बुधवार, 1 फ़रवरी 2012

गांधी जी का 'हिंद स्‍वराज' और रंगमंच



शिरोमणि पत्रकार अजीत भट्टाचार्य

Sunday, 17 April 2011 18:30 हरिवंश 
हरिवंश
जिन श्रेष्ठ पत्रकारों ने रास्ता दिखाया, स्नेह दिया और हर अंधेरे में ताकत दी, उनमें से एक-एक कर गुजर रहे हैं. शिरोमणि पत्रकार अजीत भट्टाचार्य का निधन एक ऐसे ही प्रकाश स्तंभ का बुझना है. प्रभाष जी के अप्रत्याशित और अचानक निधन के बाद अजीत बाबू का जाना, एक दौर का अवसान है.
वह दौर जिसने पत्रकारिता को बदलाव का माध्यम माना. अपने समय, देश और काल की परिस्थितियों में हस्तक्षेप का माध्यम बनाया. अपने पारदर्शी और प्रामाणिक कामकाज से हालात में बदलाव की कोशिश की. तब हम विद्यार्थी थे. सन 1976-77 की बात है. जेपी (इवरीमैन और प्रजानीति) साप्ताहिक प्रकाशन शुरू कर रहे थे.बदलाव की ताकतों और आंदोलन की बात कहने के लिए.तब पढ़ा कि मुंबई टाइम्स ऑफ इंडिया से वरिष्ठ पत्रकार अजीत बाबू नौकरी छोड़ कर इसके संपादन में लगेंगे.
उनके प्रति, उनसे मिले बगैर पहली श्रद्धा की यह शुरुआत थी. विद्रोह और बगावत का रास्ता चुनना, कितना कठिन होता है, यह बाद में जाना. पर तब इतना ही समझ सका कि श्रेष्ठ अंगरेजी दैनिक टाइम्स ऑफ इंडिया, जो वेतन और सुविधाओं की दृष्टि से भी सबसे बेहतर, प्रामाणिक और श्रेष्ठ संस्थान था, छोड़ कर एक आदमी कैसे अनिश्चित डगर पर पांव रखता है.
पत्रकारिता वैसे भी जोखिम भरा पेशा है.तब और था. नौकरी के स्थायित्व और वेतन, सुख-सुविधाओं की दृष्टि से सबसे उपेक्षित.फिर भी टाइम्स ऑफ इंडिया की नौकरी तब सर्व श्रेष्ठ मानी जाती थी. सुरक्षित भी.उसे छोड़ कर अपनी आत्मा की आवाज सुनना और उस पर चलना कठिन था.वह राह अजीत बाबू ने चुनी.इससे भी बड़ा जोखिम का काम था, तत्कालीन सर्वसत्तावादी और एकछत्र सत्ता आतंक के खिलाफ खड़ा होना. इंदिरा गांधी और संजय गांधी के उदय का दौर था.अजीत बाबू का जो पहला लेख पढ़ा था,आज बरबस वह याद आया. 12 जून 1975 को (शायद) इंदिरा गांधी के खिलाफ इलाहाबाद हाइकोर्ट का फ़ैसला आया.
उस दिन तीन महत्वपूर्ण घटनाएं एक साथ हुई थीं, जिन्होंने देश की राजनीति पर असर डाला. अजीत बाबू ने उस लेख में लिखा था कि उस दिन वह जेपी के साथ गर्म और तपती धूप-लू में आरा (शायद) की यात्रा पर थे. एक पत्रकार कैसे अपने कन्विक्शन (आस्था) को तरजीह देता है, सब कुछ छोड़ कर, इस राह के वह अगुवा लोगों में थे.संयोग से कुछेक वर्ष बाद ही टाइम्स ऑफ इंडिया मुंबई में ट्रेनी जर्नलिस्ट के रूप में (हिंदी) चुना गया. वहां बड़े-बड़े पत्रकार-संपादक पढ़ाने आते थे.
एक दिन अपने कोर्स डायरेक्टर पतंजलि सेठी से अनुरोध किया कि क्या वह अजीत बाबू को हम छात्रों से बातचीत के लिए आमंत्रित करेंगे?यह थी हम युवा पत्रकारों पर अजीत बाबू की छाप. फिर उनसे लंबा संपर्क बना, उनके साथ कई यात्राएं की. शिविर में रहे. वह, प्रभाष जी और न्यायमूर्ति पीवी सावंत (अवकाशप्राप्त सुप्रीम कोर्ट के जज और प्रेस कौंसिल के पूर्व चेयरमैन) कई बार प्रभात खबर के निमंत्रण पर रांची आये. जेपी के गांव में हमने उन्हें जेपी मेमोरियल लेक्चर देने के लिए आमंत्रित किया.
वे गांव आये, असुविधाओं के बीच रहे, गांधीवादी पत्रकार, नितांत सादा रहन-सहन, खान-पान, पर अत्यंत सजग और सावधान दृष्टि. जेपी की प्रामाणिक जीवनी लिखनेवालों में से वे एक थे. शेख अब्दुल्ला और कश्मीर पर अत्यंत प्रामाणिक काम उन्होंने किया था. उनकी शिक्षा-दीक्षा, विद्यार्थी जीवन की शुरुआत तत्कालीन पश्चिम भारत (अब पाकिस्तान) में हुई.वह जब प्रेस इंस्टीटय़ूट ऑफ इंडिया के डायरेक्टर बनें, तो ग्रासरूट की पत्रकारिता प्रशिक्षित और मजबूत बनाने का अभियान चलाया.
