गुरुवार, 2 फ़रवरी 2012

प्रधानमंत्री का मीडिया पर बाहरी नियंत्रण से इंकार/ काटजू -- मीडिया विमर्श विमोचन



प्रधानमंत्री का मीडिया पर बाहरी नियंत्रण से इंकार

नई दिल्ली, 2 जनवरी 2012 प्रधानमंत्री डाक्टर मनमोहन सिंह ने मीडिया पर किसी तरह के बाहरी नियंत्रण से इंकार करते हुए कहा कि देश का मीडिया पेड न्यूज जैसी बुराईयों पर खुद ही काबू पा सकता है। आज नई दिल्ली में दैनिक जागरण के संस्थापक श्री पूर्णचंद्र गुप्त के सम्मान में आयोजित समारोह को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि जब से हम आजाद हुये हैं तभी से मीडिया की भूमिका और उसके काम करने के तरीके पर हमारे देश में चर्चा होती रही है।
प्रधानमंत्री ने कहा कि मीडिया के उपर किसी तरह का बाहरी नियंत्रण नहीं लगाया जाना चाहिए, लेकिन मीडिया के प्रतिनिधियों को मिलजुल कर कोई ऐसा रास्ता निकालना चाहिए जिसमें निष्पक्षता और objectivity को बढ़ावा मिले और सनसनी कम हो सके। उन्होंने कहा कि हम उन मुद्दों का कवरेज बढ़ा सकते हैं जो हमारे देश के लिये वास्तव में महत्वपूर्ण है।
प्रधानमंत्री ने श्री पूरन चंद्र जी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर रोशनी डालते हुए कहा कि उन्होंने जीवन भर आजाद और बेबाक पत्रकारिता को बढ़ावा दिया। किसी भी लोकतंत्र के लिये इस तरह की पत्रकारिता बहुत आवश्यक है। उन्होंने खुशी जाहिर करते हुए कहा कि देश का मीडिया आम तौर से स्वतंत्र और जीवंत है। नई तकनीकी की वजह से प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया ने अपनी पहुंच बहुत बढ़ा ली है जो लोकतंत्र के लिये एक बहुत अच्छी बात है।

प्रधानमंत्री ने इस अवसर पर पूरन चंद्र जी के याद में एक डाक टिकट जारी किया। उन्होंने कहा कि पूरन चंद्र जी एक बहुत प्रतिभाशाली व्यक्ति थे। वे एक स्वतंत्रता सेनानी, एक क्रांतिकारी, एक पत्रकार और एक entrepreneur यह सभी थे। उन्होंने पत्रकारिता का रास्ता इसलिये अपनाया, कि वे भारत की जनता की सेवा कर सकें। महात्मा गांधी के civil disobedience movement के बाद उन्होंने एक राष्ट्रवादी अखबार की कल्पना की। 1942 में झांसी से उन्होंने ‘‘जागरण का प्रकाशन शुरू किया और उसके पहले संपादक भी बने।
इस अवसर पर सूचना प्रोद्योगिकी राज्यमंत्री सचिन पायलट और दैनिक जागरण पत्र समूह के और कई वरिष्ठ पत्रकार मौजूद थे।(पत्र सूचना कार्यालय द्वारा जारी प्रधामंत्री के संबोधन पर आधारित)

 

 

 

