बुधवार, 1 फ़रवरी 2012

मीडिया शोध के बारे में विस्तार से



Mening of definition
शोध का अर्थ
 

प्रकृति  ने  संसार को अनेक चमत्कारों  से नवाजा हैं। कुछ चमत्कारों की खोज भी एक लंबे अंतराल के शोध के बाद ही संभव हो सकी थी। यही कारण है कि किसी भी सत्य की खोज और उसकी पुष्टी के लिए शोध का होना अनिवार्य होता है। मानव की जिज्ञासु प्रवृत्ति ने ही शोध प्रक्रिया को जन्म दिया । किसी भी सत्य को निकटता से जानने के लिए शोध एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया होती है। समय- समय पर विभिन्न विषयों की खोज और उनके अध्ययन और निष्कर्षो की विश्वसनीयता और प्रमाणिकता भी शोध की मदद से ही संभव हो पाती है। जैसे जैसे समय बीत रहा हैं वैसे वैसे मानव की समस्या भी विकट होती जा रही है। हर दिन एक नई समस्या से उसे दो चार होना पड़ता है। ऐसे में शोध की महत्ता स्वतः ही पैदा हो जाती है। हालांकि मानव की सोच विविधता वाली होती है और उसकी रूचि, प्रकृति, व्यवहार, स्वभाव और योग्यता भिन्न - भिन्न होती है। इस लिहाज से अनेक जटिलताएं भी पैदा हो जाती है। इस लिहाज से मानवीय व्यवहारों की अनिश्चित प्रकृति के कारण जब हम उसका व्यवस्थित ढंग से अध्ययन कर किसी निष्कर्ष पर आना चाहते हैं तो वहां पर हमें शोध का प्रयोग करना होगा। इस तरह सरल शब्दों में कहें तो सत्य की खोज के लिए व्यवस्थित प्रयत्न करना या प्राप्त ज्ञान की परीक्षा के लिए व्यवस्थित प्रयत्न भी शोध कहलाता है। तथ्यों कर अवलोकन करके कार्य- कारण संबंध ज्ञात करना अनुसंधान की प्रमुख प्रक्रिया है। 
शोध का आशय 
       
शोध शब्द अंग्रेजी के रिसर्च का हिन्दी अनुवाद है। यह दो शब्द re और search से मिलकर बना है। re का अर्थ होता है पुनः और search का अर्थ होता है खोज। इस तरह यह दोनों शब्दों का अर्थ होगा पुनः खोज । इसलिए हम इसके अर्थ को स्पष्ट करें तो इसका तात्पर्य होगा पुनः या बार- बार होने वाली खोज । किसी भी विषय या समस्या की प्रमाणिकता को बनाए रखने के लिए बार बार खोज की जाती है।


शोध की परिभाषा
रैडमैन और मोरी ने अपनी किताब  “The Romance of Research” में शोध का अर्थ स्पष्ट करते हुए लिखा है, कि नवीन ज्ञान की प्राप्ति के व्यवस्थित प्रयत्न को हम शोध कहते हैं।
एडवांस्ड लर्नर डिक्शनरी आॅफ करेंट इंग्लिश के अनुसार- किसी भी ज्ञान की शाखा में नवीन तथ्यों की खोज के लिए सावधानीपूर्वक किए गए अन्वेषण या जांच- पड़ताल को शोध की संज्ञा दी जाती है।
स्पार और स्वेन्सन ने शोध को परिभाषित करते हुए अपनी पुस्तक में लिखा है कि कोई भी विद्वतापूर्ण शोध ही सत्य के लिए, तथ्यों के लिए, निश्चितताओं के लिए अन्चेषण है। 


वहीं लुण्डबर्ग ने शोध को परिभाषित करते हुए लिखा है, कि अवलोकित सामग्री का संभावित वर्गीकरण, साधारणीकरण एवं सत्यापन करते हुए पर्याप्त कर्म विषयक और व्यवस्थित पद्वति है।


उपरोक्त परिभाषा के आधार पर कहा जा सकता है कि नवीन ज्ञान की खोज की दिशा में दिए गए व्यवस्थित एवं क्रमबद्व प्रयास शोध है। शोध का अंतिम उद्ेदश्य सिद्धांतों  का निर्माण करना होता है। मनुष्य के जीवन में आने वाली समस्याओं के निदान में भी शोध ही आगे आता है। शोध विज्ञान और वैज्ञानिक पद्धति पर आधारित होता है। इसलिए इस पर आधारित ज्ञान भी वस्तुपरक होता है।


Updated on 15/06/2010
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Types of Research
शोध के प्रकार
शोध का प्रमुख लक्ष्य वैज्ञानिक पद्वति के प्रयोग द्वारा प्रश्नों के उत्तर खोजना है इसका उद्देश्य अध्ययनरत समस्या के अंदर छुपी हुई यर्थाथता का पता लगाना या उस सबकी खोज करना है जिसकी जानकारी समस्या के बारे में नहीं है। वैसे प्रत्येक शोध के अपने विशेष लक्ष्य होते है फिर भी सैल्टिज, जहोदा,सी आर कोठारी आदि ने सामाजिक शोध को निम्नलिखित प्रकारों में विभाजित किया हैं।
1
किसी घटना के बारे में जानकारी प्राप्त करना या इसके बारे में नवीन ज्ञान प्राप्त करना- इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए की जाने वाली शोध को अन्वेषणात्मक अथवा निरूपणात्मक शोध कहते है।
2
किसी व्यक्ति परिस्थिति या समूह की विशेषता का सही चित्रण करने के लिए की जाने वाली शोध को वर्णनात्मक शोध कहते है।
3
किसी वस्तु या घटना के घटित होने की आवृत्ति निर्धारित करना या किसी अन्य वस्तु या घटना के साथ संबंध स्थापित करने के लिए निदानात्मक शोध उपयोग में लाई जाती है।
4
विभिन्न चरो में कार्य कारण संबंधों वाली उपकल्पनाओं का परीक्षण करने के लिए उपकल्पना परीक्षण अनुसंधान या प्रायोगिक शोध उपयोग में लाई जाती है।
         शोध की उपरोक्त श्रेणियों के आधार पर सामाजिक शोध को मुख्यतः निम्न रूपों में विभाजित किया जा सकता है।
1
मौलिक या विशुद्व शोध - शोध के इस प्रकार में सामाजिक जीवन या घटना के संबंध में मौलिक सिद्वांतों और नियमों का अनुसंधान किया जाता है । इसका उद्वेश्य नए ज्ञान की प्राप्ति और बढ़ोत्तरी के साथ पुराने ज्ञान की पुनः परीक्षा द्वारा उसका शुद्वीकरण होता है इस प्रकार की खोज में नए तथ्यों और घटनाओं का अध्ययन किया जाता है। मौलिक शोध के अन्र्तगत नए सिद्वांतों और नियमों की खोज नवीन परिस्थितियों और समस्याओं के उत्पन्न होने पर की जाती है। इसका कारण यह है कि इन नवीन सिद्धांतों का वर्तमान परिवर्तित परिस्थितियों के साथ ज्यादा से ज्यादा मेल बैठ जाए और हम उनके संबंध में अपने नवीनतम ज्ञान के सहारे मौजुद परिस्थितियों की चुनौती का सामना अधिक सफलता पूर्वक कर सकें। शोधकर्ता अपने अनुसंधान के द्वारा जो सामाजिक शोध ज्ञान की प्राप्ति परिमार्जन और परिवर्धन को अपना लक्ष्य मानता है उसे मौलिक शोध कहते है।
2
व्यावहारिक शोध- पी वी यंग के अनुसार खोज का एक निश्चित संबंध लोगों की प्राथमिक आवश्यकताओं और कल्याण से होता है। सिद्धांत और व्यवहार आगे चलकर बहुधा एक दूसरे में मिल जाते है इसी मान्यता के आधार पर सामाजिक शोध के दूसरे प्रकार को व्यावहारिक शोध कहा जाता है। इस प्रकार के व्यावहारिक शोध का संबंध सामाजिक जीवन के व्यावहारिक पक्ष से होता है और वह सामाजिक समस्या के संबंध में ही नहीं बल्कि सामाजिक नियोजन, सामाजिक अधिनियम, स्वास्थ्य रक्षा संबंधी नियम,धर्म, शिक्षा, न्यायालय, मनोरंजन आदि विषयों के संबंध में भी अनुसंधान करता है और इनके संबंध में कारण सहित व्याख्या और ज्ञान से लोगो को रूबरू करवाता है। इसका तात्र्पय यह नहीं है कि व्यावहारिक शोध का कोई संबंध समाज सुधार से,सामाजिक बुराईयों के उपचार से, सामाजिक अधिनियमों को बनाने या सामाजिक नियमों को व्यावहारिक रूप में प्रस्तुत करने से होता है। वह स्वंय यह सब कुछ नही करता है। व्यावहारिक शोध का काम केवल व्यावहारिक जीवन से संबंध विषयों तथा समस्याओं के संबंध में सही ज्ञान देना है। व्यावहारिक शोध हमारे जीवन में आने जाने वाली समस्याओं  और अन्य घटनाओं पर नियंत्रण प्राप्त करने या उनका अन्य उपचार प्राप्त करने के लिए आवश्यक सिद्धांतों के विषय में हमारी चिंतन प्रक्रिया को उभार सकता हैं । सामान्यतः यह देखा गया है कि आश्र्चयजनक प्रयोगसिद्ध व्यावहारिक खोज की व्याख्या या विश्लेषण करने के दौरान शोधकर्ता ऐसे व्यावहारिक सुधारों को प्रस्तुत करता है जो कि अनेक सामाजिक समस्याओं के उपचार में सहायक साबित होते है।
3
क्रियात्मक शोघ- जब सामाजिक शोध अध्ययन के निष्र्कषो को क्रियात्मक रूप देने की किसी भावी योजना से संबंध होता है तो उसे क्रियात्मक शोध कहा जाता है। गुड्डे तथा हॉट के  अनुसार क्रियात्मक शोध उस कार्यक्रम का अंश होता हैं जिसका लक्ष्य उपस्थित अवस्थाओं का परिवर्तित करना होता है। चाहे वो गंदी बस्ती की अवस्था हो या किसी संगठन की प्रभावशिलता हो । इस शोध में निम्न बातों का ध्यान रखना चाहिए।
a. 
अध्ययन के समय घटना या समस्या के वास्तविक क्रिया पक्ष पर ध्यान - इसका तात्पर्य है कि जिन घटना का अध्ययन शोधकर्ता कर रहा है। उसमें शामिल मानवीय क्रियाओं, कारणों, आधारों और नियमों के प्रति वह अत्यधिक सचेत होता है। अगर वह घरेलू हिंसा का अध्ययन कर रहा है तो वह यह जानने का प्रयास करेगा कि परिवार में पुरूष महिलाओं के प्रति कैसा व्यवहार करते है और उसका कारण और आधार क्या है।
b.
समस्या और घटना के संबंध में ज्ञान - शोधकर्ता का विषय से संबंधित घटना के बारे में जानकारी होना चाहिए ऐसा न होने की स्थिति में उस घटना में मौजुद किसी भी क्रियात्मक पक्ष का अनुसंधान करना संभव नही होगा
c. 
सहयोग की प्राप्ति - शोधकर्ता को निरंतर इस बात का प्रयत्न करना होता है कि उसे अपने कार्य में कम से कम विरोध का सामना करना पड़े। क्र्रियात्मक शोध का पहला उद्देश्य विघमान समस्याओं में परिवर्तन लाना होता है । इस प्रयत्न को करते समय संभव है कि समाज के लोगों के स्वार्थ को ठेस लगे। इसलिए शोधकर्ता को इन सब बातों का ध्यान रखना चाहिए ताकि उसे हर संभव मदद मिल सके ।
d.
रिपोर्ट को आरंभ में ही अंतिम रूप न देना- क्रियात्मक शोध की रिपार्ट को आरंभ में ही अंतिम रूप में प्रस्तुत नही करना चाहिए। पहले एक अंतरिम रिपोर्ट को प्रस्तुत करना चाहिए जिससे उसके प्रभावित होनो वाले व्यक्तिओं की प्रतिक्रिया को जाना जा सके । उन प्रतिक्रियाओं के आधार पर अंतिम रिपोर्ट में आवश्यक सुधार करने की गुंजाईश हमेशा रहनी चाहिए।
शोध अभिकल्प का महत्व एवं विशेषताएं -
इसका संबंध सामाजिक शोधों से होता है। अर्थात सामाजिक शोधों के दौरान शोध कार्य करने के लिए सामाजिक शोधों का निर्माण किया जाता है।
2  यह शोधकर्ता को शोध की एक निश्चित दशा का बोध कराता है। इसकी एक रूपरेखा होती है जिसका निमार्ण शोधकार्य करने के पूर्व किया जाता है। यह एक दिग्दर्शक की तरह होता है।
3  इसके द्वारा सामाजिक घटना का सरलीकरण किया जाता है।
4  यह नियत्रंण का कार्य करती है। यह शोध प्रक्रिया में आगे की परिस्थितियों को नियंत्रित करती है।
5  इस प्रक्रिया में कम खर्चा होता है। यह मानवीय श्रम को कम करके समय और लागत को भी कम करती है।
6 यह बाधा निवारक का काम करती है।
Problem in social research
सामाजिक शोध में समस्या का चयन और उसका प्रतिपादन अथवा पहचान सामाजिक अनुसंधान के  सफल संचालन के लिए अत्यंत आवश्यक माना जाता है। ए आइन्सटीन तथा एन इन्फील्ड ने कहा कि समस्या का प्रतिपादन प्रायः इसके समाधान से अधिक आवश्यक हैं। अतः सामाजिक शोध की प्रक्रिया का प्रथम चरण शोध समस्या के चयन तथा उसके प्रतिपादन को माना जाता है।
समस्या का चयन और उसकी परिभाषा-  सामाजिक शोध के अन्र्तगत अनेक समस्याओं का समावेश होता है। इस लिहाज से नवीन शोधकर्ता के लिए समस्या की संर्पूण चयन विधि से पूर्णतः परिचित होना महत्वपूर्ण स्थान रखता है। गुड्डे और स्केट ने अनुभवी वैज्ञानिक की नजर से समस्याओं के छूटने की घटना का उल्लेख अपनी किताब में किया है। उन्होने बताया कि बेल टेलीफोन के अविष्कार के संबंध पढ़कर एक सप्ताह तक सो नहीं सके उन्होने कहा कि यह समस्या उनके समाने एक वर्ष में कई बार आई किंतु वे उसे देखने में असमर्थ रहें।
इस लिहाज से समस्या के चयन के लिए पूरी सर्तकता बरतने की आवश्यकता होती है। यह जरूरी नहीं की शोध के लिए चुना गया विषय पूर्णतः तार्किक हो, समस्या के चयन में शोधकर्ता पर उसका व्यक्तित्व और पर्यावरण दोनों महत्वपूर्ण प्रभाव डालते है। शोधकर्ता समाज से सीधे रूप से जुड़ा होता है। उसके अपने विचार, विश्वास, मूल्य, मनोवृत्तियां ,व्यवहार आदि होेते हैं। शोधकार्य के लिए लगन स्थिरता और तारतम्यता की आवश्यकता होती है। अतः शोध के लिए चुनी गई समस्या आदि शोध कर्ता के व्यक्तित्व संबंधी विशेषताओं के अनुकूल होना अधिक उपयुक्त माना जाता है।
समस्या के चुनाव के दौरान शोधकर्ता के अपने विचार उस पर काफी प्रभाव डालते है। इस लिहाज से ये कहा जा सकता है कि शोध समस्या का चुनाव किसी ना किसी सीमा तक शोध की व्यक्तित्व संबंधित पृष्ठभूमि से प्रभावित होता है। ऐसा शोध जो समाज की नजर में पूर्णरूपेण अनुपयोगी है बेकार माना जाता है। यहां तक कि विशुद्व शोधकर्ता भी समाज कल्याण के उद्देश्यों को अपने ध्यान में रखते हैं। साथ ही समाज के लिए विनाशकारी प्रभाव रखने वाले शोध कार्य को प्रतिबंधित करने का प्रयास करते है।
               
