बुधवार, 1 फ़रवरी 2012

आंदोलनकारी पत्रकार को सादर नमन

    आंदोलनकारी पत्रकार को सादर नमन


    Prabhash Joshi-प्रभाष जोशी का जन्म मध्यप्रदेश के सीहोर जिले के अस्टा गांव में 15 जुलाई 1935 को हुआ था। 12 भाई बहनों में वह सबसे बड़े बेटे थे। घर में उनसे तीन बड़ी बहनें थीं। उनकी प्राइमरी शिक्षा महाराजा शिवाजी राव प्राइमरी और मिडिल स्कूल में हुई। 1951-52 में मैट्रिक की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने कुछ दिनों तक सुनवानी महाकाल के प्राइमरी स्कूल में मास्टरी की।
    इंदौर में विनोबा जी के आने पर उन्होंने नई दुनिया के संपादक राहुल बारपुते के कहने पर पत्रकारिता में कदम रखा। यहां 1960 से करीब छह साल तक काम करते रहे। इसके बाद 1965 में इंग्लैंड जाकर मैनचेसटर गार्जियन और टेलीग्राफ में कुछ माह तक काम किया। वापस लौटने पर मध्यदेश नामक अखबार से जुड़े 1968 में गांधी शताब्दी समिति में प्रकाशन सचिव होकर दिल्ली आ गए। यहां 1970 से 74 तक सर्वोदय निकाला। इसके बाद प्रजानीति अखबार से बतौर संपादक जुड़े इंडियन एक्सप्रेस में 1981-83 तक स्थानीय संपादक रहे।
    इसी दौरान उन्होंने जनसत्ता अखबार निकालने की योजना तैयार की। जनसत्ता शुरू होने पर दिल्ली में उसके प्रधान संपादक बने। 1992 से उन्होंने जनसत्ता में लोकप्रिय कालम ‘कागद कारे’ लिखना शुरू किया। उनकी अब तक 9 किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। इनमें हिंदू होने का धर्म, मसि कागद, कागद कारे आदि प्रमुख हैं। उन्हें शलाका सम्मान, लोहिया विशिष्ट सम्मान जैसे कई सम्मान मिले थे। 6 नवंबर, 2009 को प्रभाष जी के निधन के साथ ही जनसरोकारों से जुड़ी पत्रकारिता का एक युग समाप्त हो गया। पत्रकारिता और आंदोलनों की दुनिया में उनका कितना ऊंचा स्थान था, उनका व्यक्तित्व कितना बहुआयामी था, इसकी छोटी सी झलक इन कुछ वक्तव्यों से महसूस की जा सकती है।
    समय का सबसे समर्थ हस्ताक्षर
    -राज किशोर (वरिष्ठ पत्रकार)
    पत्रकार अपने समय की आंख होता है। बदलते हुए परिदृश्य पर सबकी नजर जाती है, लेकिन पत्रकार अपने हस्ताक्षर वहां करता है जहां उसके समय का मर्म होता है। इस मायने में प्रभाष जोशी ने अपने पढ़ने वालों या सुनने वालों को कभी निराश नहीं किया। उन्होंने हमेशा अपने वक्त के सबसे मार्मिक बिंदुओ को चुना और उन पर अपनी निर्भीक और विवेकपूर्ण कलम चलाई।  पत्रिकाओं के क्षेत्र में जो काम ‘दिनमान’ और ‘रविवार’ ने किया, अखबारों की दुनिया में प्रभाष जोशी द्वारा स्थापित ‘जनसत्ता’ ने उससे कहीं बड़ा और टिकाऊ काम किया। पत्रकारिता की समूची भाषा को आमूलचूल बदल देना मामूली बात नहीं है। यह काम कोई ऐसा महाप्राण ही कर सकता है, जिसमें संस्था बनाने की क्षमता हो। ‘जनसत्ता’ एक ऐसी ही संस्था बन गई। यह कहना अर्धसत्य होगा कि प्रभाष जोशी ने पत्रकारिता की तत्कालीन निर्जीव और क्लर्क टाइप भाषा को आम जनता की भाषा से जोड़ा। यह तो उन्होंने किया ही, उनका इतना ही निर्णायक महत्व का योगदान यह भी है कि उन्होंने जन भाषा को सर्जनात्मकता के संस्कार दिए। हिंदी की शक्ति उसके तद्भव व्यक्तित्व में सबसे अधिक शक्तिशाली रूप में प्रकट होती है, यह उन्हें मालूम था।
    एक निर्भीक पत्रकार का खोना
    -वेदप्रताप वैदिक (वरिष्ठ पत्रकार)
