गुरुवार, 2 फ़रवरी 2012

अयोध्या विवाद : मीडिया का संयम और एक नई सुबह





प्रीति /

30 सितम्बर को अयोध्या विवाद पर फैसले को जानने को उत्सुक हर एक दिल था हर एक साँस थमी थी.कुछ इस उलझन में थे की क्या फिर से वही दोहराया जाने वाला है जो आज से 20 साल पहले दोहराया गया था?शंशय की स्थिति बनी हुई थी दिलो में घबराहट भी थी. पर बधाई हर उस व्यक्तिऔर संस्थाको जिन्होंने अपनी हर छोटी बड़ी ज़िम्मेदारी को निभाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. सोसिअल नेट्वोर्किंग साईट से लेकर हर मिलने जुलने वालो को भी इसके प्रति संयम बरतने की सलाह देते दिखे लोग और इन सबके बीच सबसे ज्यादा बधाई हमारी मीडिया को.पहली बार ऐसा लगा की मीडिया को अपनी ज़िम्मेदारी का अहसास है की वो जो भी करती है, कहती है उसका क्या असर होता है ? वरना अक्सर यही देखने को मला है की थोड़ी सी वाहवाही के लिए मीडिया ने अपने सरे उसूलो को ताक पर रख कर सिर्फ चटपटी खबरों को ही बाटा है..शायद कलम की ताकत वो भूल ही गई थी..पर इस बार उसने इतना संयम बरता.. न तो कहीं हुई हिंसा की तस्वीरों को दिखा कर लोगो को उकसाने की कोशिश की और न ही ये पूछते नज़र आये की “इस फैसले से आपको कैसा लग रहा है”. बधाई के पत्र सभी धार्मिक संघठन भी रहे और राजनितिक भी जिन्होंने न तो कोई भरकाउ भाषण दिया और न ही देश की कानून व्यवस्था पर उंगली उठाई…इसका सीधा सा अर्थ ये निकाला जाये की देश बदल रहा है और देश की दिशा तय करने वाले बदल रहे हैं.देश की सोच भी शायद हमारे युवाओ की तरह युवा हो रही है . इस बधाई के पात्र हमारी युवा पीढ़ी भी है.जिन्होंने यह साबित कर दिया है की तरक्की ही उनके लिए मायने रखती है और उन्हें ये अच्छी तरह से पता है की ये समय इन मसलो में उलझ कर देश को २० साल पीछे लेकर जाने का नहीं बल्कि अपने दिमाग को खुला रख कर सही दिशा में सोचने का है.धार्मिक वो भी हैं पर धार्मिक होने का मतलब उनके लिए धर्म के नाम पर मरना मारना कतई नहीं.धर्म का मतलब सिर्फ अपनी संस्कृति और अपनी सोच.इसके लिए थोडा बदलाव भी लाने को तैयार है.पुरानी खिची हुई लाइन पर आँख मुंद कर चलने को वो बिलकुल तैयार नहीं..उसे कोई वाद विवाद नहीं चाहिए सिर्फ तरक्की और विकास..फिर भी ये लड़ाई अभी पूरी नहीं हुई है और इसमें एक बार फिर से घी दाल कर सुलगाने की कोशिश शुरू हो गई है..आखिर वोट भी चाहिए और नाम भी कमाना है.और फिर पता नहीं इतना अच्छा मुद्दा हाँथ में आये या न आये.कुछ लोगो ने हमारे संयम को हिलाने की कोशिश शुरू कर दी है.उन्हें तो बस एक दरार दिखनी चाहिए कहीं, ताकि सयम की ईमारत गिराने का काम वो कर सके. ये जीत मंदिर या मस्जिद से कहीं बढ़ कर हमारी तरक्की और हमारी नई शुरुआत की है.अगर आज हम जीत गए तो कल हमारा है वरना शायद फिर से हम बस कुछ लोगो के हांथो की कठपुतलियां बने रहने पर विवश पाएंगे खुद को.अब देखना ये है की जीत किसकी होती है हमारे संयम की या उनके इरादों की.आज बस यही सोच कर खुद को मजबूती से एक दुसरे के साथ खड़ा रखना है की…छोडो कल की बातें कल की बात पुरानी..नए दौर में हम लिखेंगे मिलकर नहीं कहानी…
——–
संपर्क-ppakhi@gmail.com

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें