी पत्रकारों से पूछा जाता है कि वे भारत के प्रति इतनी कुत्सित, नकारात्मक और एकांगी रुख क्यों रखते हैं तो वे धड़ल्ले से कहते हैं कि हम तो वही लिखते हैं जो आपके ही प्रमुख पत्रकार और बुद्धिजीवी बोलते हैं। यह बात काफी हद तक सच भी है। जहाँ पश्चिमी मीडिया अंतर्राष्ट्रीय मामलों में अपने-अपने देशों के हित के प्रति सचेत रहता है, वहाँ हमारे बड़े पत्रकार वैदेशिक मामलों में भी अपनी राजनीतिक झक चलाते हैं। जब केंद्र में भाजपा-नीत सरकार थी, तब हमारे दो बड़े अंग्रेजी अखबारों इंडियन एक्सप्रेस और द हिंदू के संपादक (क्रमशः शेखर गुप्ता और एन. राम) तथा अरुंधती राय एक पाकिस्तानी अखबार के निमंत्रण पर पाकिस्तान गए। वहाँ इन्होंने लाहौर, कराची और इस्लामाबाद में अपने भाषणों, सेमिनारों और इंटरव्यू में जो बातें कहीं वह ध्यान देने और स्मरण रखने लायक हैं। उदाहरण के लिए, उन्होंने यह सब कहाः भारत की सरकार अंधराष्ट्रवादी है जिस से भारत और पड़ोसी देशों को खतरा है”; “हमारा रक्षा मंत्री जार्ज फर्नांडिस संदेहास्पद चरित्र का, अवसरवादी, अंधराष्ट्रवादी नजरिए का आदमी है”; “भारत में भाजपा सरकार ने परमाणु नीति का अपहरण कर लिया और पाकिस्तान को भी विवश होकर उसी नीति पर चलना पड़ा”; “भारत का एक-एक मुसलमान देशभक्त है और इसीलिए गुजरात में जो हुआ उस पर हमें बहुत तीखा एतराज है”; “बंबई के (1993 में) बम-विस्फोटों के लिए आई.एस.आई. पर आरोप लगाया गया, जबकि यह (हालात?) हिंदू दक्षिणपंथियों का बनाया हुआ था”; आदि।
हमारे दो सबसे बड़े पत्रकारों और एक राजनीतिक लेखिका ने यह बातें अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में कही। वैसा ही कहने, लिखने वाले हमारे देश में अनेकानेक बड़े संपादक, प्रोफेसर और स्तंभकार हैं। इसलिए यह बात तो सच है कि भारत के बारे में हमारे सेक्यूलर-वामपंथी पत्रकार, बुद्धिजीवी जो कुत्सा फैलाते हैं उसी का उपयोग कर विदेशी हमारे मुँह पर कालिख पोतते हैं। वे जान-बूझ कर ऐसे ही स्वरों का चुनाव करते हैं, और इसीलिए अन्य स्वरों की अनदेखी करते हैं। किंतु इस से यह बात और दुःखद हो जाती है कि हमारे प्रमुख पत्रकार, बुद्धिजीवी अपनी राजनीतिक झक में देशहित की कोई परवाह नहीं करते। न ही विदेशियों द्वारा भारत की पक्षपाती, अनुचित अवमानना से कोई दुःख महसूस करते हैं। उलटे वे पश्चिमी संस्थाओं, सरकारों और एजेंसियों को भारत-विरोधी मुहिम में तरह-तरह से सहयोग देते हैं।
उन्हीं की आड़ में अमेरिकी विदेश विभाग, अंतर्राष्ट्रीय ईसाई मिशनरी संगठन और विदेशी मीडिया इसीलिए इतनी ठसक से हमारे विरुद्ध विष-वमन और दबाव डालने की कार्रवाई करते रहते हैं। विनायक सेन प्रसंग इस का ताजातरीन उदाहरण है। हमारे मीडिया ने हमारी न्यायिक व्यवस्था में विदेशी एजेंसियों, विदेशी सरकारों के निराधार हस्तक्षेप की कोई आलोचना नहीं की। न ही उन के एजेंडे पर उँगली उठाई। क्योंकि मीडिया के एक प्रभावशाली हिस्से के लिए भाजपा विरोध के लिए हर चीज जायज हो जाती है। वे यह भी देखने से अंधे हो जाते हैं, कि अंध भाजपा-विरोध और हिन्दू-विरोध बड़ी सरलता से भारत-विरोध में परिणत हो जाता है। हमारे जो रेडिकल, वामपंथी और सेक्यूलरवादी बुद्धिजीवी कश्मीर मेंइंडियन आर्मीकी भर्त्सना हिन्दू मिलिटरी बूटकहकर इस्लामपरस्ती दिखाते हैं, वे उस क्षण देख नहीं पाते कि वे भारत और हिन्दू को समानार्थी मानकर भारत-विरोध में लग जाते हैं। विदेशी तो केवल उन के सहारे अपना अहंकार और हित तुष्ट करते हैं। क्या हम इस चिंता-जनक परिदृश्य को समझने से भी इंकार करते रहेंगे? ( ये लेखक के अपने विचार हैं )
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संपर्क :-
शंकर शरण
IV/ 44, एन.सी.ई.आर.टी. आवास, श्री अरविंद मार्ग, नई दिल्ली 110 016
e-mail- bauraha@gmail.com