    कलम को तलवार की तरह चलाना और अपने सिर को तलवार की नोक पर रखकर लिखना यदि किसी से सीखना हो तो प्रभाष जोशी से सीखे। उनकी जान को हमेशा खतरा बना रहता था लेकिन उनकी कलम कभी नहीं कांपी। जो सही लगे वह लिखना और बिना किसी संकोच के लिखना उनकी विशेषता थी। यह विशेषता विरलों में ही मिलती है। प्रभाष जी में मालवी फक्कड़पन भरा हुआ था। इसलिए उन्होंने पढ़ाई-लिखाई में भी खास रुचि नहीं ली और औपचारिक शिक्षा में आगे नहीं गए। उन्होंने पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी लेकिन उनमें तीव्र प्रतिभा थी। उनके जैसा व्यक्ति ही जनसत्ता जैसा अखबार खड़ा कर सकता था। जनसत्ता प्रसार संख्या में कभी अव्वल नहीं रहा, लेकिन प्रभाव में वह हमेशा अव्वल रहा।
    प्रवाहमयी लेखनी के धनी थे
    -विट्ठल नागर (आर्थिक विश्लेषक)
    प्रभाषजी की लेखनी प्रवाहमयी थी। विनोबाजी जब इंदौर आए थे, तब नई दुनिया में एक विशेष परिशिष्ट निकाला जाता था। इसका संपादक प्रभाषजी को बनाया गया था। वे उनके दिन भर के कार्यक्रमों व गतिविधियों को देखते थे। शाम को इसकी समग्र रिपोर्टिंग उस परिशिष्ट की सामग्री होती थी। राजेंद्र माथुर के साथ प्रभाषजी की काफी घनिष्ठता थी और वे कई बार राष्ट्रीय घटनाक्रम पर संपादकीय लिखने का दायित्व भी उन्हें देते थे। प्रभाष जी की लेखनी से निकले विचारों ने समाज को हमेशा नए आयाम दिए। उनकी लगन और स्वाध्याय का ही सुपरिणाम था कि वे इंग्लैंड यात्रा पर गए और आने के बाद नई दुनिया के कलेवर को और पैना बनाने का प्रयास किया तथा बाद में जनसत्ता जैसा अखबार निकाला।
    हाथ का लिखा, दिल के बोल
    -रवीश कुमार (टीवी पत्रकार)
    धोती-कुर्ता पहन कर हाथ से लिखने और दिल से बोलने वाले वे संभवत: आखिरी गांधीवादी और गंवई पत्रकार संपादक थे। उनकी कमी इसलिए भी खलेगी कि उनके बाद के बचे हुए लोगों ने खुद को खाली घोषित कर दिया है। लेकिन प्रभाष जी इस कमी का रोना कभी नहीं रोए। बम-बम होकर जीया, बम-बम होकर घूमा और बम-बम होकर लिखा। नर्मदा को मां कहा और गंगा से कह दिया कि तुमसे वैसा रिश्ता नहीं बन पा रहा जैसा मां नर्मदा और मौसी क्षिप्रा से है। मालवा के संस्कारों को हिंदी के बीच ऐसे मिला दिया कि लोग फर्क ही नहीं कर पाए कि ये मट्ठा है या लस्सी।
    बिछड़ना एक नायक का
    -जवाहरलाल कौल (वरिष्ठ पत्रकार)
    प्रभाष जी पत्रकारों की ऐसी पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते थे जो खबर और विज्ञापन में अंतर जानता है। जो समाचार पत्र को केवल व्यापारिक इकाई नहीं मानती और विश्वास करती है कि वैश्वीकरण और व्यावसायीकरण के इस दौर में भी पत्र-पत्रिकाएं समाज सापेक्ष हो सकती हैं और पत्रकार सामाजिक दायित्व से प्रेरित हो सकते हैं। पत्रकारों के उस वर्ग के वे नायक थे जो विचारों और भावनाओं को बाजार के अनुसार काटने-छांटने को तैयार नहीं। प्रभाष जोशी से आप असहमत हो सकते हैं लेकिन आप उन्हें नजर अंदाज नहीं कर सकते। उनका न रहना एक अच्छे संपादक का ही जाना नहीं है, एक नायक का बिछड़ना भी है।
    ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर
    -अच्युतानंद मिश्र (वरिष्ठ पत्रकार)
