गुरुवार, 2 फ़रवरी 2012

मीडिया पर सेंसरशिप कोई विकल्प नहीं:प्रधानमंत्री / कार्टून बनाने की ऐसी सजा




प्रधानमंत्री ने द ट्रिब्‍यून 130 ईयर्स : अ विटनेस टू हिस्‍ट्रीपुस्‍तक का विमोचन किया
नई दिल्ली
। प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने कहा है कि मीडिया पर सेंसरशिप कोई विकल्प नहीं है और मीडिया को बिना किसी बाहरी नियंत्रण की पूरी स्वतंत्रता होनी चाहिए। डॉ. सिंह ने कहा कि पत्रकारों को , मीडिया में पेड न्यूज जैसी बुराईयों से निपटने के लिए अपने आप को स्वयं नियमित करें। ट्रिब्यून की 130 वीं वर्षगांठ पर नई दिल्ली में कल एक समारोह में प्रधानमंत्री ने कहा कि मीडिया लोकतंत्र का एक आवश्यक स्तंभ है।
डॉक्‍टर मनमोहन सिंह ने कहा कि हमारी सरकार का यह पक्‍का विश्‍वास है कि मीडिया हमारे लोकतंत्र का एक अनिवार्य स्‍तंभ है। हम मीडिया के विदेशी नियंत्रण से पूर्ण स्‍वतंत्रता में विश्‍वास करते हैं। यह सच है कि कभी-कभी गैर-जिम्‍मेदार पत्रकारिता के सामाजिक सौहार्द और सार्वजनिक व्‍यवस्‍था के लिए गंभीर परिणाम हो सकते हैं, लेकिन सेन्‍सरशिप उसका जवाब नहीं है। मीडिया के सदस्‍यों को सामूहिक रूप से सुनिश्चित करना चाहिए कि निष्‍पक्षता को बढ़ावा दिया जाए और सनसनीखेज बातों को नियंत्रित किया जाए। यह उनके लिए आत्‍ममंथन की बात है कि वे हमारे देश और समाज की कैसे बेहतर तरीके से सेवा कर सकते हैं और उनकी कुशलता को बढ़ा सकते हैं। उन्‍होंने कहा कि मीडिया के लोगों को पैड़ न्‍यूजजैसी विकृतियों के निवारण के लिए अत्‍याधिक आत्‍म नियंत्रण करना होगा।
प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह कहा कि राजनीति और समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार तथा अन्य बुराईयों का पर्दाफाश करना मीडिया की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। उन्होंने सुझाव देते हुए कहा कि मीडिया को हमेंशा नकारात्मक सोच नहीं रखनी चाहिए । डॉ. मनमोहन सिंह ने कहा कि लोगों को सूचित और शिक्षित करना मीडिया की बड़ी जिम्मेदारी है। सरकार पर नजर रखना और महत्वपूर्ण राष्ट्रीय हितों को उजागर करना भी मीडिया का अहम दायित्व है। उन्होंने कहा कि एक संवेदनशील मीडिया देश के विकास के लिए जरूरी है।
प्रधानमंत्री ने कहा कि आज के भारतीय मीडिया की अपनी अ‍परिहार्य बु‍लंदियां और गहराइयां हैं। हम रोजाना अत्‍याधिक श्रेष्‍ठ बौद्धिक पत्रकारिता के उदाहरण देखते हैं। बिना पक्षपात के सही रिपोर्टिंग करने के अनेक उदाहरण हैं। उन्‍हें समर्थन देने के लिए गंभीर अनुसंधान की कहानियां भी हैं। पत्रकार अक्‍सर खुद को जोखिम में डालकर गलत कारनामों का भंडाफोड़ करते हैं। अत्‍याधिक राष्‍ट्रीय महत्‍व के विषयों पर सार्थक रूप से खबर देने के प्रयास किये जाते हैं। उन्‍होंने कहा कि हम किसी भी कीमत पर किसी खबर को बेचने की इच्‍छा से खलबली भी देखते हैं। कभी-कभी पक्षपातपूर्ण रिपोर्टिंग भी देखने को मिलती है। हाल ही में प्रकाश में आई पैसा देकर खबर छपवाने की प्रथा सही विचार वाले लोगों के लिए हृदय विदारक सिद्ध हुई है।
प्रधानमंत्री ने कहा कि मीडिया का यह महत्वपूर्ण दायित्‍व है कि वे व्‍यवस्‍था और हमारे समाज में फैले भ्रष्‍टाचार और अन्‍य कुरीतियों को प्रकाश में लायें। उसे सरकार को भी परामर्श देना चाहिए और जब कभी वह गलत करती है, तो उसे घुड़की भी देनी चाहिए। लेकिन मेरा सुझाव है कि हर समय निराशा और विनाश की बातें नहीं करनी चाहिएं। विश्‍व आज हमारी ओर देख रहा है और यह उचित होगा कि सार्थक खबरों को उचित स्‍थान दिया जाए। भारत के विकास की गाथा उत्‍साहवर्धक है और उसे समाचार-पत्रों और दृश्‍य माध्‍यमों के जरिये बताया जाना चाहिए।
उन्‍होंने विश्‍वास व्‍यक्‍त किया कि श्रेष्‍ठ पत्रकारिता बहुत गंभीर और कठिन काम है। तथापि मैं विश्‍वास करता हूं कि देश के पत्रकारों ने सामूहिक रूप से अपने आपको उचित रूप से मुक्‍त कर लिया है। मैं इस बात से सहमत हूं कि भारतीय मीडिया संतुलित रूप से जिम्‍मेदार है और उसने राष्‍ट्रीय हितों की सेवा के लिए अपने आपको ढाल लिया है। मुझे इस बात का भी विश्‍वास है कि आने वाले वर्षो में हमारा मीडिया और ऊंचे स्‍तर पर पहुंचेगा।