एक शोधकर्ता को शोध समस्या के चयन से पूर्व स्वयं से प्रश्न पूछने चाहिए जो निम्नानुसार होंगें ।
क्या शोध शीर्षक ऐसा है जिस पर कोई कार्य पहले किया जा चुका है। यदि हां तो क्या इस कार्य का कोई लिखित रूप उपलब्ध है। यदि हां तो क्या वह शोधकर्ता की पहुंच में है।

2  
क्या शोध-शीर्षक ऐसा है जिसके प्रति समाज द्वारा विरोध प्रकट किया जा सकता है। 
3  क्या शोध के परिणामों से शोधकर्ता स्वयं भी आय, यश आदि के रूप में कुछ लाभ प्राप्त कर सकते हैं।
4  क्या शोध शीर्षक समाज के उपयोगी है। क्या इसके परिणाम शोधकर्ता की व्यक्तिगत अभिरूचियों, इच्छाओं मूल्यों और मान्यताओं के अनुकूल है।
क्या शोध शीर्षक प्रायोगिक है अर्थात् इस शीर्षक पर शोध कार्य करने के लिए आवश्यक तथ्य की उपलब्धता संभव हो सकेगी
परिस्थिति विश्लेषण अथवा क्षेत्र निर्धारण -
   
प्रत्येक शोधार्थी को परिस्थिति विश्लेषण और अपने शोध के क्षेत्र निर्धारण के लिए निम्नलिखित सीमाओं पर भी विचार करना चाहिए।
1 ज्ञान की शाखा विशेष की सीमाएं - ज्ञान की प्रत्येक शाखा का विभाजन एक विशेष ढंग से किया जाता है। इसी लिए शोधकर्ता को जिस विषय में ज्ञान है उसी विषय में शोध का चयन करना चाहिए
2
भौगोलिक सीमाएं-  शोधकर्ता को बजट और सुविधा के मुताबिक विषय का चुनाव करना चाहिए ताकि शोध के लिए दुर्गम स्थान पर न जाना पड़े।
3
समय सीमा - समाज और शोध के विषय परिवर्तनशील है, इसलिए किसी विषय के चयन के दौरान उसकी समय सीमा को ध्यान रखा जाना चाहिए।

शोधार्थी के समक्ष आने वाली प्रमुख समस्याएं-
1  भारत जैसे विकासशील देश में शोध के लिए संसाधनों की कमी और वैज्ञानिक तौर तरीकों के अभाव में शोधकर्ता को कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है । हालात यह है कि बिना प्रशिक्षण और ज्ञान के ही अनेक लोग शोधकार्य में संलग्न होते है। इसके अलावा सही मार्गदर्शन करने वाले अनुभवी लोगों की कमी भी शोधार्थी के सामने एक बड़ी समस्या है। भारत में शोध कार्य करने के लिए अनुकूल माहौल और नियमित प्रशिक्षण का भी अभाव देखने को मिलता है। जिसके चलते शोध प्रविधि एवं विषय के चयन संबंधी समस्या से शोधार्थी को रूबरू होना पड़ता है।
2  शोधार्थी और शासकीय विभागों में परस्पर समन्वय के अभाव के कारण विभागों में जमा दूसरी शोधार्थी तक नहीं पहुंच पाती है और संदर्भित आंकड़ों  में कमी हमेशा बनी रहती है। इसके लिए विश्वविद्यालय और शोध संस्थान द्वारा वहां के शोधों की जानकारी वाले कार्यक्रम का आयोजन भी नहीं होता है।
कई परिस्थितियों में प्रकाशक पुरानी शोधों की गोपनियता बनाए रखने के लिए प्रकाशित नहीं करता है। इसके अलावा अनेक संस्थानों की कार्यप्रणाली कुछ इस तरह की होती है जिसके चलते वे अपनी जानकारियों को दुरूपयोग होने के डर से सार्वजनिक नहीं करते । ऐसा कोई उपाय इन संस्थानों के द्वारा नहीं किया जाता जिससे वे अपनी जानकारियों को निर्भिकता के साथ सार्वजनिक कर सकें। ये भी एक कारण है। जिसके चलते  शोधार्थियों को समस्या का सामना करना पड़ता है।
लिखित रूप मे सूची उपलब्ध न होने के कारण एक ही विषय पर कई बार शोध कर लिया जाता हैं । अतः शोध के विषयों की सूची ना होना भी शोधकर्ता के सामने एक बड़ी समस्या है।
5  शोध किस तरह किया जाए इसके लिए अभी तक कोई कानून या आचार संहिता नही बनाए गए है। आपस में दो विश्वविद्यालय और विभिन्न संस्थानों के मध्य सूचनाओं के आदान प्रदान की भी कोई आचार संहिता नही बनाई गई है।,इसके कारण आचार संहिता के बगैर ही शोध को अंजाम देना पड़ता है।
6  भारत मे शोधार्थी को एक और समस्या का सामना करना पड़ता है वह है सहायक सुविधा और कम्प्यूटर के प्रयोग का अभाव स्वयं के सिद्धहस्त न होने के कारण उसे इन सब पर निर्भर रहना पड़ता है उसके कारण समय अधिक लगता है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग इस समस्या को दूर करने के लिए बेहतर कदम उठा सकता है।
7  अनेक शहरों में पुस्तकालय की कमी भी एक बड़ी समस्या है। ज्यादातर शहरों में इनका अभाव है जहां पुस्तकालय उपलब्ध है वहंा भी पुस्तकों और संर्दभ ग्रंथों की कमी का सामना शोधार्थी को करना होता है। इन सब कारणों की वजह से शोधार्थी को ज्यादा समय और उर्जा का प्रयोग आंकड़ों की खोज और एक़ित्रकरण में करनी पड़ती है।
यह भी देखने में आता है कि ज्यादातर लायब्रेरी में पुराने नियमों और कानून की जानकारी उपलब्ध नही होती है। इस समस्या से निपटने के लिए सरकारी प्रकाशन को शोध संबंधित दस्तावेज सभी पुस्तकालयों में जल्दी से जल्दी उपलब्ध करवाने चाहिए।
9  शोध के दौरान जरूरत पड़ने पर सरकारी प्रकाशन और अन्य संस्थानों द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट और आंकड़े समय पर उपलब्ध नही करवाए जाते हैं। शोधार्थी को एक और समस्या का सामना करना पड़ता है वह है आंकड़ो से संबंधित प्रकाशित महत्वपूर्ण तथ्यों का न मिल पाना।
10  तथ्यों के एकत्रिकरण के दौरान नए विचारों की कमी भी एक समस्या होती है। इसके अलावा तथ्यों और आंकड़ों के एकत्रिकरण में अपनाई जाने वाली प्रक्रियाओं की कमी भी एक बड़ी समस्या है।  

Testability of hypothesis

Hypothesis
समाजिक घटनाओं के अध्ययन में उपकल्पना का महत्वपूर्ण स्थान होता है। इसका निर्माण प्रयोग और उपादेयता वैज्ञानिक पद्धति का एक महत्वपूर्ण चरण होता है। प्राकल्पना के अभाव में विषय की दिशा और उसका क्षेत्र अनिश्चित रहता है जिसके कारण शोधकर्ता दिशाविहीन हो जाता है। इसलिए शोधकर्ता के लिए यह आवश्यक होता है कि वह किसी अन्य अपरिचित शोध कार्य में यूं ही कदम ना रखें बल्कि अपनी कल्पना, अनुभव या किसी अन्य स्त्रोतों के आधार पर एक तर्क वाक्य का निर्माण कर ले जिसे शोध के दौरान परिक्षित किया जाता है।  पी वी यंग ने कामचलाउ प्राकल्पना के निर्माण को वैज्ञानिक पद्धति का पहला चरण बताया है। गुड्डे और हॉट के मुताबिक सामाजिक शोध में एक अच्छी प्राकल्पना का निर्माण का अर्थ शोध के आधे कार्य का पूरा हो जाना माना जाता है।
प्राकल्पना का शाब्दिक अर्थ - प्राकल्पना अंग्रेजी के शब्द हाइपोथिसिस का हिंदी अनुवाद है। यह शब्द ग्रीक भाषा के दो शब्दों से मिलकर बनता है। इसका पहला शब्द ीलचव है अर्थात इमसवू है जिसका अर्थ होता हैं नीचे तथा दूसरा शब्द जीमेपे अर्थात जीमवतल है जिसका अर्थ होता है विचार या सिद्धांत। इस प्रकार इसका पूर्ण अर्थ हुआ इमसवू जीमवतल अर्थात सिद्धांंत से नीचे या सिद्धांत का पूर्व कथन। प्राकल्पना में भी प्राक् का अर्थ पूर्व और कल्पना का अर्थ विचार यानि पूर्व का विचार या सिद्धांत ही होता है। सरल शब्दों में प्राकल्पना का अर्थ होता है एक ऐसा विचार या सिद्धांत जिसे शोधकर्ता अध्ययन के लक्ष्य के रूप में रखता है और उसकी जांच करता है।
अर्थ - प्राकल्पना को सामान्यतः एक कामचलाउ लोक सामान्यीकरण माना जाता है जिसकी शोध के दौरान परीक्षा की जाती है। वैज्ञानिक आधारों पर एक प्राकल्पनाओं को दो से अधिक चरों के मध्य संबंध का अनुमानित विवरण कहा जाता है। प्रारंभिक जानकारी के आधार पर किया गया पूर्वानुमान जिसके आधार पर संभावित शोध को एक निश्चित दिशा प्रदान की जा सके, प्राकल्पना कहलाता है और भी स्पष्ट रूप में यह कहा जा सकता है कि एक प्राकल्पना दो या दो से अधिक चरों के बीच होने वाले संबंध का अनुभावात्मक रूप से परीक्षा करने योग्य कथन है। वैज्ञानिकों ने प्राकल्पना को एक अस्थायी अनुमान, कामचलाउ सामान्यीकरण, कलात्मक विचार, पूर्वानुमान और अनुमानात्मक कथन बताया है। प्राकल्पना एक प्रकार का सर्वोत्तम अनुमान होता है जो कुछ शर्ते रखता है जिनके परिक्षण की आवश्यकता होती है।

प्राकल्पना की परिभाषा -

प्राकल्पना को विभिन्न विद्वानो ने अपने अपने दृष्टिकोणों से परिभाषित किया है जिनमें से कुछ प्रमुख परिभाषाए निम्नलिखित है।
 
लुण्ड बर्ग के अनुसार प्राकल्पना एक सामयिक अथवा कामचलाउ सामान्यीकरण या निष्र्कष है। जिसकी सत्यता की परीक्षा बाकी हैं। आरंभिक स्तर पर प्राकल्पना कोई भी अनुमान, कल्पनात्मक विचार, सहज ज्ञान या और कुछ हो सकता हैंै, जो कि क्रिया या शोध का आधार बन जाए ।
बोगार्डस के मुताबिक प्राकल्पना परीक्षण के लिए प्रस्तुत की गई प्र्रस्थापना है।
मान के अनुसार प्राकल्पना एक अस्थायी अनुमान है।
बैली के अनुसार एक प्राकल्पना एक ऐसी प्रस्थापना है जिसे परीक्षण के रूप में रखा जाता है। और जो दो या दो से अधिक परिवत्र्यो के विशिष्ट संबंधों के बारे में भविष्यवाणी करती है।
डोब्रिनर के मुताबिक प्राकल्पनाएं ऐसे अनुमान है जो यह बताते हैं कि विभिन्न तत्व अथवा परिवत्र्य किस प्रकार अन्र्त संबंधित है।
विशेषताएं-
अ. गुड्डे और हॉट ने प्राकल्पनाओं की निम्नलिखित विशेषताएं बताई है।
1 स्पष्टता - प्राकल्पनाएं अवधारणाओं के दृष्टिकोण से स्पष्ट होना चाहिए। किसी भी स्तर पर अस्पष्टता वैज्ञानिक सिद्धांत के प्रतिकूल होती है।
2 अनुभव सिद्धता - अध्ययन में प्राकल्पना ऐसी होनी चाहिए जिसकी तथ्यों द्वारा जांच की जा सके। प्राकल्पना अगर आर्दशों को स्पष्ट करने वाली होगी तो उसकी सत्यता की परीक्षा आसानी से की जा सकती है। प्राकल्पना ऐसे तथ्यों, कारकों एवं चरों से संबंधित होना चाहिए जो समाज या अध्ययन क्षेत्र में जाकर एकत्रित किए जा सकें साथ ही उनकी विश्वसनीयता की जांच भी की जा सके।
3 विशिष्टता-  सामान्य प्राकल्पनाओं द्वारा सही और सटीक निष्कर्ष पर पहुंचना संभव नहीं इसलिए प्राकल्पनाओं को विशिष्ट और उपयोगी होना चाहिए। प्राकल्पना अध्ययन विषय के किसी विशेष पहलु से जुड़ी होना चाहिए। प्राकल्पना का सीमित, विशिष्ट और निश्चित पक्ष से संबंधित होना चाहिए।
4 उपलब्ध प्रविधियों से संबंद्ध- प्राकल्पना एक प्रस्थापना होती है। जो तथ्यों का परस्पर कारण प्रभाव संबंध बताती है और जिनकी जांच करना अभी बाकी है। जो कि वैज्ञानिक प्रविधियों द्वारा की जाती है। प्राकल्पना का निर्माण इस बात को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए कि उसकी सत्यता की जांच उपलब्ध प्रविधियों के द्वारा की जा सके।
5 समूह से संबंधित होना- सिद्धांतों से संबंधित प्राकल्पनाओं को सिद्धांत के समूह से संबंधित होना चाहिए।
6 सरलता- किसी भी प्राकल्पना में सरलता बनाए रखने के लिए सीमित कारणों का अध्ययन करना चाहिए। अनावश्यक रूप से अधिक कारकों को शोध में शामिल नहीं करना चााहिए। पीवी यंग के अनुसार सरलता एक तेज धार वाला यंत्र है जो व्यर्थ की प्राकल्पना और विवेचना को  काट भी सकता है।
7 मार्गदर्शन के लिए भी प्र्राकल्पना उपयोगी होना चाहिए।
8 प्राकल्पना किसी विषय के संबंध में अस्थायी हल देने का साधन हैं
9 प्राकल्पना उपलब्ध पद्धतियों और साधनों से संबंधित होना चाहिए।
10 परिकल्पना में अतिशोयक्तिपूर्ण भाषा का उपयोग नहीं किया जाना चाहिए।
11 प्रयोगसिद्धता का गुण होना चाहिए।
12 प्राकल्पना व्यावहारिक और यर्थाथ पर आधारित होना चाहिए।
13 प्राकल्पना को पूर्व में निर्मित सिद्धातों पर खरा उतरना चाहिए।
14 प्राकल्पना समस्या से सीधे संबंधित होना चााहिए।
15 प्राकल्पना और उसके तहत एकत्र किए गए तत्व उपयोगी होना चाहिए।
प्राकल्पना का विकास-
किसी भी वस्तु या अवधारणा का विकास एकाएक न होकर कुछ चरणों और प्रक्रियाओं से गुजर कर होता है। प्राकल्पना भी इसका अपवाद हैंं। एक विद्वान के मुताबिक प्राकल्पनाओं का विकास करते समय इस बात को ध्यान में रखा जाना चाहिए कि प्राकल्पनाओं में लचीलापन बना रहे इनके विभिन्न विकल्पोें को स्वीकार और अपवादांें को स्पष्ट किया जाए । इस बात का खयाल रखा जाए कि अधिकतर सामाजिक परिस्थितियों में हम उन कारकों का सफलतापूर्वक पता लगा सकते हैं। जिनकी हमें तलाश है।
आमतौर पर प्राकल्पना के विकास की सामान्य प्रक्रिया निम्नलिखित चरणों में पूरी होती है।
सभी विकल्पीय कार्यो को ज्ञात किया जाना चाहिए ।
2  शोध से संबंधित महत्वपूर्ण चरों का चयन किया जाना चाहिए।
प्राकल्पना से संबंधित आनुभविक तथ्यों का संकलन किया जाना चाहिए।
प्राकल्पना की स्थापना की जाना चाहिए।
5  प्राकल्पनाओं के आशय का ज्ञान होना चाहिए ।
व्यावहारिक प्राकल्पनाओं का निर्माण करना चाहिए।
7  व्यावहारिक प्राकल्पनाओं के परीक्षण के लिए परिस्थितियों प्रविधियों एवं उपकरणों आदि का उल्लेख किया जाना चाहिए।
8  प्राकल्पना की जांच के लिए उपयुक्त माप का चयन किया जाना चाहिए।
9  मापों के प्रयोग से संबंधित मान्यताओं को निर्धारित किया जाना चाहिए।
10  प्राकल्पनाओं के उपयुक्त तथ्यों को एकत्र करके सत्यता की जांच की जानी चाहिए।
  