उम्मीदों के आगे बौना हमारा मीडिया

न्यायमूर्ति मार्कण्डेय काटजू/
बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे
बोल ज़बां अब तक तेरी है।
-फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
हाल ही में एक पत्रकार ने भारतीय पत्रकारों के बारे में मुझसे मेरी राय जाननी चाही। मैंने उस महिला पत्रकार से कहा कि यह सवाल मुझसे पूछने की बजाय आपको आमलोगों से पूछना चाहिए, लेकिन उन्हें बिना यह बताए कि आप भी पत्रकार बिरादरी की एक मेंबर हैं। हकीकत यही है कि अधिकतर लोगों की राय पत्रकार बिरादरी को बहुत सुखद नहीं लगेगी।
पिछले दिनों एक टीवी परिचर्चा के दौरान वरिष्ठ पत्रकार मधु किश्वर ने तो यहां तक कहा कि हमारे देश के पत्रकारों को मुफ्त मकान-जमीन आदि के आबंटन के रूप रिश्वतदी जा सकती है और उन्हें आसानी से राजीकिया जा सकता है। हालांकि मैं मधु किश्वर की इन बातों से पूरी तरह सहमत नहीं हूं। देश में ऐसे कई माननीय पत्रकार हैं, जो अपना काम बखूबी ईमानदारी से कर रहे हैं। लेकिन अनेक पत्रकारों के बारे में सार्वजनिक धारणाएं इससे अलग हैं।
पारंपरिक तौर पर मीडिया की दो तरह की भूमिका है। पहली, लोगों को खबरों से रू-ब-रू कराना यानी सूचना देना और दूसरी, उनका मनोरंजन करना। फिलहाल भारत संक्रमण के दौर से गुजर रहा है। हम अभी सामंती युग से आधुनिक युग की ओर बढ़ने के बीच में हैं। और इस दौर ने मीडिया की तीसरी भूमिका भी तय कर दी है। और वह है, वैचारिक नायकत्व की भूमिका। बहरहाल, जहां तक पहली दो भूमिकाओं की बात है, तो इसमें कोई संदेह नहीं कि मनोरंजन और सूचना पहुंचाने का काम मीडिया को करना ही चाहिए। परंतु, जब मीडिया 90 फीसदी मनोरंजन करे और महज 10 फीसदी हिस्से में वास्तविक और सामाजिक-आर्थिक मसले को उठाए, तो साफ है कि उसने अपने कर्तव्यों के अनुपात के मायने भुला दिए हैं।
अब भी हमारे देश की 80 फीसदी आबादी गुरबत की दिल दहला देने वाली जिंदगी जी रही है। बेरोजगारी, महंगाई, स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा से जुड़ी अनगिनत समस्याएं उनके साथ हैं। ऊपर से, सिर छिपाने के लिए लोगों के पास छत तक नहीं है। अब तक ऑनर किलिंगव दहेज हत्या जैसी सामाजिक कुरीतियों का उन्मूलन मुमकिन नहीं हो सका है। तब भी मीडिया कवरेज का 90 फीसदी हिस्सा फिल्मी सितारों, फैशन की नुमाइश, गीत-संगीत, रियलिटी शो, क्रिकेट इत्यादि से अटा-पटा रहता है। यदि मैंने इसके खिलाफ आवाज नहीं उठाई होती, तो यकीन मानिए सभी अखबारों के लिए एक फिल्म सितारे के बच्चे का हाल ही में हुआ जन्म पहले पन्ने पर बड़ी सुर्खी बटोरता, जबकि इसे अंदर के पन्नों में समेटा जाना चाहिए।
यह कटु सच है कि लाखों किसानों की जमीनें छिन चुकी हैं। वे अपनी आजीविका खो चुके हैं। अब वे शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। उन्हें उम्मीद है कि शहरों में नौकरी मिल जाएगी, जबकि ऐसा कतई नहीं है। ब्रिटेन में औद्योगिक क्रांति के दौरान विस्थापित किसानों को नव उत्पन्न उद्योगों में नौकरियां मिल गई थीं। लेकिन भारत में हाल के वर्षों में उत्पादन कम हुआ है। कई फैक्टरियों में ताले लग गए हैं। और अब उनके मालिक जमीन-जायदाद के धंधे में कूद पड़े हैं।