इस अवसर पर प्रधानमंत्री डॉक्‍टर मनमोहन सिंह ने द ट्रिब्‍यून 130 ईयर्स : अ विटनेस टू हिस्‍ट्रीपुस्‍तक का विमोचन किया। उन्‍होंने कहा कि अपनी पसंद के इस अखबार को पढ़ने के साथ ही वह अतीत की स्मृतियों में चले जाते हैं। इस पुस्‍तक में द ट्रिब्‍यून के 130 वर्ष के विस्‍तृत इतिहास को शामिल किया गया है।
प्रधानमंत्री ने कहा कि इस अखबार के संस्‍थापक दयाल सिंह मजीठिया असाधारण दूरदर्शी और महान सुधारवादी थे। वह उच्‍च आदर्शों से प्रेरित थे और चाहते थे कि यह अखबार किसी तरह के साम्‍प्रदायिक या व्‍यावसायिक पक्षपात से मुक्‍त रहे। उन्‍होंने इस बात पर खुशी जाहिर की कि अखबार ने कुल मिलाकर अपने संस्‍थापक की दूरदर्शिता को पूरा किया।
प्रधानमंत्री ने इस पुस्‍तक के लेखक प्रोफेसर ई.एन. दत्‍ता को इस शानदार लेखन के लिए बाधाई दी।(पीआईबी)
January 18, 2012 at 3:16 pmadmin

