बुधवार, 1 फ़रवरी 2012

रेडियो का अविष्कार


Transmission
Invention & Transmission
रेडियो का अविष्कार
 शुरूआती दौर से लेकर आज तक रेडियो प्रसारण में कई अमूलचूल परिवर्तन हुए हैं। रेडियो के अविष्कार में इटली के वैज्ञानिक गुगलीमो मारकोनी ने महत्वपूर्ण योगदान दिया। सन् 1895 में मारकोनी ने वायरलेस संदेश को इलेक्ट्रो मैग्नेटिक तरंगो द्वारा प्रसारित करने में सफलता हासिल की। सन् 1906 में डॉ. ली डी फारेस्ट ने एक वैक्यूम ट्यूब का अविष्कार किया, जिससे ध्वनि प्रसारण संभव हुआ। यही वजह है कि डॉ.फारेस्ट को रेडियो का पिता कहा जाता है। पहली बार अमेरिका में सन् 1912 में वायरलेस को रेडियो का नाम दिया गया। सर्वप्रथम सरकारी अनुमति प्राप्त पहला रेडियो स्टेशन  15 सितम्बर 1921 में अमेरिका में शुरू हुआ। इंग्लैण्ड में 14 नवम्बर 1922 में ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कंपनी को प्रसारण करने की अनुमति दी गई। लगभग 60 हजार पौंड की पूँजी लगाकर इस कंपनी से प्रसारण की शुरुआत बीबीसी (ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कार्पोरेशन) नाम से हुई। बीबीसी के पहले जनरल मैनेजर जेसीडब्ल्यू रीथ बने। जो बाद में लॉर्ड रीथ के नाम से प्रचलित हुए। रेडियो प्रसारण सिद्धांत पर कार्य करने वाले टेलीफोन ने समुंद्री यातायात, सैनिक संचार और प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
 रेडियो प्रसारण के लिए एक विशेष प्रकार के कमरे की स्थापना की गई, जिसे आज हम स्टूडियो के नाम से जानते हैं। यहां बैठकर बोलने वाले व्यक्ति के सामने एक माइक्रोफोन लगा होता है। माइक्रोफोन में आवाज से उत्पन्न होने वाले कंपन, विद्युतीय आवेगों में परिवर्तित हो जाते हैं, उसके बाद इन कंपन को एम्प्लीफायर द्वारा ट्रांसमिशन केन्द्र में एम्प्लीफाइड कर तरंगों के माध्यम से प्रसारित कर दिया जाता है। सामान्यतः हमारी आवाज की गति 345 मी@से. होती है। लेकिन रेडियो तकनीक द्वारा इस गति को बढ़ाकर लगभग 1 लाख 85 हजार मील@प्रति सेकन्ड कर दिया जाता है। यही वजह है कि आवाज को विद्युत शक्ति द्वारा रेडियो तरंगों मेंं परिवर्तित करके मीलों दूर बैठे श्रोता द्वारा सुना जा सकता है।
ट्रांसमीटररेडियो प्रसारण में तीसरा पड़ाव ट्रांसमीटर होता है। प्रत्येक रेडियो प्रसारण केन्द्र मंे एक ट्रांसमीटर लगा होता है, जिसके द्वारा तरंगों को प्रसारित किया जाता है। कई बार यह ट्रांसमीटर केन्द्र से बाहर भी बनाए जाते हैं। लेकिन इस स्थिति में केन्द्र से ट्रांसमीटर तक सिग्नल को फोन की लाइन द्वारा भेजा जाता है। इतनी दूरी तय करने के कारण सिग्नल का हृास होता है। इसलिए ट्रांसमीटर तक पहुंचने से पहले सिग्नल को पुनः वर्धित किया जाता हैै। ट्रांसमीटर का कार्य ध्वनि तरंगों को शक्तिशाली बनाने के साथ-साथ क्वाट्र्ज क्रिस्टल द्वारा निकले रेडियो करंट को बूस्ट करना होता है। ट्रांसमिशन के अंतिम चरण में ध्वनि तरंगों को रेडियो करंट में समाहित करने का कार्य ट्रांसमीटर द्वारा किया जाता है। इस प्रक्रिया को मोड्यूलेशन कहते हैं। मोड्यूलेशन के बाद रेडियो करंट और ध्वनि तरंगों को फीटर लाइन द्वारा एंटीने में पहुंचाया जाता है,जहां से यह तरंगें लगभग 20 करोड़ मीटर प्रति सेकण्ड की गति से चारों ओर फैल जाती हैं। जैसे ही हम रेडियो सेट को आॅन कर फ्रीक्वेंसी सेट करते हैं तो निश्चित स्टेशन से प्रसारित होने वाले कार्यक्रमों को सुन पाते हैं। रेडियो प्रसारण में फ्रीक्वेंसी का महत्वपूर्ण कार्य होता है। फ्रीक्वेंसी का निर्धारण अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर किया जाता है ताकि किसी अन्य रेडियो चैनल का प्रसारण बाधित न हो। 500 से 1600 किलो साइकल की रेंज को मीडियम वेव बैंड और 2.5 से 22 मेगा साइकल की रेंज को शॉर्ट वेव बैंड कहा जाता है।