 

 

अर्थ और परिभाषा

पत्रकारिता के लिए अंग्रेजी में जर्नलिज्म शब्द का इस्तेमाल होता है, यह शब्द जर्नल से निकला है। इसका शाब्दिक अर्थ है- दैनिक। दिन प्रतिदिन के क्रियाकलापों, सरकारी बैठकों का विवरण जर्नल में रहता है। यानी दैनिक गतिविधियों का विवरण है जर्नलिज्म। समाचार पत्रों और पत्रिकाओं के संपादन और लेखन और उससे जुड़े कार्यों को पत्रकारिता के अंतर्गत रखा जाता है। या यों कहें कि समाचारों का संकलन-प्रसारण विज्ञापन की कला और व्यवसायिक प्रबंधन पत्रकारिता है। सामयिक संचार से संबंधित सभी साधन चाहे वह रेडियो, टेलिवीजन हों या अखबार या पत्रिकाएं इसी के अंतर्गत आते हैं।
* महात्मा गांधी:- पत्रकारिता एक सामाजिक धर्म है और वह समाज के स्वास्थ्य के लिए है। जो बोला जाता है उसे लिखने की जरूरत नहीं । पर जो लिखा गया है उसे सही लिखने की जरूरत है।
* जवाहर लाल नेहरू – The press is one of the vital organs of modern life especially in a democracy. the press has tremendous power and responsibilities. the press must be respected
* लेस्ली स्टीफन :- पत्रकारिता उन विषयों पर लिखना है जिन पर जनता ज्ञानपूर्ण नहीं है।
* सी.जी. मूलर :- सामयिक ज्ञान का व्यवसाय ही पत्रकारिता है । इसमें तथ्यों की प्राप्ति, उनका मूल्यांकन और ठीक ठीक यानी वास्तविक प्रस्तुतिकरण होता है।
* चैम्बर डिक्षनरी :- प्रकाशन, संपादन, लेखन और प्रसारणयुक्त समाचार माध्यम का व्यवसाय ही पत्रकारिता है।
सूचना, ज्ञान या विचारों को समीक्षात्मक टिप्पणियों के साथ शब्द, ध्वनि और चित्रों के माध्यम से लोगों तक पहुंचाना ही पत्रकारिता है।
* इन्द्र विद्यावाचस्पति :- पत्रकारिता पांचवां वेद है जिसके द्वारा हम ज्ञान-विज्ञान संबंधी बातों को जानकर अपने बंद मस्तिष्क को खोलते हैं।
* एरिक हाडगीन :- पत्रकारिता यहां से वहां सूचनाओं को सच्चाई, गहराई और त्वरित गति के साथ भेजना है जिससे सत्य की सेवा होती है और विषयों के सही होने का स्वरूप धीरे धीरे प्रत्यक्ष होता है।
* डेली मिरर के लार्ड थामसन ने पत्रकारिता के बारे में लिखा है जनता को वह बताओ जो वह सुनना चाहती है।
* शब्दकोष के अनुसार लिखने का व्यवसाय पत्रकारिता है।
……आगे और कुछ जानेंगे संपादक
August 18, 2010 at 10:57 pmadmin

न्यूज( समाचार) गैंदरिंग क्या है?