हिंदी विदुरा (पत्रकारिता विधा की एक मात्र प्रामाणिक पत्रिका) के हिंदी संस्करण के संपादन का दायित्व मुङो दिया. यह जानते हुए भी कि मैं दिल्ली से दूर हूं. मेरी सीमा है. पर उनका तर्क था कि पत्रकारिता को मांजने, संवारने और बेहतर करने का काम ग्रामीण इलाकों से ही किया जाना चाहिए. ग्रामीण क्षेत्र ही असली भारत है. देश दिल्ली में नहीं बसता.उनका पैशन था कि ग्रामीण पत्रकार को कैसे श्रेष्ठ ट्रेनिंग दी जाये.इस सिलसिले में वे कई बार  प्रभात खबर आये और पत्रकारों के प्रशिक्षण में भाग लिया.एक बार वह आये, तब बुंडू में एक व्यक्ति नरेगा स्कीम के तहत समय से मजदूरी न मिलने के कारण आत्महत्या कर चुका था.उन्हें खबर की जानकारी मिली. उन्होंने कहा, अगली सुबह मैं अकेले उस गांव में जाना चाहूंगा.
साथ में केवल एक क्षेत्रीय संवाददाता रहेगा. वह अच्छी तरह हिंदी नहीं जानते थे. फिर भी वह गांव गये, तब उनकी उम्र 75 से ऊपर रही होगी. प्रभात खबर के लोगों को आकर बताया कि ऐसे विषयों की रिपोर्ट कैसे की जानी चाहिए. वह अच्छी तरह हिंदी नहीं बोल पाते थे, पर उनमें क्षेत्रीय पत्रकारिता के स्तर को सुधारने को लेकर अद्भुत संकल्प था. उधर अंगरेजी अखबारों में उन्होंने नयी बहस शुरू की. पेज तीन की पत्रकारिता पर. इसके बाद एक  अंगरेजी अखबार (दिल्ली से प्रकाशित) ने 1998 से 2002 के बीच पेज तीन की पत्रकारिता पर बीसियों लेख लिखे. उनकी पहल पर.प्रेस कौंसिल के मंच या अन्य समानधर्मा संस्थाओं के साथ मिल कर, वह और प्रभाष जी देश के विभिन्न हिस्सों में जाकर, पेज तीन की पत्रकारिता और मौजूदा  हालात के बारे में बोलते थे.
पत्रकारों की गोष्ठियों में, सेमिनारों में जाते थे.ग्रामीण पत्रकारों की गोष्ठियां आयोजित करवाते और सार्वजनिक व्याख्यान में भाग लेते थे.आज मामूली अखबार में लाखों रुपयों के तनख्वाह पर काम करनेवाले अनेक पत्रकार हैं.जब अजीत बाबू जैसे लोग पत्रकारिता में सक्रिय थे, तब 10-15 हजार पानेवाले देश में चंद लोग ही थे.आज तो करोड़ों में पानेवाले देश की पत्रकारिता में अनगिनत हैं. वैध तरीके से, तनख्वाह के रूप मे. अवैध या राडिया संस्कृति की राह न अपनानेवाले की भी बड़ी जमात है, जो करोड़ों में कमा रही है.तनख्वाह के रूप में.
पर पत्रकारिता का जो सत्व, पहचान और असर अजीत बाबू के युग में थी, आज उसके पासंग में भी नहीं है.देश के सबसे बड़े अंगरेजी अखबार के संपादक रह कर भी, वह विशिष्ट नहीं बने, सामान्य ही रहे.मामूली खबरें या किसी मॉडल द्वारा क्रिकेट में भारत के विश्वविजयी बनने पर नंगा होकर दौड़ने की बातों को आज अखबारों में बड़ी जगह मिल रही है. तब अजीत बाबू के गुजरने की चर्चा अखबारों में महज कुछ  पंक्तियों में हो, तो इससे कोई आश्चर्य नहीं होता. पर आज ही के अखबार में यह भी खबर है कि अन्ना हजारे जैसे लोग अब अपना जीवन दावं पर लगा रहे हैं.
किन सवालों के लिए? जो देश के बुनियादी मुद्दे हैं.मसलन भ्रष्टाचार.तब एक ऐसे आदमी का गुजर जाना, जो राजस्थान के गांव (तिलौनिया) जाकर सूचना अधिकार आंदोलन के लिए अपने जीवन को भी दावं पर लगा देता था, एक बड़ी क्षति है. उनकी स्मृति को प्रणाम.प्रभात खबर को हमेशा जिन लोगों ने हर संकट में मनोबल बढ़ा कर भिन्न पत्रकारिता करने की सूझ और ऊर्जा दी, उनमें से एक सबसे बड़े स्तंभ अजीत बाबू के न रहने पर प्रभात खबर की उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि.