उपर्युक्त चरणों से होकर ही प्राकल्पना का विकास होता है।
प्राकल्पना के प्रकार-
हेष ने परिकल्पना को दो भागों में विभक्त किया है।
1 सरल प्राकल्पना- जब किन्ही दो चरों में परस्पर सहसंबंधों का अध्ययन और परीक्षण किया जाता है इसे सरल प्राकल्पना कहा जाता है।
2 जटिल प्राकल्पना- इस तरह की प्राकल्पना में एक से अधिक चरों के सहसंबंधों का अध्ययन किया जाता है।
गुड्डे और हॉट ने प्राकल्पना को तीन प्रकारों में विभाजित किया है।
1 आनुभाविक एकरूपता से संबंधित प्राकल्पनाएं- इसके अन्र्तगत वे प्राकल्पनाएं आती हैं जो अनुभवात्मक समरूपता के अस्तित्व की विवेचना करती है। इस स्तर की प्राकल्पनाएं सामान्य तथा सामान्य ज्ञान पर आधारित कथनो की वैज्ञानिक परी़क्षा करती है।
2 जटिल आदर्श प्रारूप से संबंधित प्रकल्पनाएं-  इन प्राकल्पनाओं का उद्देश्य प्रचलित तार्किक और अनुभवात्मक एकरूपताओं के संबंधों का परीक्षण करने के लिए किया जाता है। यह प्राकल्पनाएं विभिन्न कारको में तार्किक अन्र्तसंबंध स्थापित करने के उद्देश्य से बनाई जाती है। यथार्थ में अधिक जटिल शोध के क्षेत्र में फिर से शोध करने के लिए उपकरणों और समस्याओं का निर्माण करना इस प्रकार की प्राकल्पनाओं का महत्वपूर्ण कार्य है।
3 विश्लेषणात्मक चरों से संबधित प्राकल्पनाएं- इस प्रकार की प्राकल्पनाएं चरों के तार्किक विश्लेषण के अलावा विभिन्न चरों में आपसी गुणों का भी विश्लेषण करती है। इनका उद्देश्य प्रभावों का तार्किक आधार तलाश करना भी होता है। विश्लेषणात्मक चरों से संबंधित प्राकल्पनाएं बहुत अधिक अमूर्त प्रकृति की होती हैं। इनमें चर का अन्य चरों पर क्या प्रभाव होता है। तथा चरों का आपस में क्या प्रभाव होता हैं इसका गहनता से अध्ययन किया जाता है। इनका प्रयोग विशेष रूप से प्रयोगात्मक शोधों के लिए किया जाता है। ग्रामीण विकास कार्यक्रम, जाति व्यवस्था, नेतृत्व और निर्धनता आदि ऐसी समस्याए है जिनका अध्ययन अनेक चरों से संबंधित होता है। इसलिए इसमें विश्लेषणात्मक चरों से संबंधित प्राकल्पनाओं का प्रयोग किया जाता है।
एम एच गोपाल ने प्राकल्पनाओं को दो भागों में बांटा है।
1 मौलिक प्राकल्पना - इसमें निम्न स्तरीय विचारधाराएं होती है। जो ज्यादातर संकलित की जाने वाली सामग्री को बताती है।
2 विशुद्व प्राकल्पनाएं- ये वह प्राकल्पनाएं है जो वास्तविक रूप से अधिक महत्वपूर्ण होती है। इन प्राकल्पनाओं को निम्न उपभागों में बांटा गया है।
ं सामान्य स्तरीय प्राकल्पनाएं
 
जटिल आर्दश प्राकल्पनाएं 
 
जटिलता अन्र्तसंबंधित चर प्राकल्पनाएं।
मैक गुइगन ने इसे दो भागों में विभक्त किया है।
1
सार्वभौमिक प्राकल्पनाएं- सार्वभौमिक कल्पनाएं वो है, जिनका संबंध अध्ययन किए जाने वाले सभी चरों से सभी समय एवं सभी स्थानों पर रहता है।

2
अस्तित्वात्मक प्राकल्पना- जो प्राकल्पना चरों के अस्तित्व को उचित साबित करती है, उसे आस्तित्वात्मक प्राकल्पना कहते हैं।


Research Plan
किसी भी सामाजिक शोध को संपादित इसलिए किया जाता है ताकि किसी न किसी उद्देश्य की पूर्ति हो सके अर्थात इस उद्देश्य का स्पष्टीकरण और विकास शोध के दौरान निश्चित नहीं होेता बल्कि उसके पहले ही निर्धारित कर लिया जाता है। एकॉफ के अनुसार निर्णय क्रियान्वित करने की स्थिति आने के पूर्व ही निर्णय निर्धारित करने की प्रक्रिया को अभिकल्प कहते है। उद्देश्य की पूर्ति के पहले ही उसका निर्धारण करके शोध कार्य की जो रूप रेखा बनाई जाती है उसे शोध अभिकल्प कहते है। शोध जब किसी सामाजिक घटना से संबंधित होता है तो उसे सामाजिक शोध अभिकल्प कहा जाता है। प्रत्येक शोध का क्रमबद्व और प्रभावपूर्ण ढंग से न्यूनतम प्रयासों, समय और लागत के साथ संचालित करने के लिए अभिकल्प का निर्माण आवश्यक होता है। डेवच और कुक के अनुसार वास्तव में जब अध्ययन करने वाली समस्या का का प्रतिपादन किया जाता है तभी सूचना के उन प्रकारों का विशिष्ट विवरण भी प्रस्तुत किया जाता हैं जो यह भरोसा दिलाते है कि प्रस्तावित प्रश्नों के उत्तर प्रदान करने के लिए आवश्यक प्रमाण उपलब्ध हो जाएंगे, जबकि शोध अभिकल्प का निर्माण करते समय आवश्यक प्रमाणों के संग्रह में गलतियों से यथा संभव बचना तथा प्रयासों, समय और धन को कम करना चाहिए।
शोध अभिकल्प की परिभाषाएं-
कर्लिजर के मुताबिक शोध अभिकल्प खोज की योजना, संरचना एवं रणनीति है। जिसकी रचना इस प्रकार की जाती है कि शोध प्रश्नों के उत्तर प्राप्त हो सके तथा विविधता को नियंत्रित किया जा सके । यह अभिकल्प या योजना शोध की संपूर्ण रूपरेखा या कार्यक्रम है जिसके तहत प्रत्येक चीज की रूपरेखा सम्मिलित होती है, जो शोधकर्ता प्राकल्पनाओं के निर्माण और उनके परिचालानात्मक अभिप्रायों से लेकर आकड़ो के अन्तिम विश्लेषण तक करता है।
एकॉफ के अनुसार प्ररचित करना नियोजित करना है, अर्थात अभिकल्प उस परिस्थिति के उत्पन्न होने के पूर्व निर्णय लेने की प्रक्रिया है, जिसमें निर्णय का लागू किया जाना है यह एक संभावित स्थिति का काबू में लाने की ओर निर्देशित करने की पूर्वगामी प्रक्रिया है।
डेवच एवं कुक के मुताबिक एक शोध अभिकल्प आंकड़ों के संकलन और विश्लेषण के लिए उन दशाओं का प्रबंध करती है जो शोध के मकसदों की संगतता को कार्य रितियों में आर्थिक नियंत्रण के साथ सम्मिलित करने का उद्देश्य रखती है।
शोध अभिकल्प के चरण - शोध अभिकल्प का निर्माण करना आसान काम नहीं है इसलिए शोधकर्ता को विषय का पर्याप्त ज्ञान और अनुभव होना चाहिए। शोध अभिकल्प का निर्माण करते समय निम्न चरणों का ध्यान रखना चाहिए।
1  शोध अभिकल्प का निर्माण करते समय पहली आवश्यकता इस बात की होती है कि शोध समस्या के बारे में स्पष्ट एवं विस्तृत ज्ञान शोधकर्ता को होना चाहिए।
शोध अभिकल्प का निर्माण करते समय दूसरी आवश्यकता इस बात की होती है कि शोधकर्ता को अध्ययन के विशिष्ट उद्देश्यों की स्पष्ट जानकारी होना चाहिए।
तीसरी आवश्यकता इस बात की होती है कि शोधकर्ता को उन ढंगों और कार्य विधियों की विस्तृत जानकारी होना चाहिए जिनका प्रयोग करते समय शोध के लिए आवश्यक आकड़ों के संग्रह के मार्ग में आने वाली विभिन्न समस्याओं का समाधान प्रस्तुत किया जाएगा।
शोध अभिकल्प का निर्माण करने के लिए चैैथी आवश्यकता इस बात की होती है कि  आकड़ों के संग्रह के लिए विस्तृत और सुनियोजित योजना होना चाहिए
शोध अभिकल्प का निर्माण करने के लिए पांचवी आवश्यकता इस बात की होती है कि  आंकड़ों के विश्लेषण के लिए उपयुक्त योजना बना लेनी चाहिए।
जहां तक शोध अभिकल्प की रचना का सवाल है,यह कहा जा सकता है कि इसे अनेक चरणों से होकर गुजरना पडता है। इस प्रकार इन चरणों को ही शोध का अनिवार्य अंग माना जाता हैं। इन चरणों की सहायता से एक शोध अमिकल्प का निर्माण किया जा सकता है।  शोध अभिकल्प के अन्य चरण इस प्रकार हैं-
1  इसमें सर्वप्रथम अघ्ययन समस्या का प्रतिपादन किया जाता है।
2  दूसरे चरण के तहत वर्तमान मे जो शोध कार्य किया जा रहा है उसे शोध समस्या से स्पष्ट रूप से संबधित किया जाये। अर्थात इस चरण में शोध कार्य को शोध समस्या से स्पष्ट रूप से संबंधित किया जाता है।
तीसरे चरण में वर्तमान में जिस शोध कार्य को करना है उसकी सीमाओं को स्पष्ट रूप से निर्धारित किया जात है।
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चैथे चरण में शोध के विभिन्न क्षेत्रों का  विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया जाता है। अर्थात इस चरण में शोध के विभिन्न क्षेत्रों का पता लगाकर उसका वृहद विवरण प्रस्तुत किया जाता है।
5   पांचवे चरण में शोध के परिणामों के प्रयोग के विषय में निर्णय लिया जाता है।
6  छंठवे चरण में अवलोकन, विवरण, तथा परिमापन के लिए उपयुक्त चरों का चयन करना चाहिए। इन्हे स्पष्ट रूप से परिभाषित किया जाना चाहिए।
इस चरण में अध्ययन क्षेत्र और समग्र का उचित चयन होना चाहिए तथा इन्हे स्पष्ट रूप से परिभाषित करना चाहिए।
8  आठवें चरण में अध्ययन के प्रकार और विषय क्षेत्र के विषय का निर्णय लिया जाना चाहिए।
9  इस चरण में उपयुक्त विधियों और प्रविधियों का चयन किया जाना चाहिए।
10  इसमें अध्ययन में निहित मान्यताओं और  प्राकल्पनाओं क स्पष्ट उल्लेख किया जाना चाहिए।
11  इसमें प्राकल्पनाओं की परिचालनात्मक परिभाषा करते हुए उसे इस रूप में प्रस्तुत करना चाहिए कि वह परीक्षण के योग्य हो ।
12  बारहवें चरण में यह है कि इसमें शोध के दौरान प्रयोग किए जाने वाले प्रलेखों, रिपोर्टो और अन्य पत्रों का अवलोकन किया जाता हैं।  ऐसा करना एक अच्छे शोध के लिए आवश्यक होता है।
13  इस चरण में अध्ययन के प्रभावपूर्ण उपकरणों का चयन किया जाता है। और इनका निर्माण कर व्यवस्थित पूर्व परीक्षण किया जाता है।
14  चैदहवें चरण में आकड़ों के एक़ित्रकरण का संपादन किस प्रकार किया जाएगा इसकी विस्तृत व्यवस्था का उल्लेख किया जाता है।
15  शोध अभिकल्प के इस चरण में आंकड़ों के वर्गीकरण के लिए उच्च श्रेणियों का चयन कर उनकी परिभाषा की जाती है।
16  इस चरण में आकड़ों के संकेतीकरण के लिए समुचित व्यवस्था का विवरण तैयार किया जाता है।
17  इस चरण में आकड़ों का प्रयोग योग्य बनाने के लिए संपूर्ण प्रक्रिया की समुचित व्यवस्था का विकास किया जाता है।
18  अठाहरवें चरण में आकड़ों के गुणात्मक और संख्यात्मक विश्लेषण के लिए विस्तृत रूपरेखा तैयार की जाती है।
19  इस चरण में अन्य उपलब्ध परिणामों की पृष्ठभूमि में समुचित विवेचन की कार्य विधियों का उल्लेख किया जाता है।
20  बीसवें चरण में शोध प्रतिवेदन के प्रस्तुतिकरण के बारे में निर्णय लिया जाता है।
21  इस चरण में संपूर्ण शोध प्रक्रिया में लगने वाले समय, धन और मानवीय श्रम का अनुमान लगाया जाता है।  इसी चरण में प्रशासकीय व्यवस्था और विकास का  भी अनुमान लगाया जाता है।
22  इस चरण में जरूरत के मुताबिक पूर्व परीक्षणों और पूर्वगामी अध्ययनों का प्रावधान किया जाता है।
23  तेईसवें चरण में कार्यविधियों से संबंधित संपूर्ण प्रक्रिया, नियमों और उपनियमों को विस्तारपूर्वक तैयार किया जाता है।
24  इस चरण में कर्मचारियों और अध्ययनकर्ता के प्रशिक्षण के तरीकें और कार्यविधियों का उल्लेख किया जाता है।
25 
शोध अभिकल्प के इस आखिरी चरण में ऐसा प्रावधान किया जाता है ताकि समस्त कर्मचारी और अध्ययनकर्ता आपस में सामंजस्य और ताल-मेल स्थापित करते हुए संतोषप्रद ढंग से शोध कार्यो का संपादन कर सकें। 