नतीजतन, अधिकतर विस्थापित किसान विवश होकर घरेलू नौकर बन गए हैं या फिर फेरीवाले का काम कर रहे हैं। यही नहीं बड़ी तादाद तो भिक्षावृत्ति को अपना पेशा बना चुकी है। ऐसे लोगों की भी संख्या कम नहीं है, जिन्होंने खुद को मजबूरन आपराधिक धंधे और वेश्यावृत्ति में उतार लिया है। कर्ज न चुकाने के चलते किसान खुदकुशी भी कर रहे हैं। पिछले 15 वर्षों में ढाई लाख किसान खुदकुशी कर चुके हैं। अब भी 86 करोड़ भारतीय रोजाना 25 रुपये से कम में गुजर-बसर करते हैं। यही नहीं, देश के 47 फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार हैं।
यह फीसदी अपने आप में भयावह और त्रासद है, क्योंकि उप सहारा व अफ्रीकी देशों मसलन, सोमालिया और इथियोपिया में भी आंकड़े इस स्तर तक नहीं पहुंचे हैं। एक तथ्य यह भी है कि अपने यहां गत 20 वर्षों में नाटकीय तौर पर अमीरों और गरीबों के बीच की खाई और चौड़ी हुई है।
जाहिर है, यह एक बदसूरत तस्वीर है। ऐसे में मीडिया द्वारा ज्यादा से ज्यादा फिल्मी खबरों को प्रकाशित-प्रसारित करने की प्रवृत्ति को क्या जायज ठहराया जा सकता है? क्या मीडिया जान-बूझकर देश की वास्तविक चुनौतियों से लोगों का ध्यान नहीं हटा रहा है? क्या भारतीय मीडिया की भूमिका फ्रांस की महारानी मेरी एंत्वानेत की तरह नहीं है, जो लोगों को यह सलाह देती थी कि अगर उनके पास रोटी नहीं है, तो वे केक खाएं? मीडिया में ज्योतिषी आधारित अंधविश्वासी बकबक तो खूब होती है, जबकि उसे तर्कसंगत व वैज्ञानिक विचारों को तरजीह देनी चाहिए। ऐसे में मीडिया की भूमिका क्यों जन-विरोधी नहीं है?
अलबत्ता, जहां तक मीडिया की तीसरी भूमिका की बात है यानी देश को वैचारिक नायकत्व प्रदान करने की, तो वह पूरी तरह से नदारद है। हमने देखा है कि यूरोप के अभ्युदय के दौरान मीडिया की भूमिका ऐतिहासिक और गरिमापूर्ण थी। उसने यूरोपीय समाज को सामंती युग से आधुनिकता की ओर ले जाने में मदद की। वॉल्टेयर, रूसो, थॉमस पाइने, जूनियस और जॉन विल्कस जैसे महान लेखकों ने धार्मिक कट्टरता और तानाशाही जैसी सामंती विचारधाराओं पर गहरे आघात किए। और फिर देश-दुनिया में आजादी, समानता, भाईचारा और धार्मिक स्वायत्तता की क्रांतिकारी विचारधारा का अलख जगाया। मैं चाहूंगा कि हमारा मीडिया भी मौजूदा भारत में उसी तरह की गरिमामयी भूमिका निभाए।
हालांकि कुछ लोग तर्क देते हैं कि लोग जो चाहते हैं, मीडिया उसे ही परोसता है। पर मैं इस राय से कतई सहमत नहीं हूं। मीडिया कोई सामान्य कारोबार नहीं, जो वस्तुओं की लेन-देन पर आधारित हो। यह विचारों से दो-चार होता है। इसलिए अत्यधिक पिछड़ी और जातिवाद, सांप्रदायिकता व अंधविश्वास में डूबी जनता की निम्न कोटि की पसंद की दलाली करने की बजाय मीडिया को उनके मानसिक स्तर को ऊपर उठाने पर जोर देना चाहिए। और यह तभी मुमकिन होगा, जब मीडिया उन तक तार्किक व वैज्ञानिक विचारों को पहुंचाए। और इस तरह से भारतीय जनता को प्रबुद्ध भारत का हिस्सा बनाए। जाहिर है, मीडिया अपने इस काम से ही भारतीय जनमानस का सम्मान पाएगा।
लेखक भारतीय प्रेस परिषद के चेयरमैन हैं.{दैनिक हिन्दुस्तान,3 जनवरी, 2012, से साभार}
January 2, 2012 at 10:04 amadmin