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गांधी जी ने स्वराज का सपना देखा था

Published on 01 February 2012
गांधी जी ने स्वराज का सपना देखा था। कैसा होगा यह स्वराज, किन मूल्यों व आदर्शों से पर यह देश चलेगा, गांधीजी ने इसकी वैचारिकी प्रस्तुत की थी। परन्तु आजादी के बाद इस सपने की लगातार हत्या की गई। आजाद हिन्दुस्तान में उनके उत्‍तराधिकारियों द्वारा उनके विचारों की छुट्टी कर दी गई। अपने राजनीतिक मकसद के लिए गांधी का खूब इस्तेमाल हुआ। उन्हें लेकर राजनीतिक दावेदारी जताई गई। पर उनके विचारों को फैलाने तथा नई पीढ़ी को उससे रू-ब-रू कराने का काम नहीं हुआ। हालत यह है कि गांधीवादियों को आज इस सत्‍ता और व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष करना पड़ रहा है। उन्हें भी उसी तरह के दमन का सामना करना पड़ रहा है जिस तरह के दमन का मुकाबला गांधी को करना पड़ा था।  


हिन्द स्वराजगांधीजी की मशहूर कृति है। अभी हाल में इसके सौ साल पूरे हुए। वैसे गांधी का अर्थ ही हैहिन्द स्वराज। यह पाठक व संपादक के बीच संवाद के माध्यम से लिखी विचार प्रधान गद्य रचना है। इसे गांधीजी ने 1909 में इंग्लैंड से दक्षिण अफ्रीका की पानी के जहाज से की गई अपनी यात्रा के दौरान लिखी थी। समुद्र की लहरों पर हिचकोले लेते हुए उनके दिल दिमाग में जो विचार उमड़ घुमड़ रहे थे, उसे इन्होंने इस पुस्तक में व्यक्त किया है। यह मूलरूप में गुजराती में लिखी गई थी। बाद में इसका अनुवाद अंग्रेजी व अन्य भाषाओं में हुआ। इस पुस्तक के प्रकाशन के तत्काल बाद अंग्रेज सरकार द्वारा इसे प्रतिबंधित कर दिया गया था। बाद में अंग्रेज सरकार ने ही 1938 में इस पुस्तक पर से प्रतिबंध समाप्त कर दिया था। यह पुस्तक गांधीजी के स्वराजकी अवधारणा को सामने लाती है। हमें इसमें गांधी के विचारों का बीज रूप मिलता है। गांधी उस वक्त के सवालों को संबोधित करते हैं जिनमें स्वराज, पार्लियामेण्ट, सम्यता, हिन्दुस्तान के हालात, न्याय व्यवस्था, हिंसा.अहिंसा, मशीन, सत्याग्रह आदि विषयों पर अपने विचार रखते हैं।

गांधी के जीवन पर तथा उनके जीवन से जुड़ी