शोधकर्ता के गुण
शोधकार्य एक कठिन कार्य माना जाता है। शोध कार्य के लिए केवल किताबी ज्ञान नहीं बल्कि शोधकर्ता में अनेक बाहरी और आंतरिक गुणों का होना भी परम आवश्यक है।शोध कार्य सामाजिक घटना से संबंधित होता है। और सामाजिक घटनाएं अमूर्त,परिवर्तनशील, जटिल और व्यक्ति प्रधान होती है इसलिए इनका अध्ययन प्राकृतिक या भौतिक घटनाओं के अध्ययन से नहीं किया जा सकता है। सामाजिक घटनाओं के अध्ययन का मतलब वास्तव में मानव द्वारा मानव के ही विषय में अध्ययन है। इससे यह पता चलता है कि जिस समस्या या विषय के संबंध में शोधकर्ता शोध करता है। उस समस्या या विषय का वह स्वयं अंग बन जाता है। प्रत्येक शोधकर्ता को पूर्णतया निष्पक्ष, तटस्थ और उदासीन रहकर अध्ययन करना चाहिए। एक अच्छे शोधकर्ता के अंदर कुछ गुणों और योग्यता का रहना आवश्यक माना जाता है जो निम्नानुसार हैं।
 शारीरिक व व्यक्तिगत गुण- यह मानना गलत है कि सामाजिक शोध एक शिक्षा संबंधित कार्य है इसलिए इसका कोई भी संबंध शोधकर्ता की शारीरिक विशेषताओं से होता है। शोधकार्य की सफलता में शारीरिक गुणों का भी अपना महत्व होता है शारीरिक गुणों में निम्न लिखित पहलुओं पर ध्यान दिया जाता है।
1 आकर्षक व्यक्तित्व-  अच्छे व्यक्तित्व का किसी पर एक स्वाभाविक प्रभाव देखने को मिलता है। हंसमुख चेहरा, अच्छी आदतें और अच्छा व्यवहार प्रतिमान जो कि आकर्षक व्यक्तित्व के लिए आवश्यक है। यह गुण रखने वाले व्यक्ति किसी भी सूचनादाता से सत्य और विश्वसनीय तथ्य प्राप्त करने में सफल रहते है। एक शोधकार्य की सफलता सत्य और यर्थाथ तथ्यों, सूचनाओं या आकड़ों पर पूरी तरह निर्भर करती है।
2 स्वास्थ्य - एक सफल शोधकर्ता के शारीरिक गुणों के अंर्तगत अच्छे स्वास्थ्य का होना आावश्यक माना जात है शोधकर्ता को अपने शोधकार्य के दौरान कठोर परिश्रम और दौड़ धूप की आवश्यकता होती है जो कि एक अच्छे स्वास्थ्य वाला व्यक्ति ही कर सकता है।
3 अध्यवसाय,साधनशील- एक सफल शोधकर्ता के पास समस्त संसााधन होना चाहिए। उसके अंर्तगत किसी भी हालत में हिम्मत नही हारने का गुण होना चाहिए। शोधकार्य के दौरान कई कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है जिसके चलते कई बार निराशाजनक और अस्वाभाविक घटनाएं भी घट जाती है। इन सबके बीच शोधकर्ता का अपना अध्यवसाय उसे मार्ग दिखाकर आगंे ले जाती है। कई बार सूचनादाता समय देने के बाद भी प्रश्नों के उत्तर को किसी प्रकार से समाप्त करके शोधकर्ता को टालने का प्रयास करते है। अतः निश्चित रूप से शोधकर्ता के लिए साधनशील होना आवश्यक है ।
4 सहनशीलता- एक सफल शोधकर्ता के अंदर सहनशीलता का गुण होना चाहिए। अपने शोधकार्य के दौरान शोधकर्ता को कई तरह के कष्टों का सामना करना पड़ता है। इस दौरान कई सूचनादाता उससे बुरे व्यवहार के साथ टीका- टिप्पणियां भी करते है। इन सब परिस्थितियों से निपटने के लिए शोधकर्ता में सहनशीलता होना चाहिए।
बौद्विक गुण-  एक अच्छे शोधकर्ता के लिए शारीरिक और व्यक्तिगत गुणों का होना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि बौद्विक गुणों का होना भी आवश्यक है। ये गुण निम्नलिखित है-
1 रचनात्मक कल्पनाशक्ति - एक शोधकर्ता की कल्पनाशक्ति अत्यंत प्रबल होना चाहिए । शोधकर्ता के लिए केवल बुद्विमान होना ही पर्याप्त नही है बल्कि कल्पनाशक्ति भी तीव्र होना चाहिए। क्योंकि बिना प्रखर कल्पनाशक्ति के शोधकर्ता सामाजिक समस्या में न तो गहरा पैठ कर सकता है और न ही अपने अध्ययन कार्य में व्यावहारिकता ला सकते हैं। यही कारण है कि एक अच्छे शोधकर्ता के पास रचनात्मक कल्पनाशक्ति होना आवश्यक है।
2 तर्कशक्ति- सामाजिक शोध में अलग अलग विचारों और मानसिकता वाले लोगों से सूचना प्राप्त करनी पड़ती है। इसलिए अनिवार्य रूप से शोधकर्ता में पर्याप्त तर्कशक्ति होना चाहिए, जिससे सूचनादाताओं से प्राप्त सूचनाओं को तार्किक ढंग से जोड़क वह कुछ सामान्य निष्कर्षो को निकाल सके। सूचनादाता से सूचना एकत्रित करते समय कई बार उनके द्वारा पुछे गए कई टेढ़े मेढ़े प्रश्नों का सामना करना पड़ता है। यदि तार्किक ढंग से इन सब प्रश्नों का संतोषप्रद उत्तर शोधकर्ता देने में असफल होता है जो उसे एक विषम परिस्थिति का सामना करना पड़ता है और तथ्यों के व्यवस्थित संकलन में बाधा उत्पन्न हो जाती है। अतः उन परिस्थिति का सामना करने के लिए शोधकर्ता के अंदर तर्कशक्ति का गुण होना आवश्यक होता है।
3 शीध्र निर्णय लेने की योग्यता- एक सफल शोधकर्ता के अंदर शीध्र निर्णय लेने की क्षमता होना आवश्यक हैै। शोधकार्य के दौरान उसे अपरिचित परिस्थितियों में काम करना होता है। इसलिए यदि उन दौरान आवश्यकतानुसार लाभप्रद निर्णय करने की योग्यता उसमें नहीं है तो वह सफल शोधकर्ता नही बन सकता।
4 विचारों की स्पष्टता - एक सफल शोधकर्ता के लिए बुद्विमान तथा विचारशील होना परम आवश्यक है। उसमें यह योग्यता होनी चाहिए कि वह जटिल परिस्थितियों तथा तथ्यांें को समझकर उनके सबंध में अपने विचारों कोे स्पष्ट रूप में प्रस्तुत कर सकें। इस योग्यता के बगैर न तो वह तथ्यों की विश्लेषणात्मक विवेचना स्पष्ट रूप में कर सकता है और न ही अपनी रिपोर्ट में समस्या या उसके समाधानों के संबंध में स्पष्ट विचारों को प्रस्तुत कर सकता है। अतः  एक सफल शोधकर्ता में विचारों की स्पष्टता का होना आवश्यक है।
5 सांख्यिकीय योग्यता- एक शोधकर्ता को अपने शोध के दौरान एकत्र किए गए आकड़ों , सूचना, तथ्यों आदि को वर्गीेकृत, सारणीकृत आदि करने पड़ते हैं यह बहुत नीरस काम है पर इसके बिना शोध काम में यर्थाथता नही आ सकती।
6 बौद्विक ईमानदारी- एक सफल शोधकर्ता में यह गुण भी होना आवश्यक है  इसका कारण यह है कि वह जिन सामाजिक घटना का शोध करता है। उसका वह खुद भी एक अंग होता है साथ ही इन घटनाओं के संबंध में भी इनके द्वारा व्यक्त किए गए विचारों, निरीक्षणों के मध्य उनकी अपनी व्यक्तिगत भावनाओं, आदर्शो और मूल्यों के आने की संभावना बनी रहती है ऐसी स्थिति में यदि शोधकर्ता में बौद्विक ईमानदारी नहीं है तो उसका शोधकार्य भी परिशुद्ध नही हो सकता । बौद्विक ईमानदारी होने से शोधकर्ता समाज में प्रचलित घारणाओं के विपरित भी घटना विशेष की वास्तविकताओं और अपनी स्वतंत्र राय को प्रस्तुत कर सकता है।
व्यवहार संबंधित गुण-
                       शारीरिक और मानसिक योग्यता के साथ- साथ शोधकर्ता को व्यवहार कुशल भी होना चाहिए। शोध के दौरान उसे वास्तविक व्यक्तियों से संपर्क स्थापित करके उनमें विश्वास की भावना जगा कर उन्हे अपने अध्ययन के उद्देश्यों के प्रति आकर्षित करके विषय के बारे में तथ्यों को एकत्रित करना पड़ता है इसके लिए यह जरूरी है कि उसका व्यवहार आकर्षक और प्रभावित करने वाला हो।
1 परिमार्जित व्यवहार - एक सफल शोधकर्ता का व्यवहार परिमार्जित होने के साथ शिष्टाचारपूर्ण होना चाहिए ताकि वह दूसरों को सहज रूप से अपनी ओर आकर्षित कर मित्र बना सके । इस प्रकार वह सूचनादाताओं से किसी भी प्रकार के तथ्यों और सूचनाओं का प्राप्त करने में सफल हो सकता है। अतः परिमार्जित व्यवहार सफल शोधकर्ता का आवश्यक गुण माना जाता है।
2 आत्म नियत्रंण-  शोध के दौरान शोधकर्ता को कई विपरित परिस्थितियों से निपटना पड़ता है इस लिए एक सफल शोधकर्ता में आत्म-नियंत्रण होना चाहिए। शोध कार्य के दौरान सूचनादाताओं से उसे कई बार अपशब्दों को भी सुनना पड़ता है जिसके चलते उसके आंतरिक विचारों, भावनाओं और आर्दशों को आघात पहुंचता है।
3 व्यवहार में अनुकूलनशीलता- सामाजिक शोध के दौरान शोधकर्ता को कई प्रकार से अलग अलग व्यक्तित्व के लोगों से संपंर्क करना होता है। इसलिए एक ही प्रकार का व्यवहार सभी को समान रूप से प्रभावित नहीं कर सकता। जैसे की गंभीर व्यक्ति गंभीरता पसंद करेगा वहीं कौतुकप्रिय व्यक्ति के लिए ऐसा व्यवहार अरूचिकर होगा। परंतु कठिनाई यह है कि उसे दोनों तरह के लोगों से ही सूचना लेना है। इसलिए उसके व्यवहार का लचीला होना जरूरी है। जिसके चलते वह हर स्थिति में अपने व्यवहार का परिवर्तन कर सकें। और अपन व्यवहार से प्रभावित कर तथ्यों का संग्रह कर सके । इसके अलावा उसके लिए आवश्यक है कि वह अपने विषय के बारे में अनुकूल और प्रतिकूल विचार रखने वाले दोनो पक्षों के लोगों से समान व्यवहार और आदर के साथ पेश आएं ।
4 सर्तकता - शोध के दौरान उसे चारों ओर से सर्तक और सावधान रहने की आवश्यकता होती है उसे हमेश सचेत रहना चाहिए कि कोई आदमी गलत जानकारी देकर उसके कार्य को गलत दिशा में तो नहीं ले जा रहा है। कई बार ऐसा होता है कि कुछ व्यक्ति उसके शुभचिंतक होने का दिखावा करते है। और गलत बातें बताकर उसे अफलता की ओर घकेल देते हैं।
5 संतुलित वार्तालाप- शोधकर्ता को अनुसूचि को भरवाने या साक्षात्कार के दौरान सूचनादाताओं से चर्चा करनी होती है। इस चर्चा के स्वरूप का प्रभाव सूचनादाता पर पड़ता है। शोधकर्ताा द्वारा असंतुलित और अहंकारपूर्ण भाषा के प्रयोग से जहां एक ओर सूचनादाताओं में विरक्ति की भावना और चिड़चिड़ापन आ सकता है वहीं दूसरी ओर संतुलित और नम्र भाषा का प्रयोग उनके मन में शोधकर्ता के प्रति अनुकूल भावना पैदा करता है।
अध्ययन विषय से संबंधित गुण-  इस प्रकार के गुण निम्नलिखित होते है।-
1 विषय में रूचि- किसी शोधकर्ता को अपने विषय में खुद गहरी रूचि होना चाहिए। यह रूचि उसे अध्ययन के प्रति लगन और अथक परिश्रम करने की प्रेरणा देती है जिस विषय या समस्या में गहरी रूचि होती है उसे समझने में भी सुविधा होती है साथ ही कठिनाई आने पर भी शोधकर्ता अपने कार्य को सफल बनाने के लिए अधिक से अधिक परिश्रम करने को प्रेरित होता है।
2 विषय में पारंगत होना- शोधकार्य करने  वाले शोधकर्ता को अपने विषय में पारंगत होना चाहिए। इसके लिए उसे अपने  विषय के बारे में संपूर्ण ज्ञान होना चाहिए ज्ञान के अभाव में यह संभव है कि वह उन पक्षों को कम महत्व दे सकता है जो महत्वपूर्ण है। जबकि अपना अधिकांश समय, धन और परिश्रम कम जरूरी पक्षों पर खराब कर देता है।
3 समस्या पर एकाग्रता- सामाजिक जीवन के विभिन्न पक्ष एक दूसरे के साथ इतने घनिष्ठ रूप से सहसंबंधित होते है कि निर्धारित समस्या से विचलित होने की संभावना बढ़ जाती है इसलिए इस समस्या पर उसे एकाग्रता बनाए रखना चाहिए।
5 अध्ययन स्थल में किए जाने वाले क्रिया संबंधी गुण
शोध के दौरान वास्तविक रूप से अध्ययन स्थल पर जाकर तथ्यों व सूचनाओं कोे एकत्र करना आवश्यक होता है। इस कारण इससे संबंधित भिन्न- भिन्न व्यावहारिक क्रियाओं का ज्ञान आवश्यक होता है। इस संबंध में शोधकर्ता के अंदर कुछ गुणों का होना आवश्यक माना जाता है। ये निम्नानुसार-
1 अध्ययन पद्धतियों, उपकरणों तथा प्रविधियों का ज्ञान - एक सफल शोधकर्ता के लिए यह आवश्यक है कि उसे इस बात का पूरा पूरा ज्ञान हो कि किस प्रकार के शोधकार्य में कौन- कौन सी विधियों तथा उपकरणों से काम लेना उपयोगी होगा। साथ ही शोधकर्ता को इस बात का भी ध्यान होना चाहिए कि प्रत्येक पद्वति की कौन कौन सी सीमाएं है। और उस पद्वति के द्वारा काम करने से किन- किन त्रुटियों के पनपने की संभावना होती है। इस प्रकार का ज्ञान शोधकर्ता को सबसे उपयुक्त पद्वतियों तथा उपकरणों का चुनाव करने में मदद करते हैं। साथ ही यह ज्ञान सही समय पर पनपने वाली संभावित त्रुटियों को सुधारने के प्रति शोधकर्ता को सजग भी रखता है।
2 प्रशिक्षण तथा अनुभवकिसी भी व्यक्ति को अध्ययन स्थल में सूचना संकलन हेतु छोड़ देने मात्र से ही तथ्यों का संकलन संभव नहीं हो सकता जब तक कि उसे अध्ययन स्थल पर काम करने का अनुभव न हो या उसे इस कार्य के लिए वास्तविक रूप में प्रशिक्षित न किया गया हो । अपने प्रशिक्षण व अनुभव के आधार पर अध्ययन पद्वतियों, अध्ययन कार्य में आने वाली कठिनाईयों आदि से पूर्णतया परिचित शोधकर्ता ही शोधकार्य को सुव्यवस्थित कर अंतिम लक्ष्य तक ले जाने में सफलता प्राप्त कर सकते है।
3 व्यक्ति, समय और स्थान का बोध- किसी शोधकर्ता को शोध के दौरान अलग- अलग पेशों और श्रेणियों के लोगों से  मिलना पड़ता है परंतु इसके लिए अध्ययन स्थल में जाकर अनायास, बिना पूर्वं निर्णय के किसी भी व्यक्ति से किसी भी समय या कहीं भी मिलकर सूचना प्राप्त करने की इच्छा निष्फल परिणामों को उत्पन्न करने वाली होती है इसके अलावा उसे इस बात का भी ध्यान होना चाहिए कि किसी विषय से संबंधित वास्तविक तथ्यों को प्राप्त करना सुविधाजनक होगा किस समय और किस स्थान पर उनसे मिलने पर वे उत्तर देने  के लिए तैयार हो जाएगें ।
4 साधन संपन्नता- आधुनिक शोध कार्य में धन के साथ साथ अन्य अनेक प्रकार के साधनों जैसे मानचित्र, कैमरा और टेपरिकार्डर की भी आवश्यकता होती है अतः उसके लिए इन साधनों की उपलब्धता के साथ उपयोग का तरीका भी पता होना चाहिए। कई बार शोधकर्ता को सूचनाए एकत्रित करने के लिए सरकारी तथा गैर सरकारी विभागों से सहयोग लेना पड़ता है अतः उसकी पहुंच हर विभाग में होना चाहिए। साधन संपन्न होने पर ही ऐसा संभव हो पाता है।
5 सगंठन शक्ति - उपरोक्त गुणों के साथ साथ एक सफल शोधकर्ता में संगठन शक्ति का होना जरूरी है किसी भी सफल शोध कार्य के लिए सुव्यवस्थित आयोजन और उत्तम संगठन की जरूरत होती है। शोध में आमतौर पर एक से अधिक कार्यकर्ताओं की आवश्यकता होती है। इस लिए उसे इस बात का ज्ञान होना आवश्यक है कि किसे कौन सा काम सौंपा जाए ताकि परिणाम बेहतर हो । आधुनिक युग में शोध में अन्तः वैज्ञानिक विधि अपनाई जा रही है जिससे कि विभिन्न विज्ञानों के विशेषज्ञों की सहायता और सहयोग प्राप्त करना आवश्यक होता है।
वैज्ञानिक भावना संबंधी गुण- शोधकर्ता में शोध की सफलता के लिए वैज्ञानिक भावना का होना जरूरी है। यह निम्नलिखित गुणों पर आधारित है।
1 जिज्ञासा- किसी भी घटना को जानने की इच्छा रहस्य को उजागर करने की प्रेरणा और नई खोज के प्रति आकर्षण की जागृति तभी संभव है जब मन में जिज्ञासा की भावना हो शोधकर्ता में जिज्ञासा का होना जरूरी है क्योंकि यह सभी तत्व शोध में आवश्यक होते है। जिज्ञासा के अभाव में नए ज्ञान की प्राप्ति का उद्देश्य निराधार साबित होता है।
2 वैषयिक नजरिया- शोधकर्ता में इस गुण के न होने से उसे वास्तविक घटनाओं को सही रूप में देखने में असफलता मिलेगी वैषयिक दृष्टिकोण के अभाव का तात्पर्य यह होगा कि शोध कार्य भेद भाव और झूठ से प्रभावित हैं यह नजरिया सत्य निष्कर्ष के लिए भी आवश्यक होता है क्योंकि इसके बिना निरीक्षण परीक्षण की क्रिया विकृत हो जाने की संभावना के साथ सत्यता की जांच भी कठिन हो जाती है। इसको विकृत करने वाले सभी व्यक्तिओं, विचारों , आदर्शा और भावनाओं से निरंतर अलगाव रखते हुए सत्य की खोज करना वैषयिक दृष्टिकोण के आधार पर ही संभव है।
अतः कहा जा सकता है कि एक सफल शोधकर्ता को अनेक गुणों से संपंन्न होना आवश्यक है इसका यह अर्थ नहीं है कि सभी शोधकर्ता सर्वगुण संपंन्न होते है और न ही कार्यकर्ताओं की अंतिम सूचि तैयार की जा सकती है। लेकिन इतना कहा जा सकता है कि शोधकार्य कोई साधारण कार्य नहीं हैं इसलिए इसके लिए अनुभवी, योग्य और कुशल लोगों की जरूरत होती है।