किसने कह दिया कि समाज का विश्वास नहीं रहा मीडिया पर !

मनोज कुमार / अरूण शौरी पत्रकार हैं या राजनेता, अब इसकी पहचान कर पाना बेहद कठिन सा होता जा रहा है। वे पत्रकार की जुबान बोल रहे हैं या राजनेता की, यह कह पाना भी संभव नहीं है। पिछले दिनों भोपाल में एक मीडिया सेमीनार में उन्होंने जो कुछ कहा, उसमें एक पत्रकार तो कहीं था ही, नहीं बल्कि एक राजनेता की भड़ास दिख रही थी। पता नहीं उन्हें क्या हो गया था, वे भी औरों की तरह मीडिया को कटघरे में खड़ा कर गये। वे अपनी रौ में कह गये कि मीडिया पर समाज विश्वास नहीं करता है। अरूण शौरी को कौन बताये कि जिस मीडिया पर आप सवाल उठा रहे हैं, वह मीडिया भी आपसे ही शुरू होता है। अरूण शौरी शायद यह भूल रहे हैं कि वे उसी समाज का हिस्सा हैं जहां उनकी बोफोर्स रिपोर्ट की गूंज दो दशक से ज्यादा समय से हो रही है। वे एक राजनेता के रूप में मीडिया की विश्ववसनीयता पर सवाल उठा सकते हैं किन्तु एक पत्रकार के रूप् में उन्हें यह कहना शोभा नहीं देता है।
मीडिया को अविश्ववसनीय कहने का मतलब है स्वयं को अविश्ववनीय बताना और हमारा मानना है कि अरूण शौरी अविश्ववनीय नहीं हो सकते। पत्रकार अरूण शौरी कतई अविश्वसनीय नहीं हो सकते हैं, राजनेता अरूण शौरी के बारे में कुछ कहना अनुचित होगा। अरूण शौरी जिस कद के पत्रकार हैं, उन्हें बहाव का हिस्सा नहीं बनना चाहिए। उन्हें ऐसा कुछ नहीं बोलना चाहिए जिससे अपनों को ठेस लगे लेकिन दुर्भाग्य से उन्होंने ऐसा ही सब कहा। वे जिस केन्द्र के आयोजन में बोल रहे थे, जो इस समय अनेक कारणों से चर्चा में है। इस मंच से ऐसे ही अमृत वचन की अपेक्षा थी, सो वे उनके मानस को शांत कर गये। लगभग एक दषक से मीडिया घोर आलोचना के केन्द्र में है। कुछ अपने कर्मों से तो कुछ दूसरों के रहम पर। मीडिया पर, पत्रकारों पर सवाल उठाने के बजाय उन मीडिया घरानों पर क्यों पत्थर नहीं उछाले जाते जो लोग अपने कारोबार को बचाने के लिये मीडिया को कारोबार बना दिया है। जिन लोगों का पत्रकारिता का क,,ग नहीं आता, वे लोग मीडिया हाउस बनाते हैं तो अरूण शौरी उन लोगों का विरोध क्यों नहीं करते।
पुरानों की बात छोड़ दें, नयी पीढ़ी को अरूण शौरी पत्रकारिता की शुचिता का पाठ क्यों नहीं पढ़ाते। अरूण शौरी अब महज एक पत्रकार नहीं हैं बल्कि अनुभव की एक पाठशाला हैं और पाठशाला ही जब सार्वजनिक मंच से अपनी ही आलोचना करेगा तो समाज का विश्वास उठना आवश्यक है। यह कम दुर्भाग्य की बात नहीं है कि अकेला पत्रकारिता एक ऐसा प्रोफेशन है जहां उनके गुरू सार्वजनिक रूप से स्वयं की आलोचना करते हैं। इसे भी सकरात्मक नजर