मीडि‍या संगठन में सम्‍पादक संस्‍था का ह्रास एक वास्‍तवि‍कता: उपराष्‍ट्रपति

पत्रकारि‍ता में श्रेष्‍ठता के लि‍ए रामनाथ गोयनका पुरस्‍कार
नई दिल्ली।
उपराष्‍ट्रपति श्री एम. हामि‍द अंसारी ने कहा है कि‍ अनुभव से पता चलता है कि आम लोगों के हि‍तों की सुरक्षा की सर्वोत्‍तम गारंटी सुदृढ़ और स्‍वतंत्र मानसि‍कता वाले सम्‍पादकों के होने में है। आज इस प्रकार के सम्‍पादक विरले हैं। पत्रकारि‍ता में श्रेष्‍ठता के लि‍ए वर्ष 2010-11 के रामनाथ गोयनका पुरस्‍कार 16 जनवरी 2012 को यहां प्रदान करने के बाद अपने संबोधन में, उपराष्‍ट्रपति ने कहा कि‍ भारतीय मीडि‍या संगठन में सम्‍पादक संस्‍था का धीमे-धीमे ह्रास एक वास्‍तवि‍कता है। उन्‍होंने कहा कि‍ जब मीडि‍या में स्‍थान और उत्‍पादों को पूर्णत: राजस्‍व को अधि‍ककाधि‍क बढ़ाने की नीति‍यों के रूप में लि‍या जाता है तो सम्‍पादक वि‍पणन वि‍भागों को स्‍थान देने पर वि‍वश हो जाता है।
श्री अंसारी ने वि‍चार व्‍यक्‍त कि‍या कि‍ हमने अभी तक बहु-स्‍वामि‍त्‍व और क्रॉस स्‍वामि‍त्‍व अथवा मीडि‍या संबंधी ऐसी अकाट्य राष्‍ट्रीय नीति‍जो सभी मंचों से संबंधित हो, के वि‍षय पर चर्चा नहीं की है, जो सभी मंचों को अपनी परि‍धि‍में लेती हो। उन्‍होंने कहा कि‍यह अन्‍य वि‍कसि‍त लोकतंत्रों की परंपरा के वि‍रूद्ध है। आम राय तैयार करने, राजनीति‍क चर्चा चलाने और उपभोक्‍ता तथा सार्वजनि‍क हि‍त को सुरक्षि‍त करने में समूचे मीडि‍या क्षेत्र पर अपना आधि‍पत्‍य बनाए रखने वाले कुछ चुनिंदा मीडि‍या समूह के उभरने का प्रभाव मूल प्रश्‍न है। उन्‍होंने कहा कि मीडिया क्षेत्र में सुदृढ़ीकरण की दिशा में आन्‍दोलन को देखते हुए यह मामला तात्कालिक हो गया है। उन्‍होंने कहा कि मीडिया क्षेत्र में बड़े कॉरपोरेटों के आने से, वि‍शेष रूप से बढ़ती हुई पूंजीगत आवश्‍यकताओं से नि‍पटने के लि‍ए, अपेक्षा की जा सकती है, जि‍ससे पारदर्शि‍ता और स्‍वतंत्रता सुनिश्‍चि‍त की जा सके।
उपराष्‍ट्रपति‍ ने रामनाथ जी की स्‍मृति को श्रद्धाजंलि देने के लि‍ए आयोजि‍त समारोह में भाग लेने पर प्रसन्‍नता व्‍यक्‍त की और कहा कि‍ वे भारत के पुलि‍त्‍जर थे। पत्रकारि‍ता में श्रेष्‍ठता मनाने के लि‍ए उनके नाम पर गठि‍त पुरस्‍कार उनके उत्‍साह और प्रति‍बद्धता को उचि‍त श्रद्धाजंलि है। उन्‍होंने कहा कि‍ जैसा हम जानते हैं यह वि‍श्‍व संकुचि‍त होता जा रहा है और इसने मीडि‍या के उत्‍पादों, पारेषण और उपभोग के प्रति‍मान को बदल दि‍या है। पत्रकारि‍ता से संबंधि‍त इसके तीन पहलु उल्‍लेखनीय है : यह स्‍पष्‍ट हो गया है कि‍प्रौद्योगि‍की न तो मूल्‍यतटस्‍थ है और न ही परंपरागत रूप से इक्‍वि‍टी संचालि‍त है, समाचार मीडि‍या, मनोरंजन और दूरसंचार ने पत्रकारि‍ता, जन संपर्क, वि‍ज्ञापन और मनोरंजन के बीच हदबंदी समाप्‍त कर दी है, पत्रकारि‍ता का सार्वजनि‍क