गुरुवार, 2 फ़रवरी 2012

बाजार की देन है मीडिया की ‘‘भाषा’’


 

संदीप कुमार श्रीवास्तव
समय जो है वह अपने हर पल का इतिहास लिखता है। और आने वाले कल के पथ का संधान भी करता है। वक्त की इस सृजनात्मक प्रक्रिया का फिलहाल अब तक का सबसे महत्वपूर्ण सहचर ’’मीडिया’’ ही है। मीडिया का एक मिशन रहा करता था कि वह समाज की सही तस्वीर पेश करें और उसके साक्ष्य को आधार बनाकर समय अपने मुहाने का इतिहास लिख सकें। यहां था का होना थोड़ा सा आश्चर्य पैदा कर सकता है लेकिन सत्यता तो यही है। आज मीडिया मिशन से पृथक मूलतः एक व्यावसायिक उपक्रम बनकर रह गया है।
इस व्यावसायिकता के दबाब में प्रिंट मीडिया जहां एक ओर अपने उत्तरदायित्वों से हटकर अपने बिकाऊ होने की तस्वीर रच रहा है वहीं दूसरी ओर इलेक्ट्रानिक मीडिया का पिछलग्गू बना हुआ है। इलेक्ट्रानिक मीडिया का पिछलग्गू होने का सीधा सा तात्पर्य है कि कुछ देह दर्शना छवियों को प्रथम पृष्ठ की ओर खींचों और यौन कुंठित मानसिक प्रवृति के पाठकों को जितना सम्भव हो उतना बेचो , और बौद्धिक चेतना से समर्थ पाठकों को यौन कुठित बनाने की चेष्ठा करों। कुछ अखबार तो इस हइ पर भी उतर आये हैं कि देह की नग्नता को आंखों की चाकलेट ;आई कैण्डी कहकर अखबार के पन्नों पर चश्पा कर देते हैं। पर विडम्बना महज इतनी ही नहीं है कि प्रिन्ट मीडिया नग्नता और स्त्री देह की उत्तेजक छवि को प्रथम पृष्ठ पर परोसने को उत्सुक है बल्कि सबसे ज्यादा दुखद भाषा और साहित्य को नष्ट करने वाली आज की अखबारी सोच है।
आज से लगभग दस साल पहले मैंने अपने भाषा के संस्कार हिन्दी के अखबार पढ़ कर ही हासिल किया था पर अफसोस कि हम जैसे-जैसे तकनीकी विकास करते जा रहे हैं वैसे-वैसे हमारी रचना प्रक्रिया अपने भाषाई शिल्प और व्याकरण सम्मत संस्कार भी खोती जा रही है। हमारी अखबारी भाषा सरलता और सहजता के नाम पर फुटपाथी भाषा का शिकार हुयी। चलताऊ शब्दों को जैसा का तैसा लिखने की प्रवृत्ति ने विकसित भाषा के पाठकों को हर सम्भव तरीके से व्याथित किया। इसकी शुरूआत प्राथमिक तौर पर कुछ छोटे-छोटे अखबारों ने की जिनका उद्देश्य सिर्फ इतना था कि ऐने-केन प्रकारेध बस और ट्रेन का इन्तजार कर रहे तथाकथित साक्षर किस्म के पाठकों के मस्तिष्क पर अपनी चटपटी शब्दावली से क्लिक किया जाय और झटके से एक रूपये का सिक्का उनकी जेबों से निकाल लिया जाये।
छोटे अखबारों की यह बाजारू सोच धीरे-धीरे व्यावसायिक सफलता प्राप्त करने में समर्थ होती गयी लटके-झटके वाली भाषा की इस सफलता ने धीरे-धीरे अच्छी रचनात्मक सोच के अखबारों को भी अपनी चमत्कार पूर्ण भाषा के मोह जाल में फंसाने का उपक्रम शुरू कर दिया। परिणामतः हिन्दी अखबारों के भाषायी मुहावरे, अलंकारिक शब्दावली , कावयात्मक रचानात्मक जैसी शिल्पगत अवधारणा विखण्डित होती चली गयी।
समय के साथ हम भाषा विखण्डन के उस मुहाने पर आ गये हैं जहां अखबार ने हिन्दी भाषा पर ऐसा संकट खड़ा कर दिया है कि यदि तमाम मीडिया सहचरों ने अपनी भाषा को बचाने के लिए आन्दोलनात्मक प्रयास नहीं किया तो आने वाली पीढ़ी के बहुत से शब्दों को जान ही नहीं सकेगी। आज कुछ अखबार एक ऐसी भाषा गढ़ने में लगे हुए हैं जहां सरलता के लिए बहुतेरे अंग्रेजी शब्दों को देवनागरी लिपि में चस्पा कर लिया गया है।