न्यूज गैंदरिंग यानी समाचारों का जमघट। हर न्यूज रूम में समाचार को लेकर भगदड़ मची रहती है। समाचारों के लिए भीड़, छंटनी और उसे अंतिम रूप देने की बैचेनी। यह आलम अखबार के कार्यालय में और इलेक्ट्रोनिक मीडिया दोनों जगहों पर बराबर का होता है। अंतर बस इतना होता है कि समाचार पत्र के कार्यालय में बेचैनी कुछ घंटों की होती है, जबकि टीवी चैनलों के न्यूज रूम में यह बेचैनी चैबीस घंटे की होती है। समाचारों के स्रोत दोनों माध्यमों के लिए एक ही है। जैसे, संवाददाता, एजेंसी, प्रेस कांफ्रेंस, प्रेस रिलीज, समाचार पत्र, चैनल न्यूज आदि।
न्यूज रूम की रीढ़ होते है संवाददाता। संवाददाता ही समाचार संकलन के प्रति गंभीर, कुछ अलग करने की कोशिश और नवीनतम खबर तलाशते नजर आते हैं। इनकी खबर ही किसी भी अखबार या न्यूज चैनल को उसको विशेष पहचान देती है। ब्रेकिंग न्यूज या विशेष खबर की अवधारणा भी संवाददाता की दक्षता, तीव्रता और काम के प्रति समर्पण की भावना की देन है। उदाहरण के लिए आप देख सकते है कि हर अखबार में खास खबर, विशेष खबर आदि के लोगों के साथ हर दिन एकाध खबर रहती है। यही खबर प्रतिस्पर्धा के लिए हथियार का काम करती है।
एजेंसी समाचारों के लिए खिड़की के समान है, जिससे विविध प्रकार की खबरों की सुगंध न्यूज रूम तक पहुंचती रहती है, लेकिन ये खबरें किसी मीडिया की पहचान का आधार नहीं बन सकती है। इसकी वजह है कि एजेंसियां अपने सभी ग्राहकों को सभी तरह की खबरें यथाशीघ्र उपलब्ध करा देती है अब तो खबरों के साथ एजेंसियां उसका महत्व भी बता देती है ताकि डेस्क प्रभारी को उसके महत्व के बारे में जानकारी मिल जाए। यह अलग बात है कि सैकड़ों खबरों की भीड़ में से अपने कम की खबर निकाल लेना दक्ष संपादक / पत्रकार के लिए ही संभव है। भारत में चार मुख्य समाचार एजेंसी हैं। ये हैं यूनाइटेड न्यूज आफ इंडिया (यूएनआई), इसका हिन्दी संस्करण यूनीवार्ता, प्रेस ट्रस्ट आफ इंडिया (पीटीआई) और इसका हिन्दी संस्करण भाषा है। यूएनआई और पीटीआई का समझौता विदेशी समाचार एजेंसियों के साथ है और ये उन्हें भारत के समाचार उपलब्ध कराते हैं और विदेशी एजेंसियां विदेशी खबरें इन दोनों को उपलब्ध कराती हैं। विदेशी एजेंसियों में रायटर, एपी, एएफपी आदि शामिल हैं।
प्रेस कांफ्रेंस भी समाचारों के प्रमुख स्रोत हैं। किसी पार्टी के नेता, संगठन, व्यक्ति या संस्था जब अपनी बात दुनिया के सामने रखने के लिए समाचार माध्यमों का सहयोग लेना चाहते हैं तो वह अपनी बात रखने के लिए प्रेस प्रतिनिधियों को बुलाते हैं। इसे संवाददाता सम्मेलन या प्रेस कांफ्रेंस कहा जाता है। इसमें वह अपनी बात रखता है और फिर पत्रकारों के सवालों का जवाब देकर उन्हें संतुष्ट करने की कोशिश करता है।