उद्देश्‍य, जि‍सने पहले के युग में हमारा पथ प्रदर्शन कि‍या था बदल गया है, उपराष्‍ट्रपति‍ ने कहा कि‍ बदले हुए और बदलते हुए वि‍श्‍व में यह स्‍मरण करना उपयोगी होगा कि‍ लोकतंत्र में गतिशील पत्रकारि‍ता वाचडॉग पत्रकारि‍ता है। यह समाज में अधि‍कार और प्रभाव के इस्‍तेमाल पर नजर रखता है और नागरि‍कों के अधिकारों और स्‍वतंत्रता के लि‍ए संघर्ष करता है। यह नागरि‍कों को सूचि‍त करता है और उन्‍हें सशक्‍त बनाता है, बजाय इसके कि‍ वह उनका मनोरंजन करता है।
श्री अंसारी ने कहा कि‍गति‍शील पत्रकारि‍ता व्‍यावसायि‍क नैति‍कता पर आधारि‍त है और यह लोकतंत्र में नि‍यम होना चाहि‍ए। उन्‍होंने कहा कि‍ हमारा मीडि‍या और लोकतंत्र भाग्‍यशाली हैं कि‍हमारे पास पत्रकारों के कुशाग्र और विवेकाशील उदाहरण हैं जि‍न्होंने न केवल नैति‍क आयामों को साकार किया बल्‍कि‍उनके लि‍ए अपने जीवन का बलि‍दान भी किया।
उन्‍होंने कहा कि‍ मीडि‍या लोकतंत्र में चौथा स्‍तम्‍भ है। यह जनता को सूचि‍त करने की प्रमुख भूमि‍का नि‍भाता है और इस प्रकार धाराणाओं को और इसके जरि‍ये राष्‍ट्रीय एजेंडे को साकार रूप देता है। पत्रकारिक नैति‍कता के स्‍वीकृत तौर-तरीकों का पालन करना और व्‍यावसायि‍क आचरण के उच्‍च मानकों का रख-रखाव प्राकृति‍क परि‍णाम समझे जाने चाहि‍ए।
उन्‍होंने कहा कि‍मीडि‍या के सि‍द्धांत सार्वजनि‍क चर्चा का एक मुद्दा है। मैं इस बारे में दो बातें कहना चाहता हूं। पहले तो अन्‍य लोकतां‍त्रिक समाजों में इन सिद्धांतों का उद्देश्‍य मीडिया संस्‍थाओं के बीच विविधता, प्रतिस्‍पर्द्धा और स्‍थानीयता को बढ़ाना और संवैधानिक मूल्‍यों को स्थापित करना, लघु लोगों का सरंक्षण करना और विज्ञापन को सीमित करने को ध्‍यान में रखते हुए सार्वजनिक हित को बढ़ावा देना है। दूसरे, हमने बहु-स्‍वामित्‍व और क्रॉस-स्‍वामित्‍व के मामले पर देश में अभी तक कोई चर्चा नहीं की है और न ही हमारी कोई अकाट्य राष्‍ट्रीय मीडिया नीति है, जो सभी मंचों से संबंधित हो।
उपराष्‍ट्रपति ने अपने वक्‍तव्‍य में व्‍यवसाय के एक अन्‍य पहलु की भी चर्चा की। विकास प्रक्रिया के ढांचागत पक्षपात ने ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में शहरी क्षेत्रों का पक्ष लिया है। इसी प्रकार महानगरीय क्षेत्रों की अन्‍य शहरी क्षेत्रों पर, अंग्रेजी भाषियों का अन्‍य भारतीय भाषाओं बोलने वालों पर, मध्‍य और उच्‍च वर्गो का अन्‍य लोगों पर, सेवा क्षेत्रों का कृषि जैसे अन्‍य क्षेत्रों पर वर्चस्‍व।
उन्‍होंने अपने भाषण के अंत में सभी पुरस्‍कार विजेताओं को बधाई दी और कामना की कि वे अपने चुनिंदा व्‍यवसाय तथा राष्‍ट्र की सेवा में अनेक वर्ष प्रदान करें। उन्‍होंने रामनाथ गोयनका स्‍मारक संस्‍थान और इंडियन एक्‍सप्रेस परिवार का उन्‍हें इस समारोह में आमंत्रित करने के लिए भी आभार प्रकट किया।(पी आई बी)

