गुरुवार, 2 फ़रवरी 2012

पं. बृजलाल द्विवेदी सम्मान डा. हेतु भारद्वाज को



पं. बृजलाल द्विवेदी सम्मान डा. हेतु भारद्वाज को

संजय द्विवेदी, भोपाल, 10 जनवरी,2012 । हिंदी की साहित्यिक पत्रकारिता को सम्मानित किए जाने के लिए दिया जाने वाला पं. बृजलाल द्विवेदी अखिलभारतीय साहित्यिक पत्रकारिता सम्मान इस वर्ष अक्सर ( जयपुर) के संपादक डा. हेतु भारद्वाज को दिया जाएगा।
डा. हेतु भारद्वाज साहित्यिक पत्रकारिता के एक महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं और अक्सर से पहले वे समय माजराके भी संपादक रहे हैं। पुरस्कार के निर्णायक मंडल में सर्वश्री विश्वनाथ सचदेव, विजयदत्त श्रीधर, गिरीश पंकज, रमेश नैयर और सच्चिदानंद जोशी शामिल थे। इसके पूर्व यह सम्मान वीणा(इंदौर) के संपादक स्व. श्यामसुंदर व्यास, दस्तावेज(गोरखपुर) के संपादक विश्वनाथ प्रसाद तिवारी एवं कथादेश ( दिल्ली) के संपादक हरिनारायण को दिया जा चुका है।
त्रैमासिक पत्रिका मीडिया विमर्श द्वारा प्रारंभ किए गए इस अखिलभारतीय सम्मान के तहत साहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान करने वाले संपादक को ग्यारह हजार रूपए, शाल, श्रीफल, प्रतीकचिन्ह और सम्मान पत्र से अलंकृत किया जाता है। अब तक यह सम्मान समारोह इंदौर, रायपुर, बिलासपुर में आयोजित किया जा चुका है। इस बार सम्मान कार्यक्रम भोपाल में 7, फरवरी, 2012 को आयोजित किया गया है।
मीडिया विमर्श पत्रिका के कार्यकारी संपादक संजय द्विवेदी ने बताया कि आयोजन में अनेक साहित्कार, बुद्धिजीवी और पत्रकार हिस्सा लेगें। इस अवसर साहित्यिक पत्रकारिता का भविष्यविषय पर व्याख्यान भी आयोजित किया जाएगा।

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January 7, 2012 at 10:13 amadmin