घटनाओं पर फिल्में बनी हैं, नाटक हुए हैं तथा बड़ी संख्या में कहानी, कविता आदि की रचना हुई है। लेकिन उनकी किसी वैचारिक कृति पर आधारित नाटक लिखने का काम नहीं हुआ है। राजेश कुमार विचार प्रधान नाटकों के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने हिन्द स्वराजका नाट्य रूपान्तर किया है। इसका मंचन उन्हीं के निर्देशन में गांधीजी की पुण्य तिथि 30 जनवरी के दिन वाल्मीकि रंगशाला, संगीत नाटक अकादमी, लखनऊ में हुआ। 

नाटक में दो पात्र हैं। एक तो
स्वयं गांधी है और दूसरा पात्र जिज्ञासू है। दोनों के बीच संवाद होता है। गांधी कहते हैं कि पहले मनुष्य जंगलो में रहता था, आज उसके पास मकान है, कल वह अपना तन जानवरों की खाल से ढंक लेता था पर आज उसके पास वस्त्र है। तो क्या यह सभ्यता विकास है? जो सभ्यता मनुष्य के प्रति नफरत फैलाए, उसे शैतानी सभ्यता ही कहेंगे। जिज्ञासू के मन में ब्रिटिश पार्लियामेण्ट के प्रति आदर है। इस बात से उसे गहरी चोट पहुँचती है जब गांधी ब्रिटिश पार्लियामेण्ट को बांझ और वेश्या कहते हैं। गांधी का तर्क है कि यह उसी के लिए काम करती है जो इसे अपने पास रखे। इसी तरह के वाद विवाद शिक्षा, न्याय व्यवस्था, मशीन, रेल, धर्म को लेकर चलता है। गांधी उस शिक्षा व्यवस्था, न्याय प्रणाली, धर्म तथा मशीनीकरण के विरोधी हैं जो मानव जाति के लिए अहितकारी है, जो मात्र लोभ व लाभ के उद्देश्य से संचालित है। स्वराज आजादी को मतलब ऐसी व्यवस्था है जिसका उद्देश्य मानव भलाई हो। धार द्वारा मंचित हिन्द स्वराजमें गांधी की भूमिका नितिन शर्मा ने निभाई, वहीं जिज्ञासू की भूमिका में आलोक यादव थे।

हिन्द
स्वराज का मंचन रंगमंच व नाटक के क्षेत्र में एक नये प्रयोग की तरह है। आमतौर पर रंगमंच पर इस तरह के मंचन हमें देखने को नहीं मिलते। इसलिए हिन्द स्वराज के मंचन को लेकर हमारे अन्दर उत्सुकता थी। इस संदर्भ में हमने नाटककार राजेश कुमार से बात की। उनका कहना था कि आमतौर हम यह मानकर चलते हैं कि विचार का क्षेत्र बड़ा शुष्क व स्थूल है। पर वास्तविकता यह नहीं है। विचार  में भी गति व आवेग होता है। वह किसी कथानक से ज्यादा सुनने वालों को रोमांचित कर सकता है। हमने देखा है कि वैचारिक भाषण हो या व्याख्यान श्रोता पूरे मनोयोग से उसे सुनते हैं, उससे संवेदित होते हैं। फिर ऐसी वैचारिकी को यदि पात्रों के माध्यम से रंगमंच पर पेश किया जाय तो उसकी संप्रेषणीयता बढ़ जाती है। हिन्द स्वराजमें तो संपादक और पाठक के रूप में दो पात्र हैं। इन पात्रों के माध्यम से हमने गांधीजी के विचारों को उभारने का प्रयास किया है।