 

लोगों का बौद्धिक स्तर ऊंचा उठाये मीडिया : काटजू

जयपुर / भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष और पूर्व न्यायाधीश मार्कडेय काटजू ने कहा कि प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया का करीब नब्बे प्रतिशत हिस्सा लोगों की सोच को विकसित कर ज्वलंत समस्याओं का समाधान करने की बजाय उन्हें और बढ़ाने का काम कर रहा है। उन्होंने मीडिया से लोगों का बौद्धिक स्तर ऊंचा उठाने का काम करने की अपील की।

 

जयपुर / भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष और पूर्व न्यायाधीश मार्कडेय काटजू ने कहा कि प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया का करीब नब्बे प्रतिशत हिस्सा लोगों की सोच को विकसित कर ज्वलंत समस्याओं का समाधान करने की बजाय उन्हें और बढ़ाने का काम कर रहा है। उन्होंने मीडिया से लोगों का बौद्धिक स्तर ऊंचा उठाने का काम करने की अपील की।
जयपुर में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल की ओर से आयोजित झाबरमल्ल स्मृति व्याख्यानमाला में संबोधन के दौरान काटजू ने जयपुर साहित्य उत्सव के व्यापक कवरेज पर भी सवालिया निशान लगाया। उन्होंने कहा कि जिस तरह की मीडिया में साहित्य उत्सव को लेकर छपा है वह निराश करने वाला है। काटजू ने आह्वान किया कि मीडिया पिछडे़पन, जातिवाद, सांप्रदायिकता और अंधविश्वास जैसे मुद्दों पर प्रहार कर अच्छे विचार को बढ़ावा दे ताकि देश के समक्ष चुनौतियों और समस्याओं का समाधान हो सके। उन्होंने मीडिया से समाज के हर वर्ग को एकसमान तवज्जो देने का आह्वान किया। काटजू ने आगाह किया कि मीडिया द्वारा किसी एक वर्ग को दोषी ठहरा देने से समाज में उस वर्ग के प्रति दुर्भाव की स्थिति पैदा हो जाती है जिससे बचना चाहिए।
उन्होंने कहा कि भाषा, समाज, संप्रदाय को बराबर का दर्जा देने पर ही देश चलेगा, यह वतन किसी एक का नहीं है। क्रिकेट कमेंट्री, फिल्म कलाकारों के निजी जीवन की रिपोर्टिंग को लेकर काटजू मीडिया पर फिर बरसे। उन्होंने कहा कि देश की क्या दुर्गति हो रही है, बेरोजगारी, गरीबी, प्राथमिक शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं का बुरा हाल है। सभी लोग ज्वालामुखी पर बैठे है जो कब फटेगा पता नहीं। यह ज्यादा दिन चलने वाला नहीं, जनता इसे अधिक बर्दाश्त नहीं करने वाली। काटजू ने स्पष्ट किया कि वह मीडिया के दुश्मन नहीं हैं लेकिन कुछ लोगों ने उन्हें गलत समझ लिया है।

इसी समारोह में उत्तर प्रदेश के राज्यपाल बीएल जोशी ने कहा कि मीडिया को समाज के दर्पण का काम करना होगा और समाज को दिशा दिखानी होगी। मीडिया में पेडन्यूज चिंता का विषय है जिसका विस्तार चलता रहा तो समाचारों की मौलिकता कुंठित हो जाएगी। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र के तीन स्तंभों का संवाद जनता से नहीं रह गया है जिसकी कमी को पूरा करने का काम मीडिया कर रहा है। सच्चाई को कुचलने के प्रयास जिस ढंग से अभी हो रहे है ऐसे प्रयास इससे पहले कभी नहीं हुए जो चिंता का विषय है।