यादो में हिन्दू.मुस्लिम एकता स्तंभ मानस मर्मज्ञ डॉ0 पुण्डरीक

रिजवान चंचल / लखनऊ / हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिये हमेषा संवेदनशीलता के साथ संवेदनात्मक विचारों प्रवचनो से लोगों के दिलों में अमिट छाप छोडने वाले मानस णमर्मज्ञ डॉ0 सैयद महफूज हसन रिजवी पुंडरीक अब हमारे बीच नहीं रहे । 5 जनवरी को उनका एक निजी अस्पताल में हीमोग्लोबिन की कमी के कारण निधन हो गया। संवेदना के लिए शब्दों की तलाश, खासकर किसी अपने की मृत्यु के बाद दो शब्द लिखने के लिए शब्दों की तलाश करने में कई बार आंखों के आगे सब कुछ धुंधला सा होता नजर आता है। ऐसे धुंधलेके में हिन्दू.मुस्लिम एकता स्तंभ मानस मर्मज्ञ डा0 पुण्डरीक के निधन के समाचार मिलने के बाद दिमांग का सुन्न हो जाना संभव था। चाहकर भी लिखने के लिये शब्दों का अभाव रहा ।
बीते 20 नवम्बर को वे जनजागरण मीडिया मंच के विमोचन समारोह में कार्यक्रम की अध्यक्षता हम सब के बीच कर रहे थे। इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि थे डी एन ए समाचार पत्र के चेयरमैन निशीथराय जी किसी को भी यह आभास नही था कि अपने बीच का यह साथी जो कि खासा स्वस्थ और ओजस्वी बाणी के साथ अपने विचारों पर तालियां लूट रहा है। इतनी जल्दी सबसे अलविदा कह देगा लेकिन नियति को यही मंजूर था। राम के रंग में रंगे डॉ0 पुंडरीक श्रीरामचरितमानस की विशिष्ट व्याख्या के लिए विख्यात थे। वह गोस्वामी तुलसी दास में भी अनुराग रखते थे। उनके लिखे गए लेखों में अक्सर उन विषयों को लिया जाता रहा, जिसमे समाज में भ्रम की स्थित रही उसे वे अक्सर उकेरते रहे जैसे उन्होंने अपने लेख में लिखा -
ढोल गँवार सूद्र पशु नारी,
सकल ताड़ना के अधिकारी।
यह वही अर्धाली है जिसकी पिछले चार सौ वर्ष से भ्रामक व्याख्या की जाती रही है। यहां ताड़नाको संस्कृत के ताडयसे उद्भूत स्वीकारते हुए उत्पीडि़त करने अथवा मारने के अर्थ लगाये गये हैं, जो कि सर्वथा असंगत हैं। यह अर्थ न तो कथ्य के संदर्भ से अनुकूलन करता है और न ही तुलसी की इस घोषणा से कि भाषाबद्ध करब में सोईभाषाका तात्पर्रू अवध प्रान्त की लोकभाषा अवधीसे है, न कि संस्कृत अथवा इससे उद्भूत शब्द से। अवधी मेंताड़नेके अर्थ भांप लेने, समझने अथवा निगरानी करने के लगाये जाते हैं मारने के कदापि नहीं। विस्तृत रूप से समझने के लिए देखें मेरा लेख सकल ताड़ के अधिकारी?
इसमें संदेह नहीं कि तुलसीदास को ब्राह्मण होने पर गर्व भी था किन्तु इसके ये अर्थ तो नहीं होते कि वे अन्य जातियों को नीच एवं घृणित समझते थे। यह सही है कि उन्होंने जाति प्रथा के उन्मूलन की दिशा में कबीर की भांति कोई प्रयास नहीं किया, क्योंकि वे जानते थे कि इसका उन्मूलन संभव नहीं है बल्कि इसकी विपरीत प्रतिक्रिया होगी। उन्होंने भारतीय समाज की ऊँची जातियों में व्याप्त श्रेष्ठता संघर्ष और इससे उत्पन्न होने वाली विभीषिका को देख लिया था। राख की ढेर में दबी इस स्फुलिंग को तुलसीदास हवा देकर भड़काना नहीं चाहते थे बल्कि राम सुयश वर बारी’, द्वारा इसका शमन चाहते थे। ऊँची जातियों में पनप रहे, नीच एवं छुआछूत जैसे विचारों एवं अन्धविश्वासों का उन्होंने विरोध किया है। परिणामतः वर्षाश्रमवादी ब्राह्मण समुदाय के मंच से तुलसीदास पर अब्राह्मण होने का आरोप तक लगाया गया। किन्तु वे किंचित विचलित नहीं हुए।
स्व. अमृतलाल नागर ने तुलसीदास के जीवन पर एक शोधात्मक उपन्यास मानस का हंस’, लिखा है। उसमें एक घटना का उल्लेख है कि तुलसीदास एक कुष्ठ रोगी को अपने घर उठा लाये थे और उसकी सेवा सुश्रूपा करने लगे थे। इस पर पूरे ब्राह्मण समाज ने उनका बहिष्कार कर दिया था और उन्हें अब्राह्मण कहा जाने लगा था। शायद इसीलिए, उन्होंने घोषणा कर दी कि….
धूत कहो अवधूत कहो, रजपूत कहो जोलाहा कहो कोऊ,
काहू की बेटी सो बेटा न ब्याहब काहू की जाति विगारौ न सोऊ।
मेरी जाति पांति न चाहों काहू की जात पांति।
मेरो कोऊ काम को, न मैं काहू के काम को।
अपने जीवनकाल में उन्होंने तुलसी पर पांच सौ से अधिक प्रवचन दिए। बाराबंकी जिला के रुदौली में एक जमींदार परिवार में 10 मई 1945 को जन्मे डॉ0 पुंडरीक ने मुहर्रम के दौरान इमामबाड़ा पर दिल के टुकड़े कर दिए बहना के बोल नौहा सुनाया था। वह मर्सिया पुस्तक लिख रहे थे जो अब अधूरी रह गई। उन्हें रुपलेखा पुरस्कार , अबदुररहीम खानखानापदक,मातृ श्री पुरस्कार ,0 प्र0 हिन्दी संस्थान द्वारा सौहार्द सम्मान, सारस्वत सम्मान सहित देष के विभिन्न प्रदेषों से तरह तरह के सम्मानों से नवाजा गया । वे कोलकाता में हिन्दी अधिकारी रहे वर्तमान में अमीनाबाद लखनऊ में रह रहे थे, उन्होने देश के विभिन्न समाचार पत्रों व पत्रिकाओं में भी रामायण व तुलसी पर अपने लेख लिखे तथा मानस पर केन्द्रित किताबों के अलावा गीत गजल की दर्जनों किताबे लिखीं उनका निबंध संग्रह गोस्वामी तुलसी दास और मैकाफी चर्चित व लोकप्रिय हुआ एम.ए, पी.एच. डी.,एवं डी.लिट की उपाधि लिये हिन्दू.मुस्लिम एकता के स्तंभ जाने जाने वाले मानस मर्मज्ञ डा0 पुण्डरीक के सामने जब भी कोई देश में मंदिर मस्जिद विवाद पर चर्चा छेड़ता तो अक्सर यही कहते कि हमें यह भी याद रखना चाहिये कि हम हिन्दू मुसलमान बाद में है अलबत्ता पहले तो इंसान ही है और इंसान की जान की कीमत किसी भी मंदिर या मस्जिद से कम नहीं होती हैं ।
शोक सभा आयोजित
डॉ पुण्डरीक के निधन पर रेड फाइल कार्यालय में पत्रकारों साहित्यकारों ने शोक सभा की रेड फाइल के संपादक रिजवान चंचल ने पत्रकार साथियों के साथ कुछ क्षण का मौन रख एस्वेर से इस दुःख की घरी में उनके परिवारी जानो को शक्ति प्रदान करने की दुआ की गाँधी भवन में भी साहित्यकार स्वर्ण केतु भारद्वाज के नेत्रत्वा में एक शोक सभा का आयोजन किया गया स्रधान्जली देने वालों में वरिस्थ साहित्यकार हरी पाल सिंह आर के पाण्डेय मो जाकी मीना खान आदि थे ।

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