हिन्द स्वराजपिछली शताब्दी के पहले दशक में लिखी गई थी। इन सौ सालों में देश.दुनिया में बड़े बदलाव आये हैं। ऐसे में हिन्द स्वराज आज के समय में कितना प्रासंगिक हो सकता हैइस बारे में राजेश कुमार मानते हैं कि यह ऐसा दौर है जब सबसे ज्यादा संकट विचार के क्षेत्र में आया है। हमारे राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक परिदृश्‍य से विचार को गायब किया जा रहा है। उसे महत्वहीन बनाया जा रहा है। आधुनिक रंगमंच में विचारों का संकट साफ देखा जा सकता है। गांधी जी ने ब्रिटिश पार्लियामेण्ट को बांझ व बेसवाबताया था। उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्यवादियों द्वारा थोपी जा रही आधुनिक सभ्यता को शैतानी सभ्यता कहा था। उनकी नजर में मैकाले की शिक्षा गुलामी की नींव पर खड़ी थी। क्या आज हालत इससे बदतर नहीं हैं ? भूमंडलीकरण ने जिस तरह हमें अपनी हर जरूरत और सपने के लिए यूरोप और अमेरिका की तरफ देखने के लिए मजबूर किया है, योजनाबद्ध ढंग से कुसंस्कारित किया जा रहा है, विकास के नाम पर जल-जमीन-खनिज को लूटने में लगे हैं, इन सवालों से रंगकर्मी, कलाकार मुँह नहीं मोड़ सकता। जब रंगमंच पर धार्मिक कथाओं के मंचन की प्रवृति बढ़ी है और इसके द्वारा अतीत के पतनशील मूल्यों को प्रतिष्ठित किया जा रहा है, ऐसे में गांधी के हिन्द स्वराजहमें वर्तमान को समझने और इसे बदलने की वैचारिक ऊर्जा देता है। वैश्वीकरण के बाजार में खड़ा होकर उसके प्रेतों को ललकारता है, पशुबल के खिलाफ टक्कर लेने के लिए हमारे आत्मबल को जाग्रत करता है। इस अर्थ में हिन्द स्वराज हमारे लिए आज भी प्रासंगिक है।
लेखक कौशल किशोर पत्रकारिता, साहित्‍य और रंगमंच से जुड़े हुए हैं.
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क्या लेखक का घटिया होना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बाधित करती है?

Published on 01 February 2012
वही समारोह और वही समारोह-स्थल, पर 2007 में सलमान रश्दी स्वीकार्य थे, तब एक पत्ता भी नहीं खड़का था। फिर क्या वजह है कि इस बार वह स्वीकार्य नहीं हुए ? “सेटेनिक वर्सेसकल नहीं लिखी गयी थी। क्या वजह है कि कांग्रेस की राजस्थान सरकार और दिल्ली में बैठे उनके आका अबकी बार अपने छहों अंगों पर लमलेट हो गए और वह भी साफ छिपते भी नहीं सामने आते भी नहींके भाव से। अन्ना और लाखों-लाख देश की जनता एक लोकपाल बिल चाहती थी लेकिन देश की पार्लियामेंट ने पारित नहीं होने दिया। व्यापक जनभावना जिस सरकार व राजनीतिक वर्ग को झुकाने में असफल रही उसे देवबंद के एक फतवे ने झुका दिया। पांच राज्यों के चुनाव में भ्रष्टाचार तो मुद्दा नहीं बन पाया लेकिन 23 साल पहले अपनी लिखी हुयी किताब की वजह से सलमान रश्दी जयपुर लिट्रेचर फेस्टिवल में आएंगे कि नहीं आएंगे, एक मुख्य मुद्दा बन गया।