कार्टून बनाने की ऐसी सजा : मैंने नहीं सोचा था

बहस
असीम त्रिवेदी / 6 जनवरी को मेरे मीडिया के कुछ मित्रों से जब यह बात पता चली कि मेरे खिलाफ महाराष्ट्र की एक अदालत में देशद्रोह का मुकदमा किया गया है तो यकीन मानिये, सचमुच थोड़ी देर के लिये मैं स्तब्ध रह गया. ऐसा लगा मानों पैरों तले से जमीन खिसक गई हो. कार्टून बनाने के ऐसी सजा भी मिल सकती है, मैंने नहीं सोचा था. कनफर्म करने के लिये अपने एक अजीज से बात की तो पता चला कि सामना ने अपने फ्रंट पेज पर ही आसीम त्रिवेदीवर देशद्रोहाचा गुन्हाशीर्षक से एक खबर छापी है और जिला अदालत में यह कार्यवाही एक प्राइवेट कम्प्लेन पर की गई है.
साथ ही यह भी पता चला कि यह शिकायत मुम्बई के उन वकील महोदय की नहीं है जिन्होने कम्लेन कर मेरी वेबसाइट को अन्ना अन्दोलन के पहले ही दिन बैन करा दिया था. न ही यह कम्प्लेन आरजेडी सांसद रामकृपाल यादव के राज्यसभा के बयान के बाद हुई थी. मतलब साफ था कि यह स्वघोषित देशभक्त कोई और थे जो कि इस मुद्दे से पापुलैरिटी बटोरने की फिराक में हैं. वैसे इस बीच अन्ना के अरविन्द गौड़ जी ने मुझे फोन करके भरोसा दिलाया है कि वे इस लड़ाई में मेरे साथ खड़े हैं. मीडिया रिपोर्ट के आधार पर यह भी जानकारी हुई कि स्वामी अग्निवेश भी सरकार की इस कार्यवाही को गलत ठहराते हुए मेरे समर्थन में हैं. फेसबुक पर तमाम दोस्त भी बार बार मुझसे यही कह रहे हैं कि वे साथ देंगे और आखिर तक खड़े रहेंगे. गम्भीर आरोपों से हिम्मत डोल जाती है और दोस्तों की मदद से हौसला बढ़ जाता है.
सामनाकी रिपोर्ट को माने तो मुम्बई के बीड जिले के हनुमन्त उपरे ने जिला अदालत में मेरे खिलाफ आरोप लगाए हैं कि मैंने ये कार्टून बना कर देशद्रोह किया है और इनसे जनभावनाएं आहत होती हैं. कुछ ऐसे ही आरोप मु्म्बई के एक वकील राजेन्द्र ने भी लगाए थे और सरकारी नुमाइंदों ने विशेष सतर्कता दिखाते हुए मुझे बिना कोई सूचना दिया वेबसाइट को बैन कर दिया था. मतलब कोर्ट कचहरी का कोई झंझट ही नहीं.
मुम्बई पुलिस क्राइम ब्रान्च खुद ही इतनी बड़ी कोर्ट है कि फौरन जजमेंट दे दिया और साइट बैन हो गई. अन्ना के अनशन का वह पहला दिन ही था और दिन के 12 बजे तक मेरी वेबसाइट बैन हो चुकी थी. बाद में पता लगा कि वकील आर पी पण्डे जिनकी अर्जी पर यह फास्टेस्ट ऐक्शन हुआ था वे पेशे से वकील होने के अलावा मुंबई कांग्रेस के उत्तरी जिला महासचिव भी हैं. मैं तो कहता हूं कि अगर इतनी तेज़ी प्रशासन ने भ्रष्टाचार के मामलों में दिखाई होती तो हमें कभी इस तरह करप्शन के खिलाफ सड़क पर न उतरना पड़ता.
