बुधवार, 1 फ़रवरी 2012

भारतीय पत्रकारिता का उदय-२९ जनवरी "हिकीज गजट"



भारत में पत्रकारिता के प्रारंभिक स्वरूप तो पोराणिक काल से ही देखा जा सकता है। आदिकाल से ही भारत में वेद-पुराण, रामायण, महाभारत जैसे महाग्रंन्थो की रचना होती रही है। सन १५५० में पहला प्रिन्टिंग प्रेस मिशनरियों ने गोवा में स्थापित किया, इसके बाद ब्रिटिश भारत में १६७४ में बुम्बई में मुद्र्ण प्रेस की स्थापना हुई। अठारह्बी शताब्दी के अन्त तक भारत के प्राय: सभी प्रमुख शहरों में मुद्र्ण की ब्यवस्था हो चुकी थी । अत: भारत में सन १७६७ तक किसी भी समाचार पत्र के प्रकाशन के प्रमाण नही मिलते है। भारत में पत्रकारिता के विकास में किये गये प्रयासों के कारण हालेण्ड निबासी विलियम वोल्ट का नाम उल्लेखनीय है। विलियम वोल्ट ने सितम्बर, १७६८ मे कलकत्ता के कौंसिल हाल एवं प्रमुख स्थानों पर पेमप्लेट चिपकवाये। इस प्रकार वोल्ट ने पेमप्लेट के माध्यम से विचार अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता को प्रोत्साहित किया। विचार एंव अभिव्यक्ति की मांग करने वाला पहला शिकार बिलियम वोल्ट ही हुआ और सजा के रूप मे उसे देश से इग्लैण्ड मे निर्वासित करने का फरमान जारी कर दिया।
जैम्स हिकी ने २९ जनबरी १७८० को हिकीज गजट या "हिकीज बंगाल गजट आर दि आरिजिनल कैलकटा जनरल एड्वरटाइजर" नामक साप्ताहिक समाचार पत्र प्रारंम्भ किया। अत: इसी दिन से भारत मे पत्रकारिता का विधिबत प्रारंम्भ माना जाता है। हिकी ने यह साप्ताहिक अखवार दो पॄष्टीय तीन कालम में छापा, इस समाचार पत्र में व्रिटिश कम्पनी मे ब्याप्त भॄष्टाचार के खिलाफ जम कर लिखा गया। हिकी ने अपने समाचार पत्र के माध्यम से लोगों के व्यक्तिगत आचरण पर टिप्पणी करके उनकी अच्छी खबर ली। इस अखवार ने ब्रिटिश जरनल बारेन हेस्टिंग्स और उनकी श्रीमती के खिलाफ भी निन्दाजनक सूचनायें प्रेषित की। हिकी के इस आपत्तिजनक लेखन के कारण वारेन हेस्टिंग्स ने सन १७८१ मे इस अखवार के खिलाफ कडी कार्यबाही की और हिकी द्वारा ८०,००० रुपयों का जुर्माना अदा न करने पर जेल ने डाल दिया गया। हिकी ने जेल में भी रह कर ब्रिटिश सरकार की कटु आलोचना अपनें लेखों मे जारी रखी। जनबरी १७८२ में पुन: हिकी को एक बर्ष का काराबास तथा दो हजार रुपये जुर्माने की सजा दी गयी और मार्च में समाचार पत्र के टाइप एंब प्रकाशन सामग्री जप्त कर ली गयी। इस प्रकार यह समाचार पत्र सदैब के लिये बन्द हो गया। जैम्स हिकी ने ब्रिटिश शासन काल मे जब लोग अग्रेजों के खिलाफ एक शब्द बोलने के लिये हजार वार सोचते थे उस समय पत्रकारिता में इस तरह की निर्भीकता दिखाई काबिले तारीफ है। इस कलम के सिपाही को सादर नमन.....

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