रेडियो रिसीवर
रेडियो प्रसारण केन्द्र से आने वाली तरंगों को रिसीवर द्वारा सुना जाता है। रिसीवर में तरंगों को ग्रहण करने के लिए एक एरियल लगा होता है,जब एरियल से रेडियो तरंगें टकराती हैं तो उसमें सिग्नल बोल्टेज उत्पन्न होता है। जिसके परिणाम स्वरूप रेडियो स्टेशन केन्द्र से प्रसारित सिग्नल एरियल के माध्यम से रेडियो रिसीवर मंे आ जाते हैं। रेडियो सेट में फ्रीक्वेंसी सेट करने के लिए एक ट्यूनर लगा रहता है जो कि चयन की गई फ्रीक्वेंसी के प्रोग्राम को स्पीकर के माध्यम से श्रोता के कानों तक पहुंचा देता है। चयनित किए गए स्टेशन की तरंगों को ट्यूनर डिटेक्टर में भेज देता है जो रेडियो तरंगों को पुनः ध्वनि रूप में परिवर्तित कर देता है। तत्पश्चात् ध्वनि तरंगों को एम्पलीफायर द्वारा बूस्ट कर लाउड स्पीकर में भेज दिया जाता है। यहां रेडियो प्रसारण की प्रक्रिया पूर्ण होती है।
रेडियो स्टूडियो रेडियो प्रसारण का प्रथम चरण स्टूडियो से शुरू होता है। स्टूडियो प्रसारण केन्द्र का विशेष कक्ष होता है जहां उद्घोषक किसी कार्यक्रम की प्रस्तुति करता है। स्टूडियो हमेशा ध्वनि प्रतिरोधक (साउंड प्रूफ) एवं इको रहित होता है। स्टूडियो मंंे जरुरत के अनुसार माइक्रोफोन लगे होते हैं जो किसी भी आवृति की ध्वनि तरंगों को विद्युत तरंगों में परिवर्तित करने का कार्य करते हैं। यह विद्युत तरंगें प्रसारण के बाद जब हमारे रेडियो में लगे स्पीकर तक पहुंचती हैं तब इन्हें पुनः ध्वनि तरंगों में परिवर्तित कर दिया जाता है। स्टूडियो मंे आवाज को नियंत्रित करने के लिए उद्घोषक के सामने एक कंसोल लगा होता है इसके अलावा आॅडियो टेप पर रिकॉर्ड किए गए कार्यक्रमों को चलाने के लिए टेप डैक, ग्रामोंफोन रिकॉर्ड को चलाने के लिए टर्न टेबल और सीडी को चलाने के लिए एक सीडी प्लेयर लगा होता है। साथ ही प्रसारित होने वाले फोन इन जैसे कार्यक्रमों के अनुरूप स्टूडियो में टेलीफोन भी लगे होते हैं। जिस कार्यक्रम को प्रसारित किया जाना है उसके समय का निर्धारण पहले ही कार्यक्रम विभाग में कर लिया जाता है। इन कार्यक्रमों को उद्घोषक अपनी आवाज के साथ चलाकर और अधिक रोचक बनाने का कार्य करता है।
कंट्रोल रूमरेडियो प्रसारण में स्टूडियो के बाद कंट्रोल रूम का कार्य शुरू होता है। यह कक्ष अधिकांशतः प्रसारण केन्द्र के बीचोंं-बीच स्थित रहता है। कंट्रोल रूम से सभी स्टूडियो जुड़े रहते हैं। नियंत्रण कक्ष में भी स्टूडियो की तरह आॅडियो कंसोल के अतिरिक्त मिक्सर लगे रहते हैं अर्थात् कंट्रोल रूम से भी स्टूडियो की तरह आवाज के पिच,वाल्यूम और टैम्पो को नियंत्रित किया जा सकता है। इसके अलावा कंट्रोल रूम से सीधे प्रसारण भी किया जा सकता है। उदाहरण के लिए किसी क्षेत्रीय प्रसारण केन्द्र से राष्ट्रीय प्रसारण केन्द्र के कार्यक्रमों को प्रसारित करने के लिए कंट्रोल रूम का स्टूडियो से सम्बन्ध तोड़ कर सीधे राष्ट्रीय प्रसारण केन्द्र से जोड़ दिया जाता है।

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