यह देखने और पढ़ने में कितना भी आर्कषक क्यांे न लगे पर इसका खतरा हिन्दी और अंग्रेजी दोनों ही भाषाओं के लिए भयावह है। अंग्रजी अखबार फिलहाल आज भी अपनी भाषा की शुच्छता के प्रति फिक्रमन्द हैं पर हिन्दी के अखबार नवीस हीन भावना के शिकार हैं। इस हीनता बोध में उन्होंने स्वयं ही यह अवधारणा बना ली कि हिन्दी पिछड़ों गवारों की भाषा है इसका व्यावसायिक लाभ भी न के बराबर है पर यह सोच ठीक नहीं है। हिन्दी की मजबूरी या कमजोरी महज इतनी ही है कि वह ऐसे कमजोर लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषा है जो किसी भीड़ में अपनी मां को मां कहने में सिर्फ इसलिए कतरा जाते हैं कि उनकी मां की धोती साड़ी में न तो क़ल्फ किया गया है न उस पर सेन्ट छिड़का गया है। हिन्दी को यह तकलीफ उसी देश में उठानी पड़ रही है जहां कथित तौर पर उसे राष्ट्रभाषा और राजभाषा का दर्जा प्राप्त है। क्या हम तमाम आंचलिक भाषा के लोगांे का अपनी मातृभाषा के प्रति लगाव देखकर भी कुछ नहीं सीख सकते। तमिल ,मराठी , उड़िया , बंगाली हर भाषा का आदमी अपनी भाषा में अपने स्वाभिमान अपने अस्तित्व की महक खोजता है। अपने होने की अर्थवत्ता साबित करता है। समझ में नहीं आता कि आखिर हिन्दी भाषी स्वाभिमान कैसे इतना कमजोर हो गया है।
शिल्प के साथ सोच के स्तर पर भी आज हिन्दी अखबारों में गिरावट आ रही है। हम जो स्वय्र को लोकतंत्र का चतुर्थ खंभा कहने में अपनी छाती चैड़ी करते नहीं थकते। आज तमाम लोक-तांत्रिक मूल्यों की रक्षा करने में भी अक्षम साबित हो रहे हैं। जनकवि गोरख पाण्डेय ने कभी मीडिया के भविष्य पर कयास लगाते हुए लिखा था कि -
’’इक्कीसवीं सदी की सुबह
क्या होगा अखबार पर
खून के धब्बे
या कबूतर
क्या होगा
उन अगले सालों की
शुरूआत पर लिखा।’’
जिसका सीधा सा तात्पर्य था कि समाज को हमसे उम्मीद थी कि हम इक्कीसवीं सदी की सुबह शांति के अभ्युदय से करेंगे पर हमने वहीं किया जिसका समाज को हमसे भय था हम नरपुण्डों की माला थामें अखबार को खून की छींटों से तर-बतर करने में कुछ इस तरह मशगूल हुए कि हमारी सृजनात्मकता चेतना ही कुंद हो गयी। फिलहाल सृजनात्मक का यह बिखराव भाषा का विखराव हमारे लिये बेहतर नहीं है , पर रचनात्मक उम्मीदें सहजता से खत्म नहीं होती और मैं भी अभी नाउम्मीद नहीं हूं। बस आप सब से गुजारिश है कि अपनी भाषा और अपनी सृजनात्मक चेतना की अश्रुण्ता के प्रति आगे आइये ताकि हम समय के इस मुहाने पर एक क्रांितकारी परिवर्तन का नाद भर सकें और अखबार को विवेकशील साहित्य का सहचर बनाने के लिए उद्यत हों।


लेखक :- संदीप कुमार श्रीवास्तव
स्ंपादक-जनसंचार विमर्श शोध पत्रिका और अतिथि प्रवक्ता -स्कूल आफ फिल्म एण्ड मास कम्यूनिकेशन
शियाटस, इलाहाबाद।
e-mail- sandeepkumarsri@gmail.com

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