Updated on 18/07/2010

Questionare
समाजिक शोध और सर्वेक्षण के क्षेत्र में सामग्री एकत्रित करने के लिए जिन विधियों का प्रयोग किया जाता है, उनमें प्रश्नावली भी एक है। इसका महत्व तथ्य संकलन और आंकडे़ एकत्रित करने के लिए बहुत होता है। यह प्राथमिक तथ्यों को संकलित करने में बहुत योगदान देती है। इसमें विषय समस्या से संबंधित प्रश्न रहते हैं। आमतौर पर सर्वेक्षण के लिए इसके अलावा अनुसूची का भी प्रयोग किया जाता है। क्योंकि ये दोनों ही समान सिद्धांतों पर आधारित होती है। इसी आधार पर लुण्डबर्ग ने प्रश्नावली को एक विशेष प्रकार की अनुसूची माना है जो प्रयोग की दृष्टि से अपनी निजता स्थापित करती है।
अर्थ-
      
साधारणतया किसी विषय से संबंधित लोगों से सूचना प्राप्त करने के लिए बनाए गए प्रश्नों की सुव्यवस्थित सूची को प्रश्नावली की संज्ञा दी जाती है। अर्थात प्रश्नावली अनेक प्रश्नों से युक्त एक सूची होती है जिसमें अध्ययन विषय  से जुड़े  विभिन्न पक्षों के बारे में पहले से तैयार किए गए प्रश्नों का समावेश होता है। शोधकर्ता इसे डाक के माध्यम से उत्तरदाताओं को भेजते है। उत्तरदाता उसे पढ़कर, समझकर और उसमें पूछे गए प्रश्नों के उत्तर भरकर पुनः डाक से शोधकर्ता के पास भेज देता है। आम तौर पर यह कहा जा सकता है कि विषय समस्या से संबंधित तथ्यों को संग्रहित करने के उद्देश्य से निर्मित क्रमबद्ध प्रश्नों की वह सूची जिसका उपयोग डाक द्वारा किया जाता है प्रश्नावली कहलाती है।
परिभाषा-
       
जे डी पोप ने लिखा है कि एक प्रश्नावली को प्रश्नों के एक समूह के रूप में परिभाषित किया जा सकता है, जिसका उत्तर सूचनादाता के बिना एक शोधकर्ता अथवा प्रगणक की व्यक्तिगत सहायता से देना होता है।
बोगार्डस ने प्रश्नावली को परिभाषित करते हुए लिखा है। प्रश्नावली विभिन्न व्यक्तिओं को उत्तर देने के लिए दी गई प्रश्नों की एक तालिका है।
प्रश्नावलियो की निर्माण विधियां -
                      
प्रश्नावली प्रविधि तथ्य एकत्रित करने की एक प्रमुख प्रविधि है। इसलिए यह आवश्यक होता है कि प्रश्नावली का निर्माण इस तरह से किया जाए कि उपयोगी साबित हो । प्रश्नावली का निर्माण जितना सावधानीपूर्वक एवं सुव्यवस्थित रूप से किया जाता है। शोध के लिए सामग्री का संकलन उतना ही उपयोगी हो जाता है। प्रश्नावली में सूचनादाताओं को स्वयं ही प्रश्नों को समझकर उनका उत्तर देना होता है। इसलिए प्रश्नावली के निर्माण के समय सूचनादाताओं के ज्ञान के आधार क्षेत्र को बढ़ाना होता है। इसमे बिना शोधकर्ता की मदद के ही उत्तर देना होता है। इसलिए प्रश्नावली का निर्माण इतना सरल और स्पष्ट होना चाहिए कि उत्तरदाता उसे आसानी से भरकर भेज सके। प्रश्नावली की रचना को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है। जो निम्नानुसार है-
 1 अध्ययन की समस्या
 