मुझ पर आरोप है कि मैंने संविधान का अपमान किया है. मेरा पूछना है कि जो मुंबई पुलिस ने किया, वो क्या है. मेरे डोमेन प्रोवाईडर बिग रॉक का कहना है कि जब तक पुलिस उन्हें आदेश नहीं देगी, वो साईट नहीं चालू करेंगे. मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि एक आर्टिस्ट का काम क्या एक पुलिस ऑफिसर की सहमति का मोहताज़ है, क्या हमें कोई भी कार्टून बनाकर पहले पुलिस डिपार्टमेंट से पास कराना पड़ेगा. पुलिस ने खुद ही आरोप बनाया, खुद ही जांच कर ली और खुद ही सज़ा दे दी, वो भी मुझे एक छोटा सा एसएमएस तक किये बिना. मेरी सारी मेहनत उस साईट के साथ दफन हो गयी होती अगर मेरे पास उसका बैकअप न होता. ये ऐसा है कि पुलिस को मैं बता दूँ कि आपने चोरी की है और पुलिस बिना मामला दर्ज किये, बिना आपसे बात किये सीधे आपको गोली मार दे. क्या इसे लोकतंत्र कहते हैं, क्या यही है हमारा संविधान?
वैसे केवल लोकतंत्र में ही नहीं बल्कि राजशाही में भी कलाकारों का महत्व रहा है. चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य ने भी अपने दरबार में नवरत्न रखे थे. अकबर के समय भी बीरबल बादशाह-सलामत की गलतियों पर अपने व्यंग्य से चोट किया करते थे. और यहाँ तो कोई सम्राट भी नहीं है. आज तो लोकतंत्र है. हम सब राजा हैं, हम सब सम्राट हैं. कबीर कहते थे निंदक नियरे राखिये, आगन कुटी छबाय.गनीमत है कि कबीर के टाइम में इंटरनेट नहीं था वरना सबसे पहले कबीर की ही वेबसाईट बैन होती फिर उनके मुंह पर भी बैन लग जाता. जैसे-जैसे दूसरे देशों में फ्री स्पीच को समर्थन मिलता गया, हमारे यहाँ उलटा होता गया.
कार्टूनिस्ट के बारे में भारत में बड़ी गलतफहमी फ़ैली हुयी है कि कार्टूनिस्ट का काम बस लोगों को हँसाना है. पर दोस्तों, कार्टूनिस्ट और जोकर में फर्क होता है. कार्टूनिस्ट का काम लोगों को हंसाना नहीं बल्कि बुराइयों पर चोट करना है. कार्टूनिस्ट आज के समय का कबीर है. कबीर कहते थेसुखिया सब संसार है, खावे और सोवेदुखिया दास कबीर है, जागे और रोवे.कार्टूनिस्ट जागता है, वो कुछ कर नहीं सकता पर वो सच्ची तस्वीर सामने लाता है, जिससे लोग जागें और बदलाव की कोशिश करें. बचपन में स्कूल में पढ़ा था, “साहित्य समाज का दर्पण है.पढ़ा होगा उन्होंने भी, जिन्होंने साईट बैन की है और मुझ पर देशद्रोह का केस किया है. पर वो भूल गए, उन सारी बातों की तरह जो हमें बचपन में स्कूल में सिखाई गयी थीं, जैसे चोरी न करना, झूठ न बोलना, गालियाँ न बकना. शायद वो बातें हमें इसीलिये पढ़ाई जाती हैं कि बड़े होकर सब भूल जायें.
तो साहित्य और दर्पण का मामला ये है कि आईने में आपको अपना चेहरा वैसा ही तो दिखाई देगा जैसा कि वो वाकई में है. ये तो ऐसा है कि आप शीशे पर ये आरोप लगायें कि भाई तुम बहुत बदसूरत शकल दिखा रहे हो और गुस्से में आकर शीशा तोड़ दें. इससे तो जो शीशा था वो भी गया, जो सुधार की गुन्जाइश थी वो भी गयी. हर आदमी शीशे में देखता है कि कहाँ चेहरा गन्दा है, कहाँ बाल नहीं ठीक हैं. ये वो काम था जो करना चाहिए था और सुधारना चाहिए था देश को, पर ऐसा हुआ नहीं. आइने पर देशद्रोह का मामला लगा दिया गया. आइने को तोड़ने की तैयारी है. इसीलिये हमारी तरफ एक कहावत है, बन्दर को शीशा नहीं दिखाना चाहिए. पर सवाल दूसरे का होता तो छोड़ देते, ये मामला तो हमारे घर का है. शीशा तो दिखाना ही पड़ेगा. और रही बात अंजाम की तो वो भी कबीर बता गया, “जो घर फूंके आपना, साथ हमारे आये.
