बुधवार, 1 फ़रवरी 2012

जन अधिकार / आपातकाल और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता



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  • सन् 1967 का चुनाव इस मायने मे अत्यंत महत्वपूर्ण करार दिया जाएगा, क्योंकि प्रथम बार आजादी के दौर के चुनाव इतिहास में एक साथ आठ राज्यों में कांग्रेस पराजित हुई और संयुक्त विधायक दल (संविद) सरकारों का गठन किया गया। 1967 के चुनाव के बाद गठित लोकसभा में भी प्रथम बार विपक्ष ने अपनी अत्यंत सशक्त उपस्थिति दर्ज कराई। साम्यवादियों के साथ ही समाजवादी भी बहुत ताकतवर बनकर लोकसभा में उभरे। भारतीय जनसंघ को पहली बार जबरदस्त कामयाबी हासिल हुई। ऐसा प्रतीत हुआ कि अब भारत का लोकतंत्र नेशनल कांग्रेस के प्रभाव से बाहर आकर एक स्वभाविक परिपक्वता का परिचय देगा। किंतु 1971 में बंगलादेश पर ऐतिहासिक विजय के बाद आयोजित हुए चुनाव में देश की दुर्गा बनीं इंदिरा गांधी ने विपक्ष को बुरी तरह धराशाही करके संपूर्ण लोकतांत्रिक संतुलन को पुन: गड़बड़ा दिया। लोकसभा में कांग्रेस के प्रचंड बहमुत के सामने विपक्ष बहुत बौना हो गया।
    1973 में अहमदाबाद, गुजरात से छात्र आंदोलन की लहर उठी, जिसको कि देश के मूर्धन्य नेता जयप्रकाश नारायण ने अपना समर्थन दिया। इसका परिणाम हुआ कि समस्त देश इंदिरा विरोधी लहर की चपेट में आ गया। सत्ता के मद में चूर कांग्रेस सरकार ने अहिंसक जन आंदोलन का जबरदस्त दमन किया। इसी दौर में इंदिरा गांधी के विरूद्ध दायर चुनाव याचिका पर यूपी हाईकोर्ट का फैसला आया। अपने निकट सहयोगियों की सलाह पर इंदिरा गांधी ने देश पर इमरजेंसी लगा दी। यदि देश की संसद में विपक्ष इस कदर अशक्त नहीं होता तो संभवतया इंदिरा गांधी के लिए यह मुमकिन ही न हो पाता कि वह देश पर मनमाने तौर पर इमरजेंसी लगा पातीं।
    इंदिरा गांधी की सबसे बड़ी भूल
    12 जून, 1975 को जब इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला आया और उसने इन्दिरा गांधी के लोकसभा चुनाव को रद्द घोषित कर दिया। 25 जून, 1975 को इंदिरा गांधी ने संविधान की धारा-352 के प्रावधानों के अनुसार आपातकालीन स्थिति की घोषणा कर दी। इससे इंदिरा गांधी की उस छवि को गंभीर धक्का पहुंचा जिसकी वजह से वह गरीबों की मसीहा मानी जा रही थीं और हरित क्रांति और श्वेत क्रांति की अगुआ मानी जाती थीं। उस समय में यह स्पष्ट रूप से दिखने लगा था कि कांग्रेस का एकमात्र उद्देश्य सत्ता में बने रहना है।
    आपातकाल की घोषणा के साथ ही सरकार ने प्रेस पर सेंसरशिप लागू कर दी। स्वतंत्रता के बाद पहली बार प्रेस पर पूर्ण सेंसरशिप लगाई गई थी। यह प्रेस के लिए किसी आघात से कम नही था। उन्हें सच छापने से रोकने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाए जाने लगे और उनकी स्वतंत्रता को कम करने का प्रयास किया गया। इस दौरान प्रेस के स्वतंत्रता का हनन हुआ। संपादकों पर अपनी बात स्वतंत्र रुप से न कहने के लिए दबाव बनाया गया।
    कुछ समाचार पत्रों ने विरोध स्वरुप अपने संपादकिय कॉलम खाली रखकर भी विरोध दर्ज किया। लेकिन उन्हें ऐसा करने की भी सख्त मनाही थी। इस समय प्रेस पर सेंसरशिप बेहद सख्त थी। सरकार, सत्ता प्रतिष्ठान या आपातस्थिति की आलोचना की भी अनुमति नहीं थी।
    इसी समय भारतीय प्रेस की चारित्रिक दुर्बलताएं भी सामने आई। जहां इमरजेंसी से देश की राजसत्ता का अलोकतांत्रिक चेहरा सामने आता है, वहीं सेंसरशिप भारतीय प्रेस की अन्तर्निहित नमनीयता व अवसरवादीता को भी बेपर्दा करती है। यह स्थापित कर देती है कि प्रेस प्रतिष्ठानों के मालिक और प्रतिष्ठित संपादक व पत्रकार भीतर व बाहर से कितने दनयीय हैं। सत्ता के विरुद्ध डटे रहने की उनकी प्रतिरोधी ऊर्जा कितनी क्षीण है। इमरजेंसी काल में पत्रकारिता के बड़े-बड़े स्तंभ अंदर से खोखले निकले। इससे प्रेस की प्रतिष्ठा को गहरा आघात लगा। इससे यह भी स्पष्ट हो गया कि आधुनिक भारतीय प्रेस ने स्वतंत्रता संघर्ष की पत्रकारिता की विरासत से स्वयं को अलग कर लिया है।
    इसका लाभ प्रभु वर्ग को मिला। सत्ताधीशों और प्रेस स्वामियों को इस बात का अहसास हो गया कि प्रेस के समाचार-विचार नेतृत्व अर्थात  संपादक व पत्रकारों को मनमुताबिक ढाला जा सकता है। इनका आवश्यकतानुसार इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके साथ ही संपादकीय नेतृत्व की नमनीय स्थिति के मनवांछित दोहन के युग की शुरूआत हो गई। प्रेस में नई-नई प्रवृतियां उभरने लगीं। प्रबंधन और विज्ञापन संस्थाएं मनमाने फैसले लेने लगीं और विभिन्न तरह के दबाव बनाने लगीं। हालांकि अपवादस्वरूप ऐसे संपादक व पत्रकार भी थे, जो जेल भी गए और अंत तक पत्रकारिता के उच्च मानदंडों का परचम थामे रखा। उन्होंने सुविधानुसार चोला नहीं बदला।
    कुल मिलाकर आपातकाल का दौर एक ऐसा समय था जो भारतीय लोकतंत्र के लिए चुनौतियां लेकर आया था। और यह चुनौतिया मीडिया के लिए भी थी। मीडिया की स्वतंत्रता का हनन किया गया। आज प्रेस की स्वतंत्रता पर बल देने के पीछे की मूल भावना भी यही है कि किस प्रकार मीडिया की आजादी लोकतंत्र का पर्याय है। इसके बिना एक स्वस्थ्य लोकतंत्र की कल्पना नहीं की जा सकती।
     
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