    प्रभाष जोशी केवल एक योग्य पत्रकार, असाधारण प्रतिभा के लेखक और उम्दा संपादक ही नहीं, वे बेहद संवेदनशील और स्वाभिमानी व्यक्तित्व के धनी भी थे। ‘जनसत्ता’ प्रभाष जी के अनुभवों की अभिनव और अनुपम कृति है। उन्होंने जैसे हिन्दी पत्रकारों की एक पूरी नई पीढ़ी को गढ़ा है उसी तरह उन्होंने दैनिक हिन्दी पत्रकारिता में नए तेवर की नई प्रस्तुति लाने के लिए ‘जनसत्ता’ को भी गढ़ा था, ठीक उसी तरह जैसे गणेशशंकर विद्यार्थी ने ‘प्रताप’, माखनलाल चतुर्वेदी ने ‘कर्मवीर’, अम्बिका प्रसाद वाजपेयी ने ‘भारत मित्र’, पराड़कर जी ने ‘आज’ और बनारसीदास चतुर्वेदी ने ‘विशाल भारत,’ महामना मदनमोहन मालवीय ने ‘अभ्युदय’ और अज्ञेय जी ने ‘दिनमान’ को अपनी कल्पनाओं में उतारा था।
    पत्रकारिता की कसौटी थे प्रभाष जोशी
    -राजेन्द्र धोड़पकर (वरिष्ठ पत्रकार)
    वे स्वभाव से एक्टिविस्ट पत्राकार थे, इसलिए उन्होंने खूब सारे दुश्मन बनाए। लेकिन इसके अलावा बहुत सी चीजें थीं, जो उन्हें महान पत्राकार बनाती थीं। पत्राकारिता में उम्र गुजार चुकने के बाद हम अपने को कितना ही तुर्रम खान मान लें, प्रभाष जी किसी भी दिन हमें चार नई चीजें सिखा सकते थे। वे असाधाारण कापी एडिटर थे, खराब से खराब कापी को सुधाार कर शानदार बना सकते थे, कई प्रतिष्ठित पत्राकारों की प्रतिष्ठा में प्रभाष जी के कापी संपादन का बड़ा योगदान है। वे पलक झपकते हेडिंग सुझा सकते थे, खबरों की समझ उनकी कमाल की थी। वे एक के बाद एक संपादकीय और लेख अलग-अलग विषयों पर लिख सकते थे, पेज बनवा सकते थे और तमाम उद्दंड और अराजक लोगों से मजे-मजे में अखबार निकलवा सकते थे।
    वो घूमने और लिखने को कहते थे
    -पुण्य प्रसून वाजपेयी (टीवी पत्रकार)
    विदर्भ के आदिवासियों को नक्सली करार देने का जिक्र 1990 में जब दिल्ली के बहादुरशाह जफर मार्ग की एक्सप्रेस बिल्डिंग के उनके कैबिन में दोपहर दो-ढाई बजे के दौरान किया तो वे अचानक बोले- जो कह रहे हो लिखने में कितना वक्त लगाओगे। मैंने कहा- आप जितना वक्त देंगे। दो घंटे काफी होंगे। यह परीक्षा है या छाप कर पैसे भी दीजियेगा । वे हंसते हुये बोले …घूमते रहना पंडित। जहां जाओ, वही लिखो। घूमना…लिखना दोनों न छोड़ो। अगली बार जरा शंकर गुहा नियोगी के आंदोलन पर लिखवाऊंगा। और हां, संभव हो तो पीपुल्सवार के सीतारमैया का इंटरव्यू करो। पता तो चले कि नक्सलियों की दिशा क्या है। प्रभाष जी, खबरों की नब्ज पकड़ना चाहते थे और वह अपने रिपोर्टरों को दौड़ाते रहते थे लेकिन मैं तो उनका रिपोर्टर भी नही था फिर भी संपादकीय पेज पर मेरी बड़ी-बड़ी रिपोर्ट को जगह देते और हमेशा चाहते कि मै रिपोर्टर के तौर पर आर्टिकल लिखूं।
    बीसम-बीस के खबरनवीस
    -सूर्यप्रकाश चतुर्वेदी (वरिष्ठ पत्रकार)
    उन्होंने पत्रकारिता को तो नई ऊंचाई दी ही, क्रिकेट लेखन को नए आयाम दिए। नई भाषा, नई शैली और नए मुहावरे गढ़े। ‘टी-20′ को ‘बीसम-बीस’ कहना इसका उदाहरण है। इसी तहर धुआंधार, लप्पेबाजी और सीधे हाथ या उलटे हाथ का गेंदबाज या बल्लेबाज कहना उन्हीं की देन है। बातचीत के लहजे में जैसा बोलना वैसा लिखना उनके लेखन का मूल मंत्र रहा। पढ़ाई अधूरी छोड़ कर पत्रकारिता की और केवल अपने अध्ययन और पठन-पाठन के दम पर अंग्रेजी में दक्षता प्राप्त की तथा तमाम उपलब्धियां हासिल की।
    वो हमेशा मेरे साथ खड़े होते थे
    -कपिल देव (पूर्व कप्तान, भारतीय क्रिकेट टीम)