कहा जा रहा है, मैंने राष्ट्रीय प्रतीकों का अपमान किया है. मेरा ज़वाब है कि जब मैंने कहीं वास्तविक प्रतीकों का इस्तेमाल ही नहीं किया तो भला अपमान कैसे हो गया. मैंने तो बस ये बताया कि अगर हम आज के परिवेश में राष्ट्रीय प्रतीकों का पुनर्निर्धारण करें तो हमारे नए प्रतीक कैसे होने चाहिए. प्रतीकों का निर्धारण वास्तविकता के आधार पर होता है. यदि आप से कहा जाये कि शांति का प्रतीक एके47 रायफल है तो क्या आप मान लेंगे? वही स्थिति है हमारे प्रतीकों की, देश में कही भी सत्य नहीं जीत रहा, जीत रहा है भ्रष्ट. तो क्या हमारे नए प्रतीक में सत्यमेव जयते कि जगह भ्रष्टमेव जयते नहीं हो जाना चाहिए.
आरोप है कि मैंने संसद को नेशनल टायलेट बना दिया है, पर अपने दिल से पूछिए कि संसद को नेशनल टायलेट किसने बनाया है? मैंने या फिर लोकतंत्र का मज़ाक उड़ाने वाले नेताओं ने, रुपये लेकर सवाल पूछने वाले जन प्रतिनिधियों ने, भारी भारी घोटाले करके भी संसद में पहुच जाने वाले लोगों ने और खुद को जनता का सेवक नहीं बल्कि राजा समझने वाले सांसदों ने.
आरजेडी सांसद राम कृपाल यादव राज्यसभा में ये कार्टून लहराकर बताते हैं कि लोकतंत्र का अपमान है. उन्हें लोकतंत्र का अपमान तब नज़र नहीं आता जब उन्हीं की पार्टी के राजनीती यादव उसी सदन में लोकपाल बिल की कापी फाड़ते हैं, जब उन्हीं की पार्टी के अध्यक्ष लालू प्रसाद खुले आम बयान देते हैं कि भारत में चुनाव मुद्दों से नहीं, धर्म और जाति के समीकरणों से जीते जाते हैं. जब पूरी संसद देश के १२५ करोड़ लोगों की भावनाओं से खिलवाड़ करके लोकपाल के नाम पर जोकपाल लेकर आती है और उसे भी पास नहीं होने देती.
मेरे एक और कार्टून पर लोगों को आपत्ति है जिसमे मैंने भारत माँ का गैंग रेप दिखाया है. दोस्तों कभी आपने सोचा है कि भारत माता कौन हैं? भारत माता कोई धार्मिक या पौराणिक देवी नहीं हैं, कि मंदिर बना कर उसमें अगरबत्ती सुलगाएं और प्रसाद चढ़ाएं. डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया में नेहरू जी लिखते है, “कोई और नहीं बल्कि हम आप और भारत के सारे नागरिक ही भारत माता हैं. भारत माता की जय का मतलब है इन्ही देशवासियों की जय..!और इसलिए इन देशवासियों पर अत्याचार का मतलब है भारत माता पर अत्याचार. मैंने वही तो कार्टून में दिखाया है कि किस तरह राजनेता और प्रशासनिक अधिकारी भारत माँ पर अत्याचार कर रहे हैं. फिर इसमें गलत क्या है. क्या सच दिखाना गलत है. अगर आपको इस तस्वीर से आपत्ति है तो जाइये देश को बदलिए ये तस्वीर अपने आप सुधर जायेगी.
और रही बात मेरी इंटेशन की तो ये कार्टून्स देखकर कोई बच्चा भी बता सकता है कि इनका कारण देशद्रोह नहीं देशप्रेम है और इनका मकसद हकीकत सामने लाकर लोगों को भ्रष्टाचार के खिलाफ एकजुट करना है..!
दोस्तों, आपसे अपील है कि मेरे ब्लाग cartoonsagainstcorruption.blogspot.com पर जाइये और देखकर बताइये कि क्या मैं देशद्रोही हूं.

आपका
असीम त्रिवेदी
9336505530
cartoonistaseem@gmail.com

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