अगर हम राज्य की सर्वमान्य परिभाषाओं को देखें तो उन सब में एक जो
सबसे प्रमुख बात नज़र आती है वह है- एक सफल राज्य वह है जिसमें कि प्रजा सम्प्रभु के प्रति एक आदतन निष्ठा रखती है।और वह ऐसा इसलिए करती है क्योंकि उसको विश्वास होता है कि राज्य उनकी बेहतरी के लिए बगैर किसी भेद-भाव के काम कर रहा है। लिहाज़ा जितना ही जनहित के लिए राज्य उद्यम करेगा, उसी के अनुरूप जनता का विश्वास राज्य व उसकी संस्थाओं में बढ़ता है या घटता है। लेकिन जयपुर साहित्य समारोह के पूरे घटनाक्रम को लें। जिस तरह राज्य की कांग्रेस सरकार ने अपने दिल्ली के आकाओं के इशारे पर सलमान रश्दी को आने से रोका, वह न केवल बचकाना था बल्कि राज्य के प्रति प्रजा की निष्ठा को झकझोरता है। ऐसा लगा मानो अगर चुनाव नज़दीक हों तो सत्ता में बैठे लोगों को किसी हद तक झुकाया जा सकता है।

ज़रा देखिए किस तरह के
भोंडे तरीके से सलमान रश्दी को रोका गया है। पहले राज्य के पुलिस के गुर्गों ने संदेशा भेजा कि सलमान रश्दी को मारने के लिए मुंबई से आतकंवादियों ने दो लोगों को जयपुर रवाना किया है। संदेशे का मतलब यह था कि रश्दी की हत्या हो सकती है लिहाज़ा वह न आएं। रश्दी डर के मारे रुक गए क्योंकि इतने बड़े देश की लाखों-करोड़ों पुलिस शायद उन दो हत्यारों को रोक पाने में सक्षम नहीं थी। उसके बाद आयोजकों ने वीडियो कॉनफ्रेंसिंग के ज़रिए रूबरू होने का आयोजन किया। सरकार फिर घुटनों पर आयी और बताया गया कि कुछ लोग समारोह स्थल में पहुंचे हैं और कुछ भी गड़बड़ी कर सकते हैं लिहाज़ा आपको अपनी और अपने बच्चों की खैर मनानी है तो इस आयोजन को रद्द कर दें। साहित्य के आयोजनकर्ता एके-47 की ज़ुबान नहीं समझते, अगर समझते हैं तो पुलिस का इशारा। आयोजन रद्द कर दिया गया। इसी बीच प्रेस कांउसिल के अध्यक्ष का एक लेख आता है जिसमें इन सुप्रीम कोर्ट के भूतपूर्व जज महोदय ने यह बताने की कोशिश की है कि सलमान रश्दी कितने घटिया दर्जे के लेखक हैं। प्रश्न यह है कि क्या किसी घटिया दर्जे के लेखक का अन्य देश के साहित्यिक समारोह में भाग लेना मना है? क्या ऐसे घटिया लेखक को दो आतंकवादी मारने आएं तो राज्य का कार्य उनकी सुरक्षा करना नहीं है? इसके अलावा अगर समारोह स्थल पर वीडियो कॉन्फ्रेंसिग के ज़रिए घटिया लेखक की तस्वीर भी दिखायी जा रही हो तब आयोजन में आए साहित्यकारों और उनके बच्चों की सुरक्षा राज्य की ज़िम्मेदारी नहीं है? और इस सब से बढ़कर प्रश्न यह है कि क्या मुद्दा यह नहीं है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को राज्य का अपनी चौर-वृत्ति का प्रदर्शन करते हुए इतने भोंडे ढ़ंग से अंज़ाम देना उचित है?