 2
प्रश्नों की उपयुक्तता
 3 बाहरी आकार
1 अध्ययन की समस्या- प्रश्नावली का निर्माण करते समय सबसे पहले यह आवश्यक होता है कि अध्ययन की समस्या को भली भांति समझा जाए। न केवल इसे समझना बल्कि इसका विश्लेषण करना भी आवश्यक है। इसमें निम्न बातों का ध्यान रखना आवश्यक होता है।
1 पूर्ण जानकारी
2 क्षेत्र एवं सूचनादाता
3 अध्ययन की इकाई
1 पूर्ण जानकारी- प्रश्नावली का निर्माण करते समय अध्ययन समस्या की पूर्ण जानकारी प्राप्त कर लेनी चाहिए।  इसे न केवल समझ लेना चाहिए बल्कि पूर्णतया देख’-परख भी लेना चाहिए। अगर ऐसा नहीं किया जाता है तो अध्ययनकर्ता को प्रश्न रचना के समय अनेक समस्याओं का सामना करना पड़  सकता है। इसलिए अध्ययनकर्ता का  समस्या के विभिन्न पक्षों से परिचित होना आवश्यक होता है। अध्ययनकर्ता को चाहिए कि वह विषय से संबंधित विशेषज्ञों से भी पूर्ण जानकारी प्राप्त कर ले। ऐसा करने पर ही प्रश्नावली का निर्माण उचित चरणों में पूरा हो सकेगा।
2 क्षेत्र और सूचना दाता - प्रश्नावली का निर्माण करते समय क्षेत्र और सूचनादाता के बारे में जानकारी प्राप्त करना आवश्यक होता है। अर्थात क्षेत्र का विस्तार कितना है और सूचनदाताओं की संख्या कितनी है इन बातों का ध्यान आवश्यक होता है। उदाहरण के लिए यदि भौगोलिक क्षेत्र बड़ा हो और समस्या की प्रकृति सामान्य हो तो सूचनादाता की संख्या अधिक होती है। इसमें निर्दशन प्रणाली के माध्यम से सूचनादाताओं की संख्या का निर्धारण करना पड़ता हैं।
3 अध्ययन की इकाई - प्रश्नावली का निर्माण करते समय यह स्पष्ट करना होता है,कि अध्ययन की इकाई क्या है। ऐसा करना इसीलिए आवश्यक होता है ताकि उत्तरदाता इन इकाईयों को एक ही अर्थ में समझे ताकि उसे एक ही प्रकार की सूचनाएं प्राप्त की जा सके । उदाहरण के लिए यदि बालकों का अध्ययन करना हो प्रश्नावली में बालकों की आयु का स्पष्ट उल्लेख होना चाहिए।
4 प्रश्नों की उपयुक्तता - इससे तात्र्पय यह है कि प्रश्नावली में किसी भी प्रश्न को शामिल करने के पूर्व वह विषय से संबंधित सूचना का संकलन करने में किस हद तक सहायक होगा। अनुपयुक्त प्रश्नों के शामिल होने से धन,समय और श्रम का दंुरूपयोग होता है और न ही अपेक्षित सफलता मिल पाती है। इसलिए प्रश्नों का उपयुक्त होना अंत्यत आवश्यक होता है। प्रश्न का निर्माण सरल,सटीक और व्यवस्थित होना चाहिए क्योंकि प्रश्नावली निर्माण के समय हमेशा इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि उत्तरदाता को बिना शोधकर्ता की सहायता से ही प्रश्नो को उत्तर देना रहता है। अर्थात प्रश्न हर ढंग से उपयुक्त हो । उपयुक्त प्रश्नो का अपना एक अलग महत्व होता है।
प्रश्नों की उपयुक्तता के नजरिये से निम्न बातें आवश्यक होती है।
1 प्रश्नों की स्पष्टता और विशिष्टता- प्रश्नावली का निर्माण करते समय शोधकर्ता को हमेशा इस बात का ध्यान रखना होता है कि प्रश्न स्पष्ट और विशिष्ट हो। अर्थात ऐसे प्रश्नों के निर्माण करने से हमेशा बचा जाना चाहिए जो अस्पष्ट और अनिश्चित वाले हो या फिर भ्रामक हो । अ्रगर ऐसे प्रश्नों का समावेश प्रश्नावली मे होगा तो वह दोषपूर्ण बन जाएगी जिससे शोध का उद्देश्य भी पूरा नही होगा । इसके साथ ही अस्पष्ट, दोषपूर्ण, द्विअर्थी और अप्रचलित प्रश्नों के प्रयोग से भी बचना चाहिए। प्रश्नो के निर्माण में विशिष्ट शब्दावली का भी प्रयोग नही किया जाना चाहिए।
2 सरल प्रश्न- अगर प्रश्नावली में सरल प्रश्नो का समावेश होगा तभी प्रश्नों की उपयुक्तता साबित होगी । अगर प्रश्न सरल होंगें तो सामान्य ज्ञान वाला भी उसे ठीक से समझेगा और उसका सही सही जवाब देगा। साथ ही प्रश्नों के सरल रहने से अध्ययनकर्ता के बिना भी उसका उत्तरदाता अपेक्षित अर्थ लगाकर प्रश्नो का सही सही जवाब देगा। क्योंकि खुद प्रश्नकर्ता उत्तरदाता के पास नही होता इसलिए सरल प्रश्न होना आवश्यक होता है।
3 संक्षिप्त और श्रेणीबद्व उत्तर - प्रश्नावली के निर्माण में इस बात का ध्यान देना चाहिए कि उसमें प्रश्न संक्षिप्त ही रहें। अगर प्रश्न छोटे होगें तो प्रश्नावली भरते समय उत्तरदाता जवाब देने में बोर नहीं होगा ना ही उसे कोई हिचकिचाहट होगी । प्रश्न न केवल न संक्षिप्त होने चाहिए बल्कि उनमें क्रमबद्वता भी होनी चाहिए। यदि यह उत्तर हां या न में होतो यह प्रश्न ज्यादा ठीक माना जाता है।साथ ही बहुविकल्पनात्मक प्रश्न भी सही होते है।क्यों कि इसमें उत्तर दाता को अपने मन से विकल्प चुने जाने की आजादी होती है।
4 वैषयिक प्रश्न- प्रश्नावली के निर्माण में इसकी उपयुक्तता इस बात पर निर्भर करती है वैषयिक प्रश्नों का समावेश इसमें किया जाए। इस दौरान प्रश्नों में किसी प्रकार का झुकाव नही होना चाहिए। अ्र्रगर इस तरह के प्रश्न इसमें शामिल है तब उत्तरदाता से सही और वास्तविक उत्तर निकलवाए जा सकेगें।
5 कम प्रश्न- प्रश्नावली में कम से कम प्रश्नो का समावेश करना चाहिए। इससे प्रश्नावली जल्दी भर जाएगी और उत्तरदाता की अभिरूचि भी बनी रहेगी। अधिक प्रश्नों के समावेश से प्रश्नावली  के निर्माण में समय,धन और श्रम तीनों की बर्बादी होती है।
6 बचाव वाले प्रश्न- प्रश्नावली में उत्तरदाता के गोपनीय जीवन से संबंधित प्रश्नों को शामिल नही किया जाना चाहिए। गोपनीय और गहन सूचनाओं वाले प्रश्नों से हमेशा बचना चाहिए क्योंकि ऐसे प्रश्नों के उत्तर कोई भी आसानी से नहीं देता है। अपराधी प्रवृत्ति और यौन व्यवहार से संबंधित प्रश्न इसी तरह के होते हैं। इसी तरह वैयक्तिक, भावनात्मक और प्रतिष्ठा वाले प्रश्नों से भी बचा जाना चाहिए। इसके अलावा पक्षपातपूर्ण और रूढ़िवादी प्रश्नों से भी बचा जाना चाहिए।
7 स्पष्ट भाषा- प्रश्नों में चयन में सावधानी बरती जानी चाहिए बल्कि भाषा की स्पष्टता पर भी ध्यान देना चाहिए। स्पष्ट भाषा उत्तरदाता आसानी से समझ जाते हैं। इसमें कठिन, अस्पष्ट, अप्रचलित दुरूह और क्लिष्ट शब्दों का चयन नहीं किया जाना चाहिए। बहु अर्थी, भावात्मक और अनुमानित सूचना वाले शब्दों का भी प्रयोग नहीं करना चाहिए। स्पष्ट भाषा के साथ- साथ प्रश्नावली की इकाइयॉं भी स्पष्ट होना चाहिए।
8 क्रमबद्वता- प्रश्नावली का निर्माण करते समय प्रश्नों को स्वाभाविक रूप से क्रमबद्व और व्यवस्थित करने पर ध्यान दिया जाना चाहिए। साथ ही प्रश्नों के परस्पर अंतर्सबंद्वता का गुण भी होना चाहिए । इससे प्रश्नों में तारतम्यता बनी रहेगी एवं प्रत्येक प्रश्न का उत्तर अगले प्रश्न के उत्तर के लिए पूरक कार्य करेगा। अधिक प्रश्नों को शिर्षक और उपशीर्षकों में विभाजित किया जा सकता है। गलत, व्यंग्यात्मक, दकियानूसी, कल्पनात्मक और प्रभावशील प्रश्नों को इसमें शामिल नही किया जाना चाहिए।
9 बाह्य आकार - प्रश्नावली में प्रश्नो के निर्माण के साथ-साथ उसमें भौतिक बनावट का भी महत्व होता है। उत्तरदाता के पास नही होने के कारण प्रश्नकर्ता उसका ध्यान आकर्षित करने के लिए प्रश्नावली की बाहरी आकृति जैसे - उसका आकार, कागज, छपाई और रूप रंग आदि पर भी ध्यान दिया जाना आवश्यक होता है। प्रश्नावली के बाहरी आधार के अन्र्तगत निम्न बातों पर ध्यान देना चाहिए।
1 आकार - प्रश्नावली का निर्माण करते समय इसे आकर्षक आकार में निर्मित किए जाने की आवश्यकता होती है। इसे सामान्यतः फुलस्केप आठ बाय बारह और नौ बाय ग्यारह के आकार के कागज पर बनाया जाना चाहिए। लंबे लिफाफे में मोड़कर रखने के कारण यह आकार बहुत उपयुक्त होता है। कम पृष्ठ होने से डाक खर्च भी कम आता है। साथ ही इसे उत्तरदाता तक भेजना भी आसान हो जाता है।
2 कागज- प्रश्नावली का निर्माण करते समय उसके कागज पर ध्यान देना आवश्यक होता है। यह कागज चिकना, कड़ा और टिकाउ होना चाहिए। इसका आकर्षक स्वरूप प्रश्नावली को सुंदर बनाता है। जबकि खुरदरा कागज न केवल जल्दी फट जाता है साथ ही इसकी छपाई भी अच्छी नहीं होती है। एक जैसे शोध के लिए भेजे जाने वाली प्रश्नावलियां अलग अलग कागज पर होना चाहिए।
3 छपाई- प्रश्नावली को अक्सर या तो छाप दिया जाता है या साइक्लोस्टाइल करवाया जाता है। इन दोनों ही तरीकों में इस बात का ध्यान रखा जाता है कि छपाई शुद्ध और स्पष्ट हो ताकि आसानी से इसे पढ़ा जा सके । स्याही न फैले इस बात का भी ध्यान रखा जाना चाहिए।
4- हाशिया छोड़ना- प्रश्नावली का निर्माण करते समय बायीं ओर 3 बाय 8 और दायीं ओर 1 बाय 7 या 1 बाय 6 का हाशिया छोड़ना चाहिए। इस स्थान पर टिप्पणी लिखी जा सकती है। इसमें शब्दों और दो प्रश्नों के मध्य स्थान छोड़ा जाना चाहिए।
5 प्रश्नावली की लंबाई- प्रश्नावली का निर्माण करते समय इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि इसमें प्रश्नों की संख्या इतनी नहीं होना चाहिए कि संपूर्ण प्रश्नावली अनेक पृष्ठों में छप सके। लंबी प्रश्नावली से उत्तरदाता की रूचि खत्म हो जाती है। इसकी लंबाई इतनी होना चाहिए कि इसे कम से कम आधे घंटे मेें भरा जा सके। अभी तक पचास पृष्ठों तक वाली प्रश्नावली उपयोग में लाई जा चुकी है।
6 रूप- रंग- प्रश्नावली का निर्माण करते समय उसके रूप रंग भी ध्यान देना चाहिए। प्रश्नावली इतना आकर्षक होना चाहिए ताकि उत्तरदाता उस पर लिखने के लिए बेताब हो जाए। इस पर अक्षर स्पष्ट होना चाहिए साथ ही कागज मोटा और अच्छा होना चाहिए। रंगीन कागज का प्रयोग से यह और भी आकर्षक हो जाता है। इस प्रकार यह पता चलता है कि प्रश्नावली का निर्माण करते समय उसके रूप रंग और बाहरी आकर्षण पर ध्यान दिया जाना चाहिए।
7 मदों की व्यवस्था- प्रश्नावली का निर्माण करते समय इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि इसमें एक विषय से संबंधित सभी प्रश्नों को एक साथ एक क्रम में लिखा जाए। आवश्यकतानुसार प्रश्नों को विभिन्न उपसमूहों में भी वर्गीकृत किया जा सकता है। प्रश्नावली में शीर्षक, उपशीर्षक एवं सारणियों आदि सही क्रम में छपे होने चाहिए जिससे अध्ययन करने में सुविधा प्रतीत हो।
              
                इस तरह हम कह सकते है। प्रश्नावली के निर्माण में न केवल प्रश्नो पर ध्यान देना चाहिए साथ ही इसके बाहरी स्वरूप पर भी ध्यान देने की आवश्यकता होती है।

Scheduling
समाजिक शोध के क्षेत्र में तथ्य संकलन के लिए जिन विधियों का प्रयोग किया जाता है उनमें एक अनुसूची है। इसमें प्राथमिक और द्वितियक स्त्रोंत होते हैं। प्राथमिक स्त्रोत के अन्र्तगत घटनाओं को स्वंय देखकर, सुनकर या संबंधित व्यक्तिओं से मिलकर तथ्यों को एकत्रित किया जाता है। द्वितीयक स्त्रोतों के अन्र्तगत अध्ययनकर्ता विषय से संबंधित प्रलेखों का अध्ययन कर तथ्य एक़ित्रत करता हैं। समाज की विभिन्न समस्याओं के अध्ययन के लिए सामाजिक शोध के क्षेत्र में प्रश्नावली और सूची बनाने का व्यापक महत्व होता है बाहरी रूप से यह दोनो काफी हद तक समान दिखते हैं लेकिन वास्तविक अर्थो में इन दोनो की प्रकृति और आयोग की प्रक्रिया एक दूसरे से अलग होती है।
परिभाषा-
    सामाजिक शोध के क्षेत्र में अनुसूची तथ्य को एकत्रित करने के लिए महत्वपूर्ण विधि हैं
पीवी यंग और गुड्डे एवं हॉट के अनुसार अनुसूची प्रश्नों की वह सूची है जिसका प्रयोग साक्षात्कार के दौरान सामाजिक समस्याआ के अध्ययन में किया जाता है।
लुण्डबर्ग के अनुसार अनुसूची का प्रयोग उत्तरदाता से पूछे जाने वाले प्रश्नों को याद करने से शोधकर्ता को बचाता है। क्योंकि शोधकर्ता के साथ प्रश्नों की सूची रहती है। और वह उत्तरदाता से एक जैसे प्रश्न पूछता है। अनुसूची एक सामान्य अवधारणा है जिसका प्रयोग किसी भी प्रणाली द्वारा तथ्यों के सग्रंह मंें किया जाता है।
बेगार्डस के अनुसार अनुसूची उन तथ्यों को प्राप्त करने की औपचारिक प्रणाली का प्रतिनिधित्व करती है जो वैषयिक रूप में है। तथा सरलता से प्रत्यक्ष योग्य है।
विशेषताएं-
एक अच्छी या उत्तम अनुसूची प्रश्नों और उत्तरों की गुणवत्ता पर निर्भर करती है। अर्थात प्रश्न इस प्रकार होना चाहिए जिससे वास्तविक तथ्य मालूम किए जा सकें। साथ ही प्रश्नों का सूचनादाता सही अर्थो में समझकर उचित उत्तर दे सके। एक बेहतर अनुसूची में निम्नलिखित विशेषताएं होती हैं।
1 सही संदेश वाहन- एक अच्छी अनुुसूची की पहली विशेषता यह है कि इसमें प्रश्नों को इस प्रकार पूछा जाता है कि उन प्रश्नों के संंबंध में किसी भी उत्तरदाता के मन में कोई गलत धारणा न पनप पाए। अर्थात शोधकर्ता के द्वारा पूछे गए प्रश्न उसी रूप में उत्तरदाता को मिले। अनुसूची की भाषा सरल, स्पष्ट, भ्रमरहित और अर्थ प्रदान करने वाली होना चाहिए।
2 सही प्रत्युतर- उत्तम अनुसूची की दूसरी विशेषता के रूप में सही प्रत्युतर प्राप्त होना होती है। इसकी पहचान तभी कायम होती है जब उस अनुसूची के आधार पर सूचनादाता सही उत्तर देता है जो शोधकर्ता के लिए उपयोगी और आवश्यक होता है। सही प्रत्युतर का मायना यह है कि सूचनादाता द्वारा दी गई जानकारी वास्तविक हो और उसमें कोई दुविधा न हो।
3 प्रश्नों का उचित क्रम- एक अनुसूची में प्रश्नों का क्रमबद्ध तरीके से लिखा जाना चाहिए ताकि उनमें आंतरिक संबंधता आ सके और उत्तरदाता सभी प्रश्नों की व्यवस्थित रूप में जानकारी दे सके ।
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सरल और स्पष्ट प्रश्न- एक अच्छी अनुसूची में प्रश्न सरल और स्पष्ट भाषा में होना चाहिए ताकि उत्तरदाता को प्रश्न समझने में आसानी रहे। हालांकि इस विधि में सूचनादाता और प्रश्नकर्ता एक दूसरे के समक्ष रह कर चर्चा करते है उसके बाद भी इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि प्रश्न सरल और स्पष्ट हों।
5 सीमित आकार - प्रश्नों की संख्या समस्या की प्रकृति पर निर्भर करती है फिर भी एक अच्छी अनुसूची का आकार निश्चित होना चाहिए इसमें अनुसंधान की समस्या से संबंधित प्रश्नों को ही शामिल किया जाना चाहिए।
6 क्रास प्रश्नों की व्यवस्था- एक अच्छी अनुसूची उसे माना जाता है जिसमें समस्या से संबंधित विभिन्न पहलुओं के बारे में क्रास प्रश्न पूछे जाने की व्यवस्था हो ताकि सूचनादाता द्वारा दी गई जानकारी की जांच प्रश्नों के आधार पर की जा सके।
7 सामान्य शब्द- अनुसूची में सामान्य शब्दों का प्रयोग किया जाना चाहिए अध्ययनकर्ता को अनुसूची में खड़ी बोली का प्रयोग नहीं करना चाहिए। हमेशा सीधे और बोल चाल वाले शब्द ही प्रयोग में लाने चाहिए।
8 सम्मानजनक प्रश्न- इसमें हमेशा सम्मानजनक प्रश्नों का ही प्रयोग किया जाना चाहिए ताकि उत्तरदाता को किसी भी प्रकार का आघातों न पहुंचे। आमतौर पर अध्ययनकर्ता को प्रश्नों में विकट शब्दों के प्रयोग से बचना चाहिए।
9 सांख्यिकीय विवेचना - इसमें ऐसे प्रश्नो का समावेश होना चाहिए ताकि अध्ययनकर्ता उत्तरदाताओे द्वारा दी गई जानकारी के आधार पर तथ्यों की सांख्यिकीय विवेचना कर सके।
10 सूख का अनुभव - इसके अलावा प्रश्न ऐसे हो जिससे सुख का अनुभव हो साथ ही छोटे प्रश्नो का उपयोग भी होना चाहिए। प्रश्न ऐसे होना चाहिए जो अध्ययन के विषय की प्रकृति और उद्देश्य से संबंधित हो ।