से देखना चाहिए लेकिन बात केवल आलोचना तक ही रह जाती है। सुधार की कोई कोशिश किसी भी स्तर पर नहीं हो रही है, यह इससे भी बड़ा दुर्भाग्यजनक बात कहीं जानी चाहिए। मीडिया एवं मीडिया शिक्षण में आ रहे लोगों के पास प्रशिक्षण की कमी है। जिस तरह मीडिया में काम करने वालों को इस बात की समझ पैदा नहीं की जा रही है कि उनकी समाज के प्रति किस गंभीर किस्म की जवाबदारी है, उसी तरह मीडिया शिक्षकों के पास भी प्रशिक्षण की कमी है। मीडिया शिक्षकों के लिये अरूण शौरी सरीखे पत्रकार शिक्षण के काम आ सकते हैं।
सेमिनारों की संख्या में बढ़ोत्तरी करने के बजाय शिक्षण-प्रशिक्षण में समय और साध्य लगाना उचित होगा। अच्छा होता कि मंच से मीडिया की आलोचना करने के बजाय वे इसकी सुधार की बात करते। स्वयं कोई पहल करने का संदेष दे जाते। हम उम्मीद और केवल उम्मीद कर सकते हैं कि अरूण शौरी एवं उनके समकालीन पत्रकार पत्रकारिता की नवीन पीढ़ी को यह पाठ बार बार नहीं पढ़ाएगी कि मीडिया पर समाज का विश्वास उठ गया है बल्कि वह यह बताने की कोशिश करेगी कि समय के साथ मीडिया का विस्तार हुआ है और यह विस्तार दिशहीन है।
विस्तार को दिशा देने की जरूरत है। मंच पर खड़े होकर विलाप करने से मीडिया का भला नहीं होने वाला है और न ही समाज का। मेरा अपना मानना तो है कि समाज का विश्वास मीडिया पर और बढ़ा है और कदाचित इसी विश्वास के कारण मीडिया की छोटी सी छोटी भूल को भी समाज चिन्हित करता है ताकि मीडिया सजग और सबल बने। इस बात को सभी को समझना होगा। स्वयं अरूण शौरी जी को भी। और उन लोगों को भी जिन्हें मंच और माईक मिलते ही मीडिया की आलोचना करने पर टूट पड़ते हैं। मैं उन सब लोगों से आग्रह करूंगा कि वे लोगों के बीच जाएं और बतायें कि एक सिंगल कॉलम की खबर लिखने में एक पत्रकार को कितनी मेहनत करनी होती है।
एक पत्रकार सुविधाभोगी नहीं है और नहीं हो सकता है यदि वह ताउम्र मीडिया में है तो। इस बहाने राजेन्द्र माथुर और प्रभाष जोशी को याद कर लीजिये। और पहले जाएं तो पराड़करजी का भी स्मरण करना उचित होगा। मायाराम सुरजन भी इसी कड़ी में एक नाम हैं। नीरा राडिया प्रकरण में उछलन वाले नाम पर आरोप तो दागे गये लेकिन वे आज किसी न किसी माध्यम में बैठे हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि समाज ने उन्हें अस्वीकार नहीं किया है। ऐसे में समाज का मीडिया पर से विश्वास उठ जाने की बात निराधार है। अरूण शौरी जी एक राजनेता के रूप् में मीडिया अविश्वासीनयता की बात करते हैं तो ठीक है लेकिन पत्रकार अरूण शौरी ऐसा कहते हैं तो उन्हें एक बार फिर सोचना होगा कि सच क्या है।