    काफी नेक इंसान थे प्रभाष जी। जब हम छोटे से थे, काफी प्रोत्साहित किया करते थे हमें। उन्होंने हमारे साथ प्रेस जैसा व्यवहार नहीं किया। जब भी मुझे उनकी जरूरत होती, वो हमेशा मेरे साथ खड़े होते थे। उन्होने जिंदगी हमसे कहीं ज्यादा देखी थी
    … अपने अनुभव से वो हमेशा मुझे समझाते रहते थे। क्रिकेट के वे बहुत बड़े लेखक थे। बाद में वो दिल्ली आ गए, फिर उनसे थोड़ा संपर्क छूट गया, लेकिन जब भी मिलते थे, पुराने दिनों को याद करके उनमें खो जाया करते थे।
    बहुआयामी व्यक्तित्व
    -आलोक तोमर (वरिष्ठ पत्रकार)
    प्रभाष जी के कई चेहरे थे। एक क्रिकेट को भीतर-बाहर से जानने वाला और कपिल देव को देवीलाल से पहली बार दो लाख रुपए का इनाम दिलवाने वाला, कपिल, सचिन, अजहर, गावस्कर, विशन सिंह बेदी से दोस्ती के बावजूद रणजी और काउंटी खेल चुके बेटे संदीप को भारत की टीम में शामिल करने की सिफारिश नहीं करने वाला, एक्सप्रेस समूह के प्रधान संपादक का पद ठुकरा कर ‘जनसत्ता’ निकालने वाला, जनसत्ता को समकालीन पत्रकारिता का चमत्कार बना देने वाला, सरोकारों के लिए लड़ने वाला, अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी से दोस्ती के बावजूद उनकी धर्म-ध्वजा छीनने वाला, कुमार गंधर्व के भजनों में डूबने वाला, अपने हाथ से दाल वाफले बना कर दावत देने वाला, पूरे देश में घूम कर पत्रकारिता में आई खोट के खिलाफ अलख जगाने वाला, जयप्रकाश आंदोलन में शामिल होने वाला और उसके भी पहले बिनोवा भावे के भूदान आंदोलन में घूम-घूमकर रिपोर्टिंग करने वाला, हाई स्कूल के बाद पढ़ाई बंद करने के बावजूद लंदन के बड़े अखबार में काम करने वला, धोती-कुर्ता से लेकर तीन पीस का सूट पहन कर खांटी ब्रिटिश उच्चारण में अंग्रेजी और शुद्ध संस्कृत में गीता के श्लोक समझाने वाला, प्रधान संपादक होते हुए सब एडिटर बन कर बैठ जाने वाला, अनवरत यात्रा करने वाला, एक्सप्रेस समूह के मालिक को पत्रकारिता की आचार संहिता याद दिलाने वाला…। ऐसे और भी कई विशेषण प्रभाष जी के लिए उपलब्ध हैं। उनका जाना एक युग का अवसान है। एक ऐसा युग जहां सरोकार पहले आते थे और बाकी सब बाद में।
    वे जनआंदोलनों के मार्गदर्शक थे
    -रहमत भाई (नर्मदा बचाओ आंदोलन)
    प्रभाष जोशी का निधन न सिर्फ पत्रकारिता के लिए बल्कि देश के जनसंगठनों के लिए भी अपूरणीय क्षति है। ऊनके जाने से दोनो ही स्थानों पर निर्वात महसूस किया जा रहा है। श्री जोशी देशभर के सामाजिक समूहों से न सिर्फ जुड़े रहे हैं बल्कि उन्होंने ऐसे समूहों में सक्रिय भागीदारी भी की है। ऊन्होंने देश के किसानों, दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों और वंचित वर्गों से जुड़े मुद्दे न सिर्फ अपनी लेखनी के माध्यम से उठाए बल्कि वे उनसे करीब से जुड़े भी रहे हैं। ऐसे ही समूहों में नर्मदा बचाओ आंदोलन भी शामिल है।
    भारतीय पत्रकारिता के दिग्गज पुरुष
    राजेंद्र यादव (वरिष्ठ साहित्यकार)
    हिंदी पत्रकारिता के दिग्गज पुरुष थे प्रभाष जोशी। वे एक इंटेलेक्चुअल सार्वजनिक शख्सियत थे। कुल मिलाकर अज्ञेय और राजेंद्र माथुर के बाद मैं उन्हें हिंदी का तीसरा सबसे बड़ा पत्रकार मानता हूं। यह भी सच है कि ‘जनसता’ अखबार के जरिए उन्हें खुद को साबित करने का लंबा वक्त मिला। वे लगातार लिखते रहे और अंतिम क्षणों तक सक्रिय रहे। उनका निधन हिन्दी पत्रकारिता के लिए बहुत बड़ी क्षति है।

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