अनुसूची प्रश्नों की एक सूची होती है। इसका निर्माण सोच समझकर सावधानीपूर्वक किया जाता है। यह निर्माण करना कोई सरल कार्य नहीं होता है। इसके निर्माण की प्रक्रिया के विभिन्न स्तर होते हैं। यह स्तर निम्नलिखित हैं।
1  अनुसूची निर्माण के पहले चरण में इसके निर्माण से संबंधित विभिन्न पक्षों पर विचार किया जाता है। इसके निर्माण के पहले यह निश्चित कर लेना चाहिए कि इसमें अध्ययन विषय से संबंधित किन किन विषयों को सम्मिलित किया जाएगा। इस स्तर में शोधकर्ता अध्ययन की समस्या के संबंध में जानकारी प्राप्त करता है। ऐसा करना इसलिए आवश्यक होता है क्योंकि अगर अध्ययन की समस्या की प्रकृति का पूर्ण ज्ञान नहीं होगा तब तक उसके संबंध में प्रश्नों का ज्ञान भी नही हो सकेगा। इससे शोधकर्ता को यह पता चल जाता है कि विषय में कौन कौन से पक्ष अधिक और कौन कौन से कम महत्वपूर्ण हैं। इसके अलाव अध्ययन की समस्या के मुख्य पहलुओं का भी पता चल जाता है जिनके माध्यम से विभिन्न पहलुओं के बारे में जानकारी प्राप्त की जा सकती है। पहले से ऐसा कर लेने से अनुसूची में प्रश्नों का एक संतुलित अनुपात बनाए रखना संभव हो पाता है। साथ ही इसमें अनावश्यक प्रश्नों का जमाव होने से भी बचा जा सकता है। पूर्ववर्ती विचार और समस्या के संबंध में आवश्यक जानकारी इसलिए भी आवश्यक होती हैं क्यों कि शोधकर्ता विषय के संबंध में एक संतुलित धारणाओं को पनपाए बिना ही अनुसूची में उन सभी मदों और पहलुओं को सम्मिलित करना चाहते हैं। जो उन्हे महत्वपूर्ण और रूचिकर प्रतीत होतो हैै। इस प्रवृत्ति से धन,समय और शक्ति का अपव्यय होता है। इस स्थिति से बचने के लिए एक संतुलित प्रश्न सूची को बनाए रखना आवश्यक होता है। इसको बनाए बिना यह संभव है कि कुछ महत्वहीन पक्षों को  अनुसूची में मान्यता मिल जाए और महत्वपूर्ण पक्ष अनुसूची से छुट जाए। इस लिए पूर्व ज्ञान के आधार पर अध्ययन समस्या के संबंध में जानकारी प्राप्त की जाती है।
 
2  
दूसरे चरण में इसका आकार निर्धारित किया जाता है। इस स्तर में शोधकर्ता यह निश्चित करता है कि अनुसूची के अंदर कितने प्रश्न रखें जाएं। अनुसूची का आकार, समस्या की प्रकृति, अध्ययन क्षेत्र की प्रकृति, अध्ययन के लिए प्राप्त धनराशि और समय आदि पर निर्भर करती है। अध्ययन विषय को विभिन्न पक्षों में विभाजित किया जाता है। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाता है कि प्रत्येक उपविभाग के संबंध में सभी विषय स्पष्ट हो। इसके लिए दो बातों का ध्यान रखना आवश्यक होता है। इसमें पहली बात यह है कि इस प्रकार के प्रश्नों को अनुसूची में सम्मिलित करने पर पहलू विशेष पर अधिक ध्यान दिया जाए। दूसरी बात यह कि इस प्रकार के प्रश्नों के उत्तरों से प्राप्त सूचनाओं का शोध के उद्देश्य की पूर्ति में अधिकाधिक उपयोग हो। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि इस स्तर में अध्ययन विषय के विभिन्न पक्षों के उपविभागों और उनसे संबंधित प्रश्नों के विस्तार, प्रकृति और उसकी उपयोगिता के विषय में निश्चित कर लिया जाता है। अगर मनोवृत्ति, भावनाओं ओर विचार आदि मनोवैज्ञानिक समस्याओं के अध्ययन के लिए अनुसूची का निर्माण किया जाता है तो इसका आकार बड़ा रखा जाता है। इसके विपरित घरेलू दशा, साक्षरता, व्यवसाय और पोशाख स्टाईल आदि समस्याओं के अध्ययन के लिए अनुसूची का निर्माण किया जात है तो अनुसूची का आकार छोटा रखा जाता है। साथ ही अगर अध्ययन के लिए धनराशि एवं समय अधिक प्राप्त रहता है। तब तुलनात्मक रूप में अनुसूची का आकार बडा रखा जाता है एवं यदि धनराशि और समय कम रहता है तब अनसूची का आकार छोटा रखा जाता है।
3  अनुसूची के निर्माण की प्रक्रिया का तीसरा स्तर प्रश्नों के निर्माण से संबंधित होता है। इस स्तर पर इस बात की सावधानी रखनी पड़ती है कि जल्दबाजी में प्रश्नों का निर्माण न हो जाए। प्रश्नों की प्रकृति पर ही यह निर्भर करता है कि उत्तरदाता उन प्रश्नों के सही अर्थ को समझकर सही उत्तर दे सकेगा या नहीं । इसलिए इस बात का हमेशा ध्यान रखा जाना चाहिए कि प्रश्नों की भाषा जटिल, अस्पष्ट, संदेहयुक्त और बहुअर्थक न हो । साथ ही जिन प्रश्नों से उत्तरदाताओं को कोई क्षोभ पहुंचे या उत्तर देने में किसी प्रकार का संकोच हो, ऐसे प्रश्नों के निर्माण से भी बचा जाना चाहिए। सरल, स्पष्ट और ठीक ढंग से पूछे गए विनम्र प्रश्न उत्तरदाता से सही उत्तर स्वयं ही प्राप्त कर लेता है। जबकि गलत ढंग से पूछे गए प्रश्न उत्तरदाता के मन को विचलित कर देते है। जिसके चलते वह या तो उत्तर नहीं देता और देता भी है तो अनमने ढंग से । विषय से संबंध न रखने वाले प्रश्नों को भी शामिल नही किया जाना चाहिए। कहने का तात्पर्य यह है कि प्रश्नों का निर्माण सावधानीपूर्वक किया जाना चाहिए ताकि प्रश्न विश्वसनीय तथ्य संग्रह करने में सक्षम हों। प्रश्नों का निर्माण करते समय इस बात का ध्यान रखा जाता है कि समस्या के विभिन्न पहलूओं के संबंध में विस्तृत और विश्वसनीय आंकड़े इन प्रश्नों द्वारा प्राप्त हो सके। हर संभव प्रयास किया जाना चाहिए कि अनुसूची में कई अर्थो वाले या फिर उत्तरदाताओं को विचलित करने वाले प्रश्नों का चयन नही करना चाहिए।
चैथे स्तर में प्रश्नों को एक सिल- सिलेवार ढंग से क्रमबद्व सजाया जाता है। इस समस्या से संबंधित सभी प्रश्न को एक ही जगह रखा जाता है। साथ ही यह भी ध्यान रखा जाता है कि उत्तरदाताओं की आसानी के लिए कैसी क्रमबद्धता होनी चाहिए। उत्तरदाताओं का नाम, लिंग, आयु, ज्ञान, धर्म, वैवाहिकी, स्थिति, आमदनी और व्यवसाय आदि की जानकारी से संबंधित प्रश्नो का सबसे उपर और मुख्य प्रश्नों को नीचे रखा जाना चाहिए। लेकिन सबसे उपर अध्ययन की समस्या के विषय का उल्लेख भी किया जाना चाहिए। यदि इसमें उस विषय के उद्देश्य भी दिया गया हो तो यह और भी अच्छा माना जाता है। प्रश्नो का क्रम में बनाने से उत्तरों के माध्यम से तथ्यों की प्राप्ति उसी क्रम में होती है, जिस क्रम में तथ्यों की व्याख्या, विश्लेषण और रिपोर्ट लिखनी होती है। क्रम से लगे प्रश्नों के द्वारा उत्तरदाता से भी शीघ्रता से उत्तर मिल जाता है। सरल से जटिलता की ओर प्रश्न का क्रम होने से उत्तरदाता सरल प्रश्नों को पहले करके जटिल के लिए मानसिक तौर पर तैयार भी हो जाता है। क्रमबद्वता के दौरान यह भी ध्यान रखना चाहिए कि ऐसा कोई प्रश्न न शामिल न हो जिसका उत्तर न मिल सके ।
अनुसूची निर्माण की अंतिम प्रक्रिया अनुसूची की सार्थकता की जांच करने से संबंंधित होता है। अर्थात प्रश्नों को क्रमबद्व रूप में रखने के बाद अनुसूची के दोषों की जानकारी प्राप्त करने के लिए पूर्व- परीक्षण या सर्वेक्षण कराया जाता है। इसके अलावा कुछ पर अनुसूची लागू कर देखा भी जाता है कि उसमें कोई अनावश्यक प्रश्न तो शामिल  नही है। अगर कोई प्रश्न छूट गया है तो उसका भी पता चल जाता है। अनुसूची को दोषरहित और अधिक सार्थक बनाने के उद्दश्य से पूर्व सर्वेक्षण किया जाता है। पूर्व- सर्वेक्षण के अनुभव के आधार पर अनुसूची में संशोधन  किया जाता है और अंतिम रूप अनुसूची का निर्माण किया जाता है। ऐसा कर लेने से आगे आने वाली समस्याओं का निराकरण हो जाता है।