 

मीडिया विमर्श के वार्षिकांक का लोकार्पण 5 जनवरी को


रायपुर। जनसंचार के सरोकारों पर केंद्रित त्रैमासिक पत्रिका मीडिया विमर्श के पांच साल पूरे होने पर रायपुर में मीडिया और लोकतंत्र विषय पर एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया है। इस अवसर मीडिया विमर्श के वार्षिकांक का विमोचन भी होगा तथा राज्य के कई वरिष्ठ पत्रकारों को सम्मानित भी किया जाएगा।
कार्यक्रम का आयोजन 5 जनवरी को सिविल लाइंस स्थित वृंदावन हाल में सांय चार बजे किया गया है। कार्यक्रम के मुख्यअतिथि सांसद और भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता प्रकाश जावडेकर होंगें तथा मुख्यवक्ता माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के कुलपति प्रो. बृजकिशोर कुठियाला होंगें। यह जानकारी देते हुए पत्रिका के प्रबंध संपादक प्रभात मिश्र ने बताया कि आयोजन के विशिष्ट अतिथि के रूप में गृहमंत्री ननकीराम कंवर, कृषि मंत्री चंद्रशेखर साहू, कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय, रायपुर के कुलपति डा. सच्चिदानंद जोशी और हिंदी की प्रख्यात साहित्यकार श्रीमती जया जादवानी संगोष्ठी में लेंगें। आयोजन छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश के अनेक साहित्यकार, पत्रकार, मीडिया शिक्षक और शोधार्थी हिस्सा लेगें।
मीडिया विमर्श का वार्षिकांक

इस बार जनसंचार के सरोकारों पर केंद्रित त्रैमासिक पत्रिका मीडिया विमर्श के पांच साल पूरे होने पर निकाला गया वार्षिकांक सोशल नेटवर्किंग साइट्स और उनके सामाजिक प्रभावों पर केंद्रित है। इस आवरण कथा का प्रथम लेख माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल के कुलपति प्रो. बृजकिशोर कुठियाला ने लिखा है, जिसमें उन्होंने सोशल नेटवर्किंग साइट्स के सकारात्मक पक्ष पर प्रकाश डालते हुए इसके सार्थक उपयोग की चर्चा की है।
पत्रिका के सोशल नेटवर्किंग साइट्स , चर्चा में शामिल होकर अनेक वरिष्ठ पत्रकारों, मीडिया प्राध्यापकों, चिंतकों एवं शोध छात्रों ने अलग-अलग विषय उठाए हैं। जिनमें प्रमुख रूप से प्रकाश दुबे, मधुसूदन आनंद, कमल दीक्षित, वर्तिका नंदा, विजय कुमार, प्रकाश हिंदुस्तानी, राजकुमार भारद्वाज,डा.सुशील त्रिवेदी,विनीत उत्पल, शिखा वाष्णेय, धनंजय चोपड़ा, संजय कुमार, अंकुर विजयवर्गीय, संजना चतुर्वेदी, कीर्ति सिंह, संजय द्विवेदी, आशीष कुमार अंशू, सी. जयशंकर बाबू ,बबिता अग्रवाल, रानू तोमर, अनुराधा आर्य, शिल्पा अग्रवाल, जूनी कुमारी, एस.स्नेहा, तृषा गौर के नाम शामिल हैं।
इसके अलावा इस अंक में भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष मार्कंडेय काटजू के बयानों से उत्पन्न विवाद पर एनके सिंह और डा. श्रीकांत सिंह की महत्वपूर्ण टिप्पणी प्रकाशित की गयी है। हिंदी को सरल बनाने के भारत सरकार के गृहमंत्रालय की पहल पर प्रभु जोशी की एक विचारोत्तेजक टिप्पणी भी इस अंक की उपलब्धि है, जो सरलता के बहाने हिंदी पर अंग्रेजी के हमले की वास्तविकता को उजागर करती है।
पत्रिका के कार्यकारी संपादक संजय द्विवेदी है । पत्रिका का मूल्य 50 रूपए है ।



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