समाचारों का एक अन्य स्रोत प्रेस विज्ञप्ति भी है। हालांकि इसे सबसे कमजोर और जबरिया स्रोत भी माना गया है लेकिन इसकी पठनीयता ज्यादा होती है। कई बार सरकारी प्रेस रिलीज बड़ी खबरों के स्रोत साबित होती है। हालांकि ऐसी प्रेस रिलीज जारी करने के लिए संबंधित अधिकारी प्रेस कांफ्रेंस का आयोजन कर लेते है लेकिन स्थानीय और जनहित के मुद्दों पर संघर्षरत, संगठन, धरना, प्रदर्शन, बैठक आदि की खबरें प्रेस विज्ञप्तियों के माध्यम ही समाचार कक्ष तक पहुंचती है और अखबार या स्थानीय न्यूज चैनल उन खबरों को प्रकाशित व प्रसारित अपना प्रसार व दर्शक संख्या भी बढ़ाते है। न्यूज रूम में पहुंच रही खबरों के विशाल भंडार में से उसको छांटना और फिर उसको प्रकाशित करने के लायक बनाना पूरी एक टीम का काम है। इसमें दर्जनों पत्रकार लगे होते हैं। इस प्रक्रिया में खबरों के छांटने का काम प्रारंभ से शुरू कर दिया जाता है। समाचार पत्रों में पत्रकारों को आप दो हिस्से में बांट सकते हैं डेस्क और रिपोर्टिंग। टीवी की भाषा में इसे आउटपुट और इनपुट का नाम दे सकते हैं। रिपोर्टर को इनपुट इंस्टूमेंट भी कहा जाता है। इनका काम ही खबरों का संकलन करना और उसे बेहतर ढंग से लिखकर डेस्क को सौंप देना। इसके बाद काम शुरू होता है डेस्क यानी आउटपुट इंस्टूमेंट का। ये खबरों को संपादित करते हैं और उसे महत्व के हिसाब से पेज पर लगाकर मशीन को सौंप देते हैं। यहां पर संपादकीय का काम समाप्त हो जाता है। लेकिन जेनरल डेस्क का प्रभारी यह कोशिश करता है तो वह मशीन पर छप रहे अखबार की एक कापी देखकर संतुष्ट हो ले। आउटपुट और इनपुट के बीच समन्वय का काम करती है विभिन्न डेस्कों का प्रभारियों के बीच होने वाली बैठक। बैठक में ही महत्वपूर्ण खबरों के संबंध में निर्णय कर लिया जाता है, खासकर उनक खबरों के लिए, जिसे जनरल डेस्क पर यानी पहले पेज पर देना है। इसके अलावा भी दूसरी महत्वपूर्ण खबरों को लेकर दिशा-निर्देश दे दिये जाते है। इसके साथ डेस्क प्रभारी भी अपने साथियों के साथ बैठक करते हैं ओर खबरों की जगह को लेकर चर्चा करते है। इसी तरह रिपोर्टिंग के प्रभारी भी अपने साथियों के साथ बैठक करते हैं। कहा जा सकता है कि जिस मीडिया संस्थान में जितनी अधिक न्यूज गैदरिंग होगी, उसकी उतनी ज्यादा बाजार पर पकड़ होगी। जितनी ज्यादा खबर होगी, उतना अधिक खबर का एंगल होगा। फिर जिस अखबार की बिक्री ज्यादा होगी, उसके पास खबरें भी अधिक पहुंचेगी। बड़े मीडिया हाउस के संवाददाताओं के स्रोत भी अधि बड़े और विश्वसनीय होते हैं, इस कारण उन्हें विशेष खबरों का स्कोप भी ज्यादा मिल जाता है । कुल मिलाकर मीडिया की अर्थव्यवस्था भले ही विज्ञापनों से चलती है, पर बाजार में बिकती खबर ही है। खबर की अनदेखी कर कोई भी मीडिया माध्यम अधिक दिनों तक बाजार में नहीं बना रह सकता है। और खबरों की ताकत है न्यूज गैदरिंग, क्योंकि वह हमें विकल्प मुहैया कराता है, खबरों से खेलने का, एंगल गढ़ने का और पाठकों को बांधने का।



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