Types of scales
किसी भी अध्ययन को यथार्थता और वैज्ञानिकता प्रदान करने के लिए निश्चित अनुमापन  बहुत आवश्यक होता है। सामाजिक विज्ञान में अध्ययन को यर्थाथ बनाने के लिए समाजिक घटना के गुणात्मक और गणनात्मक दोनो पक्षों का अध्ययन अनिवार्य होता है। इस प्रयास का परिणाम अनेक मापक यंत्रों, पैमानों अनुमापों अथवा स्केलिंग प्रविधियों का निर्माण है जिनकी सहायता से विभिन्न सामाजिक घटनाओं और समस्याओं के प्रति लोगों की मनोवृत्तियांें, नजरिया और दूरी को मापा कर इनका मूल्याकन किया जा सकता है।
अनुमापन या पैमाने किसी सामाजिक घटना या समस्या के विषय में व्यक्तिओं की राय और मनोवृत्तियों को मापने के यंत्र हैं। पैमाने गुणात्मक तथ्यों को गणनात्मक तथ्यों में परिवर्तित करने की प्रविधियां है  और क्रम का निर्धारण करने में इनका विशेष महत्व है। अतः पैमाना किसी घटना अथवा वस्तु को मापने का एक यंत्र है। अध्ययन वस्तु की प्रकृति के अनुसार ही पैमानों का निर्माण किया जाता है। जिस प्रकार प्राकृतिक विज्ञानों में विभिन्न वस्तुओं को मापने के यंत्र भिन्न- भिन्न होते हैं उसी प्रकार सामाजिक घटना की विशिष्ट प्रकृति को ध्यान में रखते हुए उसी के अनुसार पैमानों का निर्माण किया जाता है ।
परिभाषा-
 गुडे तथा हॉट के मुताबिक- अनुमापन प्रविधियों में अन्तर्निहित समस्या इकाइयों की श्रेणियों को एक क्रम के अन्तर्गत व्यवस्थित करने की है। दूसरे शब्दों में अनुमापन प्रविधियां गुणात्मक तथ्यों की श्रेणियों को गुणात्मक श्रेणियों में बदलने की पद्धतियां है।
पी वी यंग के अनुसार- किसी वस्तु या घटना की मात्रा या भार को मापने के लिए जिस पैमाने का प्रयोग किया जाता है, उसके आधार पर जिन अनुमापन साधनों का निर्माण किया जाता है, उसे अनुमापन प्रविधि कहते है।
डॉ आर एन मुकर्जी - अनुमापन का तात्र्पय पैमाइश की उस विधि से है जिसके द्वारा गुणात्मक तथा अमूर्त सामाजिक तथ्यों या घटनाओं को गणनात्मक स्वरूप दिया जाता है।
पैमाना पध्दतियों के प्रकार -
गुणात्मक मीडिया शोध में क्रमाबद्धता, तार्किकता और वैज्ञानिकता लाने के लिए पैमाने के प्रयोग को अधिक महत्वपूर्ण समझा जा रहा है। श्रीमती यंग के अनुसार दो प्रकार के मानवीय व्यवहार के माप के लिए विभिन्न यंत्रों का निर्माण हुआ है।
मनुष्य के संचार तथा व्यक्तिगत को मापने वाले पैमाने जिनके द्वारा प्रवृत्तियां, नजरिया, नैतिकता, चरित्र और सहयोग आदि की माप ली जाती है।
संचार संस्कृति और सामाजिक पर्यावरण को मापने वाले पैमाने जिनके द्वारा संस्थाओं, संस्थागत व्यवहार,संचारिक तथा सामाजिक स्थिति, आवास व्यवस्था, रहन सहन आदि की माप ली जाती है।
मीडिया या संचार के क्षेत्र में प्रमुख पैमाने निम्नलिखित है। -
1 अंक पैमाना- इस पैमाने में कुछ शब्द लिख दिए जाते हैं प्रत्येक शब्द का एक अंक होता है। सूचनादाता जिन शब्दोे को प्रसन्नता देने वाला समझता है उसके आगे सही का चिन्ह लगा देता हैं । जितने सही के निशान होते है, उनकी गिनती कर ली जाती है। इस प्रकार कुल योग ही प्राप्ताक होते है। इन अंको के आधार व्यक्ति के मनोभावों और प्रवृत्तियों का पता लग जाता है।
2 संचार रिक्तता मापन यंत्र - इस तरह के पैमानों द्वारा भिन्न भिन्न वर्गों अथवा व्यक्तिओं के मध्य पाए जाने वाले संचार रिक्तता का पता चल जाता है इस प्रकार के दो पैमाने प्रचलित है।
1 बोगार्डस का पैमाना
2 मीडियामितीय पैमाना
3 तीव्रता मापक यंत्र- व्यक्तिओं की रूचियों, अभिरूचियों, प्रवृत्तियों, मनावृत्तियों, मनाभावों आदि की तीव्रता और गहनता को मापने के लिए इन पैमानों का प्रयोग किया जाता है।
4 पदसूचक पैमाने - भिन्न- भिन्न पदों को तुलनाक्रम में रखकर जो अनुमापन पैमाना बनाया जाता है उसे की पदसूचक पैमाना कहते है। इन पैमाने  को निम्नलिखित प्रणालियों द्वारा निर्मित किया जाता है।
युग्म तुलना
हॉरोविज प्रणाली
थर्सटन प्रणाली
आंतरिक स्थिरता मापक पैमाने
मीडिया निर्देशांक
मनोवृत्तियों के माप की प्रणालियां
मीडिया संचार या समाज से जुड़े व्यक्ति अथवा समूह की मनावृत्ति दो प्रकार से मापी जा सकती है।
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अभिमत सर्वेक्षण- व्यक्ति अथवा समूह की मनावृत्तियों के संदर्भ में उपयुक्त पैमाने द्वारा माप की सुविधा न होने के कारण प्रायः उनकी मौखिक राय के द्वारा ही उनकी प्रवृत्तियों का अनुमान किया जाता है। जब तक वास्तविक घटना न घटित हो तब तक शारीरिक व्यवहार संभव नही होता है और उसके बिना अनुमापन भी संभव नहीं होता । अतः यह कहा जा सकता है, कि व्यक्ति अथवा समूह की मनोवृत्ति का अनुमान उनके द्वारा मतानुसार ही किया जाएगा।
2 अनुमापन प्रणाली - व्यक्ति या समूह की मनावृत्ति उनके व्यवहार से परिलक्षित होती है। शरीर की भाषा से ही व्यक्ति की वास्तविक मनोवृत्ति की अभिव्यक्ति होती है। वास्तविक व्यवहार को मापने से ही मनावृत्ति का वास्तविक परिचय प्राप्त हो सकता है। मौखिक संचार के द्वारा व्यक्ति प्रायः अपने वास्तविक स्वरूप को प्रकट नहीं करता । अतः शरीर भाषा की माप ही मनोवृत्ति को समझने की सर्वश्रेष्ठ प्रणाली है।
1 अंक पैमाना - मीडिया या संचार शोध के लिए इसे सर्वाधिक सरल पैमाना माना जाता है। इसके माध्यम से व्यक्ति और समूह के व्यवहार का अनुमापन बहुत हद तक संभव है। वास्तव में अंक पैमाना के तहत मीडिया या संचार से संबंधित किसी भी विषय पर व्यक्ति और समूह की मनोवृत्ति जानने के लिए कुछ शब्द या स्थितियां लिख दी जाती है। इनमें से कुछ शब्द विषय का विरोध प्रकट करने वाले होते है। तथा कुछ उसके समर्थन का आभास देते है। उत्तरदाता जिन शब्दो को पसंद करता है उसके सामने सही और नापसंद वाले शब्दों को वहां से हटा देता है। हर सहमति के चिन्ह को 1 अंक दिया जाता है। इस प्रकार विषय के प्रति व्यक्ति की मनोवृत्ति की सीमा का अनुमान प्राप्तांको  के आधार पर किया जाता है। कभी- कभी परस्पर विरोधी तथा परस्पर सहमतिपूर्ण साथ साथ रखें जाते है। ऐसा इसलिए ताकि एक ही समय दोनो का उचित भार समझकर सूचनादाता मत प्रकट कर सके।
2 तीव्रता मापक पैमाना- यह पैमाना मनोवृत्ति मापने की एक अत्यत ही महत्वपूर्ण अनुमापन प्रणाली है। अर्थात इन पैमानों का उपयोग रूचियों और मान्यताओं की गहनता को मापने के लिए किया जाता है। व्यक्ति विषय के प्रति पूर्ण सहमत, थोड़ा बहुत सहमत, कम सहमत या असहमत हो सकता हैं। वह उदासीन और तटस्थ भी हो सकता है। व्यक्ति की मनोवृत्ति जानने के लिए यह महत्वपूर्ण है कि इन सभी सीमाओं का ज्ञान प्राप्त किया जाए। इसे अलग अलग शब्दों के द्वारा व्यक्त किया जा सकता है। यह तीव्रता जितने शब्दों से प्रकट की जाती है। उतने ही खंड पैमाने बन जाते हैं। यहां पांच खंडो के पैमाने का उदाहरण किया जा रहा है।
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पूर्णतः पंसद 2 पसंद 3 अनिश्चित 4 नापसंद 5 पूर्णतः नापसंद ।
यहां तीव्रता मापने के लिए सात खंडों के भी पैमाने बनाए जा सकते हैं इस पैमाने के मध्य की स्थिति को शून्य का भार प्रदान किया जाता है। इसके दोनो ओर 1 2 3 आदि शब्दों का प्रयोग होता है। ये अंक धन अथवा ऋण में प्रदान किए जाते है। तीव्रता मापक पैमाने दो प्रकार के होते है। एक सम विस्तार और एक असम विस्तार पैमाना। उपरोक्त पांच खंडों वाला पैमाना समय विस्तार पैमाना है क्योंकि इसमें भिन्न भिन्न खंडों का विस्तार समान है तथा तटस्थ बिंदु का अंक शून्य है । असमान विस्तार वाले पैमाने में भार एक क्रमानुसार होता है, जिसमें माप शून्य से आरंभ होकर आगे बढ़ती जाती है। यहा कोई जरूरी नहीं कि दोनों खंडों के बीच का विस्तार समान हो । इन दोनेां प्रकार के पैमानों को दो विद्वानों ने अलग अलग तरीके से वर्णित किया है।
1 थर्सटन का समय विस्तार पैमाना-
 
यह पैमाना सबसे पहले एल एल थर्सटन द्वारा किसी समूह की राय जानने के लिए किया गया था। यह पैमाना आवृत्ति बंटन के रूप में होता है। इसकी आधार रेखा प्रवृत्तियो के पूर्ण विस्तार को समान खंडों में प्रकट करती है। सम विस्तार प्रणाली में इसके एक छोर पर धनात्मक अधिकतम भार बिंदु रहता है। जबकि दूसरे छोर पर ऋणात्मक अधिकतम भार बिंदु रहता है। यहां शून्य भार मध्य बिंदु पर रहता है।
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लाइकर्ट का पैमाना
यह पैमाना भी थर्सटन के पैमाने की तरह ही है, किन्तु उससे अधिक सरल और सुबोध है। लाइकर्ट के तीव्रता मापक पैमाने को तीव्रताओं के योग का पैमाना भी कहा जाता है।
इस प्रणाली में अंक प्रदान करने की एक अन्य विधि को लगाया जाता है जिसे सिगमा विधि कहा जाता है। इसका उपयोग एक गणितीय तालिका के माध्यम से किया जाता है। भिन्न भिन्न विवरणों को अनेक प्रकार के व्यक्तिाओं में बांटकर उनमें पांच खंडों में से किसी एक खंड पर निशान लगाने को कहा जाता है। बाद में हर एक खंड का योग प्रतिशत में निकाल लिया जाता है। हर प्रतिशत का सिगमा मूल्य भी निकाल लिया जाता है।
पदसूचक पैमाना- यह अनुमापन प्रणाली का एक अपरिहार्य पैमाना है। यह तीव्रता मापन पैमाने के सदृश्य होता है। इसमें किसी विशेष तत्व का सभी क्रमों में स्थान निर्धारित किया जाता है। इस पैमाने के जो दो प्रमुख पैमाने है वे इस प्रकार है।
1 तुलनात्मक युग्म - इस विधि के अन्तर्गत व्यवसायों के जोड़े लिखकर सूचनादाता को दिए जाते है। हर जोड़े में से एक पर सहमति का निशान लगवाया जाता है। प्रत्येक व्यवसाय को मिले अंको या प्राथमिकताओं का योग निकाल लिया जाता है। इन सभी के माध्य को पैमाने का मूल्य समझा जाता है।
3 हॉरोविज प्रणाली - हॉरोविज ने जातीय पक्षपात का अध्ययन करने के लिए 12 चित्रों का चयन किया। इसमें से 8 नीग्रो और 4 गोरे बच्चों के थे। ये चित्र स्कूली बच्चों को दिये गये । इन बच्चों को चित्रों को प्राथमिकता के आधार पर उपर से नीचे क्रमानुसार लगाने को कहा गया । उपर से नीचे चित्रों को क्रम से 1 2 3 4 5 आदि अंक दिए गए । हॉरोविज ने इन स्कूली बच्चों में बालकों को भिन्न भिन्न स्थितियों में उन्ही चित्रों में से साथी चुनने का कहा। इस प्रकार प्राथमिकता के प्रतिशत के आधार पर पक्ष या विपक्ष का फैसला लिया गया ।
4 संचार रिक्तता माप पैमाना- इर समाज या समुदाय में  संचार रिक्तता के कारण वर्ग विद्वेष की भावना किसी न किसी रूप में पाई जाती है। प्रायः व्यक्ति अतीत के अनुभवों और आस पास के पर्यावरण से प्रभावित होकर किसी वर्ग के प्रति सकारात्मक नजरिया रखता है। दोनो वर्गो के प्रति द्वेष और निकटता की भावना भी अलग अलग मात्रा में होती है। इस प्रकार की संचार रिक्तता को मापने के लिए संचार रिक्तता पैमाना या सामाजिक दूरी पैमाना का प्रयोग किया जाता है। संचार रिक्तता या सामाजिक दूरी मापने के लिए निम्नलिखित दो प्रकार के पैमाने अधिक प्रचलित है।
1 बोगार्डस का पैमाना- बोगार्डस ने संचार रिक्तता या सामाजिक दूरी को इंगित करने वाले भिन्न- भिन्न संबंधों को चयन किया । इन सभी संबंधों को सात ऐसी श्रेणियों में विभाजित किया गया जो बढ़ती हुई संचार रिक्तता या समाजिक दूरी प्रकट करती थी। यह काम सौ जजों से कराया गया। बाद में ये अनुसूचियों 1725 व्यक्तिओं को दी गयीं। इनमें दक्षिण की ओर प्रजातियों  के नाम लिखे गये। उत्तर की ओर संबंधों या दूरियों की श्रेणियां रखी गई । जैसे व्यवसाय साथी, जीवन साथी, क्लब, साथी आदि बनाने की स्वीकृति। इन सभी व्यक्तिओं को श्रेणियों के सामने चिन्ह लगाने का निर्देश दिया गया । हर श्रेणी के आधार पर प्रजातियों के प्रति मनोवृत्तियों का योग निकालकर प्रतिशत में परिवर्तित किया गया। इस प्रकार भिन्न भिन्न के प्रति संचार रिक्तता या सामाजिक दूरी का औसत निकाला गया । लेकिन इस विधि को कम विश्वसनीय समझा जाता है।
मीडियामितीय पैमाना- इस विधि का प्रयोग भी प्रत्यक्ष- परोक्ष रूप से किया जाने लगा है। यह पैमाना संस्थागत अथवा सामुदायिक अथवा सामूहिक मनोवृत्तियों को मापने में उपयोग किया जाता है। समूह में पारस्परिक संचार एवं संबंधों की माप में यह पैमाना अधिक प्रासंगिक, लाभकारी, उपयोगी और सहायक साबित होता है।
मीडिया या संचार शोध में सामुदायिक, संस्थागत व्यवहार का निम्न लिखित प्रणालियों द्वारा मापा जा सकता है।
1 मीडियामितीय पैमाना - इस प्रणाली की निम्न लिखित विशेषता होती है।
मीडियामितीय एक अनुमापन विधि है, जिसके द्वारा सामूहिक या सामुदायिक स्वीकृति अथवा अस्वीकृति प्रेम अथवा घृणा की सीमा माप ली जाती है।
  यह सामुदायिक, संस्थागत, या सामूहिक संबंधों, मीडियाई या संचारिक संरचना तथा स्थिति के अध्ययन से संबंधित है।
इसके द्वारा सामुदायिक,संस्थागत, सामाजिक तथा समूह सांचारिक व्यवहार की प्रस्तुति रेखाचित्रों अथवा सरल बिंदु रेखाओं द्वारा की जाती है।
इस पैमाने के निर्माण में संस्था का चुनाव माप के पहलू संबंधित तथ्यों का चुनाव एवं भार प्रदानीकरण आदि जैसी महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं का अपनाया जाता है। एक अच्छी मीडियामितीय पैमाने में विश्वसनीयता, वैधता, सरलता, व्यापकता, व्यावहारिकता, आदर्शानुकूलता, और उचित भार की मौजुदगी रहती है।
2 मीडिया की बिंदु रेखीय विधि- मीडिया का बिंदु रेखीय या ग्राफ द्वारा चित्रण पारस्परिक आकर्षण अथवा विकर्षण को प्रकट करने का सरल मीडियामितीय साधन है।
3 मीडिया निर्देशांक- जब मीडिया या संचार से संबंधित एक से अधिक सम्मिलित तथ्यों का तुलनात्मक अध्ययन करना होता है, तो मीडिया निर्देशांको का प्रयोग किया जाता है। सांचरिक अथवा संस्थागत व्यवहार को मापने के लिए मीडियामितीय पैमानों का अधिक परिमार्जित और परिष्कृत रूप निर्देशांक है। इसके द्वारा मीडिया या संचार से संबंधित तथ्यों की माप की इकाई में की जा सकती है तथा एक ही दृष्टि में उनके बारे में जानकारी हासिल की जा सकती है।

Mediaguruji
01 feb2012

     
 


1 टिप्पणी:

  1. बहुत अच्छे ढंग से लिखा है| इससे बहुत मदद मिली है, धन्यवाद|

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