सलमान
रश्दी को घटिया बताने वाले लोगों से यह भी जानना होगा कि क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए लेखक का उम्दा होना भी कोई शर्त है? क्या संविधान के अनुच्छेद 19(1) क में प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संदर्भ में अनुच्छेद 19(2) में वर्णित आठ प्रतिबंधों में एक भी लेखक के घटिया होने के बारे में है? आइए हम आपको कुछ तथ्य बताते हैं। सलमान रश्दी  ने यह किताब 1988 में लिखी थी। दुनिया के मुसलमानों के एक वर्ग ने इस पर आपत्ति जतायी। भारत में इस किताब पर पाबंदी नहीं लगायी गयी बल्कि इसके आयात पर पाबंदी लगायी गयी और वह भी कस्टम्स एक्ट 1962 के तहत। उधर ब्रिटेन में जो ईश-निंदा (ब्लॉशफेमी) कानून है वह सिर्फ इसाई धर्म का संज्ञान लेता है। किताब प्रकाशित होने के बाद ब्रिटेन के कुछ मुसलमानों ने जब वहां की सरकार से अपील की कि इस कानून का दायरा सभी धर्मों तक बढ़ाया जाए तब ह्वाइट हॉल (वह बिल्डिंग जहां से सत्ता संचालित होती है) में बैठे सरकार ने साफ मना कर दिया।

याद रखिए कि ब्रिटेन दुनिया में उदारवादी प्रजातंत्र होने के
लिए विख्यात है और ब्रिटेन का संसद दुनिया के तमाम संसदों की जननी माना जाता है। लेकिन अन्य धर्मों के प्रति सहिष्णुता का यह आलम है। यह वो देश है जहां 1215 के मैग्नाकार्टा और फिर 1689 के बिल ऑफ राइट्स से लेकर आज तक धार्मिक और राजनीति स्वतंत्रता के कसीदे काढ़े जाते हैं। इसमें सबसे बड़ा आश्चर्य यह है कि अपने को उदारवादी कहने वाले वह लेखक जो अपनी कलम से देश में आन्दोलन की आग लगाया करते हैं वह भी जयपुर की घटना पर पूरी तरह चुप्पी साधे हुए हैं। एक न्यूज़ चैनल ने जब देश के सभी प्राख्यात साहित्यकारों जिनमें से कई इसमें भाग लेने गए थे, से बात करनी चाही तब उन्होंने यह कहते हुए साफ मना कर दिया कि हम इस वाद-विवाद में नहीं पड़ना चाहते। यहां तक कि समारोह स्थल पर भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का गला घोंटा जा रहा था, तब एक भी बुद्धिजीवी तन कर खड़ा नहीं हुआ और गांधीवादी तरीके से भी विरोध करने की ताकत नहीं जुटा पाया।

उस पर से तुर्रा यह कि सलमान रश्दी के पास
पासपोर्ट था, वीज़ा था, उनको आने का निमंत्रण था लेकिन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दम भरने वालों ने अब सलमान रश्दी को ही घटिया दर्जे का साहित्यकार बताना शुरू कर दिया है। सत्ता का सुख भोगने वाला एक बड़ा वर्ग है जो कि अभिव्यक्ति के स्वतंत्रता के अधिकार से बेहद चिन्तित है। यह वर्ग इस अधिकार के सभी उपादानों को चाहे वह मीडिया हो, चाहे वह सोशल नेटवर्किंग हो, चाहे अन्ना हज़ारे का
एनके सिंह
आन्दोलन हो, इसे खत्म करने में लगा हुआ है। वह हज़ारे को ट्रक ड्राइवर बताकर, मीडिया को बे-पढ़ा लिखा बताकर और सोशल नेटवर्किंग को लम्पटों का कामुक मनस-विलास बताकर कानून लाना चाहता है। रश्दी की घटना को भी इसी प्रयास के रूप में देखा जाना चाहिए।
लेखक एनके सिंह वरिष्‍ठ पत्रकार, ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन के महासचिव और साधना न्यूज चैनल के एडिटर इन चीफ हैं. उनका यह लेख उनके ब्‍लॉग पोस्‍टकार्ड से साभार लेकर प्रकाशित किया जा रहा है. यह लेख आज के दैनिक जागरण में भी प्रकाशित हो चुका है.

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